
कागा करंग ढंढोलिया सगला खाइया मासु। ए दुइ नैना मति छुइयो पिउ देखन की आस।। जो विरहिणी है वो कौए से बात कर रही है और कह रही है कि जितना माँस है शरीर में, तू खाले सब, मैं नहीं रोकती तुझे, लेकिन ये दो आँखें छोड़ देना। ये दो आँखें छोड़ देना क्योंकि इन्हें पिया को देखने की आशा है।


आचार्य प्रशांत: किसी मुर्दे को आज तक बीमार पड़ते देखा है तो इसका क्या अर्थ है? बीमारी कहाँ से उठती हैं? प्राणों से उठती है। बीमारी प्राण का सन्देश है तुम्हें, कुछ गलत हो रहा है। बीमारी प्राण का सन्देश है कि करीब आओ, मेरे पास रहो, मेरे जैसे हो

आचार्य प्रशांत: तुम जो इतना विचार करते हो कि पति क्या कर रहा होगा, पत्नी क्या कर रही होगी; और क्या है माथे का भार? दिन भर और क्या सिर पर चलता रहता है? नात, रिश्तेदार, काम, सम्बन्ध, पति, पत्नी, बच्चे, माता, पिता — यही मन है। इसी को कबीर


प्रश्न: आचार्य जी, बाबा शेख फ़रीद, ऐसा क्यों बोल रहे हैं, कि “जो तुमसे भय मानता हो, तुम उससे भय मानो?”

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥

प्रश्नकर्ता: हम ध्यान में डर क्यों जाते हैं?
आचार्य प्रशांत: हम ध्यान में डर क्यों जाते हैं? डर का या बेचैनी का या किसी भी तरह के विचित्र या विशिष्ट अनुभवों का सामना किस-किस का हुआ है, ध्यान में? कि ध्यान की किसी भी विधि का उपयोग किया। श्रवण भी…
कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खाइयो माँस। दोई नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।।
अर्थ: हे काग (कौवा) तन के हर जगह का माँस खाना पर आँखों का नहीं, क्योंकि मरने के बाद भी आँखों में पिया (प्रभु) मिलन की आस रहेगी ही रहेगी।
~ बाबा शेख फ़रीद
आचार्य…
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।

भारत में जाति केवल सामाजिक या कानूनी समस्या नहीं, बल्कि धर्म से जुड़ चुकी मानसिक संरचना बन गई है। इसलिए संविधान, कानून और समाज-सुधार के प्रयास इसे समाप्त नहीं कर पाए। जन्म-आधारित जाति का आधार वैदिक दर्शन नहीं, बल्कि बाद की विकृत धार्मिक व्याख्याएँ हैं। जाति तभी समाप्त होगी जब धर्म अपने मूल वेदान्त और अद्वैत स्वरूप की ओर लौटे, जहाँ मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, सत्य से होती है।

समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है।

मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।

अध्यात्म यह नहीं सिखाता कि बाहरी प्रभावों से बचो, बल्कि यह सिखाता है कि उनके दास मत बनो। जानकारी, विचार और अनुभव बाहर से ही आते हैं, लेकिन उन्हें समझने और उनके आधार पर निर्णय लेने का अधिकार आपके विवेक का है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब जीवन बाहरी प्रभावों से नहीं, बल्कि अपने विवेक से संचालित हो। मन बाहरी प्रभावों पर आश्रित हो सकता है, लेकिन आप केवल मन नहीं हैं ।

तकनीक अपने-आप में समस्या नहीं है। असली प्रश्न यह है कि उसका उपयोग कौन और किस मानसिक अवस्था से कर रहा है। यदि भीतर भय, असुरक्षा और निर्भरता है, तो तकनीक सुविधा देने के बजाय बैसाखी बन जाती है। तब संवाद कृत्रिम हो जाता है, ज्ञान सतही रह जाता है और शक्ति विनाश का साधन बनती है। बाहरी प्रगति तभी सार्थक है जब उसके साथ भीतर की परिपक्वता और विवेक भी विकसित हों; अन्यथा हर नई तकनीक हमारी कमज़ोरियों को ही और बढ़ा देती है।

क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।

डर और जड़ता से बाहर निकलने का रास्ता किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि एक छोटे-से सही कदम से शुरू होता है। अपनी समस्याओं का बार-बार विश्लेषण और वर्णन करने के बजाय उनसे दूर जाने का निर्णय आवश्यक है। सत्य के प्रति प्रेम जागने पर भय अपने-आप पीछे छूट जाता है और साहस जुटाना नहीं पड़ता। सही संगति, अनुकूल वातावरण और आत्मिक विकास के अवसरों को अपनाने से परिवर्तन सहज होने लगता है। अपनी कमजोरियों से मोह रखने के बजाय उनके प्रति वैराग्य विकसित करना ज़रूरी है। शिकायत, बहाने और आत्म-दया में उलझे रहने से कुछ नहीं बदलता; निर्णायक कर्म, सत्य के प्रति प्रेम और वर्तमान स्थिति के विरुद्ध विद्रोह ही ऊँचे जीवन की वास्तविक शुरुआत हैं.

प्रेम कोई सामाजिक स्वीकृति, विवाह या रोमांटिक आकर्षण नहीं, बल्कि अहंकार के मिटने की प्रक्रिया है। सच्चा प्रेम अनुमति नहीं मांगता और न ही हार्मोन या परंपरा से पैदा होता है; वह सत्य और मुक्ति की ओर भीतर की यात्रा है। इसी तरह अहंकार सफलता पाने के लिए खुद को नहीं मिटा सकता — क्योंकि जब तक "मैं" बना हुआ है, तब तक हर त्याग, चाहे परिवार का हो, मित्रों का हो या स्वास्थ्य का, अहंकार का ही एक रूप रहता है। सही कर्म योजना बनाकर नहीं, बल्कि झूठे प्रभावों और बंधनों से मुक्त होकर स्वतः प्रकट होता है।

आध्यात्मिकता अहंकार को सांत्वना देने या स्वयं को विद्रोही घोषित करने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने भीतर बैठी गहरी गुलामी को पहचानने का साहस है। हमारी अधिकांश इच्छाएँ, मान्यताएँ और पसंद वास्तव में सामाजिक संस्कारों से बनी होती हैं, इसलिए केवल बाहरी विद्रोह स्वतंत्रता नहीं देता। सच्चा धर्म भीतर के अहंकार से संघर्ष कर जीवन में सत्य के पक्ष में खड़े होने का आह्वान करता है, चाहे उसकी कीमत संघर्ष और घाव ही क्यों न हों।

प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।

डेटिंग ऐप, कुंडली मिलान और “मेरी पसंद” जैसी धारणाएँ अक्सर प्रेम नहीं, बल्कि डर, सामाजिक कंडीशनिंग और अहंकार से संचालित होती हैं। परंपरा के दबाव में किया गया चुनाव और केवल व्यक्तिगत पसंद पर आधारित चुनाव, दोनों ही भ्रमित हो सकते हैं। सच्चा प्रेम तब संभव होता है जब व्यक्ति स्वयं को जाने और ऐसा संबंध चुने जो उसके बंधनों, भय और अहंकार को चुनौती देकर उसे भीतर से मुक्त करे।

जीवन की बाहरी समस्याओं का समाधान केवल तकनीक, नीतियों या आर्थिक प्रगति से नहीं हो सकता, क्योंकि उनके पीछे मनुष्य की आंतरिक अवस्था काम करती है। विज्ञान और तकनीक उपयोगी हैं, लेकिन यदि मनुष्य स्वयं को नहीं समझता, तो वही उपलब्धियाँ विनाश का कारण भी बन सकती हैं। जलवायु संकट, अत्यधिक उपभोग और सामाजिक चुनौतियों की जड़ मानव की अतृप्त इच्छाओं और अचेतन जीवन में है। स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब बाहरी प्रगति के साथ आत्मज्ञान, ईमानदारी और आत्मबोध भी विकसित हो।

रिश्तों में प्रेम को अक्सर जन्म, परिवार या सामाजिक भूमिकाओं से जोड़ दिया जाता है, जबकि अधिकांश संबंध अपेक्षाओं, स्वामित्व और तयशुदा व्यवहारों पर टिके होते हैं। केवल माता-पिता या संतान का रिश्ता होने से प्रेम नहीं जन्मता। प्रेम कोई जैविक घटना नहीं, बल्कि सीखने और समझने की प्रक्रिया है। जहाँ “मेरा” और “मेरे लिए” का आग्रह घटता है, वहीं प्रेम सीमाओं को लाँघकर स्वतंत्रता, करुणा और वास्तविक संबंध का रूप लेता है।

रिश्तों में प्रेम अक्सर मान लिया जाता है, पर अधिकांश संबंध तय भूमिकाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक ढाँचों पर चलते हैं। माता-पिता, पति-पत्नी या परिवार के रिश्ते भी कई बार समझ, स्वतंत्रता और संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि आदत, अधिकार और “मेरापन” से संचालित होते हैं। सच्चा प्रेम सीमित नहीं होता; वह स्वामित्व नहीं, बल्कि समझ, स्वतंत्रता और विस्तार देता है। प्रेम जन्म से नहीं, जागरूकता से सीखा जाता है।

अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।

थोड़ी जीवन में ठसक होनी चाहिए, एक्सक्लूसिविटी। एक शान, ऐरी-गहरी चीज़ों को भाव नहीं देना, ऐरे-गैरों को मुँह नहीं लगाना। “तू क्यों है ऐरा-गैरा?” मैं तेरा अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं तुझे प्रेरणा दे रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है तू भी वही संभावना रखता है, जो किसी ऊँचे-से-ऊँचे व्यक्ति में है। तू अपनी संभावना क्यों नहीं साकार कर रहा? और जिस दिन तक तू अपनी संभावना साकार नहीं करता, उस दिन तक मैं तुझे स्वीकार नहीं करता।

ये घटना है जो आपको परेशान कर रही है। मैं चाहता हूँ कि आप सिद्धांत की ओर जाएँ, और ये आपको एक बहुत बेहतर और गहरे तरीके से सुरक्षित करेगा। एक बात ये है कि कोई आपको बताता है, “ओह, यूरेनियम की गेंदों के साथ मत खेलो, कुछ बुरा हो सकता है।” एक बात ये है कि आप सिद्धांत जानते हैं। आप ठीक-ठीक जानते हैं कि *क्रिटिकल मास,* गेंद का *रेडियस,* और ऐसी चीज़ें कैसे गणना की जाती हैं। आप क्या चाहेंगे? आप सिद्धांत के बारे में जानना चाहेंगे, है न?

तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफॉल्ट होता तो अच्छा है, बस वो पावर उसको करप्ट कर देता है। पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, कुछ लोगों पर। बात उन व्यक्तियों की नहीं है। हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है — अहंकार। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान।

जिसको तुम कहते हो रोमांटिक लव, इसका बाज़ारवाद से बहुत सीधा ताल्लुक है। अच्छे कपड़े पहन लिए, तोहफ़े दे लिए और मज़े कर लिए, लेकिन कुछ पूरा नहीं पड़ रहा; एक अधूरापन, एक कसक रह जाती है। आपकी बेचैनी वैसी की वैसी है। प्रेम का मतलब है कि जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोल दो; वो ख़ुद को जानने लगे, मन को समझने लगे, यही प्रेम है। लेकिन ये करना आसान नहीं होता। ये करने की क़ीमत चुकानी पड़ती है। ये करने के लिए तुम्हें अपना सर्वस्व भी निछावर करना पड़े, तो कर दो। यही है वैलेंटाइन डे।

मुझे बड़ा ताज्जुब होता है। एक से एक नमूने, ज़िंदगी में जिनको कुछ नहीं समझ में आता, कुछ नहीं जानते। 14 साल के होंगे, 16 साल के होंगे, तभी से एक लफ्ज़ वो जान जाते हैं, क्या? प्यार। और ऐसे कभी सामने पड़ें, मैं कहूँ कि तुझे गणित नहीं आती, तुझे भूगोल नहीं आता, तुझे यहाँ से लेकर वहाँ तक सीधे चलना नहीं आता, तुझे किसी आदमी से दो बात करना नहीं आता, तुझे अपना गुस्सा संभालना नहीं आता, तुझे कहीं पर समय से पहुँचना नहीं आता, तुझे इंसान बनना नहीं आता, तुझे प्रेम करना कहाँ से आ गया?

पानी को आप खौलाते हो, देखा है जब वो 100 डिग्री के आसपास पहुँचने लगता है, तो आवाज़ करने लगता है। वैसे ही आकर आपको कोई खौला देता है, तो आप भी आवाज़ करने लगते हो, “भाग यहाँ से, मार दूँगा, ऐसे कर दूँगा, भाग यहाँ से।” पानी में कोई जान होती है? पर आवाज़ करने लग गया न, क्योंकि किसी ने बाहर से उसमें आग लगा दी। आपके भी कोई आग लगा देता है, तो आप आवाज़ करने लग जाते हो कि नहीं? करने लग जाते हो। तो आवाज़ करने के लिए, बेटा, बोलने के लिए, *कॉन्शियस* होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।

ऑब्ज़रवेशन का हमेशा एक ऑब्जेक्ट होता है। अटेंशन थोड़ी-सी अलग चीज़ है, क्योंकि उसका कोई ऑब्जेक्ट नहीं होता। इट्स जस्ट अ स्टेट ऑफ माइंड, इन विच द माइंड नोज़, इन विच द माइंड इज़ फ़्री ऑफ डिस्टरबेंस इन व्हाटएवर इट डज़। इट डज़ नॉट हैव एन ऑब्जेक्ट ऑर अ सेंटर।

आत्म-अवलोकन बस ये नहीं है कि बैठे-बैठे कह रहे हैं, 'मैं आत्म-अवलोकन कर रहा हूँ।' सक्रिय रूप से जाकर के पूछो। जैसे, आपने एक फ़िल्म देखी किसी के साथ। तो देखने के बाद आधे घंटे कहीं बैठ जाओ, और कहो, 'अच्छा, मैंने क्या देखा?' 'अच्छा, तुमने क्या देखा?' इससे पता चलता है कि कितने हम पक्षपाती हैं। फ़िल्म हो, समाज हो, घटना हो, जीवन हो, कुछ भी। जिन्हें स्वयं को बढ़ाना है, उनके लिए बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो दूसरों से बात ज़रूर करें। अपने पास सिर्फ़ अपना ही पक्ष नहीं, तीन-चार और पक्ष आने दें।

इंसान होने का मतलब ही है बहुत कुछ होगा जो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर का होगा। एक चीज़ है तुम्हारे हक़ में। क्या? घटना कुछ भी घट रही हो, उस घटना को उत्तर क्या देना है। तुम्हारा प्रतिसाद, तुम्हारी प्रतिक्रिया, ये तुम्हारे अधिकार में हो सकते हैं। बिल्कुल संभव है कि बाहर बड़ी से बड़ी कठिनाई हो, कष्ट हो; भीतर तुम्हारे एक अस्पर्शित शांति बनी ही रहे। जो ऐसा कर ले गया, वो न सिर्फ़ जी गया, वो जीवन के पार निकल गया। सिर्फ़ उसी का जीवन सार्थक हुआ।

छोटे बच्चे हैं; मिर्ची लग गई। मम्मी भाग के आती है तो क्या करती है उसके मुँह में? ले, चीनी खा। ये सुख है। यह जीवन जीने की हमारी आम विधि रहती है। हमें सुख चाहिए ही इसीलिए होता है क्योंकि हम दुख में हैं। पर हम यह नहीं करते कि दुख के कारणों को ही समझ लें। जब दुख हो तो सुख की तरफ़ भागने की अपेक्षा दुख के कारणों की तरफ़ भागो, दुख के भीतर की ओर भागो। और वहाँ पता चलेगा दुख किसलिए है। पता चलते ही दुख घटना शुरू हो जाएगा। तुमने कुछ करा नहीं; तुमने सिर्फ़ जाना और जानने भर से दुख मिट गया।

तुम और क्या करोगे, भीतर परेशान हो तो दूसरों को परेशान करोगे। ‘आई लव यू’ भी बोलते हो, तो तुम्हारी आँखों में आशा रहती है। और फिर जब वो उम्मीद पूरी नहीं करेगा, तो कहोगे: ‘हर्ट।’ जो भी बात है, उसको थोड़ा खुला रखना सीखिए। देना सीखो और लो भी तो उसी से, जो बिना उम्मीद के दे रहा हो तुमको।

भारत के सारे जवान लोगों का अब यही नारा है: कुछ और न आता हो हमको, हमें प्यार निभाना आता है। प्रेम हल्की बात नहीं होती है, भाई! एक तरीके से प्रेमी बनने का अर्थ होता है चिकित्सक बनना; जिससे प्रेम करते हो, तुम्हारे ऊपर उसके सुधार और स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी आ जाती है। प्यार ऐसी चीज़ है, जिससे बच भी नहीं सकते, लेकिन बिना पात्रता के किया, तो फिर तुम्हें कोई बचा भी नहीं सकता। करना तो पड़ेगा ही, लेकिन बिना समझ-बूझ कर करा, तो फिर वो प्यार नहीं है, वो अत्याचार है।

दुख रोकना है, सुख को पकड़ो; वहीं दुख छिपा हुआ है। धोखा रोकना है, भरोसे को पकड़ो; वहीं धोखा छिपा हुआ है। चोट से बचना है, तो सहलाने वालों से बचो; वहीं से चोट आने वाली है। और चालाकी से बचना है, तो अपने भोलेपन को ध्यान से देखो; वहीं चालाकी छुपी हुई है। अज्ञान से बचना है, तो अपने ज्ञान को देखो; वहीं मूर्खता बैठी हुई है। और दुश्मनों से बचना है, तो दोस्तों से बचो। लूटने से बचना है, तो इकट्ठा करने से बचो।

ये समझना होता है कि past has a way of becoming the present. जो हमारी शरीर और मन की पूरी संरचना है, इस तरह से डिज़ाइन्ड नहीं है कि ये पास्ट को पास्ट में छोड़ दे। अगर पास्ट ही प्रेज़ेंट बन रहा है तो फ्रीडम कहाँ है? अतीत की कठपुतली बनने से मुक्त होने के लिए आपको चैतन्य प्रयास करना पड़ेगा। जो लोग वो चैतन्य प्रयास नहीं कर रहे, उन्हें ये दावा करने का कोई हक़ नहीं है कि वो फ़्री लाइफ़ जी रहे हैं। मुक्ति और क्या है? जो भी कीमत देनी पड़े, दो; पर जो स्वभाव नहीं है, उसको बर्दाश्त मत करो।

किस-किस की ज़िंदगी से कोई विदा हुआ है, जिसकी विदाई पर रोए थे? वो अभी भी उतना ही याद आता है जितना विदाई के चार महीने तक आता था? शरीर नहीं, तुम्हारी याद भी मिट जाएगी। तुम भी किसी को याद नहीं आने वाले, पागल। यही है भविष्य। खूबसूरत फंदों में फँसना सीखो। बस फंदा इस लायक होना चाहिए कि फँसा जाए। भगत सिंह ने भी फंदा ही तो चुना था, फंदा माने बंधन। पर वैसा बंधन चुनो तो क्या बात है! फिर उसके बाद शिकायत नहीं रह जाएगी कि ज़िंदगी रुखी है, बेरौनक है, ‘जिया नहीं जाता।’

प्रेम ऐसी चीज़ है जो बोध के पहले भी चाहिए और बोध के बाद भी आती है। बोध से पहले कौन-सा प्रेम चाहिए? मैं जो उच्चतम और सुंदरतम हो सकता हूँ, वो मुझे होना है; ये है आंतरिक प्रेम, परम प्रेम। परम प्रेम कहता है, बोध होना चाहिए और जब बोध होता है, तो फिर उसके होने से आप जान जाते हो कि दुनिया में आपके प्यार के लायक कौन-सा विषय है। तो सबसे पहले परम प्रेम, फिर बोध और फिर साधारण सांसारिक प्रेम।

हम सोचते हैं, हमारी जैसी चाहत है, ये सामने वाला व्यक्ति वैसा व्यवहार करे। वो आपकी चाहत के हिसाब से नहीं चलने वाला। आप चाहते रहो कुछ भी, कुछ भी चाहते रहो। एक ही बार में टूट जाने दो न दिल को, जग की मरनी क्यों मरे दिन में सौ-सौ बार। किसी को कुछ देना चाहते हो तो दे दो, उम्मीद क्यों कर रहे हो? और जहाँ आप सचमुच चाहते हो कि बदल जाए बंदा, अब लग गया है दिल, है कोई बात, नहीं छोड़ सकते ये कहकर कि जैसा पहले था, आगे भी वैसा ही रहेगा। जहाँ पर ये आपने रुख ले लिया हो, वहाँ पर साधन बस एक है। क्या? अध्यात्म।

ये मत कहिए कि पीछे से कुछ आ जाता है और आपको ले जाता है। जो सामने है, आप अपने आप को उससे बचा लेते हो। अगर आपने अपने आप को पूरा-पूरा जीवन को सौंप दिया होता, तो फिर कुछ बचता ही नहीं, जिसको भूत या भविष्य ले जाए। 'लैक ऑफ इंटरेस्ट' चाहिए और वो तब होता है, जब सामने कुछ होता है जो आपका पूरा अटेंशन ले ले। ज़िंदगी में जो ज़रूरी है, उसको स्वीकार करिए और उसमें कूद जाइए, फिर इधर-उधर की झंझटें ख़ुद ही याद आनी बंद हो जाएँगी।

आकाश से कोई प्रत्यक्ष प्रेम नहीं कर सकता। आकाश से प्रेम है कि नहीं, वो बस इसी से पता चलेगा कि पिंजरे को देखकर आग उठती है कि नहीं, पिंजरे के प्रति विरोध, विद्रोह उठता है कि नहीं। वही प्रेम का सूचक है।

शराब पीने से, मूवी देखने से, कोई भी एंटरटेनमेंट से क्या होता है? आप थोड़ी देर के लिए सब भूल जाते हो, यही तो होता है। इसका मतलब आपके पास कुछ है भूलने लायक, अपनी ज़िंदगी बर्दाश्त नहीं हो रही। जब तक आप व्यक्तित्व और पूरे माहौल को ही नहीं बदलोगे, तब तक जो भी लत लगी हुई है, वो लगी रहेगी। कोई आपका बहुत-बहुत गहरे आनंद का क्षण हो, उसमें आप बेहोश होना चाहोगे क्या? उसमें तो आप नींद को भी भगा देते हो, भगाते हो कि नहीं?

हम अपने आप को बहाना दिए रहते हैं कि अगर मेरे जीवन में प्रेम नहीं है, तो इसलिए नहीं है क्योंकि कठिन है। संगति ऐसों की करिए, जिनकी ज़िंदगी में प्रेम हो, वो आपसे आपके बहाने छीन लेंगे। संगति इसीलिए बहुत बड़ी चीज़ होती है। सौ लोग मिलकर जो सिद्ध कर रहे हैं कि प्रेम असंभव है, इन सौ लोगों की बात को एक दूसरा उदाहरण, एक विपरीत उदाहरण काट सकता है, उसकी खोज करनी चाहिए। और ये सौ उस एक से बहुत घबराएँगे, क्योंकि एक करोड़ लोगों के झूठ को एक आदमी का सच काट सकता है।

ऐसा कोई नहीं होता, जिसके जीवन में दुख न हो। हम पैदा ही दुख में होते हैं। दुख एक डिफ़ॉल्ट स्टेट है, जो सबकी ज़िंदगी में होगा ही होगा। यह और ज़्यादा ख़तरनाक बात है कि दुख है, लेकिन या तो आपने उसको दबा रखा है, या आप उसके ऑपोज़िट एंड, सुख पर जाकर किसी तरीके से बचने की कोशिश करते रहते हैं। कोई बोले, “मेरे पास दुख नहीं है, तो मैं अध्यात्म में क्यों आऊँ?” तो उसको फिर अपनी ज़िंदगी का पता ही नहीं है कि उसको कितना दुख है।

भारतीय चित्त बहुत हद तक ऐसा हो गया कि हमें कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं करना। नींद आ रही? नहीं आ रही। खाओगे? नहीं खाएँगे। कपड़ा चाहिए? नहीं चाहिए। पैसा चाहिए? नहीं चाहिए। तू जी ही क्यों रहा है फिर, जब तुझे कुछ नहीं चाहिए तो? भीतर कामना भरी हुई है और बाहर से संस्कारी दिखना है। जो खुल के नहीं बता सकता कि उसकी कामना क्या है, उसके पास छुपी हुई बहुत बड़ी कामना है। सरल हो जाओ। प्रकृति ने पैदा किया है। प्रकृति को ही हम महा-माँ बोलते हैं। जैसे भी हो, वैसे हो, पैदा ही ऐसे हुए हो, शर्माने-लजाने की क्या बात है इसमें?

कोई पूछे सुबह-सुबह, “कहाँ जा रहे हो?” बोलो, “मोहब्बत करने।” मैं जी रहा हूँ, और यूँ ही नहीं जी रहा हूँ, मेरी हर धड़कन में आशिक़ी है। ये ज़िंदगी के प्रति प्रेम है — ऐसा प्यार जो परिणाम माँगता ही नहीं। किसके लिए है बात ये सारी? जो कर रहे हैं, उसके लिए है। ये प्रेम यज्ञ की ज्वाला है — काम और आग, जिसमें वो आग हो, वो है योगी। आग का धर्म है हमारा; उपनिषद् कहते हैं, “तुम अमृत की औलाद हो।” मैं और साफ़ करके तुमसे कह रहा हूँ — तुम आग की औलाद हो और आग की औलाद नहीं हो, तो अपने आप को सनातनी मत बोलना।

जहाँ प्रेम है, वहाँ मोह हो नहीं सकता, और जहाँ मोह है, वहाँ प्रेम की कोई जगह नहीं है। मोह में सुविधा है, सम्मान है। प्रेम तो सब तोड़-ताड़ देता है—पुराने ढर्रें, पुरानी दीवारें, सुविधाएँ, आपका आतंरिक ढाँचा, और जो सामाजिक सम्मान मिलता है। प्रेम सब तोड़ देता है। प्रेम इतनी ऊँची चीज़ है कि आप उसमें पुरानी व्यवस्था का विरोध नहीं करते, पुरानी व्यवस्था को भूल जाते हो। प्रेम और मोह दो अलग-अलग दुनियाओं के हैं।

संतों ने गाया है कि इश्क़ और मौत साथ-साथ नहीं चले, तो इश्क़ कैसा? हमारा जीवन अप्रेम का है। जो अपने ही प्रति सहानुभूति नहीं रखता, वो अपने आप को जैसा है, वैसा बचाए रखेगा और प्रेम जब आ गया तो अहम् मिटेगा। प्रेम जो तुम्हें तुम्हारे जैसा छोड़ दे, वो प्रेम तो है ही नहीं।