
प्रसंग:
क्या मोक्ष को प्राप्त हुए लोगों के साथ कोई अनोखी घटना घटी थी जिसके कारण वे मोक्ष को प्राप्त हुए? क्या उनमें कुछ ख़ास था? बुद्ध को मोक्ष की प्राप्ति कैसे हुई थी?
सुई और पानी की कथा
तमिल कवि तिरुवल्लुवर की स्त्री का नाम वासुकी था। वह बड़ी…

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।

जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल अदालतों, सरकारों या अन्य संस्थाओं से उम्मीद करके नहीं हो सकता, क्योंकि ये सभी संस्थाएँ उसी समाज और चेतना से निकलती हैं, जिसने समस्या को जन्म दिया है। वास्तविक परिवर्तन के लिए मनुष्य को बदलना होगा। जब तक अज्ञान, conditioning और उदासीनता बनी रहेगी, संस्थाएँ भी व्यवस्था को ही बनाए रखेंगी। इसलिए तथ्यों को सीधे देखना, मिथकों से ऊपर उठना और जागरूकता विकसित करना ही मूल परिवर्तन का आधार है।

समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है।

जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। अंधाधुंध उपभोग, अनियंत्रित विकास, जनसंख्या वृद्धि और भविष्य के भ्रम ने पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल दिया है। समाधान डर फैलाने या आदेश देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और सही समझ में है। जब मनुष्य होश में जीना सीखता है, तभी उपभोग, विकास और जीवन के निर्णय प्रकृति के साथ संतुलित हो पाते हैं।

जानवर अपनी जैविक प्रवृत्तियों के अनुसार जीते हैं, जबकि मनुष्य के पास विवेक और चुनाव की क्षमता है। इसलिए अपने व्यवहार को सही ठहराने के लिए पशुओं का उदाहरण देना उचित नहीं है। जीवन में महत्वपूर्ण यह है कि हम सचेत होकर निर्णय लें। इसी तरह खेल में सफलता तब मिलती है जब ध्यान खेल पर हो, न कि जीत, प्रशंसा या दूसरों को प्रभावित करने पर। परिणाम की चिंता बढ़ते ही एकाग्रता टूटती है और प्रदर्शन प्रभावित होता है।

जलवायु संकट केवल किसानों, मज़दूरों या गरीबों की समस्या नहीं है; इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ने वाला है। बढ़ती गर्मी, आर्द्रता, बाढ़, सूखा, प्रदूषण, खाद्य संकट, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक अस्थिरता धीरे-धीरे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करेंगी। तकनीकी सुविधाएँ और निजी आराम स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकते। यह संकट भविष्य का नहीं, वर्तमान का है, और इससे बचाव के लिए सामूहिक जागरूकता व गंभीर कार्रवाई आवश्यक है।

जलवायु संकट कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। इसके बावजूद लोग, मीडिया और राजनीति उन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं जो अहंकार, मनोरंजन, पहचान और तात्कालिक भावनाओं को संतुष्ट करते हैं। पर्यावरण विनाश का मूल कारण बाहरी व्यवस्था से अधिक मानवीय लालच, उपभोग और सामूहिक बेहोशी है। प्रकृति का शोषण विकास नहीं, आत्मविनाश है; और जब तक व्यक्ति स्वयं नहीं बदलेगा, तब तक न राजनीति बदलेगी, न समाज, न पृथ्वी का भविष्य।

हम जो एनिमल लवर भी बनते हैं, तो आमतौर पर क्या करते हैं, मुझे आसपास जो दिख रहा है, मैं उसका ख़्याल कर लूँगा। तो ये तो तुम्हारा बहुत संयोग से रिश्ता बना न, बोध की बात तो ये है कि मैं देखूँ कि पूरी पृथ्वी पर क्या चल रहा है और उसके लिए काम करूँगा। और बिल्कुल ये हो सकता है कि जितना समय आप चार जानवरों की सेवा में लगा रहे हो, उतना समय अगर आप जानवरों के लिए सही तरीक़े से लगा दो, तो आप 4 हज़ार जानवर बचा दो। तो बताओ, फिर ये चार जानवरों की सेवा करना प्रेम हुआ या हिंसा?

खेत खाली जगह नहीं है; खेत एक ह्यूमन कॉलोनी है। खेत का मतलब होता है कि तुमने वहाँ की पूरी प्रकृति नष्ट कर दी है। 80% जो खेती होती है, वो सिर्फ़ इंसान को अन्न खिलाने के लिए नहीं, वो इंसान को मीट खिलाने के लिए होती है। तो जंगल काट के तुमने खेत बनाया, और वो खेती इसलिए कर रहे हो कि अब जानवर काटोगे। अगर हम में थोड़ी चेतना जगेगी, तो जैसे हम मनुष्यों को मारने को अपराध समझते हैं, वैसे ही हम जीवों को मारने को भी अपराध घोषित करेंगे, और पेड़ काटने को भी अपराध घोषित करेंगे।

यह मामला जो है, अरावली के नाश का नहीं है। यह मामला ग़रीबों के नाश का है। क्या होने वाला है? ड्रिलिंग-ब्लास्टिंग होगी, तो वहाँ पर उड़ेगी ज़बरदस्त क़िस्म की धूल। बिल्डर आएगा और वो वहाँ पर बनाएगा, अरावली ग्रीन्स। महँगी-महँगी रेज़िडेन्शियल प्रॉपर्टीज़ निकलेंगी। और अमीरों को कहा जाएगा, 'आओ, आओ, यहाँ पर इको-टूरिज़्म करो।' नुकसान किनका होने जा रहा है? आम आदमी का। पेड़-पौधों का, जानवरों का। एकदम जो ग़रीब लोग हैं, उनका। उनका, जो अभी पैदा भी नहीं हुए। यह चोरी सिर्फ़ ग़रीबों की जेब से नहीं की जा रही, यह चोरी अजन्मी पीढ़ियों की जेब से भी की जा रही है।

‘ज़ॉम्बी’ शब्द का मतलब समझते हैं? चलती-फिरती लाश। हम वो बन चुके हैं, बहुत हद तक। हम वैसे हो गए कि हमारे सामने अब कुछ भी चल रहा है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तो हम मर गए। और जो मर गया, वो मरने से क्यों डरे? उसको तुम 2000 की AQI में डाल दो, उसे तब भी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा; वो तो मर ही चुका है। ये समाज मृत्युधर्मा होता जा रहा है। हमारे भीतर ये मान्यता कूट-कूट कर भर दी गई है कि जो चल रहा है, ठीक ही चल रहा है, क्योंकि किसी और ने चला रखा है।

रेस्टोरेंट में जाकर बैठो, वहाँ मेन्यू आता है; उसमें लाल निशान वाले इतने सारे होते हैं; क्या बुरा नहीं लगता? सड़क पर गाड़ी लेकर निकलता हूँ, तो वहाँ पर झटका मीट, हलाल मीट। छोटे शहरों की ओर चले जाओ, तो वहाँ तो पूरे के पूरे बकरे लटक रहे हैं। जिस इंसान में थोड़ी भी जागृति है, वह जैसे-जैसे इस दुनिया को देखेगा, वैसे-वैसे बिल्कुल पगलाता जाएगा। कहेगा, "ये दुनिया है? ये जीने की जगह है? यहाँ क्यों जिए?" पर जीना है। दुनिया में आग लगी हुई है, तो आग बुझाने के लिए जीना है।

मनुष्य के शरीर में 70% पानी है और पृथ्वी की सतह पर भी 70% पानी है। आपको दिखाई नहीं दे रहा कि हम पृथ्वी ही हैं। और आप ऐसी जगह जा रहे हो जहाँ पानी की बूंद भी नहीं है, जहाँ अलग से प्लांट लगाकर बस किसी तरह से इतना पानी दिया जाएगा कि पीकर ज़िंदा रह लो। अगर प्लानेट बदल गया, तो आपने ये जितनी ग़ज़लें लिखी हैं, ये जितनी आर्ट फॉर्म्स हैं; ये सब आपके लिए बेकार हो जाएँगी क्योंकि माइंड बदल जाएगा। आप कुछ और हो जाओगे। किसी और ग्रह पर जाने का मतलब है सामूहिक आत्महत्या की सोचना।

इंसान होने का मतलब ही है बहुत कुछ होगा जो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर का होगा। एक चीज़ है तुम्हारे हक़ में। क्या? घटना कुछ भी घट रही हो, उस घटना को उत्तर क्या देना है। तुम्हारा प्रतिसाद, तुम्हारी प्रतिक्रिया, ये तुम्हारे अधिकार में हो सकते हैं। बिल्कुल संभव है कि बाहर बड़ी से बड़ी कठिनाई हो, कष्ट हो; भीतर तुम्हारे एक अस्पर्शित शांति बनी ही रहे। जो ऐसा कर ले गया, वो न सिर्फ़ जी गया, वो जीवन के पार निकल गया। सिर्फ़ उसी का जीवन सार्थक हुआ।

छोटे बच्चे हैं; मिर्ची लग गई। मम्मी भाग के आती है तो क्या करती है उसके मुँह में? ले, चीनी खा। ये सुख है। यह जीवन जीने की हमारी आम विधि रहती है। हमें सुख चाहिए ही इसीलिए होता है क्योंकि हम दुख में हैं। पर हम यह नहीं करते कि दुख के कारणों को ही समझ लें। जब दुख हो तो सुख की तरफ़ भागने की अपेक्षा दुख के कारणों की तरफ़ भागो, दुख के भीतर की ओर भागो। और वहाँ पता चलेगा दुख किसलिए है। पता चलते ही दुख घटना शुरू हो जाएगा। तुमने कुछ करा नहीं; तुमने सिर्फ़ जाना और जानने भर से दुख मिट गया।

आप साँस ले-लेके मर रहे हो। साँस लेके जिया जाता है। आपको मजबूर किया गया है कि आप साँस लेके मर जाओ, और आपके भीतर क्रोध नहीं उठ रहा। आप खड़े होकर के गर्जना नहीं कर रहे कि ये कैसे हो रहा है? कौन ज़िम्मेदार है? दुनिया की जो सबसे प्रदूषित राजधानी है, वो दिल्ली है। यह प्रदूषण विकास से नहीं हो रहा है। यह आंतरिक दूषण है, जो बाहरी प्रदूषण के रूप में दिखाई दे रहा है। छोटी सी बात ये है, कि इट ऑल स्टार्ट्स विदइन। और जो चीज भीतर से शुरू होनी है, आप बाहर, बाहर, उसमें लगे हुए हो। उससे क्या हो जाएगा?

दुख रोकना है, सुख को पकड़ो; वहीं दुख छिपा हुआ है। धोखा रोकना है, भरोसे को पकड़ो; वहीं धोखा छिपा हुआ है। चोट से बचना है, तो सहलाने वालों से बचो; वहीं से चोट आने वाली है। और चालाकी से बचना है, तो अपने भोलेपन को ध्यान से देखो; वहीं चालाकी छुपी हुई है। अज्ञान से बचना है, तो अपने ज्ञान को देखो; वहीं मूर्खता बैठी हुई है। और दुश्मनों से बचना है, तो दोस्तों से बचो। लूटने से बचना है, तो इकट्ठा करने से बचो।

ये समझना होता है कि past has a way of becoming the present. जो हमारी शरीर और मन की पूरी संरचना है, इस तरह से डिज़ाइन्ड नहीं है कि ये पास्ट को पास्ट में छोड़ दे। अगर पास्ट ही प्रेज़ेंट बन रहा है तो फ्रीडम कहाँ है? अतीत की कठपुतली बनने से मुक्त होने के लिए आपको चैतन्य प्रयास करना पड़ेगा। जो लोग वो चैतन्य प्रयास नहीं कर रहे, उन्हें ये दावा करने का कोई हक़ नहीं है कि वो फ़्री लाइफ़ जी रहे हैं। मुक्ति और क्या है? जो भी कीमत देनी पड़े, दो; पर जो स्वभाव नहीं है, उसको बर्दाश्त मत करो।

किस-किस की ज़िंदगी से कोई विदा हुआ है, जिसकी विदाई पर रोए थे? वो अभी भी उतना ही याद आता है जितना विदाई के चार महीने तक आता था? शरीर नहीं, तुम्हारी याद भी मिट जाएगी। तुम भी किसी को याद नहीं आने वाले, पागल। यही है भविष्य। खूबसूरत फंदों में फँसना सीखो। बस फंदा इस लायक होना चाहिए कि फँसा जाए। भगत सिंह ने भी फंदा ही तो चुना था, फंदा माने बंधन। पर वैसा बंधन चुनो तो क्या बात है! फिर उसके बाद शिकायत नहीं रह जाएगी कि ज़िंदगी रुखी है, बेरौनक है, ‘जिया नहीं जाता।’

दुनिया में किसी देश में उतनी खराब जलवायु नहीं है, जितनी भारत में है, और भारत में कहीं भी उतनी खराब नहीं, जितनी दिल्ली में है। यहाँ साँस नहीं ली जाती, यहाँ का पानी गंदा है, लेड, मर्करी सब मिले हुए हैं पानी में। जीना मुश्किल होने वाला है सबका, बस कुछ पर असर आज ही पड़ जाएगा, कुछ पर चार साल बाद पड़ेगा। जब तक आपको पता चलेगा कि यह असर इर्रिवर्सिबल है, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी, आप कुछ नहीं कर पाओगे।

हम सोचते हैं, हमारी जैसी चाहत है, ये सामने वाला व्यक्ति वैसा व्यवहार करे। वो आपकी चाहत के हिसाब से नहीं चलने वाला। आप चाहते रहो कुछ भी, कुछ भी चाहते रहो। एक ही बार में टूट जाने दो न दिल को, जग की मरनी क्यों मरे दिन में सौ-सौ बार। किसी को कुछ देना चाहते हो तो दे दो, उम्मीद क्यों कर रहे हो? और जहाँ आप सचमुच चाहते हो कि बदल जाए बंदा, अब लग गया है दिल, है कोई बात, नहीं छोड़ सकते ये कहकर कि जैसा पहले था, आगे भी वैसा ही रहेगा। जहाँ पर ये आपने रुख ले लिया हो, वहाँ पर साधन बस एक है। क्या? अध्यात्म।

श्रीमद् भगवत गीता प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग
धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || 1.1 ||
धृतराष्ट्र ने कहा, “हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के लिए एकत्रित हुए मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया?”
आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा से आरंभ हो…

पृथ्वी नहीं गर्म हो रही है, हम भीतर से तप रहे हैं, अपनी कामनाओं में। आग लगी हुई है हमारे भीतर — और भोग लूँ, और भोग लूँ, मुझे और कंज़म्पशन करना है। ये जो हमारे भीतर आग लगी हुई है ना, ये ग्लोबल वार्मिंग के रूप में हमें दिखाई दे रही है। कचरा बाहर नहीं फैल रहा है, कचरा हमारे भीतर है। और जब तक इंसान के भीतर के कचरे को साफ़ नहीं करोगे, बाहर कचरे को रोकने का कोई तरीका नहीं है।

ये मत कहिए कि पीछे से कुछ आ जाता है और आपको ले जाता है। जो सामने है, आप अपने आप को उससे बचा लेते हो। अगर आपने अपने आप को पूरा-पूरा जीवन को सौंप दिया होता, तो फिर कुछ बचता ही नहीं, जिसको भूत या भविष्य ले जाए। 'लैक ऑफ इंटरेस्ट' चाहिए और वो तब होता है, जब सामने कुछ होता है जो आपका पूरा अटेंशन ले ले। ज़िंदगी में जो ज़रूरी है, उसको स्वीकार करिए और उसमें कूद जाइए, फिर इधर-उधर की झंझटें ख़ुद ही याद आनी बंद हो जाएँगी।

अरे होगा कोई आमरण अनशन कर रहा होगा, हमें क्या लेना-देना?” तुम्हें ये लेना-देना कि तुम भूखे मरने वाले हो क्लाइमेट चेंज से। खेतों में फसलें उगनी बंद होने वाली हैं, और जिनकी वजह से खेतों में फसलें उगनी बंद होंगी, उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। उनके पास बहुत पैसा है। अपनी आमदनी का वो खाने पर एक या दो प्रतिशत खर्च करते हैं बस, उनके पास इतना पैसा है। वो दो प्रतिशत पहले खाने पर खर्च करते थे, अब तीन प्रतिशत खर्च कर लेंगे, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।

अगर कोई NCR में रह रहा है लगातार, तो उसकी उम्र से दस–पंद्रह साल गए — निश्चित रूप से गए। हमको सिखाया नहीं गया है कि क्या कीमती है। गुड लाइफ़ इसमें नहीं है कि हवा साफ़ है, पानी साफ़ है, सेहत अच्छी है, लाइब्रेरी में जाकर पढ़ने को मिल रहा है। गुड लाइफ़ इसमें है कि तुम मेरा माल खरीदो। जब तक हम वो सीमा नहीं तय कर देते कि भाई, इससे ज़्यादा कंज़म्प्शन की किसी भी आदमी को ज़रूरत नहीं है, तब तक ये AQI वगैरह बढ़ता ही रहेगा। लोग बस ये कहते हैं कि “मैं तो नहीं मरा न, और अभी तो नहीं मरा न; आगे मरेंगे तो देखा जाएगा।

आकाश से कोई प्रत्यक्ष प्रेम नहीं कर सकता। आकाश से प्रेम है कि नहीं, वो बस इसी से पता चलेगा कि पिंजरे को देखकर आग उठती है कि नहीं, पिंजरे के प्रति विरोध, विद्रोह उठता है कि नहीं। वही प्रेम का सूचक है।

शराब पीने से, मूवी देखने से, कोई भी एंटरटेनमेंट से क्या होता है? आप थोड़ी देर के लिए सब भूल जाते हो, यही तो होता है। इसका मतलब आपके पास कुछ है भूलने लायक, अपनी ज़िंदगी बर्दाश्त नहीं हो रही। जब तक आप व्यक्तित्व और पूरे माहौल को ही नहीं बदलोगे, तब तक जो भी लत लगी हुई है, वो लगी रहेगी। कोई आपका बहुत-बहुत गहरे आनंद का क्षण हो, उसमें आप बेहोश होना चाहोगे क्या? उसमें तो आप नींद को भी भगा देते हो, भगाते हो कि नहीं?

ऐसा कोई नहीं होता, जिसके जीवन में दुख न हो। हम पैदा ही दुख में होते हैं। दुख एक डिफ़ॉल्ट स्टेट है, जो सबकी ज़िंदगी में होगा ही होगा। यह और ज़्यादा ख़तरनाक बात है कि दुख है, लेकिन या तो आपने उसको दबा रखा है, या आप उसके ऑपोज़िट एंड, सुख पर जाकर किसी तरीके से बचने की कोशिश करते रहते हैं। कोई बोले, “मेरे पास दुख नहीं है, तो मैं अध्यात्म में क्यों आऊँ?” तो उसको फिर अपनी ज़िंदगी का पता ही नहीं है कि उसको कितना दुख है।

तुम कैसे शुद्ध सात्त्विक ज़िंदगी जी लोगे? संभव ही नहीं है। सड़क पर चल रहे हो न? सड़क पर खून है। वो सड़क ऐसे ही नहीं बन गई। सड़क पर ही चलते हो न? भोजन ही खाते हो न? भोजन में खून है। तुम कैसी सात्त्विक ज़िंदगी जी रहे हो? झूठ! हवा में साँस ले रहे हो न? हवा में धुआँ है। और वो धुआँ किस चीज़ का है? वो लाशों का धुआँ है। तुम किस सात्त्विक ज़िंदगी की बात कर रहे हो? लेकिन हमें ये बर्दाश्त करना पड़ेगा, हम गुनाह में शरीक हैं।

"हम बंधन में हैं, बंधन ही दुख है और जिज्ञासा उस दुख के पार जाने का उपाय है। अस्तित्ववादी विचारकों ने कहा था कि वास्तव में एक ही प्रश्न है — “To be, or not to be?” दुख इतना है कि इसके साथ जिएँ भी या न जिएँ? फिर कामू इसका उत्तर देते हैं, “जीना तो ऐसे ही पड़ेगा, बस अपनी हालत पर हँसकर जियो।” जो कुछ भी हो रहा है, उसे समझना तुम्हारा दायित्व है। जब समझकर सहते हो तो मुस्कुराहट आ जाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं, “इस जीवन में जो इंसान प्राकृतिक वेगों को तितिक्षा से सहने में सक्षम हो जाता है, वह जीवन-मुक्त है।”

जिसकी चेतना पूरे तरीके से उसकी देह से आबद्ध है, वह पशु है। पशुबलि का मतलब जानवर मारना नहीं है, पशुबलि का मतलब अपने भीतर के जानवर को मारना है। बकरे को नहीं मारना है, ये जो भीतर ‘मैं-मैं’ चलता रहता है, इसे मारना है। एक पशु को मारकर खाने से तुम्हें शांति कैसे मिल जाएगी? इससे कौन-सा देवता प्रसन्न हो जाएगा? ये क्रूरता और मूर्खता की बात है। वास्तविक धर्म कहता है — “भीतर वाले पशु को मारो।”
![[गाँधी जयंती विशेष] मत मानों उनके आदर्शों को, लेकिन उनको एक बार ठीक से पढ़ लो](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-8e708d2d-a5df-48cf-92ec-50fbf0d40a8a/30/image.jpg)
मैनचेस्टर से जाकर पूछो कि गांधी का वहां क्या नाम था और क्या छवि थी। गांधी कहते थे कि यह सब व्यापारी हैं, सभी पैसे के भूखे हैं। इन्हें भारत से जो पैसा मिल रहा है, भारत को लूट-लूट कर के लंदन मोटा रहा है। मैं भारत की लूट रुकवाऊंगा।…

ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी बहुत श्रेष्ठ दर्जे की हो सकती है और साथ ही साथ यह भी हो सकता है कि प्रकृति के साथ आपका रिश्ता बड़े प्रेम का हो। ऐसी टेक्नोलॉजी जो प्रकृति का नाश करती हो, हमें नहीं चाहिए। प्रकृति के प्रति सम्मान रखना और टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट — ये दोनों कोई आवश्यक रूप से विपरीत बातें नहीं हैं। अगर आपको उन्नति चाहिए और साथ ही साथ नाश नहीं चाहिए तो अध्यात्म ज़रूरी हो जाता है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का मतलब ही यही है कि विज्ञान, टेक्नोलॉजी चले और साथ ही साथ प्रकृति के प्रति आदर और प्रेम हो।

कृपा प्रदर्शित करने का तरीका है — युद्ध में निष्ठुरता। जो धर्म-विरुद्ध जा रहा हो, उसके प्रति सबसे बड़ी कृपा यही है कि उसको रोक दिया जाए। अगर अचेत व्यक्तियों को तुमने निष्ठुर होकर रोका नहीं, तो तुम उन्हें परोक्ष रूप से और ज़्यादा अधर्म करने के लिए प्रोत्साहित ही कर रहे हो। याद रहे कि किसी व्यक्ति के प्रति तुम्हारी आसक्ति, सत्य के प्रति तुम्हारे समर्पण से बड़ी न हो जाए।

जो चीज़ तुम्हें सबसे प्यारी हो, प्यार से यहाँ पर अर्थ है मोह का, आसक्ति का। जिससे तुमने अपनी आसक्ति बैठा ली है, जिससे लिप्त हो गये हो व्यर्थ ही, उसको त्यागना ही बलि है और ये बात ग्रन्थ बार-बार ज़ोर-ज़ोर से, दोहरा-दोहराकर, चिल्लाकर कहते हैं कि बलि की सही परिभाषा ये है। लेकिन इंसान ने बलि के नाम पर जानवरों को काटना शुरू कर दिया, हमसे ज़्यादा बड़ा जानवर कोई है क्या?

चेतना को मिटाने या दबाने के प्रयास को हिंसा कहते हैं। चेतना को समर्थन और सम्मान देना ही अहिंसा है। दैत्य स्वयं तो अचेत है ही, ये चैतन्य जीव की चेतना पर आक्रमण के लिए भी आतुर है, तो अब देवी क्या करें? अगर चेतना को बचाना है तो सबसे पहले उसका वध करना पड़ेगा जो चेतना के विरुद्ध खड़ा है। हिंसा हुई या नहीं हुई, यह इससे नहीं नापा जा सकता कि खून बहा कि नहीं बहा, बल्कि इससे नापना होगा कि आपका मन चेतना के साथ है या चेतना के ख़िलाफ़ है।

गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

अतीत शरीर में बैठा हुआ है; उसका मिटना बड़ा मुश्किल है। आपने जैसी ज़िंदगी जी होती है, वो आपकी देह में घुस जाती है। कोई भी पल कभी पूरे तरीक़े से बीत नहीं जाता, वो शरीर पर अपना निशान छोड़ जाता है। जिन चीज़ों को आप पीछे छोड़ आए हो, वो बीच-बीच में फिर सर उठाती दिखाई दें तो निराश मत हो जाना। आध्यात्मिक प्रक्रिया जंग जैसी होती है; उठोगे–गिरोगे, पर मैदान मत छोड़ना। ज़िंदगी ऐसी कर लो कि जो कुछ भी अतीत कह रहा है, उनके लिए समय ही कम से कम बचे।

आज वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड प्राकृतिक स्तर से 50% ज़्यादा हो गई है। ऐसा पाँचवें महाविनाश के बाद कभी नहीं हुआ। इसे छठा महाविनाश माना जा रहा है। सिर्फ़ तापमान नहीं बढ़ने वाला, तापमान की रेंज ज़बरदस्त तरीक़े से बढ़ने वाली है। यदि औसत तापमान 3 डिग्री है तो पीक 8–10 डिग्री बढ़ेगा। हर प्रजाति तापमान पर निर्भर होती है। तापमान बदल दोगे तो पूरी प्रजाति ही नष्ट हो जाएगी। यदि पूर्ण विध्वंस होगा तो वह आपने तय किया है और आप चाहो तो उसका समाधान भी हो सकता है।

प्रचलित धारणा है कि अध्यात्म में आकर आदमी अकर्मण्य हो जाता है, यह धारणा बिल्कुल ग़लत है। अध्यात्म तो आलसी को भी कर्मनिष्ठ बना देता है। श्रीकृष्ण की पूरी सीख ही यही है — युद्ध सही रखो और परिणाम की परवाह मत करो। आध्यात्मिक समर्पण का अर्थ होता है — संग्राम। यदि संग्राम नहीं है तो जीवन कायरता भरा समर्पण है। आध्यात्मिक आदमी हमेशा चुनौतियों से जूझता हुआ मिलेगा। जो लड़ गया, वह समर्पित है और जो पीठ दिखा रहा है, वह घोर कर्ताभाव रखता है।

पिछले एक हज़ार साल में मानवता के सामने जलवायु परिवर्तन से बड़ी कोई समस्या नहीं आई है। दुनिया के कार्बन उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा एक-दो प्रतिशत प्रिविलेज्ड आबादी करती है और इसी ने सबको नशे में डाल रखा है। सारा काम अमीरों ने किया है, और गरीब भुगत रहे हैं। यह मानव की उपभोग-प्रवृत्ति के कारण उत्पन्न संकट है। ज़िंदगी की एक समझ चाहिए, जिसकी शिक्षा हमें नहीं दी जा रही। हम अपने आपको नहीं जानते और यही वजह है कि इंसान अब इस हालत में पहुँच गया है कि बचना बड़ा मुश्किल हो गया है।

जो कुछ भी मानसिक है, वही तो मायावी है। जो कुछ भी मन में आ सकता है, छवि, चित्र, कल्पना के तौर पर, सिद्धांत के तौर पर, वही तो माया है, और क्या है।

कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।

पृथ्वी पर आज तक पाँच बार महाविनाश हो चुका है। महाविनाश माने सारे जीव जंतुओं का संपूर्ण नाश।इतिहास में 5 बार पृथ्वी का तापमान बेहिसाब बढ़ा, और ग्रह पर जीवन ही समाप्त हो गया।
और अब, छठे महाविनाश की शुरुआत हो चुकी है!और इस छठे महाविनाश का कारण भी…

प्रकृति के सारे चक्र क्लाइमेट चेंज से प्रभावित होने जा रहे हैं — ये प्रलय ही है। सब चक्र एक-दूसरे पर आश्रित हैं और फ़ीडबैक लूप्स सक्रिय हो चुके हैं। हम सिर्फ़ मरने नहीं वाले, हम पागल होकर मरने वाले हैं। अनुमान है कि 120 करोड़ लोग अपना घर छोड़कर भागने को विवश होंगे। यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे दर्दनाक विस्थापन होगा। यह वैल्यू सिस्टम की कैटस्ट्रॉफ़ी है; किसको महत्त्व देना है और किसको नहीं — यह हमें पता नहीं है, इसलिए अध्यात्म बहुत ज़रूरी है।

हमें चेतना होगा, ज़मीनी हक़ीक़त को स्वीकारना होगा, तथ्यों को सम्मान देना होगा। वरना हमारे प्यारे देश को प्रकृति की बड़ी कड़ी सज़ा दुर्भाग्यवश भुगतनी पड़ेगी।

यह जगते हुए आदमी का लक्षण है कि उसे बार-बार शक होता है, कहीं वह बेहोश तो नहीं है। जब आप कहते हैं, कुछ फ़ैसले नादानी, नासमझी में हो गए, तो छुपा दावा यही है कि बाक़ी समझदारी में किए हैं। गड़बड़ यही है — सब कुछ ही बेहोशी में हुआ है, क्योंकि करने वाला ही बेहोश था। अगर दिखने लगे कि निर्णय गड़बड़ थे, तो यह दुख नहीं, सौभाग्य है। नई शुरुआत करिए — पुराना जो था, सो था; 'अब मैं नया, मेरी कहानी नई, लिखते हैं फिर से, मज़ा आएगा।'