जिनमें सच सुनने का दम है, सिर्फ़ उनके लिए || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श आचार्य जी, जब कोई कामना बहुत हावी हो जाती है तो उससे मिलने वाले तात्कालिक सुख के अलावा कुछ नहीं दिखता। लेकिन उस कामना को पूरी करने के बाद ग्लानि अनुभव होती है। जब चुनाव करना होता है, तब छोटे सुख की तरफ़ खिंच जाते हैं। उस समय सही चुनाव कैसे करें?
आचार्य प्रशांत: नहीं। देखिए, ये हो नहीं सकता कि कोई छोटा सुख आपको बड़ा दुख न दे रहा हो और अगर ऐसा हो रहा है कि आप किसी छोटे या बड़े सुख की ओर झुक जाते हैं और फिर उससे पैदा होने वाला दुख या उससे मिलने वाली ग्लानि, सुख से छोटी ही है, तो मैं तो यही सलाह दूँगा कि फिर तो उस सुख को भोगिए, जमकर भोगिए।
पर ऐसा होता नहीं है, ये अस्तित्व के नियम के विपरीत है। आपको जो सुख मिल रहा है छोटा, वो किसी बड़े सुख को काटकर मिल रहा है। वो जो बड़ा सुख कट रहा है, वह बड़े दुख की बात है न। उसको लगातार याद रखना होगा, थोड़ा स्वार्थी बनना पड़ेगा। जहाँ चोट लगी है, जहाँ नुकसान हुआ है, उस चीज़ को भूलना नहीं होगा।
जहाँ पाँच रुपए पाने की ख़ातिर पंद्रह गँवाने पड़े हों, वैसा सौदा दोहराने से बचना होगा। पर ये सब तभी हो सकता है, जब हममें ज़रा स्वयं के प्रति प्रेम हो। देखिए, कहने को तो कहते हैं कि मन का, मनुष्य का स्वभाव आनन्द है। कहते हैं न, हम आनन्दधर्मा लोग हैं इत्यादि। पर वो बात भी साधारण आदमी पर कुछ पूरी तरह ठीक है नहीं। हममें से ज़्यादातर लोग अपने स्वभाव से इतनी दूर निकल आते हैं कि हममें आनन्द के लिए भी कोई अनुराग बचता नहीं है। नहीं तो आनन्द की जो कशिश है, आनन्द की तरफ़ जो कर्षण है, जो खिंचाव है, वही बहुत है न।
आदमी कहेगा कि मैं फ़लाना काम क्यों करूँ, उसमें सुख से ज़्यादा दुख मिलता है, बात ख़त्म! वो बेवकूफ़ी भरे काम करेगा नहीं। लेकिन ऐसा होता नहीं है। हम आनन्दधर्मा की जगह दुखधर्मा बन बैठते हैं। हमें दुख मिलता जाता है, मिलता जाता है और वो हमारी नसों में दौड़ना शुरू कर देता है। दुख जैसे हमारा स्वभाव ही बन जाता है। हमें आपत्ति उठनी ही बन्द हो जाती है कि मैं दुखी क्यों हूँ, मैं कमज़ोर, दुर्बल क्यों हूँ। मैं दीन-हीन क्यों हूँ, मैं चिंतित और व्यग्र क्यों हूँ। ये सब सवाल उठने बन्द हो जाते हैं। इन सब सवालों की चिता पर एक पहचान खड़ी हो जाती है — मैं तो ऐसा ही हूँ।



