प्यार से समझाओ, विदेशी चोचले मत बताओ || आचार्य प्रशांत, वीगनिस्म पर (2021)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसा कि हम बात करते हैं दूध की तो भारत में डेयरी कंजम्पशन (दुग्ध आधारित उत्पादों का उपभोग) बहुत ज़्यादा है और लोग लगभग पूरी तरह से निर्भर है दूध पर। हर घर में दूध का बहुत ज़्यादा कंजम्पशन है। तो दूध एक ऐसी चीज़ हो जाती है जो ना कि खाने में बल्कि पूजा-पाठ में भी लोग इस्तेमाल करते हैं। तो इस माइंडसेट (मानसिकता) को हम कैसे बदल सकते हैं कि आप नोर्मल दूध यानी गाय या भैंस के द्वारा दिए जा रहे दूध को छोड़कर आप प्लांट बेस्ड मिल्क (पौधों पर आधारित दूध) की ओर जाएं? आपने सुना ही होगा कि अभी हाल में ही एक बड़ी डेयरी कम्पनी का एक विवाद हुआ है एक एन.जी.ओ. के साथ में, तो आपको क्या लगता है कि भारतीय लोग क्यों इतने ख़िलाफ हैं इस चीज़ के? क्यों डेयरी नहीं छोड़ना चाहते?
आचार्य प्रशांत: देखिए, जिस वजह से भारत में दुनिया में सबसे ज़्यादा शाकाहारी लोग पाएं जाते हैं — दुनिया में जितने भी शाकाहारी हैं उनका सबसे बड़ा वर्ग भारत में है। मैं समझता हूँ शायद आप आंकड़े देखें तो दुनिया भर के शाकाहारियों का सत्तर-अस्सी प्रतिशत तो भारत में ही है। तो जिस वजह से भारत में अधिकांश लोग शाकाहारी हैं उसी वजह से भारत में दूध को एक ऊँचा स्थान भी मिला हुआ है। अब आप या तो उस वजह से लड़ लीजिए या उस वजह का सदुपयोग कर लीजिए।
ये जो वीगन आंदोलन है वो आंदोलन भी कुछ भी नहीं है, अलग-अलग छोटे-छोटे उसके द्वीप है या कह दीजिए छोटी-छोटी टोलियाँ है जैसे होली में टोलियाँ निकलती है ना? वो कुछ ऐसा नहीं है कि एक संगठित, सुगठित आंदोलन चल रहा हो, ऐसा तो है भी नहीं उसमें। ये कभी इस बात पर विचार ही नहीं करते कि भारत इतनी गहराई से शाकाहारी कैसे रहा आया।
ये तो अभी पिछले दस-बीस साल में हुआ है कि ये जो नई पीढ़ी है ये बहुत तेजी से चिकन वगैरह की ओर जा रही है। वो भी हम विचार नहीं करते कि क्यों जा रही है, कि पहले के लोग अपेक्षतया ज़्यादा शाकाहारी क्यों थे। भारत शाकाहारी इसलिए नहीं रहा है कि पहले कोई



