माँसाहार के पक्ष में अहिंसा का तर्क || आचार्य प्रशांत (2020)

प्रश्नकर्ता: पिछले दिनों आपने कहा कि एक हाथी की जान और एक मुर्गे की जान एक बराबर है, तो फिर एक मुर्गे और एक बैक्टीरिया की जान भी तो बराबर होनी चाहिए न।
साँस लेते वक़्त हम न जाने कितने बैक्टीरिया मार डालते हैं, अन्न उगाने की प्रक्रिया में खेती-बाड़ी में भी हम तमाम जीवाणुओं को मारते हैं तो वो भी तो हिंसा हुई न? तो फिर हमें क्या हक़ है मुर्गा और बकरा खाने वालों पर ऊँगली उठाने का?
आचार्य प्रशांत: तृप्ति, हिंसा क्या होती है? आपने तो बस एक-दो मौकों का उल्लेख करा है जब एक इंसान के कारण तमाम छोटे जीवाणुओं की मृत्यु होती है और कई बहुत ज़्यादा सूक्ष्म और निरन्तर घटने वाली घटनाएँ भी हैं जहाँ हमारे होने के कारण ही न जाने कितने छोटे-छोटे जीवाणु जीते-मरते रहते हैं।
उदाहरण के लिए आपकी त्वचा पर लगातार जीवाणुओं का वास रहता है, आप कितनी भी साफ़-सफ़ाई रख लें उसके बाद भी। चाहे हथेली हो, हाथ हो, सिर हो, शरीर का कोई भी हिस्सा हो, उस पर लगातार कीटाणु, जीवाणु माइक्रो ऑर्गेनिज्म (सूक्ष्म जीव) मौज़ूद रहते ही हैं। वो वहीं जन्मते भी हैं, वहीं मरते भी हैं।
आप अगर ताली भी बजा रहे हो तो उनकी जान जा रही है। इसी तरीके से आपके मुँह में जो लार है, उसमें भी तमाम छोटे-छोटे जीवाणु बसते हैं, तो आप अगर बोल भी रहे हो तो उनकी जान जा रही है। आप बिस्तर पर करवट बदल रहे हो, तो भी उनकी जान जा रही है।
आगे सुनिएगा। हम जिसको इंसान कहते हैं वो वास्तव में एक जीव नहीं होता है, इंसान का होना अनिवार्यत: लाखों, करोड़ों अन्य छोटे-छोटे जीवों के साथ होता है, जो उसके शरीर के भीतर वास करते हैं। उनके होने का हमारे होने के साथ बिलकुल अविछिन्न सम्बन्ध है।



