प्रश्नकर्ता: आपकी वीडियो देखती हूँ मैं हमेशा। और आपने बहुत लोगों को इस राह पर लगाया है, सत्य की राह पर। मैं भी बहुत महीनों से आपको सुन रही हूँ। और ऐसे जीवन को देखने लगी हूँ अभी। विवेक थोड़ा-थोड़ा जाग्रत होने लगा है, क्या सत्य है, क्या असत्य है। तो ऐसा लग रहा है कि जीवन में ये माया जो है — अभी इधर बैठी हूँ बहुत शान्त हूँ, आपके साथ हूँ। लेकिन इधर से बाहर जाऊँगी, तो कुछ-न-कुछ दिमाग में चलता रहेगा। ऐसे ही घर पर भी होता रहता है, हमेशा होता रहता है — ये माया-मोह के चक्कर में इतना हम लोग फँसे हैं। और सब लोग बोलते हैं और मैंने ऐसा समझा है कि कितना आत्म-सुख है। तो आत्म-सुख इतना नज़दीक है हमारे, वो आनन्द सागर है, वो हमारे इतने नज़दीक है, फिर भी हम लोग क्यों ऐसा माया-मोह में अटके हैं?
आचार्य प्रशांत: वो आनन्द सागर नज़दीक नहीं है, वो मिल ही गया है। उसी का नाम माया-मोह है। किसने कह दिया कि आत्मा का कोई भी सम्बन्ध सुख से है। जब आप कहते हैं ‘आनन्द सागर’, तो देखा है मन में कैसी अनुभूति होती है?
मैं बताता हूँ, कैसी होती है। पहली बात, छोटे सुख से बहुत बड़ा सुख, उसको आप नाम देते हैं आनन्द का। और जो सुख हमें अभी तक मिला है वो दो-चार बूँदें होती हैं, छींटें या बाल्टी भर के पानी अधिक-से-अधिक। उससे बहुत ज़्यादा बड़े — परिमाण में बड़े — सुख को आप नाम देते हैं सागर का। तो जब आप आनन्द सागर भी कह रहे हैं, तो वो वास्तव में उसी सीमित सुख का एक बड़ा प्रदर्शन है जिससे आप सदा से ही लिप्त और आसक्त रहे ही हैं।
हम जिसको सुख कहते हैं और हम जिसको आनन्द कहते हैं वो हमारे लिए एक ही आयाम की बातें हैं। उनमें हमारे देखे अन्तर आयाम का नहीं, बस परिमाण का, मात्रा का, संख्या का है। थोड़ा सा सुख, तो कह दिया सुख। और जब आनन्द कहा, तो भी कल्पना यही करी कि बड़ा भारी सुख। और थोड़े सुख की जब कल्पना करते हो तो साथ में मिलता है थोड़ा सा दुख, क्योंकि सुख-दुख क्या हैं? साथ हैं। सुख-दुख ऐसे ही हैं कि जैसे इस पर रोशनी पड़ रही है तो यहाँ रोशनी और यहाँ नीचे अन्धेरा (मेज़ पर पड़े रूमाल की तरफ़ इशारा करते हुए)।



