रुला देने वाले अनुभव || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मैं आपको पिछले दो महीने से सुन रही हूँ और मेरी जो एक तलाश थी सत्य की, करुणा की और विसडम (बोध) की, वो आप पर आकर ख़त्म हुई है। मैं बचपन से ही मुझे, मैं गौतम बुद्ध की तरफ़ देखती थी और मुझे वही अनुभव आपसे अब मिल रहा है।
और मेरा जो शायद अन्तर्मन है उसे इतनी शान्ति मिली है ये जानकर कि कोई सच्चे तरीक़े से सारे जीवों के लिए, के प्रति प्रेम और दया और करुणा और रेस्पेक्ट (सम्मान) ज़ाहिर कर रहे हैं, जो सारे जीवों के हित के लिए कितना कुछ कर रहे हैं और कितने सारे जो लोग हैं, जो मॉंस खाते हैं या मॉंस पहनते हैं।
आप उनकी जो इग्नोरेंस (अनभिज्ञता) हैं, उनकी जो भावनाएँ हैं, वो बदल रहे हैं और मुझे उससे इतनी ख़ुशी मिलती है कि मैं शायद उसको शब्दों में भी बयान नहीं कर पाऊँगी, शब्द भी कम पड़ जाएँगे उसके लिए। लेकिन मैं बचपन से ही बहुत ज़्यादा भावुक रही हूँ और मेरे कोई दोस्त नहीं थे।
मेरे जो दोस्त थे वो मेरे जो घर के सामने जो कुत्ते थे, मैं उन्हीं के साथ बड़ी हुई हूँ एक तरीक़े से, उन्हीं की संगति में रही हूँ। लोग बहुत बार मेरा मज़ाक उड़ाते थे ये कहकर कि ये जानवरों को और इंसानों को एक जैसा कैसे मान सकती है और मेरे मन में बहुत सारे प्रश्न उठते थे कि लोग ऐसा क्यों उनके साथ, जितने भी जानवर हैं उनके साथ ऐसा कर रहे हैं क्योंकि एक तरह से जैसे आप भी बोलते हैं कि हम इंसानों ने अपनी आबादी इतनी बढ़ा ली है और हम प्रकृति को ऐसे नष्ट किये जा रहे हैं और हमने और हमारी जो भूख है वो ख़त्म ही नहीं होती।
वो बढ़ती ही जा रही है, बढ़ती ही जा रही है और हमने मतलब इतनी ज़्यादा ज़मीन है उस पर कब्जा किया है, मतलब मेरे को वो शर्म आती है, हम लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं कि एक मासूम जानवर जिसको, जो हाथ सेवा के लिए बने हैं, जिन्हें उनकी सेवा करनी चाहिए, वो उन्हें ही कष्ट दे रहा है।



