बुद्ध निर्विकल्प जीवन जीने को कहते थे| निर्विकल्पता में आता है कि पात्र में जो दे दिया विधि ने, वहीं खा लेना है। अगर बुद्ध ने अपवाद खड़ा कर दिया होता, तो भिक्षु निर्विकल्पता का पालन करने से मुकर जाते| तो बुद्ध ने कहा, ‘नहीं, अब आ ही गया है माँस तो खा लो। वैसे भी इसको तुमने मारा नहीं’। पर ये समय सापेक्ष बात है | भूल होती है, जब कहते हैं ‘बाज़ार में जो माँस है, हमने तो मारा नहीं,तो हम उसे खाएँगे।’ ये मत कर लेना, ये केंद्रीय, कालातीत बात नहीं|
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भगवान बुद्ध के जीवन से एक कहानी है कि एक भिक्षु के पात्र में माँस का टुकड़ा चील के मुँह से गिर गया और भगवान बुद्ध ने उस भिक्षु को वो माँस खाने के लिए कह दिया। इसी प्रकार रामकृष्ण परमहंस भी मछली खाते थे और जीसस को लेकर भी कुछ ऐसा है। मेरे लिए ये बात समझनी बहुत मुश्किल हो रही है कि बुद्ध माँस खाने का समर्थन कैसे कर सकते हैं।
आचार्य प्रशांत: देखो, गुरु के जीवन और गुरु के शर्त में हमेशा दो हो होते हैं। भूलना नहीं कि तुम जिनकी बात कर रहे हो वो अपने-अपने समय के जीव हैं। वो अपने-अपने समय के जीव हैं।
कुछ बातें उनकी ऐसी होती हैं जो उनके समय और उनके जीवधर्म से ही सम्बन्धित होती हैं। वो बातें सब समय सापेक्ष होती हैं, स्थान सापेक्ष होती हैं। उन बातों का सम्बन्ध सिर्फ़ उस समय से होता है। वो बातें अमर नहीं होतीं। वो बातें सदा के लिए नहीं होतीं। और गुरु के चरित्र में और ग्रन्थों में बहुत बातें ऐसी होती हैं जो सदा के लिए होती हैं, जो काल-निरपेक्ष होती हैं, कालातीत होती हैं। जो स्थान-निरपेक्ष होती हैं, स्थिति निरपेक्ष होती हैं। वो बातें अजर-अमर होती हैं।
दोनों ही तरह के बातें तुम हर गुरु के जीवन में पाओगे। और हर गुरु के साहित्य और शास्त्र में पाओगे। और सभी ग्रन्थों में पाओगे।







