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काली कौन हैं? शराब-माँस पर विवाद क्या? || आचार्य प्रशांत (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, अभी कुछ दिनों से मैं एक घटनाक्रम को फॉलो कर रहा था। जिसमें एक महिला फिल्ममेकर (चलचित्र निर्माता) हैं जिन्होंने माँ काली पर एक डॉक्यूमेंट्री रिलीज करी है, बनाई है। जिसके पोस्टर पर उन्होंने माँ काली को बीड़ी या सिगरेट पीते हुए दिखाया है। जिस पर काफ़ी विवाद छिड़ा हुआ है।

उसी पोस्टर पर बंगाल की एक सांसद हैं जिन्होंने ये कहा है कि आई हैव एवरी राइट टू इमेजिन काली एज़ ए मीट कंज्यूमिंग एंड अल्कोहल ड्रिंकिंग गॉडेस। (मुझे अधिकार है काली को माँस और शराब पीने वाली देवी के रूप में कल्पना करूँ) और इस बात पर काफ़ी गरमा-गरम विवाद छिड़ा हुआ है। तो मैं जानना चाह रहा था कि पहली बात तो माँ काली हैं कौन और उनका माँस और मदिरा से क्या सम्बन्ध है?

आचार्य प्रशांत: देखो, जो पूरा शाक्त पंथ ही है न, वो प्रकृति को जानने, समझने और उसकी उपासना करने का है। और क्या हैं माँ काली, ये समझने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें देवी महात्म्य की पूरी चर्चा है, जिसमें खुलकर बताया गया है कि दुर्गा कौन, अंबिका कौन, काली कौन, गौरी कौन, सरस्वती कौन; उस पर जाना पड़ेगा।

ये जितनी भी देवियाँ हैं, ये सब प्रकृति की प्रतीक हैं। प्रकृति की शक्तियों की प्रतीक हैं। तुमको थोड़ा-सा धीरज के साथ सुनना पड़ेगा, अगर जानना चाहते हो कि माँ काली कौन हैं। उसके बाद फिर हम इस पर भी आ जाएँगे कि ये कहना कि वो बीड़ी-सिगरेट या माँसाहार या मदिरा-पान से सम्बन्धित हैं, कितना ठीक है।

तो तीन चरित्र हैं दुर्गा सप्तशती में। जो इसमें तीसरा चरित्र है, उत्तर चरित्र बोलते हैं इसको, वो पाँचवें अध्याय से उसके तेरहवें अध्याय तक जाता है, दुर्गा सप्तशती ग्रंथ के। क्या है उसमें, इस तीसरे चरित्र में जिसका सम्बन्ध काली से है।

तो कहानी कुछ उसमें इस तरह से है — और पूरी कहानी प्रतीकों से भरी हुई है — इसको बहुत ध्यान से सुनोगे तभी समझ में आएगा — कहानी कुछ इस तरह से है कि हिमालय के पर्वत हैं और उस पर देवी अंबिका अपना शान्तिपूर्वक विराजी हुईं हैं। देवी अंबिका कौन हैं, देवी अंबिका हिमालय पर विराजी हुईं हैं।

समझ लो जैसे कि हिमालय पर प्रकृति फैली रहती है। हिमालय पर तुम प्रकृति का पूरा विस्तार देखते हो न। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, साफ़ हवा। कभी वहाँ हिमपात भी हो जाता है। सूरज भी वहाँ साफ़ दिखता है। पानी भी वहाँ साफ़ है। तो जैसे हिमालय पर ये सब कुछ पसरा हुआ है, प्राकृतिक तौर पर, तो उसी को इंगित करते हुए कहा गया है कि देवी अंबिका अपना हिमालय पर वास कर रहीं हैं।

लेकिन उसी समय शुंभ-निशुंभ नाम के दो असुर पृथ्वी पर अपना साम्राज्य बना लेते हैं। शुंभ-निशुंभ नाम के दो असुर। अब ये दोनों असुर भी प्रतीक ही है, सिंबल्स हैं। किसके प्रतीक हैं वो, वो क्या करते हैं, इस से समझ में आ जाएगा किसके प्रतीक हैं। वो क्या कर रहे हैं। कहा गया है कि वो सारी प्राकृतिक शक्तियों को अपने अधीन कर लेना चाहते हैं। इसी में उनका असुरत्व है।

वो अग्नि पर अपना क़ब्ज़ा जमा लेना चाहते हैं। वो वायु पर अपना क़ब्ज़ा जमा लेना चाहते हैं। वो सूर्य पर अपना क़ब्ज़ा जमा लेना चाहते हैं। वो जल को अपने अधीन कर लेना चाहते हैं। और वो ये सब कुछ कर भी लेते हैं। अब प्रकृति में बड़ा हाहाकार मचा हुआ है। क्योंकि इन राक्षसों ने प्रकृति को बिलकुल जकड़ लिया है अपने स्वार्थ के लिए, अपने अहंकार के लिए, अपने सुख, अपने भोग के लिए। तो इस तरह से इन राक्षसों ने बड़ा उत्पात मचा रखा है शुंभ-निशुंभ ने।

अब देवी अंबिका अपना हिमालय पर विराजी हुईं हैं। तो ये शुंभ-निशुंभ हैं इनके दो — समझ लो नौकर हैं, भृत्य — चंड-मुंड नाम के। तो वो घूमते-घामते जाते हैं वहाँ देखते हैं देवी को और देवी की सुन्दरता बड़ी अनुपम है। एकदम अद्वितीय उनका सौंदर्य, तेज, आभा। तो ये देवी को देखते हैं और जाते हैं अपने मालिकों के पास — शुंभ-निशुंभ के पास।

और बोलते हैं कि आपने दुनिया का सारा वैभव लूटकर के अपने अधीन कर लिया, अपने खजाने में भर लिया है। सबसे अच्छे अस्त्र आपके पास हैं। सबसे अच्छे घोड़े भी आपने लूटकर रख लिए सबसे बढ़िया वाले ऊँचे, जो हीरे, मोती, माणिक्य थे वो भी सब आपने अपनेपास कर लिए। दुनिया में जो कुछ भी कमाने लायक है, पाने लायक है वो आपने अपनेपास कर लिया है।

ये समझ रहे हो किस बात का सूचक है, ये अहंकार की संचयी प्रवृत्ति का सूचक है। ईगो वांट्स टू एक्यूमलेट (अहंकार संग्रह करना चाहता है) तो इन राक्षसों ने भी यही कर रखा होता है। इन्होंने सब तोड़-फोड़ मचाकर के और प्रकृति को तहस-नहस करके, सबकुछ अपनेपास इकट्ठा कर रखा होता है।

तो ये जो उनके दोनों जाते हैं नौकर, सेवक चंड-मुंड ये इनसे कहते हैं, ‘जब सभी बढ़िया-बढ़िया चीज़ें आपके पास हैं, तो वो जो वहाँ सबसे सुन्दर स्त्री हिमालय पर विराजी हुई है वो भी तो आप ही के पास होनी चाहिए न। आप उससे विवाह कर लीजिए।

तो ये दोनों जो हैं, शुंभ-निशुंभ, ये लालायित हो जाते हैं। तो ये अपना दूत भेजते हैं, देवी के पास। देवी कहती हैं, ‘देखो, मैंने प्रतिज्ञा कर रखी है कि मुझे तो जो हराएगा मैं उसी से विवाह कर लूँगी। अब ये मेरी अल्पज्ञता है कि मैंने ऐसा संकल्प कर लिया। पर अब कर लिया है कि भई, मुझे जो हराएगा मैं तो उसी को पति मानूँगी।’ तो ये बात पता चलती है इन दोनों को, शुंभ-निशुंभ को। ये बड़े क्रोधित हो जाते हैं। वो कहते हैं ऐसा बोला, कि हमारी बात नहीं मानी और कहा कि जो हराएगा उसी से….

तो वो अपनी सेना भेजते हैं और उसमें एक सेनापति रखते हैं, शायद धूम्रलोचन उसका नाम। तो वो देवी के पास जाता है, देवी को आज्ञा देता है, चलो। देवी कहती हैं, ‘युद्ध में मुझे जीत लो और ले चलो ।’ तो युद्ध होता है। देवी उसको मार देती हैं। देवी उसको मार देती हैं तो शुंभ-निशुंभ को पता चलता है वो अतिशय क्रोध में आ जाते हैं। जैसी अहंकार की और दुष्टों की वृत्ति होती है।

तो इन्हीं दोनों को भेज देते हैं चंड-मुंड को। कहते हैं, ‘जाओ और उसको लेकर के आओ।’ अब ये समझ रहे हो, क्या करा जा रहा है। जो मनुष्य के भीतर की राक्षसी वृत्ति है उसके प्रतीक हैं ये शुंभ-निशुंभ। ये शुंभ-निशुंभ आज हमारे ही भीतर जो राक्षसी अहंकार बैठा हुआ है, ये उसके प्रतीक हैं। और ये जो राक्षसी अहंकार है ये प्रकृति को जीत लेना चाहता है।

ये पूरी पृथ्वी का उपभोग करना चाहता है। इसका पूरा विश्वास किसमें है, कंज़म्शन (भोग) में है। ये हर चीज़ का कंज़्यूमर (उपभोक्ता) बनना चाहता है। वही जो तुम आजकल भी अपने चारों-ओर होता देख रहे हो।

प्र: भोक्तावाद।

आचार्य: भोक्तावाद। तो अब ये दोनों जाते हैं। जब ये दोनों जाते हैं तो इनको देखकर के अंबिका के भीतर — जो देवी वहाँ बैठी हुई हैं — एक शक्ति उत्पन्न होती है। बहुत क्रोधित। क्योंकि ये बड़ी सेना-वेना लेकर के आये होते हैं देवी को जीतने और देवी को उल्टी-सीधी अपमान सूचक बातें भी कह रहे होते हैं। तो देवी के भीतर से एक शक्ति उत्पन्न होती है और उस शक्ति का नाम है काली। ये हैं काली।

और वो जो शक्ति है वो जब उत्पन्न होती है तो वो पहले ही क्षण से बड़े क्रोध में है। वो बड़े क्रोध में है और उसका विवरण कुछ इस तरीके से है कि उसकी आँखें गहरे गड्ढों में धँसी हुईं हैं और जीभ लपलपा रही है, शरीर पर माँस नहीं है, हड्डियाँ ही हड्डियाँ हैं, एकदम कृषकाय हैं, दुबली-पतली हैं। तो ये काली है। काली फिर क्या हैं, काली प्रकृति की वो विध्वंसात्मक शक्ति हैं जो राक्षसी व्यवहार की प्रतिक्रिया में उत्पन्न होती हैं। ये है काली।

समझिए बात को?

प्र: हूँ।

आचार्य: जब तुम प्रकृति के साथ बहुत छेड़खानी करोगे, जब तुम प्रकृति को जीत लेना चाहोगे, जब तुम प्रकृति का बलात्कार करना चाहते हो, तो फिर प्रकृति पलटवार करती है। एक सीमा तक सहती है। एक सीमा तक प्रकृति तुमको अपना बच्चा मानकर के तुम्हारी हरकतों को सहन करती है, बर्दाश्त करती है।

पर जब तुम अपनी सीमाओं का उल्लंघन ही कर जाते हो, जब तुम प्रकृति पर बिलकुल चढ़ ही बैठते हो, जब तुम्हारा विवेक बिलकुल मर जाता है और तुम वही करने लग जाते हो। भीतर के अपने राक्षसत्व को ही अभिव्यक्ति देने लग जाते हो। तब प्रकृति से एक कुपित शक्ति पैदा होती है तुम्हारे संघार के लिए; उस शक्ति का नाम है काली।

तो काली पैदा होती हैं और उसके बाद वो चंड-मुंड दोनों को संघार देती हैं। चूँकि वो चंड को मार देती हैं तो, और मुंड को भी, तो इसीलिए जो उनका एक नाम है चामुंडा वो भी प्रचलित है। तो ये हैं काली।

समझ में आ रही है बात?

प्र: हूँ।

आचार्य: बाकी आप जितना कुछ देखते हो कि काली की आराधना ये, वो, वो सब आपको तभी समझ में आएगा जब पहले आप ये समझो कि काली किसका प्रतीक हैं। भारत में — मैंने बार-बार कहा है — ये बड़ी गड़बड़ हो गयी है। हम जिनकी पूजा करते हैं, उनके विषय में कोई ज्ञान नहीं रखते और पूजा-आराधना ये सब बिलकुल व्यर्थ की बातें हो जाती हैं अगर जो तुम्हारे सामने पूज्य है, जो प्रतिमा है, जो प्रतीक है तुम उसका अर्थ ही नहीं जानते। अगर तुम अर्थ ही नहीं जानते तो तुम पूज किसको रहे हो। तो काली का पहले अर्थ समझना ज़रूरी है। ठीक है। मैं दोहरा के बताऊँ?

प्र: जी।

आचार्य: काली क्या हैं, जब तुम प्रकृति — जो कि बिलकुल शान्त सोई पड़ी है — जैसे हिमालय के वन सोये पड़े हैं। अपने में मग्न हैं न हिमालय के सब वन और उसमें पशु हैं, पक्षी हैं वो अपना शान्ति से चल रहे हैं। उनका अपना एक चक्र है। उसी में निमग्न रहते हैं, मस्त रहते हैं। लेकिन इंसान जाता है और इंसान की हवस की कोई सीमा नहीं। इंसान को चाहिए है, तोड़फोड़ करना है, लूट मचानी है, मौज करनी है, सुख भोगना है। तो इंसान पृथ्वी के साथ तरह-तरह के अत्याचार करता है।

ये जो अत्याचार हैं यही शुंभ-निशुंभ की परिभाषा हैं, दुर्गा सप्तशती में। कि शुंभ-निशुंभ जब चढ़ बैठे पृथ्वी पर तो उन्होंने अग्नि से अग्नि के अधिकार छीन लिए, सूर्य से सूर्य के अधिकार छीन लिए, जल से जल के अधिकार छीन लिए। वो एकदम भूल ही गये कि वो स्वयं भी प्रकृति के छोटे से अंश मात्र हैं। अहंकार इतना बढ़ जाता है कि स्वयं को भूल जाता है और फिर उसी आत्म अज्ञान में वो आत्मघातक हरकतें करने लग जाता है। तो ये हैं काली।

जब तुम प्रकृति को बहुत परेशान करते हो तो वो अपना रौद्र रूप दिखाती है, अपना कुपित रूप दिखाती है। उस कुपित रूप को काली कहते हैं। ठीक है?

प्र: जी।

आचार्य: और क्या पूछा था तुमने, काली के विषय में?

प्र: कि उनका और माँस और मदिरा का क्या सम्बन्ध है?

आचार्य: उनका और माँस और मदिरा का क्या सम्बन्ध है। तो यही जो तीसरा चरित्र है न दुर्गा सप्तशती का, तो इसके जब तुम जाते हो सातवें अध्याय पर, तो सातवें अध्याय का जब तुम चौबीसवाँ श्लोक देखोगे तो उसमें काली अंबिका के सामने जाती हैं चंड-मुंड को हराकर के, मारकर के और कहती हैं कि इन दो महा पशुओं का सिर मैं अब आपको समर्पित करती हूँ। ठीक है। इन दो महा पशुओं का सिर मैं आपको समर्पित करती हूँ।

तो जो पशु बलि की बात है अब समझ लो कि क्या है, काली किसको पशु कह रही हैं। सातवें अध्याय का चौबीसवाँ श्लोक कहता है कि काली कह रही हैं अंबिका से कि इन दो महा पशुओं की ये जो मृत देह है अंबिका, ये अब मैं आपको दे रही हूँ। समर्पित कर दी। तो पशु कौन है, काली से किस पशु के वध का सम्बन्ध है, काली किस पशु के वध की बात कर रही हैं। ये जो चंड-मुंड हैं, इनको पशु कह रही हैं।

तो काली से बकरे के वध का नहीं सम्बन्ध हो सकता, न मुर्गे के वध का सम्बन्ध हो सकता है, न भैंसे के वध का सम्बन्ध हो सकता है। जो भी लोग काली के सामने इनकी बलि देते हैं वो अनाड़ी हैं। समझ नहीं रहे हैं बात को। काली के तो बच्चे हैं ये सारे पशु। क्योंकि काली स्वयं प्रकृति का प्रतीक हैं। प्रकृति अपने बच्चों की बलि थोड़े ही लेगी। कोई माँ अपने बच्चों की बलि लेती है क्या? काली किसको पशु बोल रही हैं, आप श्लोक में पढ़िए बिलकुल साफ़ लिखा है। यही पशु हैं। जो राक्षस है वो पशु है, उसको मारना है।

और राक्षस कौन है, राक्षस हमारी वृत्तियाँ हैं। तो काली के सामने अपनी जो अहम् वृत्ती है, अपनी जो राक्षसी वृति है उसकी बलि देनी होती है। मुर्गे या बकरे या भैंसे की नहीं बली देनी होती है। अब अगर कोई अपने अज्ञान में कहे कि काली तो मीट ईटिंग गोडेस (माँसभक्षी देवी) हैं। तो उसको काली का कुछ पता नहीं है।

और अच्छा होता है कि जिस विषय में आदमी कहे उस विषय में थोड़ा ज्ञान रखे। जिस विषय में कुछ पता नहीं, जिस क्षेत्र का कोई ज्ञान नहीं उसके बारे में टिप्पणी करना अज्ञानता का ही सूचक है। ये किसी भले आदमी की तो निशानी नहीं कि जिस चीज़ को आप जानते नहीं उसको लेकर के आप एक नाटक या फिल्म बना दो या उसके बारे में आप टीका-टिप्पणी करनी शुरू कर दो।

ख़ैर, ये बात हम एक-दो लोगों के बारे में ही क्यों कहें, क्योंकि काली को लेकर के ये छवि तो लाखों लोगों में, आम जनमानस में सैकड़ों सालों से प्रचलित रही है कि काली के सामने तो पशु बलि दी जाती है। तो काली का सम्बन्ध माँसाहार से है। किस पशु की बलि देनी है ये हम जानते नहीं। क्योंकि हम काली को ही नहीं जानते। अब और अगर आगे बढ़ने जानना है कि ये माँस क्या है, अल्कोहल कंज्यूमिंग (मद्यपान करने वाली) भी कहा गया काली को।

तो फिर आप आइए आठवें अध्याय पर और आठवें अध्याय का सत्ताईसवाँ श्लोक है:-

बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धका‌‌ङ्‌क्षिणः। तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः।।

देवी कह रही हैं, जो उनकी शक्तियाँ हैं उनको सम्बोधित करके- यह जो राक्षक हैं इनके माँस का भक्षण करके ही तुम तृप्ति पाओगे।

~दुर्गा सप्तशती (अध्याय ८ श्लोक २७)

जहाँ पर देवी कह रही हैं, जो उनकी शक्तियाँ हैं, उनको सम्बोधित करके, उनको मातृगण कहते हैं। गण माने सेवक। तो माता के सेवक उनको सम्बोधित करके कह रही हैं कि ये जो राक्षस हैं इनका भक्षण करके, इनके माँस का भक्षण करके ही तुम तृप्ति पाओगे।’

तो किसके माँस का भक्षण करने को कहा गया है, राक्षस के माँस का भक्षण करने को कहा गया है। वो बेचारा निर्दोष मासूम जानवर है उसके माँस का भक्षण करने को थोड़े ही कह रही हैं देवी। लेकिन जो अपनेआपको देवी के उपासक भी बोलते हैं, जो ये भी बोलते हैं कि आई एम वरशिपर ऑफ माँ काली, उन्होंने दुर्गा सप्तशती कभी खोलकर देखी नहीं होगी। वो कभी समझेंगे ही नहीं कि जो पूरा तंत्र का मार्ग है, वो भी आता तो वेदों से ही है न। और यदि वेदों से आता है तो पहले समझना पड़ेगा कि वेदों का मूलभूत दर्शन बात करता है, अहंकार की और मुक्ति की।

तो वेदों से जो भी प्रतीक उठेंगे वो कहीं-न-कहीं अहंकार की आसुरी वृत्ति से सम्बन्धित होंगे और मुक्ति दायिनी शक्तियों से सम्बन्धित होंगे। लेकिन जब आपको न तो वेदान्त का ज्ञान हो और न ही कभी आपने शाक्त मार्ग के या तंत्र के ग्रंथों का अध्ययन किया हो। बस आपकी बोलने में ज़्यादा रूचि हो, फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन (अभिव्यक्ति) के नाम पर। तब आप फिर दुर्भाग्यवश उल्टी-पुल्टी बातें करना शुरू कर देते हैं।

देखो, हुआ क्या है। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन ये बड़ी अच्छी चीज़ है। और मैं भी इसका घोर समर्थक हूँ। किसी व्यक्ति को क्या कहना है, इस पर अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए। अपने विचारों को प्रस्तुत करने की सबको आज़ादी होनी ही चाहिए। लेकिन यदि मुझे ये आज़ादी है कि मैं अपने विचारों को खुले में कह सकूँ तो क्या इस आज़ादी के साथ मुझ पर एक ज़िम्मेदारी भी नहीं आ जाती? आपको जो अधिकार मिलते हैं क्या उन अधिकारों के साथ आपको कुछ कर्तव्य भी नहीं मिल जाते?

आपको छूट मिल गयी है कि आप बोल सकते हैं आप जो चाहे, तो फिर आपको ये ज़िम्मेदारी भी मिल गयी है न कि बोलने से पहले थोड़ा सोच-समझ लें कि आप बोलें, उससे पहले आप जिस विषय के बारे में बोल रहे हैं उसका कुछ ज्ञान रखें।

लेकिन पूरे विश्व में, भारत में भी, हम सबमें यही प्रवृत्ति रहती है कि अपनी आज़ादी का तो भरपूर इस्तेमाल करना है और अपने कर्तव्य की ओर ध्यान नहीं देना है। तो हम बोलते ख़ूब हैं बिना ये ज़िम्मेदारी देखे कि जो बोल रहे हैं उसमें पहले कुछ सोच-समझ लिया है, कुछ जाँच-पड़ताल करी है, कुछ जिज्ञासा करी है, खोजबीन करी है, बोले जा रहे विषय में गोता लगाया है, पैठ करी है।

खास तौर पर धर्म का क्षेत्र बड़ा ध्यान माँगता है। धर्म के क्षेत्र में टिप्पणी करने से पहले धर्म का ज्ञान होना चाहिए। धर्म के प्रति प्रेम होना चाहिए। अब धर्म के प्रति प्रेम हो नहीं, धर्म से बहुत लेना-देना नहीं है और धर्म पर आप टीका-टिप्पणी करें, धार्मिक प्रतीकों को लेकर आप यूँही अनर्गल बयान दें, ये किसी सुलझे हुए आदमी की निशानी नहीं है। जो भी लोग धर्म के क्षेत्र में रुचि रखते हों, मैं उनसे आग्रह करूँगा कि उनका पहला दायित्व ये है कि धर्म को समझें।

जो बातें प्रचलित हैं, सिर्फ़ उन प्रचलित बातों को जान लेने से आप ज्ञानी नहीं हो जाते। जो प्रचलित बातें हैं वो तो अधिकतर अनाड़ीपन की हैं। एक तरह की गॉसिप है। कल्चरल गॉसिप हैं।

उससे आप ज्ञानी नहीं हो जाते। ज्ञानी होने के लिए थोड़ी साधना करनी पड़ती है। धर्म ग्रंथों के साथ बैठना पड़ता है। उनके एक-एक श्लोक के साथ जूझना पड़ता है। एक ग्रंथ का दूसरे ग्रंथ से सम्बन्ध खोजना पड़ता है। प्रतीकों की गहराई में उतरना पड़ता है। तब जाकर के बात निकलती है। समझ रहे हो?

प्र: जी। जी। आचार्य जी माँस भक्षण तक तो आपने एकदम स्पष्ट ही कर दिया, समझ में आ ही गया मुझको। कि बात तो असल में अपने अंदर के बैठे राक्षस की हो रही है।

आचार्य: हाँ। हाँ।

प्र: फिर ये मदिरा कैसे जुड़ गयी?

आचार्य: हाँ, मैं वो बोल रहा था। रह गया। तो आठवें ही अध्याय के जब तुम तिरसठवें श्लोक पर जाते हो।

तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः।।ऊँ।।

यह जो राक्षस हैं इसका रक्त ही मद है।

~ दुर्गा सप्तशती (अध्याय ८ श्लोक ६३)

तो उसमें बिलकुल स्पष्ट कर देती हैं देवी कि ये जो राक्षस है इसका रक्त ही मद है। मद माने– नशा, मदिरा। तो मदिरा माने वो मदिरा नहीं जो आप बनाते हो किसी साधारण मदिरालय में। यहाँ बात हो रही है कि जो राक्षस का रक्त है, वो ही मद है।

तो जो लोग जाकर के काली को साधारण शराब वगैरह चढ़ाते हैं, वो बहुत पागलपन का काम कर रहे हैं। ये न जाने कहाँ से चीज़ शुरू हो गयी? देवी स्पष्ट कर रही हैं मद का अर्थ। जो दुष्ट है उसका रक्त ही मद है और उसी मद का पान देवी को करना है।

अब जो दुष्ट है उसको भी व्यक्ति के रूप में नहीं देखना है। हमने क्या कहा– शुंभ-निशुंभ कौन हैं? चंड-मुंड कौन हैं? या महिषासुर कौन है? ये प्रतीक हैं हमारे ही भीतर जो, जो आसुरी वृत्ति बैठी है उसके। तो उसको मारना है देवी को, उसको भक्षण करना है। उस आसुरी वृत्ति के माँस को खाना है, उसके रक्त को पीना है।

तो ये हुआ माँसाहार और ये हुआ मदिरा पान। ठीक है? इससे अलग नहीं है कुछ, देवी का माँसाहार या मदिरापान। तुम और अगले अध्याय में आओ तो एकदम ही स्पष्ट हो जाएगा। अगले अध्याय में, नौवें अध्याय में रक्तबीज आ जाता है।

अब रक्तबीज क्या है, जानते ही होंगे कहानी। कि उसके खून की एक बूँद गिरती थी ज़मीन पर, तो उससे एक रक्तबीज और खड़ा हो जाता था। अब देवी की सब शक्तियाँ लगी हुई हैं युद्ध में, रक्तबीज के विरुद्ध। तो वो रक्तबीज पर वार कर रही हैं। एक के बाद एक बहुत सारी शक्तियाँ हैं।

उनके सब अलग-अलग नाम दिए हुए हैं ग्रंथ में और वो उस पर जितना वार करती हैं तो उसके रक्त की बूँद गिरती है तो उससे एक राक्षस और खड़ा हो जाता है। इतने राक्षस खड़े हो जाते हैं कि कहते हैं पूरी पृथ्वी भर गयी, ग्रंथ कहता है।

तो फिर काली क्या करती हैं, काली ये करती हैं कि वो सब राक्षसों को जितने रक्तबीज थे कहती हैं इनको मारेंगे इनका रक्त ज़मीन पर गिरेगा तो और खड़े हो जाएँगे तो उनको अपने मुँह में ही लेने लग जाती हैं। कहती हैं, ‘आओ यहीं चबा लेंगे तुमको। यही चबा लेंगे, तुम्हारा रक्त भी फिर भीतर ही चला जाएगा।’

समझ में आ रही है बात?

प्र: जी।

आचार्य: तो उसका रक्त वो पीने लग जाती हैं। रक्त पीने लग जाती हैं। तो यहाँ पर भी माँस भक्षण वाली बात आती है। इससे पहले भी है कि काली असुरों को उठा रही हैं और उनको अपने दाँतों में चबा ले रही हैं। वैसा ही वो रक्तबीज के साथ भी करती हैं, कि उठा लिया और उसको चबा लिया।

इसमें पशु कहीं नहीं आ गये, कि पशुओं का माँस चबाना है। इसमें माँसाहार को कहीं से समर्थन नहीं आ गया। यहाँ तो बात हो रही है कि आप अपनी चेतना इतनी ऊँची करें कि वो प्रकृति का दोहन या शोषण न करे। और माँसाहार तो सीधे-सीधे एक नीची, गिरी हुई चेतना का काम होता है। देवी तो उठी हुई चेतना की प्रतीक हैं। जो कि गिरी हुई चेतना के राक्षस से युद्ध करती हैं, उसको मिटाती हैं। समझो।

पशु को मारना राक्षस का काम है, देवी का नहीं। तो ये हम बहुत उल्टी रीत चला रहे हैं कि हम देवी को या देवी के सामने पशु की बलि दे रहे हैं। या देवी के नाम पर माँसाहार कर रहे हैं। जो माँसाहार करे वो देवी का भक्त नहीं है। जो माँसाहार करे वो ठीक वैसा ही राक्षस है, जिसका देवी ने वध किया। ये उल्टी बात समझ रहे हो?

जो माँसाहार कर रहा है वो देवी का भक्त नहीं है। जो माँसाहार कर रहा है वो बिलकुल वही राक्षस है जिसका देवी ने वध किया है।

तो ये सब उस में रहता है, नौवें अध्याय में।

फिर आगे जब बढ़ते हो, दसवाँ अध्याय आता है, उसमें फिर शुंभ-निशुंभ का भी वध हो जाता है। जानते हो वध होने के बाद, क्या बताया गया है, कहा है, वध होने के बाद पूरी प्रकृति ने आनन्द मनाया। नदियाँ अपनी पुरानी गति से बहने लगीं, साफ़ हो गयीं। हवा साफ़ हो गयी। सूरज की रोशनी साफ़ दिखाई देने लग गयी। जो सब पशु डरे हुए थे, जितना जंगलों का विनाश हो रहा था वो सब दोबारा ठीक हो गया।

तो ये बात पुरानी नहीं है, ये बात कोई ऐतिहासिक नहीं है, ये बात किसी एक काल की नहीं है। ये बात आदमी के मन की है और सदा की है। हम प्रकृति का विध्वंस करते हैं। आज भी कर रहे हैं न? बल्कि ये जो पूरी शुंभ-निशुंभ की और काली की कहानी है वो ठीक आज की कहानी है। शुंभ-निशुंभ हमारे ही भीतर की वो गिरी हुई वृत्ति है, हमारे ही भीतर का वो राक्षस है जो पूरी पृथ्वी को तबाह किये दे रहा है। उसको शुंभ-निशुंभ कहते हैं। ठीक है।

चाहे फिर उसमें तुम एक्सटिंशन ऑफ स्पीशीज (प्रजातियों का विलुप्तिकरण) ले लो। ये जितनी प्रजातियाँ हैं विलुप्त हुई जा रही हैं पशुओं की, जानवरों की। रोज़ सैकड़ों प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। वो बात हमें पता ही नहीं है।

तो या क्लाइमेट चेंज ले लो या नदियों का प्रदूषित होना ले लो। ये जो तुम जंगलों में घुसकर के वहाँ से नये-नये तरीके के वायरस उठा लाते हो, जिसमें कोविड भी शामिल है, उसको ले लो। ये सबकुछ अगर पढ़ोगे दुर्गा सप्तशती को तो तुम्हें पता चलेगा कि वो तो आज की ही बात हो रही है। शुंभ-निशुंभ हम ही हैं।

प्र: ऐसा ही लग रहा है मेरे को कि बिलकुल आज की ही बात हो रही है।

आचार्य: बिलकुल आज की ही बात हो रही है। तो और फिर जब शुंभ-निशुंभ का वध हो जाता है तो नदी साफ़ हो जाती है। हमने नदियों को गंदा कर रखा है न। तो बताओ वो बात तब की है या आज की है। नदी बिलकुल गंदी है। जो नदी को गंदा कर रहा है वही शुंभ-निशुंभ है।

देवी उसी का वध करने के लिए आती हैं। प्रकृति की वो शक्ति जो नदियों को प्रदूषित करने वाले को मिटा देती हैं, मार डालती हैं, प्रकृति की उसी शक्ति को काली कहते हैं। नाम ही काली है। काली। काली। काली का सम्बन्ध काल से है। जो ख़त्म कर दे, जो मार दे। वो काली है।

किसको मार दें, जो कि नदियों को गंदा कर रहा है, बेजुबान जानवरों को सता रहा है अपने स्वाद के लिए, अपनी ज़ुबान के स्वाद के लिए माँस खाये ही जा रहा है, खाये ही जा रहा है। ये बड़े-बड़े स्लॉटरहाउसेस (बूचड़खाने) चल रहे हैं। मैकेनाइज्ड (यंत्रीकृत) स्लॉटरहाउसेस हैं। आप पैकेज्ड मीट (डिब्बाबन्द माँस) खरीद रहे हो।

आप कोई आज, कोई भी ऐसी वेबसाइट खोल लीजिए तो उसमें प्रचार आता रहता है। काहे का प्रचार आता रहेगा, उसमें वो आपके सामने बार-बार माँस दिखाएँगे और कहेंगे हम आपके घर में ये माँस पहुँचा देंगे। आप बस आर्डर करिए और आपके पास ताज़ा माँस पहुँच जाएगा।

ये राक्षस-ही-राक्षस हैं। यही तो राक्षस हैं। जो घर-घर में ताज़ा माँस पहुँचाने का विज्ञापन दे रहा हो। वही राक्षस है। वही चंड-मुंड हैं। वही शुंभ-निशुंभ हैं। वही महिषासुर है। और इन्हीं का फिर वध करने के लिए प्रकृति से एक शक्ति उठती है जिसको काली कहते हैं। इन्हीं को मिटाने के लिए।

और ये राक्षस जितने हमको बाहर दिखाई दे रहे हैं उतने ही हमारे भीतर भी हैं। हर आदमी के भीतर वो राक्षस है। आप इंसान पैदा हुए हो तो आपका दायित्व है कि उस राक्षस को ज़रा दबाकर के रखो।

आपके ही भीतर देवता भी है दानव भी है। आपका दायित्व है आप देवता को पोषण दो।

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं न बार-बार कि यज्ञ। यज्ञ की बात करते हैं न तीसरे अध्याय में। कि यज्ञ क्या है?

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेनः एव सः।।

(यज्ञ द्वारा पोषित देवता गण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको दिए बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है।)

~ श्रीमद्भगवतगीता (अध्याय ३ श्लोक १२)

अपने भीतर जो देवता बैठा है उस देवता को भेंट देना, उस देवता को होम देना, आहुति देना, वही यज्ञ है। तुम्हारे भीतर जो दानव है उसको पोषण मत दो। उसको मत बढ़ाओ। अपने भीतर के शुंभ-निशुंभ को आगे नहीं बढ़ाना है। अपने ही जो भीतर देवता है अपना जो देवत्व है उस को आगे बढ़ाना है।

तो ये सब ग्रंथ एक ही ओर आप को ले जाते हैं। चाहे वो भगवद्गीता हो, चाहे उपनिषद् हों, चाहे दुर्गा सप्तशती हो। आपको उनको समझने की ज़रूरत है। उनमें जो बात कही जा रही है वो आज भी बहुत-बहुत प्रासंगिक है और सदा रहेगी। कालातीत है वो बात।

अहंकार ऐसा अनाड़ी होता है न। पहली बात तो वो कुछ समझता नहीं। वो अपनी ही दुनिया में जीता है। और उसकी दुनिया बोध की नहीं होती, कल्पना की होती है। है न?

ये सब जो राजनेता वगैरह टिप्पणी कर रहे हैं काली पर, यही तो कह रहे हैं न कि इट इज माय फ्रीडम टू इमेजिन काली एज़ ए मीट ईटिंग गॉड्स (यह मेरी स्वतंत्रता है कल्पना करुँ काली माँसभक्षी देवी हैं)। इमेजिन काली। इमेजिन क्या होता है, काली क्या हैं, पहले ये जानो न। अंडरस्टैंडिंग इज़ नीडेड नॉट इमैजिनेशन। (कल्पना की नहीं समझ की ज़रूरत है)।

इमैजिनेशन तो उनके लिए होती है जिन्हें बात समझ में नहीं आ रही है। तुम्हें जब कोई बात समझ में आ जाती है तो तुम्हें उसके बाद उसकी कल्पना नहीं करनी पड़ती न। और जो समझते ही नहीं हैं, उनकी मजबूरी हो जाती है कल्पना में जीना।

तो कल्पनाओं से बाहर आना होता है न, यथार्थ में आना होता है न। आपको इमैजिनेशन नहीं करना है काली को, काली क्या हैं? ये आपको जानना है। कल्पना नहीं करनी है। आपके पास बोध होना चाहिए। बोध होना चाहिए।

तो काली आपकी इमैजिनेशन से नहीं पैदा हुई हैं। काली एक सशक्त प्रतीक हैं जो आपको दिया गया है, ताकि आप कुछ सीख सकें। काली पर आप की कल्पना नहीं चलेगी। आपने नहीं बनाया है काली को। काली एक विधि हैं। काली एक उपाय हैं। काली आपके लिए आपकी मदद के लिए किया गया एक प्रबन्ध हैं। जो आपको दिया गया है।

आपको उसको समझना है, आपको उसके बारे में इमैजिनेशन नहीं करनी है। ये अहंकार की बात है। अहंकार सोचता है, मैं जिसके बारे में जो चाहूँ कल्पना कर सकता हूँ।

आप कुछ भी कल्पना कर सकते हो, उससे क्या हो जाएगा। आप कल्पना बिलकुल ये कर सकते हैं कि….भई, आप कल्पना कर सकते हैं कि इट इज माय फ्रीडम टू इमेजिन देट न्यूटन्स सेकंड लॉ इज़ रिलेटेड टू साइकोसोमेटिक डिसऑर्डर्स। (ये मेरी स्वतंत्रता है कि मैं कल्पना करूँ न्यूटन का द्वितीय नियम मनोदैहिक विकार से सम्बन्धित है)।

आप इमेजिन कर लीजिए। आपके इमेजिन करने से वो जो आपको लॉ दिया गया है वो बदल तो नहीं जाएगा। और न ही ये हो जाएगा कि आप उस लॉ को समझ जाएँगे। उसको समझने के लिए आपको कुछ पढ़ना पड़ेगा। हम पढ़ना चाहते नहीं।

हम वैसे तो कहते हैं कि हम बहुत पढ़े-लिखे लोग हैं। लेकिन जिस बारे में टिप्पणी कर रहे हैं, उस बारे में हमने कुछ नहीं पढ़ रखा। पढ़ हमने रखा नहीं है और कह रहे हैं कि मैं इमेजिन करूँगा। क्यों इमेजिन कर रहे हो भाई? जान लो। कल्पना मत करो, जानो।

प्र: मुझे तो साफ-साफ ये दिखने लगा है कि हम आध्यात्मिकता से इतनी दूर आ चुके हैं कि हमारे लिए ये जो पूरा क्षेत्र है, ये अब उसमें कोई भी साइंटिफिक टेंपरामेंट जो होता है कि हाँ जी तथ्य है इसमें, ये कुछ बात कही गयी है या फिर ऊँचे से ऊँची बात कही गयी है उससे काफ़ी दूर आ चुके हैं।

आचार्य: हाँ-हाँ, हाँ-हाँ।

हमें लगता है कि कोई बात है कैसे भी बना लो, कैसे भी मान लो, कुछ भी कर लो, अपने हिसाब से चल लो; वो बढ़ता ही जा रहा है कि लोग इतनी कॉन्फिडेंटली आकर जो चाहे वही कहना शुरू कर रहे हैं।

आचार्य: हाँ, हाँ। ये अहंकार का एक और लक्षण होता है। उसमें कॉन्फिडेंस बहुत होता है। जितना उसमें अज्ञान होता है उतना ही उसमें आत्मविश्वास होता है। गहरे आत्मविश्वास से भरा होता है अज्ञान। तभी तो फिर अज्ञान कायम रह जाता है न। उसको ये दिखाई ही देने लगे कि वो खोखला है तो वो अपनेआप को फिर त्याग देगा, सुधरेगा, बदलेगा, बेहतर बनेगा।

लेकिन वो आत्मविश्वास से भरपूर होता है। वो पूरी दुनिया को चुनौती देता है, मैं जानता हूँ। मैं बताऊँगा। कौन है जो मुझसे लड़ना चाहता है? आओ मेरे सामने आओ।

अरे भाई, दुनिया से लड़ने से पहले थोड़ा अपनी ओर दृष्टि कर लो। देख लो कि तुम कितने पानी में हो। तुम्हें कुछ पता भी है, बस बोले जा रहे हो। कुछ जानते हो? बोले जा रहे हो। और धर्म के क्षेत्र में तो टिप्पणी उसी को करनी चाहिए जो धर्म से कुछ रिश्ता-नाता रखता हो, जो धर्म से प्रेम रखता हो, जिसको धर्म का कुछ ज्ञान हो।

धर्म तो बुद्धिजीवियों के लिए बिलकुल हीन, हेय वस्तु है। जिसको वो छूना नहीं चाहते। धर्म उन के हिसाब से एकदम सड़ी-गली, बीते हुए ज़माने की बात है। अरे, जब धर्म से तुमको इतनी ही अरुचि है तब धर्म पर फिर टिप्पणी भी क्यों करते हो?

ये एक बहुत-बहुत सीधी बात है कि हमें मुँह उसी क्षेत्र में खोलना चाहिए जिस क्षेत्र में हम कुछ पैठ रखते हों या प्रेम रखते हों। न पैठ है न प्रेम है, बस पूरे आत्मविश्वास के साथ बोलने की बड़ी आतुरता है। ये बात ठीक नहीं है।

इतना देखो और हो रहा है कि ये सब करके जो नई पीढ़ी है, उसको हम अध्यात्म से पूरा ही वंचित करें दे रहे हैं। अभी ये जो अब नए लड़के-लड़कियाँ हैं, पन्द्रह साल, बीस साल, पच्चीस साल वाले वो ये जो पूरा विवाद चल रहा है काली को लेकर के; वो इस विवाद को तो पढ़ लेंगे अखबारों में, वेबसाइट्स में, सोशल मीडिया पर, लेकिन इस विवाद के चलते ऐसा तो नहीं है कि वो दुर्गा सप्तशती पढ़ने लग जाएँगे।

ऐसा तो नहीं होगा न। वो तो पढेंगे नहीं लेकिन ट्वीट्स वो सब पढ़ लेंगे। लेकिन ट्वीट्स पढ़ के उनको भी काली से अरुचि ही हो जाएगी। तो ले-दे कर के इतना ही परिणाम निकलता है, इस तरह की बातों का और विवादों का कि और ज़्यादा और ज़्यादा लोग धर्म की ओर पीठ कर लेते हैं। धर्म से हटते जाते हैं। और आप देखिए, जब मैं धर्म कहता हूँ तो उससे मेरा मतलब विशुद्ध अध्यात्म से होता है। ठीक है?

परंपराओं, प्रथाओं, अंधविश्वासों; इनसे मेरा कोई लेना देना नहीं। जब युवा पीढ़ी अध्यात्म से कटेगी, तो क्या नतीजा होगा? नतीजा यही होगा कि सब शुंभ-निशुंभ ही बनते जाएँगे। वही बन गये हैं। देखिए न हमने पृथ्वी की क्या हालत कर ली है।

हम विध्वंस के आज जितने निकट खड़े हैं इतने कभी भी नहीं थे न। यही तो प्रलय है। आदमी आज मानसिक रूप से इतना बीमार है, इतना कब था? हम मानसिक रूप से भी बीमार हैं और संसार भौतिक रूप से भी मिटने को तैयार खड़ा है। डूम्सडे क्लॉक है, उसकी टिकिंग हमको सुनाई नहीं दे रही क्या?

हमको कुछ दिखाई नहीं दे रहा। हमें नहीं दिखाई दे रहा कि संसार का औसत तापमान डेढ़ डिग्री लगभग बढ़ ही चुका है। हमें नहीं दिख रहा कि हमने कितनी प्रजातियों को मार दिया है। जंगल कितनी तेज़ी से सिकुड़ते जा रहे हैं। जिन कीट-पतंगों को हम मार रहे हैं, वही पॉलिनेशन किया करते हैं।

आप एक प्रजाति को मारते हो उससे जुड़ी कम से कम बीस प्रजातियाँ और मिट जाती हैं। तो, और ये सब क्यों हो रहा है? इसलिए हो रहा है क्योंकि इन सबको रोकने का एक ही तरीका होता है, आत्मज्ञान, अध्यात्मा।

दुनिया जिस महाविनाश की ओर जा रही है उसको सिर्फ़ अध्यात्म रोक सकता है। लेकिन अध्यात्म को आप बदनाम करते रहोगे, कैसे? बस यही दिखा दो कि शिव बैठकर के गांजा-धतूरा कर रहे हैं, काली बैठकर के बीड़ी-सिगरेट, शराब कर रही हैं।

तो जो नई पीढ़ी है, उसको और अरुचि हो जाए। वो कहे, ‘हमें समझना ही नहीं है शिव क्या हैं।’ शिव महा प्रतीक हैं। जिसने शिव को समझ लिया उसका जीवन सुधर जाएगा। समझ लिया, मैं कोरी पूजा की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं नारेबाजी की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं समझ की, बोध की, अंडरस्टैंडिंग की बात कर रहा हूँ।

जिसने समझ लिया शिव को उसका जीवन बदल जाएगा। जिसने समझ लिया काली को वो व्यक्ति कुछ और हो जाएगा। अब काली को समझना एक बात है और काली को मुर्गा और दारू चढ़ाना बिलकुल दूसरी बात है न। समझने की ज़रूरत है। और बताओ।

प्र: मुझे जो एक प्रश्न उठता है, आमतौर पर जो, आपको जब मैं सुन रहा हूँ, तो आप अगर इतना ही जैसे जो आदमी माँसाहार की ओर बढ़ रहा है, मदिरा का पान कर रहा है वो भी इस नाम पर कि मैं तो माँ काली का भक्त हूँ। तो यह सारी जो आदतें हैं वो उसको दुख के दरवाज़े पर तो ले कर तो जाती ही हैं…..

आचार्य: बिलकुल।

प्र: ऐसा तो है नहीं। और आदमी जो भी कुछ करता है वो सुख के लिए करता है, आनन्द के लिए करता है, ऊँचाई के लिए मतलब आख़िरी में तो उसकी नियत यही होती है कि मैं कुछ बेहतर हो सकूँ जो मैं अभी हूँ।

लेकिन क्या आदमी अब इतना अंधा हो चुका है कि उसको ये दिखना ही बंद हो चुका है कि ये सब कुछ करने के बावजूद मैं सिर्फ़ दुख की ही चपेट में खड़ा हूँ और मेरा अभी भी कोई उत्थान हो नहीं रहा है।

क्योंकि जहाँ तक आपने जैसे कहा कि प्रेम की बात है। आपका अगर सम्बन्ध है धर्म से, ऊँचाई से तो ये आपके लिए काफ़ी स्पष्ट हो जाएगा कि वहाँ पर माँसाहार की बात नहीं करी गयी है, ये नहीं कहा गया है कि जानवरों को नोच कर खा लो।

तो क्या आदमी ऐसा हो चुका है कि उसको अपने आप से भी कुछ प्रेम नहीं है कि वो अपनेआपको ही रोककर देख ले। छोड़ो आप माँस की बात, छोड़ो जानवरों की बात, तुम अपने ही जीवन को देख लो।

आचार्य: अहंकार को, अहंकार को अपनी भलाई से ज़्यादा अपनी आदत प्यारी होती है। अपने आसपास के लोगों को देखो, क्या पाओगे? वो अपनी आदतों पर चल रहे हैं या अपनी भलाई की ओर बढ़ रहे हैं?

प्र: आदतों पर चल रहे हैं।

आचार्य: तो जो अहंकार की पुरानी आदत है सुख की, भोग की, लिप्सा की, अज्ञान की, बेहोशी की, नशे की ये पुरानी आदतें हैं। बहुत पुरानी आदतें हैं अहंकार की। वो इन पर चलने लग जाता है। उसको एहसास होता रहता है बीच-बीच में कि इन पर चलने में मेरी भलाई नहीं है।

पर वो चुनाव ये करता है कि आदत ठीक है। सुधार को पीछे रखते हैं। सुधार की बहुत ज़रूरत नहीं है। ये एक चुनाव की बात होती है। अब ये आपके ऊपर है कि आप अपना चुनाव बदलें। आप अपनी आदत, अपने आलस, अपनी तमसा इनसे ऊपर की वरीयता दें, अपनी भलाई को।

यही स्वयं के प्रति प्रेम है। यही मनुष्य की अपने प्रति ज़िम्मेदारी है। यही मनुष्य की पूरी दुनिया के प्रति ज़िम्मेदारी है। कि इस बात को बहुत महत्व मत दो कि तुम्हें अच्छा-बुरा क्या लग रहा है? इस बात को महत्व दो कि सही क्या है। जो सही है वो करो। भले ही उसमें सुख न हो, भले ही उसमें कष्ट मिलता हो।

और तो ये जानते ही हो न कि जो भी चीज़ें सही होती हैं उनकी और बढ़ने के लिए तकलीफ़ तो झेलनी ही पड़ती है। अनुशासन दिखाना पड़ता है। साधना, संकल्प करने पड़ते हैं। और उनमें हमेशा एक, एक तरह का कष्ट तो होता ही है।

तो हमें चुनाव ये करना चाहिए कि कष्ट भले ही हो लेकिन जो सही है, वो करेंगे। जब आदमी ये चुनाव नहीं करता तो फिर वो दुख में और गहरा डूबता जाता है। और जितना वो दुख में डूबता है उतना उसे फिर नशे की ज़रूरत पड़ती है। उतना उसे और झूठ की ज़रूरत पड़ती है।

यही हमारी आज की हालत है। कैसे बदलेगी ये? हमारे चुनाव की बात है। हमें चुनाव करना पड़ेगा कि हमें इस को बदलना है। और कोई हमें नहीं बचा सकता। हमारा संकल्प ही हमको बचाएगा।

प्र: लेकिन आजकल जो एक जैसे ट्रेंड फैला हुआ है, ज़िन्दगी को जीने की जो एक फिलॉसफी है, जिसने बहुत ज़्यादा, बहुत सारे लोगों को कन्वेंस करा हुआ है कि हाँ जी हम इस तरह से जी सकते हैं; वो यही है कि चार दिन की ज़िन्दगी है, अभी आये हैं तो भोग लो। यू ओनली लिव वंस।

आचार्य: नहीं ठीक है। मैं भी कह रहा हूँ, यू ओनली लिव वंस। चार दिन की ज़िन्दगी है। और चार दिन की ज़िन्दगी है तो इसी से तो ये सिद्ध होता है न कि क्यों उसको बर्बाद किये दे रहे हो, समय बहुत कम है। तुम कह रहे हो चार दिन की ज़िन्दगी है, उसमें सुख भोग लूँ।

मैं कह रहा हूँ तुम्हें सुख मिल कहाँ रहा है? तुम झूठ बोल रहे हो कि तुम सुखी हो। तुम्हारा आत्मविश्वास बिलकुल खोखला है। थोड़ा सा उसको कुरेद दें तो भीतर तुम्हारे डर ही बैठा हुआ है। घोर असुरक्षा बैठी है। भीतर ही भीतर तुम लगातार तपते रहते हो, इसीलिए तुम बाहर इतना आत्मविश्वास प्रदर्शित करते हो।

मैं भी बिलकुल यही कहता हूँ, समय बहुत कम है इसलिए सुधर जाओ। यही तो तुम्हारा एकमात्र अवसर है। क्यों इसको व्यर्थ करे दे रहे हो। आनन्द तुम्हारा अधिकार है। मुक्ति तुम्हारा अधिकार है। बोध तुम्हारा अधिकार है। उसको पाये बिना क्यों मर जाना चाहते हो? दुख में ही तुम छटपटा रहे हो, अज्ञान की कीचड़ में लथपथ हो तुम, ऐसे ही जीने के लिए पैदा हुए थे क्या?

प्र: तो आज का जो युवा है, जो धर्म से तो काफ़ी दूर आ चुका है। और अपने आप को अगर कोई बोले भी कि हाँ, भाई तेरी ज़िन्दगी का कोई सुधार है तो वो दुर्गा सप्तशती से होगा या फिर वेदों के पास जाने से होगा, तो वो कतराता है। वो डरता है बल्कि कि भैया कहीं ग़लत ही न फँस जाऊँ। तो क्या अभी बहुत ज़्यादा ज़रूरत नहीं है कि कुछ नए सिंबल्स या फिर….

आचार्य: नए सिम्बल आप बना सकते हैं, उसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन पुराने जो हैं उनको तो समझ लो। जो पुरानी बात है उसको समझ लो, नए के निर्माण पर कोई रोक नहीं है। आप बिलकुल नए प्रतीकों को रच सकते हैं। और ये सृजनात्मकता की बात है कि हर युग अपने अनुसार देवत्व के, ऊँचाई के, सौंदर्य के नए प्रतीक गढ़े। ये अच्छी बात है।

लेकिन पता तो हो बात का। जब आप किसी चीज़ के मूल सिद्धान्तों से ही परिचित नहीं हैं, तो आप उसमें आगे विकास क्या करेंगे? अगर साइंस ही नहीं पता आपको, साइंस के रूल्स नहीं पता हैं तो आप नई टेक्नोलॉजी कैसे विकसित कर लोगे?

और वो जो मूल सिद्धान्त है, वो आप को मिलते हैं वेदान्त में। वेदान्त ही वो कुंजी है जो सब प्रतीकों के तालों को खोल देती है। सब बातें कोडेड तरीके से हैं। काली हों, दुर्गा हों, शिव हों, शक्ति हों, पार्वती हों ये सब प्रतीक हैं। राम हों, श्रीकृष्ण हों सब प्रतीक हैं।

पूरी श्रीमद्भगवद्गीता प्रतीकों में बात करती है। वो कोड है, उसको डिकोड करने के लिए आपको वेदान्त की समझ चाहिए। उसके बाद ये जितनी बातें हैं ये खुलने लग जाती हैं। सिंबल्स फिर आपके लिए मीनिंगफुल , अर्थवान हो जाते हैं।

नहीं तो आप ऐसा है जैसे किसी ताले की पूजा कर रहे हों। ताले पूजने के लिए नहीं होते हैं। ताले खोलने के लिए होते हैं। ताला खोलिए, फिर देखिए दरवाज़े के भीतर क्या है? और वहाँ बहुत बड़ा खज़ाना है। वहाँ बड़ी सम्पदा-समृद्धि है।

हम ताले को पूजे जा रहे हैं। कुछ लोग पूज रहे हैं ताले को और कुछ लोग हैं जो ताले को गालियाँ भी दे रहे हैं। न पूजने वाले कुछ समझ रहे हैं, न गालियाँ देने वाले कुछ समझ रहे हैं। चाबी उठाइए उसको खोलिए, देखिए भीतर क्या है?

प्र: चाबी माने वो विगरस ट्रेनिंग , साधना, जानना।

आचार्य: चाबी माने वेदान्त। चाबी माने वेदान्त। चाबी माने मन को जानना। चाबी माने समझना मन की वृत्तियों को और जानना की आत्मा माने मुक्ति ही — मन का, जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। लेकिन ये बात सिर्फ़ बौद्धिक रूप से पकड़ने की नहीं होती।

वेदान्त को जानना माने उसके साथ इतना निकट हो जाना कि ये बात आपकी रग-रग में पैठ जाए कि जब आपकी आँखें दुनिया को देखें तो एक आँख ऐसी भी हो जो स्वयं को देखती रहे। लगातार आत्मज्ञान वाले नेत्र को भी सक्रिय रखना।

इसको मैं कहता हूँ, ‘वेदान्त का ज्ञान होना।’ वेदान्त का ज्ञान अन्यथा बौद्धिक रूप से तो बहुत सरल है। कुछ मूल बातें हैं, महावाक्य हैं, उनको जान लो आपको लगेगा आप वेदान्त जान गये।

वेदान्त का ज्ञाता वो है जो जितना बाहर देख रहा है उतना ही भीतर भी देख रहा है। जब बाहर-भीतर एक साथ देखने लग जाते हो, संकल्प, अनुशासन, साधना से तब आपके हाथ वो चाबी लगती है, जिससे फिर धर्म के सारे ताले खुल जाते हैं।

प्र: धन्यवाद आचार्य जी। ये आपसे जब माँ काली के बारे में जानने को मिला, उससे तो बस ये दिखाई दिया कि ये साइंटिफिक अप्रोच ] के साथ ही अगर आप आगे बढ़ें और धर्म को जाने तो ही कुछ फायदा है वरना आप जाते हो उनकी पूजा करने और आप वही असुर बन जाते हो जिनके खिलाफ़ वो खड़ी हैं।

आचार्य: बिलकुल ठीक। बिलकुल ठीक है।

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