तुम 'कूल' कैसे हो गए? || आचार्य प्रशांत (2021)

Acharya Prashant

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तुम 'कूल' कैसे हो गए? || आचार्य प्रशांत (2021)

#तुम 'कूल' कैसे हो गए?

प्रश्नकर्ता: सर आप 'कूल' लोगों का एकदम बाजा बजा देते हो। तो सवाल मेरा यह है कि आप कूल लोगों की इतनी बजाते क्यों हैं? उनकी इतनी बेइज्जती क्यों करते हैं?

आचार्य प्रशांत: 'कूल' माने क्या? 'कूल' के आध्यात्मिक अर्थ हो सकते हैं। कृष्ण अर्जुन को गीता में कहते हैं — तू विगत ज्वर हो जा। उसे सिखाते हैं विगत ज्वर होना। विगत ज्वर समझते हैं? ज्वर माने, बुखार। बुखार माने हॉट (गर्म)। विगत ज्वर माने कि अब जिसको बुखार नहीं चढ़ता। माने जो 'कूल' हो गया। तो वही कह रहे हैं अर्जुन को — तू 'कूल' हो जा।

पर फिर कूल होने का जो असली मतलब है वो हमें पता तो हो। जिसको अब ज्वर नहीं चढ़ता; ज्वर माने उन्माद, आवेश, आवेग, वो कूल हो गया। अब दुनिया आ करके उसको आँच नहीं दिखा पाती। दुनिया उस पर चिंगारी नहीं फेंकती कि अब ये जल उठेगा। जो अब ज्वलनशील नहीं रहा वो कूल हो गया, है न?

तो कूल होना अच्छी बात है, तो मैं कूल लोगों के ख़िलाफ नहीं हूँ, ना बाजा बजाता हूँ, जो भी तुम कह रहे हो। बात ये है कि ये लोग कूल हैं नहीं, जो अपने-आपको कूल बोल रहे हैं। तो मुझे इनके कूल होने से समस्या नहीं है क्योंकि कूल हो जाएँ, यह तो अध्यात्मिक बात है। वो तो कृष्ण की बात का अनुसरण कर रहा है कूल हो करके। विगत ज्वर हो गया।

कूल होने में कोई समस्या नहीं है पर कूल हो नहीं और फिर भी अपने-आपको कूल कह रहे हो, यह समस्या है क्योंकि वो बेईमानी हुई न। तुम हो नहीं *कूल*। भीतर तुम्हारे गरमा-गरम लावा उबल रहा है और अपने आप को बोल क्या रहे हो? कि, 'मैं तो कूल हूँ!' मुझे उससे समस्या है।

तुम कूल क्यों नहीं हो? मैं सवाल तुम्हारी ओर पलट रहा हूँ। तुम कह रहे हो कि मुझे कूल लोगों से क्या समस्या है, नहीं, मेरी समस्या ये है कि तुम कूल क्यों नहीं हो। तुम्हें कूल होना चाहिए, तुम कूल हो नहीं। कहाँ से कूल हो तुम? कोई भी आ करके तुमको भड़का देता है, तुम भड़क जाते हो। कोई आ करके तुम्हें डरा देता है, तुम डर जाते हो।

कूल होने के लिए तुम्हारे पास उसका सामीप्य होना चाहिए, उसका साथ होना चाहिए जिसने सबसे पहले कूल होने की शिक्षा दी थी। माने कौन? कृष्ण, और कृष्ण का साथ होने का क्या मतलब है? कि तुम कृष्ण की मूर्ति साथ लेकर घूमो? नहीं, कृष्ण के साथ होने का मतलब है कि तुम कृष्ण का ज्ञान जानो। ज्ञान तुम्हारे पास कुछ है नहीं तुम कूल कैसे हो गए?

ज्ञान की जगह तुम्हारे पास क्या है? अज्ञान है, हर तरीके का, सांसारिक भी आध्यात्मिक भी। अब आध्यात्मिक ज्ञान को तो तुम वैसे ही अनकूल मानते हो और मैं कह रहा हूँ तुम्हारे पास तो सांसारिक ज्ञान भी नहीं है। तुम कूल कैसे हो गए , बताओ न? तुम नाईकी के जूते पहनकर कूल हो जाओगे? 'मैं कूल हूँ!' क्यों? 'लिवाइस की जींस और नाईकी के जूते पहनता हूँ, तो मैं कूल हूँ।'

'मैं नई-नई तरीके की गालियाँ देता हूँ तो मैं कूल हूँ।' ऐसे थोड़े ही कूल हो जाते हैं! तुम्हें दुनिया का भी कुछ नहीं पता, तुम अध्यात्म का, विजडम का तो छोड़ो, तुम्हें दुनिया का भी कुछ नहीं पता। तुम फूल (बेवकूफ) हो।

मैं तुमसे आध्यात्मिक सवाल पूछूँ, वो तो तुम्हारे लिए आउट ऑफ सिलेबस (पाठ्यक्रम से बाहर) है। मैं तुमसे कुछ दुनियादारी का सवाल पूँछ दूँ, कोई अच्छा वाला, तुम वो भी नहीं बता सकते। इनसे अभी पूछ दिया जाए यू.एन.एस.सी (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) का चेयरमैन कौन है, निन्यानवे प्रतिशत कूल लोग बता नहीं पाएँगे। उतना छोड़ दो, बहुत बड़ी बात कर दी, सिक्योरिटी काउंसिल बहुत दूर की बात हो गयी। चलो पास की बात कर देते हैं, मैं इनसे बोल दूँ चलो बिजली का बिल जमा कर आओ। ये कूल लोगों से बिजली का बिल नहीं जमा कराया जाएगा और ये बोल रहे हैं हम कूल हैं। इनको बोल दो जाकर अपना बैंक अकाउंट खुलवा लो। ये खुलवा नहीं पाएँगे। ये कूल हैं!

समझ में आ रही है बात? कूलनेस बहुत अच्छी चीज़ है पर आपके पास कूलनेस कहाँ है? आप जिस जनरेशन से आ रहे हैं उसके पास तो मेंटल डिजीज है। वो कूलनेस की निशानी होती है? बताओ न।

हम कोविड की बात करते हैं लेकिन पिछले तीस सालों का असली एपिडेमिक (महामारी) कौन सा है, हम जानते हैं न? कौन सा है? *मेंटल डिजीज*। और उसके शिकार कोई पचास-साठ पार के लोग नहीं हो रहे। सबसे ज़्यादा उसके शिकार कौन हैं? तुम्हारी (प्रश्नकर्ता के) उम्र के लोग या तुमसे जो कम उम्र के हैं। तुम तो पच्चीस के हो, पन्द्रह वाले, अट्ठारह वाले, बीस वाले ये जितने कूल हैं, ये सब मानसिक तौर पर इतने कमज़ोर हैं कि इन पर मानसिक बीमारियाँ हमला कर देती हैं।

और इनको ये बात बहुत बुरी लग रही होगी अभी सुनने में कि 'हम बीमार हो गए तो हमें कमज़ोर बोल रहे हो।' बिलकुल बोलेंगे साहब, जैसे शारीरिक बीमारी का जल्दी से लग जाना बताता है कि आपकी शारीरिक इम्यूनिटी कमज़ोर है। बताता है कि नहीं? आपको जल्दी से शारीरिक बीमारी लग जाए, इसका क्या मतलब है? आपकी शारीरिक इम्यूनिटी, प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर है। वैसे ही अगर आपको जल्दी से ही मानसिक आघात लग जाए, मानसिक बीमारी लग जाए तो क्या इससे ये नहीं पता चलता कि आपका मानसिक प्रतिरक्षा तंत्र, मेंटल इम्यूनिटी कमज़ोर है? पता नहीं लगता क्या? पर नहीं।

यह इतने 'कूल' है कि यह मानेंगे ही नहीं कि इनमें कमज़ोरी है। बल्कि नए-नए तरीके के जुमले और सिद्धांत ईजाद करते रहेंगे, कि हमें बताना नहीं कि हम कहीं पर गलत हैं, अगर तुमने हमें कहीं पर बताया कि हम गलत है तो हम बोलेंगे कि 'तुम हमारी शेमिंग (शर्मसार) कर रहे हो, शेमिंग बुरी बात होती है।'

किसी को बता दिया कि वह गलत है तो तुम दो काम कर रहे हो, एक तो जजमेंटल हो रहे हो, जजमेंटल होना गलत है। और दूसरा तुम उसकी शेमिंग कर रहे हो, शेमिंग करना भी गलत है।

अभी कोई आ करके मुझसे बोल रहा था, आप फूड शेमिंग करते हैं। मैंने कहा, 'कैसे?' बोले, 'वो एक बड़ा कोई इंस्टाग्रामर है, उसने हमको बताया है कि फूड शेमिग एक बुरी बात होती है क्योंकि ये तो अपने-अपने परसेप्शन (दृष्टिकोण) की बात है न।' मैंने कहा, 'कैसे?' वो बोला, 'आप लोग जानवरों को जीव की तरह देखते हो। ज़िंदा प्राणी की तरह देखते हो और हम लोग उसे भोजन की तरह देखते हैं, फूड की तरह देखते हैं। यह तो अपने-अपने परसेप्शन की बात है न।' मैंने कहा, 'अगर माने किसी का कैसा भी परसेप्शन है तो वो परसेप्शन रख कर के हर तरह के इल्ज़ामों से बरी हो गया?' बोल रहा है, 'हाँ, यह तो अपने परसेप्शन की बात है। अपनी आज़ादी की बात है कि कोई किसी भी चीज़ को कैसे भी देखे।'

मैंने कहा, 'फिर मैं तुझे फूड की तरह देखूँ तो? मेरा परसेप्शन है मैं तुझे फूड की तरह देख रहा हूँ।' बोला, 'मैं तो इंसान हूँ।' मैंने कहा, 'उसका क्या मतलब है? और उससे तुम्हें क्या विशेषाधिकार मिल गया, जो एक जानवर को नहीं मिल रहा? जानवर भी तो बोल सकता है कि मैं एक जानवर हूँ। तुम बोल रहे हो, मैं इंसान हूँ, फूड नहीं। जानवर भी तो बोल रहा है, मैं जानवर हूँ, फूड नहीं।' बोला, 'नहीं-नहीं-नहीं।' मैंने कहा, 'नहीं-नहीं कुछ नहीं, तुम बेवकूफी की बातें कर रहे हो।' बोल रहा है, 'आप जजमेंटल होने लग गए।' मैने कहा, 'मैं जजमेंटल हूँ, ठीक। तुम बेवकूफ हो, वो भी ठीक।'

ये 'कूलनेस' के लक्षण है कि तुम अपनी बेवकूफियों को दबाए जा रहे हो, छुपाए जा रहे हो, खुलकर मान नहीं सकते? बोलो। तुम्हें अपने इतिहास का पता नहीं, तुम्हें धर्म का कुछ पता नहीं, तुम्हारे लिए धर्म एक बकवास और गई-गुज़री चीज़ है जिससे तुम किसी भी तरीके से पीछा छुड़ाना चाहते हो और तुम अपने आपको 'कूल' बोलते हो।

मैं पूछ रहा हूँ, तुम किस चीज़ से पीछा छुड़ाना चाहते हो? रिलीजन (मज़हब) को ये बोलते हैं रिग्रेसिव (प्रतिगामी)। ठीक है, पहले तुम ये तो बता दो तुम किस चीज़ को रिग्रेसिव बोल रहे हो? बोल रहे है, '*रिलीजन*।' मैंने बोला रिलीजन माने क्या? बोले, 'वो हम जानना नहीं चाहते।' मैंने कहा, 'मतलब तुम किस चीज़ को रिग्रेसिव बोल रहे हो?' बोले रहे हैं '*रिलीजन*।' तो मैंने कहा, 'मतलब तो बता दो।' बोले, 'नेट-पिकिंग (नुक्ताचीनी) कर रहे हैं आप।' मैं नेट-पिकिंग कर रहा हूँ!

और मैं एक आदमी से नहीं कह रहा हूँ अभी, प्रश्नकर्ता से। मैं पूरी पीढ़ी से, बल्कि पूरे एक कल्ट (पंथ) से बात कर रहा हूँ, *द कल्ट ऑफ कूलनेस*। मैं उनसे बात कर रहा हूँ।

कैसे कूल हो तुम, बताओ? संवेदना रहित, सेंसटिविटी रहित होने का नाम 'कूल' होता है? इग्नोरेंट (लापरवाह) होने का नाम 'कूल' होता है? क्रुएल (हिंसक) होने का नाम 'कूल' होता है? अज्ञानी होने का नाम 'कूल' होता है? कैसे 'कू्ल' हो?

तुम्हारे लिए 'कूलनेस' का मतलब सिर्फ होता है — इरेवरेंट (बेअदब)। इररेवेंस समझते हो? हमारे लिए दुनिया में कुछ भी सेक्रेड (पवित्र) नहीं है। हमारे लिए दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसके आगे हम सर झुकाएँगे। यही हमारी 'कूलनेस' है।

मैं घंटों बोल सकता हूँ इस पर। कोई 'कूल' आदमी होता यहाँ पर तो मज़ा आता उससे आमने-सामने बात करके। और क्या निशानियाँ होती हैं 'कूलनेस' की? आपको कैसे पता चलता है कौन 'कूल' है, कौन 'अनकूल' है? गाली देना।

गाली-गाली में भी फर्क होता है न। एक गाली होती है जो होली पर चलती है। और एक गाली होती है जो शादियों में भी गायी जाती है। अगर आप में से कुछ लोग अगर बिहार या मिथिला के तरफ के होंगे तो जानते होंगे। वो एक चीज़ होती है। एक गाली वो भी हो सकती है जो प्रेम में या आत्मीयता में दोस्त एक-दूसरे को दे लेते हैं, वो भी एक चीज़ हो सकती है। और एक गाली वो होती है जो आप खुलेआम प्रदर्शित करते हो। अपनी 'कूलनेस' चमकाने के लिए। वो एकदम दूसरी चीज़ होती है कि नहीं होती है, बोलो?

पूर्व में, जब शादियाँ हो रही होती हैं न, वहाँ गाली गायी जाती है, बकायदा। जानते हैं आप लोग? नहीं जानते। गाली गायी जाती है और गाली माँ-बहन वाली गाली नहीं होती। वो गाली ऐसी होती है, कि अब लड़की पक्ष की दस-बीस औरतें बैठ जाती हैं और वह लड़के वालों की खिंचाई करना शुरू कर देती हैं। उसे कहते हैं गाली गाना। वो संस्कृति का हिस्सा है, गाली गायी जा रही है। वो सब बैठ करके लड़के के बाप के मज़े ले रही हैं, फिर लड़के के ताऊ दिख गए तो उसको ढोलक बजा-बजाकर कह रहे है कि इसकी मटके जैसी तोंद है और इसका कर रही हैं, उसका कर रही हैं। ये गाली कर रहे है, ये एक चीज़ है।

इसी तरीके से ब्रज में है या बरसाने में होली के समय जब गाली गायी जा रही है, तो वो भी एक चीज़ है। प्रेमी लोग हैं, मित्र लोग हैं, वो एक-दूसरे को आपस में प्रेम के नाते गाली देते हैं वो भी एक चीज़ है। लेकिन गाली आपकी रोटी बन जाए, ये बिलकुल दूसरी चीज़ है न। कि आप गाली दे-देकर रोटियाँ कमा रहे हो, आप की रोटी ही गाली है। आप की रोटी उठाओ और उस पर एक गाली लिखी हुई है। ये 'कूल' है? ये 'कूल' है मामला? कि गाली क्यों देता है ये आदमी क्योंकि गाली देने से इसकी रोटी चलती है। तो पहली रोटी उठाई उस पर लिखा हुआ है कोई गाली, वो उस रोटी को खा रहा है। उसकी पूरी हस्ती ही एक गाली बन गई है। उसके खून में अब गाली दौड़ रही है क्योंकि वो गाली की ही रोटी खाता है।

यह 'कूल' है बात? बोलो और क्या लक्षण होते हैं 'कूलनेस' के?

अगर ये वाकई इंग्लिश (अंग्रेज़ी) बोल रहे होते तो मैं कहता कम-से-कम 'सेमीकूल' हैं। इन्हें अंग्रेजी आती कहाँ है! ये तो यूँ ही कोई सड़क की भाषा बोलते हैं, *स्ट्रीट्स लैंगुएज*। इन्हें अंग्रेजी बोलने लग जाओ तो इधर-उधर होने लग जाते हैं। इनको अभी मैं बीस शब्द दे दूँ या अंग्रेजी मुहावरे दे दूँ या अंग्रेजी लोकोक्ति दे दूँ, और कहूँ इनका मतलब बता देना। ये बीस में से पाँच का मतलब बता दे तो मैं मान जाऊँगा ये 'कूल' हैं।

इन्हें अंग्रेजी आती कहाँ है? इन्हें अंग्रेजी नहीं आती, ये बस वेस्टर्नआईज (पश्चिमी) दिखने की कोशिश करते हैं। इन दोनों बातों में बहुत अंतर है। आपको अंग्रेजी आती है, अच्छी, एक भाषा की तरह, वो एक बात है और आप वेस्टर्नआईज तौर-तरीके दिखा रहे हैं वो बिलकुल दूसरी बात है।

बहुत अच्छी अंग्रेजी थी बाल गंगाधर तिलक की, महात्मा गांधी की, उतनी अच्छी अंग्रेजी सौ-दो सौ-दो हज़ार 'कूल' लोगों को ले आओ, किसी की नहीं होगी। पर वो वेस्टर्नआईज नहीं थे, और ये वेस्टर्नआईज्ड भी नहीं हैं। इनको वेस्ट मे छोड़ दिया जाए तो ये सड़क पर नहीं चल पाएँगे। इनका हर दस मीटर पर चालान कटेगा क्योंकि पश्चिम कम-से-कम सार्वजनिक स्थानों में जबरदस्त अनुशासन पर चलता है। इनके पास वो डिसिप्लिन भी नहीं है कि ये वेस्ट में जीवित रह पाएँ। तो ये कहीं के नहीं है, ना यह देसी हैं ना विदेशी हैं। ये दुनिया की हर जगह से परदेसी हैं।

इनकी अंग्रेजी कौन सी है, समझते हो? इनकी अंग्रेजी पंजाबी गानों वाली अंग्रेजी है। जहाँ पर जब आपको अंग्रेजी बोलनी होती है तो आप ब्रांड का नाम लेना शुरू कर देते हो, *'गुच्ची अरमानी यू आर माय जानी'*। यह इनकी अंग्रेजी है। इनसे हिंदी बोलो, इन्हे हिंदी नहीं आती है। हिंदी तो खैर, छोड़ ही दीजिए। ना तुम्हें हिंदी आती है, ना तुम्हें अंग्रेजी आती है तुमसे कौन सी भाषा में बात करें?

तो ले-देकर एक ही भाषा बचती है — गाली। या जानवरों वाली भाषाएँ, जिसमें भाषा नहीं ध्वनियाँ होती हैं। जानवरों के पास शब्द नहीं होते, उनके पास होती है ध्वनियाँ। तो फिर ये ध्वनियों में बात करते हैं। 'कूल' हो गए तुम? ध्वनियाँ कैसी होती है? आआववव! हूहूहू! अब तुम इस तरीके की आवाजें निकाल रहे हो। इसको तुम भाषा बोलते हो, इससे तुम 'कूल' हो गए, कैसे?

और क्या लक्षण होते हैं?

श्रोतागण: भावनाओं का मज़ाक उड़ाते हैं।

आचार्य: भावनाओं का अगर ये मज़ाक उड़ाते हैं तो इनके पास भावनाओं के अलावा क्या है? इनके पास क्या है,भावनाओं के अलावा? इनकी पूरी जनरेशन टिक-टॉक और इंस्टाग्राम पर बैठी हुई है। उस पर यह भावना से अलग कौन सा काम कर रहे है, बताना मेरे को?

हाँ, मैं बताता हूँ, ये सूक्ष्म भावनाओं का मज़ाक उड़ा सकते हैं। पर भावनाओं पर खुद भी बैठे हैं, बस ये स्थूल भावनाओं पर बैठे हैं। स्थूल भावनाएँ क्या हैं? कामवासना, ईर्ष्या, क्रोध, महत्वाकांक्षा। ये तो खुद ही भावनाओं पर चल रहे हैं। ये भावनाओं का मज़ाक क्या उड़ाएँगे। इनकी पूरी 'कूल' ज़िंदगी कामवासना पर, महत्वाकांक्षा पर केंद्रित है। ये भावनाएँ नहीं होतीं? तो ये खुद ही भावनाओं पर चल रहे है।

लेकिन अगर सूक्ष्म भावनाएँ हो त्याग, सेवा, समर्पण, वहाँ इनको हँसी छूट जाती है।

'कूल' हो कर दिखाओ। फटी हुई जींस पहनने से और बालों को नीला रंगवा लेने से और पिछवाड़े में टैटू करवा लेने से 'कूल' नहीं हो जाते। या हो जाते हैं? मै गधे की दुम के नीचे टैटू बना दूँ, तो वो 'कूल' हो गया? 'कूल' हो गया क्या? और क्या है भई 'कूल' माने?

श्रोता: पॉप कल्चर का अनुकरण करते हैं।

आचार्य: क्या है पॉप कल्चर?

श्रोता: बॉलीवुड के नायकों को अपना आदर्श मानते हैं।

आचार्य: तो इससे तो यही पता चलता है न कि तुम्हारे पास उससे अधिक और उससे ऊँचा कुछ है ही नहीं। जितना तुमको दिखाई दे रहा है उतने में ही तुम्हें अपना रोल मॉडल भी मिल गया। ना तुम्हें हिस्ट्री (इतिहास) पता है, ना तुम्हें साइंस (विज्ञान) पता है, तुम्हें किसी भी क्षेत्र का कोई गहरा ज्ञान है नहीं। ले-देकर के तुमने बचपन से एक स्क्रीन देखी है, उसी स्क्रीन में तुमको दो-चार-पाँच-सात दर्जन लोग मिल गए। उन्हीं में से कोई तुमको शारीरिक और इन्द्रियगत रूप से आकर्षक लग गया तो वो तुम्हारा हीरो हो गया, रोल मॉडल हो गया। और तुम क्या कर रहे हो? आपने भी क्या शब्द इस्तेमाल किया कि, 'वो बॉलीवुड को फॉलो कर रहे हैं।' तो ये फॉलो करना कब से 'कूलनेस' की निशानी हो गया भई?

हम तो यह समझते हैं 'कूलनेस' मतलब होता है कि अब भीड़ का अनुसरण नहीं करेंगे, सत्य का अनुसरण करेंगे, है न? कहीं यूँ ही कोई भीड़ चली जा रही है आप भी उसी के साथ-साथ चल दिए। ये 'कूलनेस' है, बोलो?

आपकी ज़िंदगी में ऐसा कुछ भी है, जो नया है, असली है, ओरिजिनल-ऑथेंटिक है? आप 'कूल' कैसे हो गए? आपकी ज़िंदगी में ऐसा कुछ भी है जो आपने मेहनत से हाँसिल करा है, तो आप 'कूल' कैसे हो गए?

दो चीज़ें हैं जिस पर आज के समय में, एकदम जोर नहीं दिया जा रहा। इन दो चीज़ों का बड़ा अपमान कर दिया गया है — एक श्रम और दूसरा ज्ञान। और 'कूलनेस' में ये दोनों ही शामिल नहीं हैं। कोई बहुत मेहनती आदमी है उसको आप 'कूल' नहीं बोलते, नहीं न? और कोई बहुत जानकार, होशियार, इंटेलिजेंट आदमी हो, उसको भी आप 'कूल' नहीं बोलते।

बल्कि इन चीज़ों का तो मज़ाक बनाया जाता है। आपके जो रोल मॉडल्स हैं मुझे बताइएगा, वो कितने मेहनती हैं और कितने ज्ञानी हैं? जो आपके 'कूल' सॉन्ग (गाने) आते हैं, उसमें जो आपका 'कूल' हीरो होता है और 'कूल' लेडी भी, वो ऑडी पर और बेंटली (कार) पर तो चल रहे होते हैं। पर उन सॉन्गस में या उन स्क्रिप्ट में कहीं भी ये शामिल होता है कि, उनको वो उतनी बड़ी कोठी या उतनी बड़ी गाड़ी मिली कैसे?

क्योंकि दुनिया में प्राप्ति के, पाने के, कुछ भी पाने के, अचीवमेंट के, यही दो तरीके होते हैं, क्या? श्रम और ज्ञान। आपके हीरोस ना तो कभी मेहनत करते नज़र आते हैं और ना कभी वो नॉलेज (ज्ञान) पाते नज़र आते हैं। वह सिर्फ नज़र आते हैं स्टाइल मारते हुए। ये स्टाइल मारना तुम वहन कैसे कर पा रहे हो, यह तो बता दो? बाप के पैसे पर? तुम बाप के पैसे पर 'कूल' बनोगे?

वो है न गाना — 'डैडी जी का कैश, उस पे करी जावे ऐश।' यह 'कूलनेस' है तुम्हारी! और तुम से बोल दिया जाए अपने दम पर दुनिया में दो काम करके दिख दो, तुमसे होगा नहीं।

तुम यह तो छोड़ दो कि तुम्हें इतना ज्ञान है कि तुम इलेक्ट्रिसिटी डिस्कवर कर सकते हो, तुम ये छोड़ दो कि तुममें इतनी मेहनत है कि तुम एक इलेक्ट्रिक पावर प्लांट खड़ा कर सकते हो, मैंने थोड़ी देर पहले कहा कि तुम इतने ना-काबिल हो कि तुम बिजली का बिल भी नहीं भर सकते। 'कूल' वो लोग थे जिन्होंने इलेक्ट्रिसिटी डिस्कवर की, 'कूल' वो लोग थे जिन्होंने पावर प्लांट खड़े करे। पर उन लोगों के बारे में तुम जानते भी नहीं होंगे।

और तुम्हारी 'कूलनेस' इसमें है कि तुम्हें ये भी नहीं पता कि इलेक्ट्रिसिटी का बिल कैसे भरा जाता है। तुमसे अभी ये पूछ लिया जाए कि पर यूनिट चार्ज कितना है बिजली का, तुम बता नहीं पाओगे 'कूल' आदमी!

'कूल' बाइक्स लेकर घूम रहे हैं। मुझे खैर मज़ा आता ही है 'कूल' लोगों को थोड़ा-सा लपेटे में लेने में। तो एक घूम रहा था ऐसे ही, मैंने पकड़ लिया, मैंने कहा, 'इधर आ।' मैंने कहा, 'तेरी बाइक का टॉर्क कितना है?' वो सोच रहा है वो मीटर में दिखाई देने वाली कोई चीज़ होती है। मैंने कहा, 'नहीं इसमें नहीं दिखाई देती है।' तो उसको लगा मैं कह रहा हूँ इसमें नहीं दिखाई देती है तो कहीं और दिखाई देती होगी, तो वह रियर व्यू मिरर (पीछे देखने वाली दर्पण) में देखने लगा, कि क्या पता इसमें टॉर्क दिख जाए।

और ये इंजीनियर हैं, 'कूल' इंजीनियर हैं। इन्हें टॉर्क माने नहीं पता। मैंने पूछा, 'तूने बाइक खरीदी कैसे?' बोल रहा है, 'आई एम इन लव विद शेप ऑफ़ इट (मैं इसकी बनावट के प्रेम में पड़ गया)।'

मैंने कहा, तुझे कुछ नहीं पता इसके इंजन में क्या है, तू इंजीनियर है। बोल रहा है, 'मैं 'कूल' हूँ, मैं इंजीनियर थोड़े ही ना हूँ, मैं सिर्फ 'कूल' हूँ।' और 'कूल' होने का क्या मतलब होता है? खोपड़े से खाली होना।

मुझे बोलते हैं, 'आचार्य गॉट नो चिल (आचार्य का दिमाग़ ठंडा नहीं है)।' अंदर-ही-अंदर जले-भुने तुम पड़े रहते हो और चिल मेरे पास नहीं है? बोध 'कूलनेस' है, आध्यात्मिकता 'कूल' है, 'अल्ट्राकूल', 'उबरकूल'। इसके अलावा कुछ नहीं 'कूल' होता।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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