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माँसाहार का समर्थन मूर्खता या बेईमानी? (भाग-5) || 2020
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: जब मेरे मज़हब में कुछ जानवरों के माँस को हलाल बताया गया है तो फिर मैं माँस क्यों ना खाऊँ?

आचार्य प्रशांत: हलाल बताया गया है माने अनुमति ही तो दी गई है न, अनिवार्य तो नहीं कर दिया गया। अलाउड और कंपलसरी में अंतर होता है न। और बहुत बड़ा अंतर होता है। किसी बात की तुमको अनुमति दे दी गई है इसका मतलब यह नहीं कि वह बात तुम्हारे लिए अनिवार्य कर दी गई।

और कई बार अनुमति इसलिए भी दे दी जाती है क्योंकि यह माना जाता है कि इतनी बुद्धि तुम्हें होगी कि तुम स्वयं ही उस अनुमति का गलत और मूर्खतापूर्ण इस्तेमाल ना कर लो।

उदाहरण के लिए फुटबॉल के मैच में यह अलाउड तो है न कि तुम विपक्षी टीम के किसी खिलाड़ी को पास दे सकते हो, यह अलाउड तो है ही। अगर तुम ऐसा करोगे तो कोई पेनाल्टी तो नहीं पड़ेगी तुमको। ऐसा तो नहीं होगा कि रैफरी कार्ड दिखाकर तुमको मैदान से बाहर निकाल देगा।

तो टेक्निकली (तकनीकी रूप से) किताब में तो इस बात की अनुमति है। अनुमति माने अलाउड है, अनूज्ञा है। अनुमति है कि तुम विपक्षी टीम के खिलाड़ी को भी पास दे सकते हो और तुम ऐसा करो तो खेल चलता रहेगा। रेफरी तुम्हें रोकेगा नहीं, तुमने कोई फॉल्ट नहीं कर दी। है न?

होना यह चाहिए था कि तुम सही खेलते। तुम अपनी ही टीम के अपने साथी को पास देते। तुम दे रहे हो पास बार-बार विपक्षी टीम के खिलाड़ी को और तर्क भी यह दे रहे हो कि जो रूलबुक है सौकर की, जो किताब है, उस किताब में कहीं भी तो वर्जित नहीं किया गया न कि विपक्षी खिलाड़ी को पास नहीं देना है। बिलकुल वर्जित नहीं किया गया है। यह बात तो तुम्हारी बुद्धि पर, तुम्हारी कॉमन-सेंस पर छोड़ दी गई है कि यह काम हम वर्जित तो नहीं कर रहे पर ऐसा करना थोड़े ही है। नहीं है न?

तो अनिवार्य और अनुज्ञेय यह बहुत अलग-अलग बाते हैं और इनका अर्थ बहुत ध्यान से समझो। अलग-अलग अर्थ है। अनिवार्य माने कंपलसरी अनुज्ञेय माने छूट दे रखी है, तुम्हारी बुद्धि पर छोड़ दिया गया है कि खुद ही समझ लो कि करना है कि नहीं करना है।

क्रिकेट खेल रहे हो तुम, ठीक है? और चार-सौ के लक्ष्य का पीछा कर रहे हो पचास ओवर में। तुम सौ डॉट बॉल खेल जाओ, माने तुम सौ गेंदे ब्लॉक कर दो बिना एक भी रन बनाए। अंपायर उंगली उठा करके तुमको आउट तो नहीं करार देगा।

किताब के हिसाब से तो तुम कोई अपराध नहीं कर रहे लेकिन अक्ल के हिसाब से तुम बहुत बड़ा अपराध कर रहे हो। तो हर अपराध किताब में लिखा हुआ नहीं होता। किताब बहुत बातों पर मामला तुम्हारी बुद्धि पर छोड़ देती है। किताब कहती है कि जिस ऊपर वाले ने तुमको बनाया है, उसने तुमको बुद्धि भी देकर बनाया है। कुछ अपनी बुद्धि का भी इस्तेमाल करोगे या नहीं?

और अगर तुम अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं कर रहे तो यह तुम्हें बनाने वाले के प्रति कोई सम्मान तो नहीं हुआ न।

सोचो बनाने वाले ने एक ऐसी चीज़ बनाई जो ज़बरदस्त मेधा, प्रज्ञा, बुद्धि, विवेक पर चलती है। तो यह हुआ न उस बनाने वाले के प्रति सम्मान, कि देखो क्या कमाल की चीज़ उसने बनाई है इंसान। और यही ऊपर वाले ने जो चीज़ बनाई है वह बिलकुल बुद्धू हो करके चले, ऊपर वाले की दी हुई बुद्धि का ज़रा भी इस्तेमाल ना करे, तो यह बात तो ऊपर वाले को भी जरा जचेगी नहीं।

हर वह चीज़ जो साफ-साफ मना नहीं कर दी गई उसको करने नहीं लग जाते। टेनिस में यह मना तो नहीं है न कि तुम सर्विस करोगे दस किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से। बिलकुल मना नहीं है। करोगे क्या? कुछ अपनी भी बुद्धि है या नहीं है? या यह कहोगे कि, "किताब में वर्जित नहीं है, किताब में मना नहीं किया गया है इसीलिए हम तो करेंगे"?

दिन भर तुम इतने काम करते हो, कोई भी दुनिया की किताब, किसी भी धर्म, किसी भी मज़हब की किताब हर काम का कैसे लेखा-जोखा रख लेगी? दिन भर के तुम्हारे काम सही हों इसके लिए तुम्हें लगातार ऊपर वाले को याद करके अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना होगा।

दोनों बातें एक साथ: याद उसकी रहनी चाहिए जिसको तुम कह रहे हो कि उसने तुम्हें बनाया है और इस्तेमाल अपनी बुद्धि का होना चाहिए। लेकिन यहाँ पर तो दुर्बुद्धि है। तुम अपनी बुद्धि की जगह अपनी रक्त लोलुप वृत्ति का इस्तेमाल कर रहे हो।

खून के प्यासे हो, जानवरों का तुम्हें माँस खाना है और इसके लिए तुम सहारा ले रहे हो धार्मिक किताब का। धार्मिक किताब का पालन तुम और कितनी चीज़ों में करते हो? पता नहीं कितनी ही बातें होंगी, कितने ही मुद्दे होंगे जहाँ पर तुम धार्मिक पुस्तक का उल्लंघन करने से बाज नहीं आते। लेकिन जब जानवर को चीरना है, फाड़ना है, उसके माँस में मसाला मिलाकर स्वाद के मज़े लेने हैं तो तुम कह रहे हो कि, "मैं इसलिए करता हूँ क्योंकि किताब का आदेश है।" किताब का कोई ऐसा आदेश तो नहीं है। किताब ने कहीं कहा कि अगर तुम जानवर को नहीं मारोगे तो तुम कम धार्मिक हो जाओगे?

दुनिया की कौन सी ऐसी किताब है, बताना। कहीं कोई ऐसी किताब नहीं है जिसने अनिवार्य, कंपलसरी कर रखा हो जानवरों को मारना। दुनिया की किसी धार्मिक किताब में लिखा है क्या कि जब केला खाना तो छिलका उतारकर खाना? तो क्या केले को छिलके समेत खा जाओगे? कहोगे कि, "किताब में तो लिखा नहीं है कि छिलका उतारना है या किताब में तो अनुमति दी गई है छिलका खाने की"? नहीं भाई, देने वाले ने दिल भी दिया है, दिमाग भी दिया है। कुछ इस्तेमाल करो न।

कुछ किताबें हैं, वो साफ-साफ कहती हैं नहीं मारना है और कुछ किताबें हैं जो बात तुम्हारी बुद्धि, तुम्हारे विवेक, तुम्हारे कॉमनसेंस पर छोड़ देती हैं, कुछ उसका इस्तेमाल भी करो।

प्र२: अगर एक गाय के सामने माँस रख दिया जाए तो वह तो नहीं खाएगी पर अगर एक शेर या इंसान के सामने रख दिया जाए तो वह खा लेते हैं, इसका मतलब यह है कि माँस खाना इंसान की कुदरती फितरत है।

आचार्य: नहीं साहब, आप जो उदाहरण दे रहे हैं वह कहीं से भी जायज़ नहीं है। गाय के सामने माँस रखेंगे वह नहीं खाएगी यहाँ तक बात ठीक है, शेर के सामने माँस रखेंगे वह खा लेगा यह बात भी ठीक है लेकिन इंसान के सामने रखेंगे तो वह खा लेगा यह बात ज़रा ठीक नहीं है।

आप किस इंसान की बात कर रहे हैं? एक जैन के सामने माँस रख कर देखिए कि वह माँस को खाएगा या आपको घूरने लग जाएगा। और कोई ऐसा जिसे माँस खाने की खूब शिक्षा मिली हो, खूब उसकी आदत लगी हो, संस्कार हो उसके माँस खाने के, उसके सामने आप माँस रख कर देखिए तो वह आपको धन्यवाद दे देगा।

तो इंसान इंसान में अंतर है, गाय गाय में अंतर नहीं है। कोई गाय माँस नहीं खाएगी। शेर शेर में भी अंतर नहीं है, सब शेर माँस खाते हैं। पर इंसान इंसान में अंतर है। इंसान इंसान में क्या अंतर है? इंसान इंसान में संस्कारों का अंतर है, कंडीशनिंग का अंतर है। उसके दिमाग में क्या बात भर दी गई है, इस बात का अंतर है।

गाय के दिमाग में आप कोई बात भर नहीं सकते, शेर के भी दिमाग में आप कोई बात नहीं भर सकते। इंसान अलग होता है हर जानवर से। इंसान के पास चेतना होती है। और उस चेतना को और शुद्ध किया जा सकता है या फिर उस चेतना को और अशुद्ध किया जा सकता है। सब इस पर निर्भर करता कि आपने इंसान के दिमाग में क्या बातें डाल दी हैं, उसी को कहते हैं ज्ञान या अज्ञान। समझ रहे हैं?

तो इंसान माँस खाएगा या नहीं खाएगा, इंसान प्राकृतिक तौर पर माँसाहारी है या नहीं है, यही अगर जाँचना है तो उसका ज़्यादा अच्छा तरीका है कि किसी वयस्क इंसान की जगह किसी छोटे बच्चे के सामने माँस रख कर देखिए, बिलकुल छोटा होना चाहिए बच्चा। और आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि इस तरह के बहुत प्रयोग किए जा चुके हैं। आप चाहें तो अपने घर में भी कर सकते हैं। बिलकुल छोटे बच्चे के सामने माँस रख कर देखिए। वह बिलकुल दूर भागेगा, रोने लगेगा, खाना नहीं चाहेगा।

छोटे बच्चे के सामने आप माँस रख दीजिए और सेब रख दीजिए और देखिए वह किस तरफ को लपकता है। छोटे बच्चे के सामने आप अंगूर रखिए, केला रखिए, तोता रखिए और खरगोश रखिए और फिर देखिए कि क्या वह आपके घर का छोटा सा बच्चा लपक करके तोते की गर्दन मरोड़ देता है, खरगोश की खाल फाड़ देता है या खरगोश के साथ खेलने लग जाता है, तोते को देखकर हँसने लगता है और केले को खा लेता है, अंगूर को खा लेता है।

मैं बहुत छोटे बच्चे की बात कर रहा हूँ। बच्चा एक साल-दो साल का होना चाहिए। ऐसे बच्चे की बात नहीं कर रहा हूँ जिसके मुँह में आपने माँस और शोरबा डाल-डाल कर उसे माँसाहारी बना ही दिया है पहले ही। ऐसे बच्चे की बात नहीं कर रहा हूँ। तो बच्चों पर प्रयोग करके देख लीजिए, आपको पता चल जाएगा कि इंसान भी कुदरती तौर पर माँसाहारी है या शाकाहारी है। गलत तर्क ना दें।

प्र३: इतने सारे लोग हैं जो जानवरों के माँस से ही आमदनी करते हैं, यही उनका रोजगार है और आप कह रहे हैं कि माँस-भक्षण कम हो जाए। अगर माँसाहार कम हो गया तो इतने सारे बेचारे लोगों का रोजगार नहीं छिन जाएगा?

आचार्य: (व्यंग्य करते हुए) अरे! बड़ा गलत हो जाएगा। फिर तो जितने नियम कानून हैं यह सब हटा दिए जाने चाहिए। और सारी पुलिस फोर्स भी हटा दी जानी चाहिए। क्योंकि पुलिस और कर क्या रही है। जितने भी गुंडे-मवाली, बलात्कारी, हत्यारे हैं इन सब का रोजगार छीन रही है।

तुरंत आपको तर्क देना चाहिए न कि हत्यारों का रोजगार क्यों छीना जा रहा है, पुलिस को हटाओ। भाई, हत्या करो उसके पैसे भी तो मिलते हैं। कोई और हो सकता है पैसे दे रहा हो कि जा कर उसकी हत्या कर दो। या यह भी हो सकता है जिसकी आप हत्या कर रहे हो उसके पैसे लूट ले जा रहे हो।

चोरी भी तो बहुत बड़ा रोजगार है तो क्यों कानून बना रखा है कि चोरों को जेल में डालना है? ऐसा कानून हटाओ। यह कानून तो बेरोजगारी बढ़ा रहा है। जवानों के पास वैसे ही नौकरियाँ नहीं हैं, ऊपर से आपने चोरी को गैरकानूनी कर दिया। बताइए, बेरोजगारी बढ़ाई जा रही है। यह क्या तर्क दे रहे हो?

रोजगार माने कोई भी ऐसा काम जिससे आप पैसा कमाते हो। है न? तो पैसा कमाने का कोई जायज़-नाजायज़ ज़रिया होगा या नहीं होगा। या हर ज़रिया तुम्हारी नज़र में जायज़ ही है, उचित ही है?

अगर बात यही है कि कोई पैसा कमाए तो पैसा तो कोई ऐसे भी कमा सकता है कि तुम्हारे कपड़े उतरवा ले जाए, तब उसे रोकोगे या नहीं रोकोगे? या यह कहोगे कि, "इस बेचारे का तो यही रोजगार है मैं इसको क्यों रोकूँ"?

उचित-अनुचित भी कोई बात होती है या यूँ ही रोजगार रोजगार करते रहोगे? यह कैसा प्रश्न है!

प्र४: अगर कोई जंगल में ही रहता हो तो वो शाकाहारी कैसे हो सकता है?

आचार्य: अगर कोई जंगल में ही रहता हो तो वो यूट्यूब नहीं देखेगा। तो मैं उससे बात नहीं कर रहा हूँ। जो जंगल में ही रहता होगा उससे मैं अलग बात कर लूँगा। जंगल की किसी भाषा में जंगल के किसी तरीके से उसको समझा लूँगा मैं।

अभी मैं तुमसे बात कर रहा हूँ। तुम जंगली हो? तुम जंगल में रहते हो? तुम जंगल में रह करके अपना सवाल व्हाट्सएप कर रहे हो मुझे?

तुम रहते हो शहर में, जहाँ तुम खरीद-खरीद कर माँस खाते हो लेकिन अपनी इस हरकत को जायज़ ठहराने के लिए तुम न जाने किस जंगली का उदाहरण ले कर के आ रहे हो। कि जो सिर्फ जंगल में रहता है, कौन है ऐसा जो सिर्फ जंगल में रहता है? कौन है वह? उससे अलग से बात होगी।

और तुम्हें क्या लगता है, जो सिर्फ जंगल में रहते हैं उनके लिए क्या ज़्यादा आसान है फल पाना, पत्तियाँ पाना सब्जियाँ पाना या जानवर का माँस पाना, बताओ ज़रा? अगर जंगल में भी हो तुम तो तुम्हें ज़्यादा आसानी से क्या मिलेगा, फल, पत्ती, या तुम ज़्यादा आसानी से हिरण को दौड़ा कर पकड़ लोगे?

सच्चाई तो यह है अगर तुम्हारे पास कटा-कटाया अगर मुर्गा, बकरा ना आए, तुमसे कहा जाए खुद ही जाओ मुर्गे को दौड़ा कर पकड़ लो और नंगे हाथों से उसको फाड़ करके उसका माँस निकाल करके और नंगे ही हाथों से पत्थर को घिस करके, आग जला करके, लकड़ी में मुर्गे को पका करके खा लो, तो तुम खा लोगे क्या?

पेड़ से फल तोड़ना आसान है या जंगली पशु को दौड़ा करके पकड़ लेना आसान है? अपने-आपको देखो और जंगली पशु को देखो। यहाँ तो शहर में तुम बहुत तरीकों का इस्तेमाल करके उस पशु को नियंत्रण में कर लेते हो, जंगल में कैसे कर लोगे उसको तुम नियंत्रण में?

यहाँ तो तुम गाय-भैंस-भैंसा जो पाते हो उसके नकेल डाल देते हो, वह तुम्हारे नियंत्रण में आ जाता है, जंगल में जा करके ज़रा जंगली भैंसे को पकड़ना कि आज इसका माँस खाना है। और फिर देखना कि कौन बचता है किसका माँस खाने के लिए।

जो आदमी जंगल में है वह तो और ज़्यादा शाकाहारी हो जाएगा भाई! और भूलो नहीं कि तुम नहीं हो जंगल में। तुम शहर में हो और माँस चबाने के लिए व्यर्थ कुतर्क कर रहे हो अभी।

प्र५: देखिए जंगल में बहुत कम माँसाहारी जानवर बचे हैं तो जो शाकाहारी जानवर हैं उन्हें कौन खाएगा? और अगर हमने उन्हें खाया नहीं तो वह इतने बढ़ जाएँगे, इतने बढ़ जाएँगे कि पूरी पृथ्वी पर छा जाएँगे। उदाहरण के लिए: टिड्डियों का हमला। देखिए यह जो टिड्डियाँ हैं यह माँसाहारी तो है नहीं, टिड्डियाँ शाकाहारी हैं। अब हमें खाना पड़ेगा न शाकाहारियों को, नहीं तो यही सब छा जाएँगे दुनिया पर।

आचार्य: इससे ज़्यादा भी मूर्खता की बात तुम कर सकते थे? टिड्डी चबाना चाहते हो? और टिड्डीयों को चबा-चबा कर तुम टिड्डीयों का हमला रोक लोगे? कुछ पढ़े-लिखे हो या नहीं हो?

टिड्डियाँ कहाँ से आ रही हैं? टिड्डियाँ आ रही हैं पूर्वी अफ्रीका से, मध्य-पूर्व से, ईस्ट अफ्रीका और मिडल ईस्ट एशिया से। वहाँ से कैसे आ रही हैं, कारण समझो।

यह जो भारतीय महासागर है इसके दो हिस्से हैं और उन दोनों हिस्सों के बिलकुल बीच में पड़ता है भारत, इंडियन पेनिनसुला। जो पश्चिम की तरफ का हिस्सा है, वह ज़्यादा गर्म रहता है तुलना में पूर्वी हिस्से के। ठीक है? इसको बोलते हैं: ' इंडियन ओशियन डाई पोल '। पिछले दो-तीन सालों में यह जो अंतर है पश्चिम और पूर्व के तापमानों में, यह ज़्यादा बढ़ गया है। उसका एक बड़ा कारण क्लाइमेट चेंज भी हो सकता है।

लगभग दो डिग्री सेंटीग्रेड का अंतर आ गया है। तो भारत के पश्चिम की तरफ जो भारतीय महासागर का क्षेत्र है वह बहुत ज़्यादा गर्म हो गया है। और जो भारत के पूर्व की तरफ जो क्षेत्र है भारतीय महासागर का वह थोड़ा कम गर्म है। जितना ज़्यादा गर्म होता जाता है सागर उतना उसमें से भाप उठती है। उस भाप में ऊर्जा होती है, फिर उससे बारिश भी होती है, अंधड़ आते हैं तूफान आते हैं।

तो ऐसी जगहों पर अंधड़ आने लगे हैं और भारी वर्षा होने लग गई है जो बंजर रेगिस्तान है। जहाँ कभी बारिश नहीं होती थी वहाँ बारिश होने लग गई है क्योंकि वहाँ महासागर का तापमान बढ़ गया है।

यह जो भारत के पश्चिम की तरफ भारतीय महासागर है, यह किन क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है? यह जुड़ा हुआ है जो अरेबियन पेनिनसुला है, अरेबियन प्रायद्वीप है, और अफ्रीका के पूर्वी तट से। तो उन क्षेत्रों में पिछले दिनों में बहुत ज़बरदस्त बारिश हुई। ऐसी बारिश हुई कि रेगिस्तान के बीच में तालाब बन गए। रेगिस्तान के बीच में तालाब बन गए इतनी ज़्यादा बारिश हुई, जो कि आमतौर पर होती नहीं है।

अब यह जो पानी, तालाब और उमस का पूरा माहौल बना यह टिड्डियों के प्रजनन के बहुत अनुकूल होता है तो इसलिए इतनी सारी टिड्डियाँ वहाँ पैदा हुई। वहाँ पैदा हुई और फिर वहाँ से पूर्व की ओर निकल पड़ी। तो फिर ईरान पाकिस्तान सब पार करते हुए वह पहुँच गई राजस्थान और फिर पूरा हिंदुस्तान। ऐसे आ रही है टिड्डी।

टिड्डियों का संबंध इससे थोड़े ही है कि टिड्डियों को खाने वाले जो जानवर थे वो कम हो गए हैं, तो अब इंसान उन टिड्डियों को खाए। यह किस तरीके का तर्क है? कहाँ से आ रहा है यह तर्क? या कि ज़बान के स्वाद के इतने गुलाम हो गए हो कि कोई भी मूर्खतापूर्ण तर्क देने लग जाओगे? तुम कह रहे हो कि जितने भी माँसाहारी जानवर थे वह सब विलुप्त हो गए हैं।

विलुप्त भी कैसे हुए हैं कुछ सोचा है तुमने? शेरों की, चीतों की, बाघों की संख्या इतनी कम क्यों हुई है? उनकी संख्या इतनी कम इसलिए हुई है क्योंकि आदमी ने उनके जंगलों को काट डाला। वो रहे कहाँ, वह प्रजनन कहाँ करें? एक शेर अपने रहने के लिए काफी बड़ा क्षेत्र माँगता है। ऐसा नहीं है कि तुम एक छोटे से क्षेत्र में चाहोगे कि पाँच शेर एक साथ रह लें भाईचारे में, तो वह रह लेंगे, नहीं रहेंगे।

एक क्षेत्र होता है, एक एरिया होता है उस पर एक ही बाघ रहेगा या एक ही शेर रहेगा या शेरों का एक छोटा सा दल या परिवार रहेगा। अब तुम अगर जंगल का क्षेत्रफल ही कम कर दोगे तो कहाँ रहेगा बाघ और कहाँ रहेगा शेर?

तो अब पूछो कि तुमने इतने जंगल काटे क्यों, इतने कम क्यों करे। दुनिया भर में यह जो जंगल काटे गए हैं या कम किए गए हैं यह इसीलिए किए गए हैं ताकि जंगल की उस भूमि पर खेती की जा सके और जैसा कि पिछले सत्रों में मैंने स्पष्ट किया है कि सत्तर प्रतिशत खेती की जाती है उन जानवरों को खिलाने के लिए जिनका तुम आगे चलकर के माँस खाओगे। तो शेर, चीते अगर कम हो रहे हैं तो उसकी वजह यह है कि तुमको भैंसे का, बकरे का, सूअर का, गाय का माँस खाना है।

तुम्हें यह बात समझ में ही नहीं आ रही है। न जाने क्या टिड्डियों वाला तर्क दे रहे हो।

प्र५: यह तो मुर्गे और बकरे की ज़िंदगी का फ़र्ज़ है कि वो इंसान को अपना गोश्त प्रदान करें और जब हम किसी मुर्गे या बकरे को काटते हैं तो उसके बाद उन्हें जन्नत नसीब होती है।

आचार्य: ऐसी बात का कोई भी जवाब देना जवाब का ही अपमान होगा। तो मैं इतने घोर कुतर्क को बस पास कह सकता हूँ। आगे बढ़ो भाई! ऐसी बातों का कोई जवाब नहीं है।

प्र६: क्लाइमेट चेंज कोई नई चीज़ तो है नहीं। वह प्रकृति के चक्र का ही एक हिस्सा है और अगर कुछ जानवर या उनकी पूरी प्रजातियाँ ही विलुप्त हो जाएँगे तो इसमें बड़ी बात क्या है? डायनासोर भी तो विलुप्त हुए थे और उन्हें प्रकृति ने ही मारा था।

आचार्य: हाँ, अतीत में न जाने कितनी प्रजातियाँ हैं जीवों की जो विलुप्त हुई हैं पर उनके कारण प्राकृतिक थे। इस बार जो कारण है वह प्राकृतिक नहीं है। इस बार कारण इंसान है। इसीलिए ग्लोबल वार्मिंग को सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग नहीं बोलते, उसको बोलते हैं एंथ्रोपोजेनिक (मनुष्यजनित) ग्लोबल वार्मिंग, माने आदमी द्वारा लाया गया *क्लाइमेट चेंज*। यह हम कर रहे हैं। हम कर रहे हैं तो हमारी कोई ज़िम्मेदारी भी तो बनती है न, अपने किए को ठीक करने की?

तुम कह रहे हो, "क्या फ़र्क़ पड़ता है इतनी प्रजातियाँ पहले विलुप्त हो गई, इतने जानवर खत्म हो गए, डायनासोर भी तो खत्म हुए थे अभी और जानवर खत्म हो जाएँगे तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा।"

फ़र्क़ पड़ेगा या नहीं पड़ेगा वह तो इस पर निर्भर करता है कि तुममें इंसानियत कितनी है। कोई और जीव खत्म हो रहा है तो तुम कह रहे हो क्या फ़र्क़ पड़ता है। तुम्हारे दोस्त-यार खत्म होने लगे तब कहोगे, क्या फ़र्क़ पड़ता है? तुम्हारा अपना बच्चा खत्म होने लगे तब कहोगे क्या फ़र्क़ पड़ता है?

तो इंसान और इंसान में यही अंतर होता है। किसी को फ़र्क़ सिर्फ तब पड़ता है जब उसका बच्चा खत्म होने लगता है और किसी को तब भी फ़र्क़ पड़ता है जब किसी दूसरे जीव का बच्चा खत्म होने लगता है।

तुम ही खत्म होने लग जाओ तब भी कहोगे क्या कि " क्या फ़र्क़ पड़ता है, इतनी प्रजातियाँ आईं इतनी प्रजातियाँ चली गईं, डायनासोर भी तो चले गए, मैं भी चला जाता हूँ"?

तुम्हारी हत्या हो रही हो, तुम राजी-राजी खुशी-खुशी तैयार हो जाओगे? अभी तुम्हें पता चल जाए तुम्हें कैंसर है और जाने वाले हो, तब कहोगे, "क्या फ़र्क़ पड़ता है"? तब तो इधर-उधर भागोगे कि कुछ इलाज हो जाए पर दूसरे जीव खत्म हो रहे हैं तो कह रहे हो कि क्या फ़र्क़ पड़ता है।

"इतना लंबा प्रकृति का चक्र रहा है इतने जीव आए, इतने चले गए" बड़ा दर्शन बता रहे हो, बड़े फिलॉस्फर (दार्शनिक) हो गए। बस जब अपने घर की बात आएगी, अपने दोस्त यारों की बात आएगी, अपनी ज़िंदगी की बात आएगी तब सारी फिलॉसफी गुम हो जाएगी।

थोड़ा दिल रखो, थोड़ी करुणा रखो, इंसान बनो। क्रूरता और स्वाद के पीछे इतने मूर्खता भरे तर्क मत दो।

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