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रुला देने वाले अनुभव || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मैं आपको पिछले दो महीने से सुन रही हूँ और मेरी जो एक तलाश थी सत्य की, करुणा की और विसडम (बोध) की, वो आप पर आकर ख़त्म हुई है। मैं बचपन से ही मुझे, मैं गौतम बुद्ध की तरफ़ देखती थी और मुझे वही अनुभव आपसे अब मिल रहा है।

और मेरा जो शायद अन्तर्मन है उसे इतनी शान्ति मिली है ये जानकर कि कोई सच्चे तरीक़े से सारे जीवों के लिए, के प्रति प्रेम और दया और करुणा और रेस्पेक्ट (सम्मान) ज़ाहिर कर रहे हैं, जो सारे जीवों के हित के लिए कितना कुछ कर रहे हैं और कितने सारे जो लोग हैं, जो मॉंस खाते हैं या मॉंस पहनते हैं।

आप उनकी जो इग्नोरेंस (अनभिज्ञता) हैं, उनकी जो भावनाएँ हैं, वो बदल रहे हैं और मुझे उससे इतनी ख़ुशी मिलती है कि मैं शायद उसको शब्दों में भी बयान नहीं कर पाऊँगी, शब्द भी कम पड़ जाएँगे उसके लिए। लेकिन मैं बचपन से ही बहुत ज़्यादा भावुक रही हूँ और मेरे कोई दोस्त नहीं थे।

मेरे जो दोस्त थे वो मेरे जो घर के सामने जो कुत्ते थे, मैं उन्हीं के साथ बड़ी हुई हूँ एक तरीक़े से, उन्हीं की संगति में रही हूँ। लोग बहुत बार मेरा मज़ाक उड़ाते थे ये कहकर कि ये जानवरों को और इंसानों को एक जैसा कैसे मान सकती है और मेरे मन में बहुत सारे प्रश्न उठते थे कि लोग ऐसा क्यों उनके साथ, जितने भी जानवर हैं उनके साथ ऐसा कर रहे हैं क्योंकि एक तरह से जैसे आप भी बोलते हैं कि हम इंसानों ने अपनी आबादी इतनी बढ़ा ली है और हम प्रकृति को ऐसे नष्ट किये जा रहे हैं और हमने और हमारी जो भूख है वो ख़त्म ही नहीं होती।

वो बढ़ती ही जा रही है, बढ़ती ही जा रही है और हमने मतलब इतनी ज़्यादा ज़मीन है उस पर कब्जा किया है, मतलब मेरे को वो शर्म आती है, हम लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं कि एक मासूम जानवर जिसको, जो हाथ सेवा के लिए बने हैं, जिन्हें उनकी सेवा करनी चाहिए, वो उन्हें ही कष्ट दे रहा है।

और वो बिलकुल कभी-कभी सहा नहीं जाता, कभी-कभी पढ़ने में आता है कुछ और मेरे आचार्य जी दो ही हाथ हैं, मैं जो भी कर सकती हूँ करती हूँ। लेकिन फ़िर भी बहुत ज़्यादा ग्लानि होती है। अभी हाल ही में मेरे पास एक नन्ही सी, एक परी थी जो मुझे एक स्ट्रीट में मिली थी और मैं अपनेआप को बहुत सौभाग्यशाली मानती हूँ कि वो मुझे मिली क्योंकि शायद लोग मोती खोजने के लिए बहुत दूर जाते हैं और जो अनमोल, जो भगवान की कृपा ख़ुद मेरे पास चलकर आयी, लेकिन वो इतनी कष्ट में थी कि मैं शायद बयान भी नहीं कर सकती।

वो पता नहीं उसे कोई अनडिटेक्टिव डिज़ीज़ (अप्रत्याशित बीमारी) था, मैंने उसको बहुत सारे डॉक्टर्स के पास में लेकर गयी। वो इतनी प्यारी बिल्ली थी, खेलती थी मस्त, जैसे कि कोई इंसान का बच्चा था, बिलकुल वैसी ही उसके अन्दर मासूमियत थी। उसे शिकार करना भी नहीं आता था।

वो एक छोटी सी प्यारी सी बिल्ली थी और वो अपनी आख़िरी वक़्त में इतनी सिकुड़ गयी, उसे जो बीमारी थी, उसका जो जो जबड़ा वो भी लॉक हो गया। मुँह खोलने में तब उसको तक़लीफ हो रही थी। मुझे लग रहा था काश कोई तरीक़ा होता कि उसका थोड़ा-बहुत कष्ट मेरे शरीर में आ जाता, तो उसे इतना कष्ट नहीं झेलना पड़ता। और उस दिन मेरे ध्यान में ये आया जो बिल्ली मेरे पास थी, अगर वो आपके पास होती तो उसको जो शान्ति जो उस वक़्त उसके लिए ज़रूरी थी वो प्रदान कर पाते, जो शायद मैं नहीं कर पायी।

आचार्य प्रशांत: आज मुझे हिबा (स्वयंसेवी) ने एक फोटो भेजी। एक बोर्ड लगा हुआ है, सड़क में, दिल्ली में कहीं पर, उसमें लिखा हुआ है, चिकन एंड फिश मार्केट , मंडी। मुर्गा और मछली मंडी और लिखा है कि आचार्य जी आप अपनी आवाज़ का इस्तेमाल करके ये बन्द करवा दीजिए। इतना कर दीजिए। बोली, ‘विनती कर रही हूँ ये बन्द करवा दीजिए।’

तो मैंने उस बात का कोई जवाब ही नहीं दिया। अभी मुश्किल से चार-पाँच घंटे पहले की बात है। फिर अभी आपकी ये बात। मैं कोशिश किया करता हूँ कि मैं काम में लगा रहूँ, मैं इस बारे में कुछ सोचूँ नहीं क्योंकि बड़ी दिक्क़त हो जाएगी अगर पूरी तरह सोचने ही लग गया तो, जितनी देर में आपने अपनी बात कही, बिल्ली के बच्चे की बात कही, उतनी ही देर में कई लाख पशु इंसान ने मार डाले! कई लाख।

मैं कोशिश किया करता हूँ कि मैं सोचूँ नहीं, बस काम करता रहूँ। मैं उस स्थिति से भी डरता हूँ कि कभी ऐसा न हो जाए कि मेरे सामने कोई किसी जानवर की हत्या कर रहा है, मैं चाहता नहीं हूँ वो स्थिति आये क्योंकि वो काम में होने दूँगा नहीं, चाहे उसके परिणाम जो भी हों और परिणाम बहुत दूर तक जा सकते हैं। कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिसमें रुका नहीं जा सकता।

अपनी आँखों के सामने वध हो रहा हो उसको रोकने के लिए किसी भी सीमा तक जाया जा सकता है। फिर जेल, पुलिस चाहे जो हो उसका सामना किया जाना चाहिए। तो वो दिन आये, वो नौबत आये, इस विषय में मैं सोचना नहीं चाहता। बल्कि चाहता हूँ कि कभी ऐसा हो नहीं और मैं सोचने लगता हूँ तो बहुत ज़्यादा बेचैनी उठती है।

ये इतनी सीधी सी बात है, कोई इससे कैसे इनकार कर सकता है कि अगर आप एक कमज़ोर, निर्बल जानवर पर अत्याचार कर सकते हो और आप उसे मार सकते हो, उसका शोषण कर सकते हो किसी भी तरीक़े से या उसे खा सकते हो, तो आप इंसान हो ही नहीं, आप नहीं हो इंसान। आप उसे सिर्फ़ इसलिए सता पाये और खा पाये क्योंकि वो कमज़ोर है।

आपको तो उस जीव को जानवर कहने का कोई हक़ ही नहीं है सबसे बड़े जानवर आप ख़ुद हो। जिनसे ज़रूरत है भिड़ जाने की उनसे तो भिड़ जाने की कभी आपमें हिम्मत हुई नहीं, कायरता की कोई सीमा नहीं। हाँ, कोई छोटा जीव मिल गया, कुछ दुर्बल है, असहाय है, उसके पास आपकी जितनी कुटिलता नहीं है, आपकी जितनी कुबुद्धि नहीं है, वो अपनी रक्षा नहीं कर सकता तो आपने उसको फाँस लिया।

आप उसकी छटपटाहट नहीं देख रहे हैं, आप उसकी आँखों में नहीं देख रहे, फाँसने की भी तो अब नौबत नहीं आती न, फाँसना ही नहीं पड़ता है, उसको पैदा ही करते हैं वध के लिए, तो फाँसना क्या है। वो पैदा ही ज़बरदस्ती किया जाता है, ज़बरदस्ती पैदा करो, फिर उसका शोषण करो, खाओ, मारो, जो भी है।

फिर हमें ताज्जुब होता है कि हमारी ज़िन्दगी में इतना दुख क्यों है। मैं सौ बार बोल चुका हूँ, जब तक हमारे शहरों में कत्लखाने रहेंगे और हमारी सड़कों पर वो गाड़ियाँ चलती रहेंगी जिनमें छोटे-छोटे पिंजड़ों में मुर्गे-मुर्गियाँ क़ैद रहते हैं और वो गाडियाँ बाक़ायदा ठसक के साथ हमारी सड़कों पर चलती हैं, हमारे चौराहों पर खड़ी होती हैं और उनके आस-पास, उनके पीछे इतनी गाड़ियाँ खड़ी होती हैं वो सब देख रही होती हैं कि उनमें मुर्गियाँ बन्द हैं उनको ले जा रहे हैं, उनको भी काटेंगे, उनको खिलाया जाएगा।

जब तक हमारे शहरों, हमारी सड़कों की ये हालत है, तब तक हमें कोई सुख-चैन मिलेगा नहीं। हमारी हालत बहुत बुरी ही रहेगी, सौ तरीक़े से हम अभिशप्त रहेंगे। लेकिन हमारी दरिंदगी कम होने की जगह बढ़ती ही जा रही है। अब तो आप अगर सोशल मीडिया पर जाइए तो वहाँ पर ये नयी चीज़ चली है फूड पोर्न। उसमें अधिकतम यही होता है कि मॉंस दिखाया जाता है और इतने आकर्षक तरीक़े से दिखाया जाता है कि जो लोग मॉंस नहीं भी खाते वो उसकी ओर आकर्षित हों।

तो उसमें दिखाएँगे कि कैसे बहुत सारा पूरा एक कड़ाह भरकर चिकन बना हुआ है फिर कोई आएगा वो उसको खाएगा, कोई आएगा उसको दिखाएँगे कि वो कैसे उसको तैयार कर रहा है और वो सब चीज़ें इतने लुभावने तरीक़े से दिखायी जाएँगी जिसमें कहीं पर भी ये शामिल नहीं होगा कि ये किसी जीव का शरीर है। उस जीव की चीत्कार, उसकी आहें, उसकी छटपटाहट इनका कोई उल्लेख ही नहीं होगा।

तो एक और तो बड़ी ऊर्जा उठती है कि इन सब चीज़ों से अभी तत्काल भिड़ जाया जाए, सीधे आमने-सामने की लड़ाई हो जाए क्योंकि विवश होकर के देखा तो नहीं जाता। दूसरी ओर ये भी पता है कि आमने-सामने की लड़ाई फ़ायदेमन्द नहीं होगी, ऐसे नहीं जीती जातीं लडाइयाँ। अगर उन जीवों के लिए वास्तव में कुछ करना है तो समस्या की जड़ पर ही प्रहार करना होगा। जब तक ऐसी ताक़तें मौजूद हैं जो हमारे भीतर हिंसा को बढ़ावा दे रही हैं, जब तक ऐसी ताक़तें मौजूद है जो हमें ग़लत जीवनदर्शन सिखा रही हैं, हमसे कह रही हैं कि अपने सुख के लिए किसी को चोट पहुँचाना, दर्द देना, दुख देना, जान लेना ठीक है, तब तक ये सब जो चल रहा है चलता ही रहेगा। उन ताक़तों से लड़ना ज़रूरी है जो हमें अज्ञान की ओर फेंकती हैं।

उन्हीं ताक़तों ने पशुओं के शोषण को हर तरीक़े के दुख-दर्द को, मॉंसाहार को और मनुष्यता के पतन को बढ़ावा दे रखा है। ज़्यादातर लोग जो पशुओं के शोषण में उद्यत हैं, वो जानते भी नहीं कि वो कितना बड़ा पाप और व्यभिचार कर रहे हैं। उनको लगता है, ‘ये तो एक सामान्य, साधारण बात है, हर कोई करता है, हम भी कर रहे हैं।’ वो अज्ञान ही हटाना पड़ेगा जो शोषण को जन्म देता है।

प्र: आचार्य जी, जो ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि हम आध्यात्मिक हैं, हम वेद पढ़ते हैं, हम उपनषिद् पढ़ते हैं, हम गीता पढ़ते हैं और उसके बाद भी वो लोग जैसे वेज़िटेरियनिज़्म (शाकाहार दूध सहित) है उसको प्रमोट कर रहे हैं और उसमें एक तरह से गाय है उसको बाँधकर रखा जाता है, एक तरह से जैसे वो दूध देने की सामग्री है और कुछ नहीं है और उनका बहुत शोषण भी किया जाता है।

और ये लोग बोलते हैं हमारी गौशाला है तो हम उनको मारते नहीं हैं लेकिन फिर भी उनको एक दूध देने की सामग्री बना देना भी तो शोषण है, तो फिर कैसे वो अपने अन्तर्मन को मना लेते हैं ये चीज़ करने के लिए। क्योंकि आचार्य जी मेरे को याद है मैं दो हज़ार उन्नीस में मैं घूमने गयी थी बाहर, विदेश यात्रा पर और मैंने हर जगह ढूँढा लेकिन मेरे को बिना फ़र या बिना वूल (ऊन) के जैकेट नहीं मिला तो मेरे को लगा कि मैं ठंड सह लूँगी लेकिन मै किसी मासूम पशु को बस ठंड के लिए मार नहीं सकती। बस थोड़ी चंद समय के लिए अपने शरीर को बचाने के लिए किसी, किसी पशु की हत्या नहीं कर सकती और मैं वहाँ पर क़रीबन नौ-दस दिन तक बिना जैकेट के ही घूमी थी। मेरे पास जैकेट भी नहीं था और मुझे ये समझ नहीं आता कि ये जो ये लोग बोलते हैं कि हम तो कृष्ण की मुरली हैं, हमारे, हमारे थ्रू (माध्यम) जो है वो दिव्य शक्तियाँ बोलती हैं और ये लोग फिर ऐसे कैसे करते हैं, ये लोग बाद में कैसे अपने अन्तर्मन को समझाते हैं, कैसे अपनेआप को फेस (सामना) कर लेते हैं।

आचार्य: अज्ञान सब कुछ करवा देता है, माया धर्म पर भी कब्जा कर लेती है न। आप धर्म के नाम पर ही शोषण करना शुरू कर दोगे, आप शोषण के समर्थन में धर्म का उदाहरण देने लग जाओगे।

प्र: जैसे जो शिव हैं, जिन्हें हम सब पशुपति कहते हैं वो तो सब पशुओं के पति हैं। वो कैसे, वो तो शिव है जो लोग, भक्तों को ये प्रेरणा देते हैं कि भस्म को जिन्हें लोग कहते हैं, ‘अपवित्र है’ शिव के नाम पर लोग उस भस्म को अपने माथे पर लगाते हैं, शिव तो वो हैं जो अमृत, जो विश्व के लिए जिन्होंने विष ग्रहण किया था।

वो शिव कैसे कह सकते है कि आप आइए और मेरे जो शिवलिंग है उस पर आप दूध ही चढ़ाइए और ये लोग तर्क देते हैं कि शिव, शिवलिंग पर दूध चढ़ता है या कृष्ण तो माखन खाते हैं या ये करते हैं लेकिन जो वो भगवान ऐसा क्यो करेंगे और ये जो तर्क देते हैं क्यों देते हैं ऐसा? मतलब एक तरफ़ ये कहते हैं कि हम ये सब पढ़ते हैं और ये सब करते हैं। और बोल रहे हैं कि हम तो महान हैं और फिर ये सब कर रहे हैं।

आचार्य: देखो, समझो बात को। जहाँ आत्मा से जितनी ज़्यादा दूरी होगी, वहाँ अन्याय, अत्याचार, शोषण, अज्ञान उतना ज़्यादा होगा। और अन्याय, अत्याचार, शोषण का ही एक पैमाना होता है पशुओं के प्रति आपका रवैया। हिन्दू धर्म में ये दो बहुत अलग-अलग चीज़ें हैं, एक वेदान्त और दूसरी जो साधारण प्रचलित संस्कृति है। ठीक है?

ये जो साधारण प्रचलित संस्कृति है इसका वेदान्त और आत्मा से बहुत कम सम्बन्ध है। फिर भी थोड़ा-बहुत है, तो इसलिए आपको शोषणकारी बहुत सारी वृत्तियाँ दिखाई पड़ती हैं हिन्दू धर्म में भी, आप अभी जिनकी बात कर रहे हो। शिवलिंग पर दूध चढ़ाना इत्यादि, गौशाला वगैरह जिनकी आप बात कर रहे हो, वो सब आपको हिन्दू धर्म में दिखाई पड़ता है क्योंकि हिन्दू धर्म के बहुत बड़े हिस्से का वेदान्त से और आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है।

उनका सम्बन्ध परम्पराओं, रीति-रिवाज़ों, रूढ़ियों से है, पौराणिक कथाओं से है। जो धर्म का मर्म और केन्द्र है वेदान्त, उसको वो जानते नहीं, चूँकि उसको नहीं जानते इसीलिए उनमें एक हद तक हिंसा पायी जाती है। क्योंकि जहाँ अज्ञान होगा, वहाँ हिंसा होगी। अहिंसा तो सिर्फ़ ज्ञान के साथ आती है और ज्ञान का सम्बसम्बन्ध आत्मा से है। मैं कौन हूँ। ‘कोहम्’ प्रश्न से ही ज्ञान का सम्बन्ध है यही ज्ञान होता और कोई ज्ञान नहीं होता। आत्मज्ञान को ही ज्ञान कहते हैं।

तो आपने जो बात करी कि हिन्दू धर्म में ऐसा क्यों होता है कि वही जो दूध वाली बात और ये सारी चीज़ें। वो इसलिए हैं क्योंकि हिन्दू धर्म में भी बहुसंख्यक लोगों का वेदान्त और आत्मा से कोई रिश्ता नहीं है। वो रीति-रिवाज़ों का पालन करते रहते हैं, वो अपनेआप को हिन्दू भले ही कहते हैं पर उनका वेद-वेदान्त से कोई रिश्ता है नहीं। अब आते हैं अब्राहमिक धर्मों की ओर और वहाँ आप पाते हो कि पशुओं की ओर क्रूरता और ज़्यादा है।

आप ईसाई धर्म को ले लो, आप इस्लाम को ले लो, तो वहाँ तो और ज़्यादा आप ऐसा पाते हो। इस्लाम से भी ज़्यादा ईसाइयत में पशुओं के प्रति क्रूरता है। आमतौर पर हम बकरीद आदि का सम्बन्ध लगाते हैं पशुओं के वध से। लेकिन आप अगर यूरोप को देखेंगे और अमेरिका को देखेंगे तो वहाँ जो प्रति व्यक्ति मॉंस की खपत है वो मुस्लिम देशों से कहीं ज़्यादा है।

क्यों है ऐसा? क्योंकि अब्राहमिक धर्मों में आत्मा जैसा कुछ होता ही नहीं। वहाँ पर एक क्रिएटर है, रचयिता, गॉड है, अल्लाह है, बनाने वाला है। आत्मा, सेल्फ़ जैसा वहाँ कुछ नहीं है और जहाँ सेल्फ़ नहीं होगा वहाँ बड़ी दिक्क़त होगी। समझ में आ रही है बात? वहाँ पर और हिंसा और क्रूरता होगी।

वो जो पूछ रहे हो बार-बार कि धर्म के नाम पर ऐसा कैसे हो सकता है, ऐसा कैसे हो सकता है, ये कोई बहुत अचम्भे की बात नहीं है। जहाँ आत्मा नहीं है वहाँ हिंसा है, शोषण है, क्रूरता है; करुणा तो आत्मा के साथ ही आती है। जब हम करुणा कहते हैं तो तुरन्त एक छवि कौंध जाती है महात्मा बुद्ध की। जानते हो बुद्ध के समय तक आते-आते सनातन धर्म की क्या दशा हो गयी थी? सबसे पहले तो ये समझो कि बुद्ध स्वयं एक हिन्दू ही थे, क्षत्रिय घर में पैदा हुए थे। उन्होंने कुछ बड़ी गड़बड़ चीज़ें देखीं तभी उन्हें एक अलग मत का निरूपण और प्रस्ताव और प्रचार करना पड़ा। उन्होंने क्या देखा? उन्होंने देखा कि जो छठी और पाँचवीं शताब्दी थी ईसा पूर्व, वहाँ तक आते-आते वैदिक धर्म इतना ख़राब हो चुका था कुरीतियों से, विकृतियों से, इतना ग्रस्त हो चुका था कि आत्मा से उसका सम्बन्ध ही पूरा टूट गया था इस हद तक कि आत्मा शब्द को ही विकृत कर दिया गया था। आत्मा शब्द को ही विकृत कर दिया गया था। नतीजा क्या था? दो नतीजे थे।

पहली बात इंसान, इंसान का शोषण कर रहा था और दूसरी बात इंसान पशुओं का शोषण कर रहा था। बुद्ध और महावीर को जो अलग धाराएँ स्थापित करनी पड़ीं और उनको जो जनसामान्य से समर्थन मिला, उसकी दो बड़ी वजहें थीं। कई वजहें थी, जिनमें दो बड़ी वजहें ये थीं कि एक तो सनातन धारा में ऊँच-नीच और शोषण बहुत आ गया था, जातिवाद इत्यादि और दूसरी ये कि पशुओं पर बड़ा शोषण शुरू हो गया था।

यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ इनके समय पशुओं की जो बलि थी वो बहुत आम बात हो गयी थी और ये देखकर के बुद्ध और महावीर दोनों बड़े दुखी और बड़े द्रवित हुए। तो अब देखो तीन चीज़ें एक साथ चल रही हैं, इंसान का इंसान के प्रति शोषण, इंसान का पशुओं के प्रति शोषण और आत्मा के प्रति अज्ञान और विकृति। ये तीनों एक साथ चलती हैं।

ये तीनों तब भी एक साथ चल रही थीं जब बुद्ध को नया धर्म स्थापित करना पड़ा, जब उन्होंने कहा, ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ और ये तीनों चीज़ें आज भी चल रही हैं। आत्मा के प्रति अज्ञान इतना ज़्यादा हो गया था उस समय कि बुद्ध को आत्मा शब्द को ही ख़ारिज करना पड़ा। उन्होंने कहा, ‘जिसको तुम आत्मा बोलते हो, वो बहुत बड़ा झूठ है।’ क्योंकि हमने आत्मा शब्द को ही ख़राब कर दिया था।

उन्होंने कहा, ‘जिसको तुम आत्मा बोलते हो वैसा कुछ होता ही नहीं’, उन्होंने कहा, ‘अनात्मा! तुम्हारी आत्मा झूठ है, आत्मा होती ही नहीं।’ तो आत्मा शब्द को ख़राब करना, सामाजिक कुरीतियों का आना, जिसमें जातिभेद, शोषण और पशुओं के प्रति अत्याचार का आना कि पशुओं की लगातार बलि दी जा रही है और ये सब हो रहा है।

ये तीनों चीज़ें एक साथ चलती हैं और तीनों फिर मिटती भी एक साथ ही हैं। और तीनों के मिटने में सबसे पहले क्या मिटेगा? आत्मा के प्रति अज्ञान है वो मिटेगा। तो आत्मा के प्रति जो अज्ञान है वो मिटाना पड़ेगा, मनुष्यता को मूल वेदान्त की ओर ले जाना पड़ेगा। वहीं से करुणा का जन्म होता है, वहीं से इंसान के भीतर इंसान के प्रति सहृदयता का जन्म होता है और वहीं से इंसान के मन में समस्त जीवों के प्रति करुणा का जन्म होता है।

“अगर हम आत्मा को नहीं जानते तो हम सबके प्रति क्रूर, बर्बर और हिंसक रहेंगे, चाहे वो कोई मनुष्य हो, पशु हो, पेड़-पौधा हो, कुछ भी हो, उससे हमारा जो रिश्ता है वो शोषण का, नोच-खसोट का, हिंसा का, यही रहेगा।”

प्र: क्या ये बोल सकते हैं कि जहाँ मतलब प्रेम और करुणा एक तरह एक ही साथ चलते हैं या अगर हमें प्रेम और करुणा में डिफ्रेंशिएट (अन्तर) करना हो तो हम कैसे पता लगाएँ कि ये प्रेम है और ये करुणा है?

आचार्य: आप प्रेम और करुणा को छोड़ो। वो जो अपने समय पर आ जाते हैं। आप अन्तर करो आत्मा और अनात्मा में, सच और झूठ में, अपने शरीर में और अपनी सच्चाई में। वो अन्तर करना सीखो, वो असली अन्तर है। बाक़ी सारे अन्तर बहुत महत्व के नहीं हैं, असली अन्तर इसका करना सीखो कि मेरा शरीर अगर कुछ माँग कर रहा है तो क्या मुझे उसे मानना ज़रूरी है, क्या मैं मेरा शरीर हूँ। ये अन्तर करना सीखो। ठीक है? क्योंकि देखो शरीर तो हमारा पशु का ही है और पशु का शरीर पशु के मॉंस की माँग कर सकता है, जैसे जंगल में होता है न? एक जानवर दूसरे जानवर के मॉंस की माँग करता है वहाँ पर। तो ऐसे ही शरीर तो हमारा भी जानवर का ही है, वो माँग कर सकता है। वहाँ आपको पूछना होगा कि मैं शरीर से ही जानवर हूँ या सच्चाई से भी जानवर हूँ।

ये भेद करो, यही आत्मा-अनात्मा का भेद है।

“पशु होना आपकी देह की सच्चाई है, आत्मा होना आपकी सच्चाई है। जैसे ही ये भेद सीख जाओगे वैसे ही प्रेम, करुणा और वो सबकुछ जो जीवन को सुन्दर बनाता है, अपनेआप जीवन में फलीभूत हो जाएगा।”

प्र: धन्यवाद आचार्य जी, मैं बस यही कामना करती कि आप जिस माध्यम से आप इतने सारे लोगों को जागरूक कर रहे हैं और मैं पिछली बार आपका ऋषिकेश में जो सत्र हुआ था उसमें भी आयी थी और मैंने बहुत लोगों से पूछा था और बहुत लोगों ने बोला कि वो आपके कारण वीगन (शुद्ध शाकाहारी) बने हैं तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई।

और मेरी बस यही कामना है कि आप इसी तरह बहुत सारे लोगों को, के मन में करुणा जगा सकें और उन्हें दूसरों की ज़िन्दगी के प्रति इज़्ज़त और उसको महत्व देना बतायें, बस उन्हें ये सिखा सकें जो अभी तक आप इतने सालों से करते आये हैं। बस यही कहना चाहूँगी मैं। धन्यवाद!

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