
कागा करंग ढंढोलिया सगला खाइया मासु। ए दुइ नैना मति छुइयो पिउ देखन की आस।। जो विरहिणी है वो कौए से बात कर रही है और कह रही है कि जितना माँस है शरीर में, तू खाले सब, मैं नहीं रोकती तुझे, लेकिन ये दो आँखें छोड़ देना। ये दो आँखें छोड़ देना क्योंकि इन्हें पिया को देखने की आशा है।

*farida jaaganaa ee taan jaag, hoiaa ee parbhat*is jaagan noo pachhtaayengaa ghanaa savenga raat

आचार्य प्रशांत: किसी मुर्दे को आज तक बीमार पड़ते देखा है तो इसका क्या अर्थ है? बीमारी कहाँ से उठती हैं? प्राणों से उठती है। बीमारी प्राण का सन्देश है तुम्हें, कुछ गलत हो रहा है। बीमारी प्राण का सन्देश है कि करीब आओ, मेरे पास रहो, मेरे जैसे हो

आचार्य प्रशांत: तुम जो इतना विचार करते हो कि पति क्या कर रहा होगा, पत्नी क्या कर रही होगी; और क्या है माथे का भार? दिन भर और क्या सिर पर चलता रहता है? नात, रिश्तेदार, काम, सम्बन्ध, पति, पत्नी, बच्चे, माता, पिता — यही मन है। इसी को कबीर


प्रश्न: आचार्य जी, बाबा शेख फ़रीद, ऐसा क्यों बोल रहे हैं, कि “जो तुमसे भय मानता हो, तुम उससे भय मानो?”

ध्यान में बैठकर हम कोशिश करते हैं कि मन में एक भी विचार न आए, मानो सोचना कोई गंदगी हो। पर जैसे पेट का काम पचाना है, वैसे ही मस्तिष्क का काम सोचना है। विचार न कोई रोग है, न कोई बड़ी उपलब्धि, वह डकार जितनी ही साधारण क्रिया है। दस सेकंड आँख बंद करके अपनी कोई अधूरी हसरत पूरी होती सोचिए, सब नकली जानते हुए भी मज़ा आ जाता है। सोच के घोड़े को वही दौड़ा रहा है जिसे उससे राहत की आशा है। तो हम विचार से लड़ें, या पूछें कि यह सोच किसके लिए चल रही है?
Farid says that you have anyway been sleeping since a really long time.…
प्रश्नकर्ता: हम ध्यान में डर क्यों जाते हैं?
आचार्य प्रशांत: हम ध्यान में डर क्यों जाते हैं? डर का या बेचैनी का या किसी भी तरह के विचित्र या विशिष्ट अनुभवों का सामना किस-किस का हुआ है, ध्यान में? कि ध्यान की किसी भी विधि का उपयोग किया। श्रवण भी…
कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खाइयो माँस। दोई नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।।
अर्थ: हे काग (कौवा) तन के हर जगह का माँस खाना पर आँखों का नहीं, क्योंकि मरने के बाद भी आँखों में पिया (प्रभु) मिलन की आस रहेगी ही रहेगी।
~ बाबा शेख फ़रीद
आचार्य…
आचार्य प्रशांत: तो, कहा है कि जो तुमसे भय मानता हो, तुम उससे भय मानो।बताते हैं कि बाबा फ़रीद के उपदेशों में से समझेंगे। आप यदि किसी…
![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)
आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग है।
आचार्य प्रशांत के यूं तो सोशल मीडिया इत्यादि पर तीन करोड़ से अधिक फॉलोवर और तीस करोड़ से अधिक श्रोता हैं, परंतु गीता कम्यूनिटी कुछ अलग ही बात है। इसमें मात्र वे गंभीर साधक सम्मिलित हैं जो…

Research has shown that loneliness is found throughout the society, including among people in marriages along with other strong relationships, and those with successful careers. As a subjective emotion, people experience loneliness even when surrounded by other people.

Love is great. Love is necessary. Love is beautiful.
But what is love?
For most of us, love is the greatest excitement and comfort—and also the greatest suffering. Whether love has become a problem or something you cherish the most in your life, please go deeper into the matter. Know…

Self-help doesn't help. Its approach is, “I am sad as my desires are not fulfilled, so the way to help myself is to fulfill desires.” They never realize their lives are driven by biological, social, and cultural forces outside of themselves. Spirituality offers the only real solution: “Before helping the self, one must know what the self really is."

Spirituality is about belonging to existence. Not belonging to a narrow household, or caste or ideology. All these are boundaries. So, wherever there are boundaries, there is violence. Wherever there are boundaries, there is also the fear of being small, powerless, limited. The really non-violent one is at home, everywhere and in every situation. Non-violence is not about following duties. Non-violence is an action in clarity and love. That alone is non-violence.

'The observer is the observed; an honest observation dissolves them both.' Or, 'The observer is the observed, and both are false.' We lay a lot of emphasis on the world, assuming it to be the Truth. If the world is an entity independent of everything, then it has to be the Truth, right? Truth is that which is independent of everything.

They don't contradict each other. Existentialists like Sartre argue that humans cannot suppress consciousness and are 'condemned to be free.' We are born without a predetermined purpose—existence precedes essence. You exist first and must then discover your essence. In the spirit of 'Neti Neti' (neither this nor that), no external force can define your essence; it is your freedom to consciously determine what life is for.

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर आज काफ़ी अच्छे सीख थे सत्र में। और मेरा प्रश्न भी इस सत्र से ही सम्बन्धित है। सर, आपने बताया था कि मान्यताओं का सम्बन्ध अनुभव से है। प्रारम्भ में हमने चर्चा की था। यानी कि जो विकार हैं, वो भी एक तरह से मान्यताओं…

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! डू वी नीड टू क्रिएट गॉड्स ऑर वी हैव ऑलरेडी (क्या हमें भगवान बनाने होंगे या वो पहले से हमारे पास हैं)? जैसे हम कुछ अच्छी क्वालिटीज़ हम जो पढ़ते हैं शास्त्रों में, कई बार हमारे पास नहीं होती है, या वो हमारे पास है, हम अनदेखा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…

प्रश्नकर्ता: अगले प्रश्नकर्ता आपके साथ गोवा शिविर में भी थे और वहीं से ही वे उद्धृत करते हैं। आपने कहा था, ‘आदमी वास्तव में जान जाए उनके ऊपर कौन है। तो आगे लिखते हैं कि आचार्य जी, इस बात को मैं कैसे समझूँ और जान पाऊँ कि ज़िन्दगी निजी भोग…
![अपने बारे में धोखे में मत रहो [ऐसे जाँचो अपनी सच्चाई] || आचार्य प्रशांत (2021)](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-af5c2d9d-efc9-4cdb-b73d-461d8c27b596/30/image.jpg)
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो मैं अब तक समझा हूँ, मुझे लगता है कि जैसे मन अपना सही जगह जानता है, तो पूरे दिन वो वही ढूँढता रहता है हर चीज़ में। खाली भी बैठा है तो वो प्लेननेस (साधारणता), वो जो ब्लंटनेस (भोथरापन) अच्छी नहीं लगती, वो फ्रेशनेस (ताज़गी) ही…

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, हाल ही में मैंने अपने आदर्श स्टीव जॉब्स और विराट कोहली द्वारा सुझाई गयी लोकप्रिय किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पढ़ी, तो जीवन का अलग ही आयाम खुल गया।
उस किताब के लेखक और उनके गुरु ने, न केवल अपने पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सैक्स (यौन क्रिया) से सम्बन्धित बहुत विचार आते हैं तो उन्हें कैसे कम या नियन्त्रित कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँ ही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो, जो तुमको पता है…

Acharya Prashant: Desire means that you are not alright with yourself and you want something else to happen, correct? So, we are anyway not living for ourselves. We are rather living to change ourselves. And are these not two very different things? If you are living for yourself as you…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम संघर्ष करते हैं तो वह समय हमें बहुत कुछ सिखाता है, लेकिन फिर हम उसे कठिन समय क्यों कहते हैं? और जब समय अनुकूल चल रहा हो तो हम कुछ ऐसे काम कर देते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए था। मुझे यह समझ नहीं…

आप एक बन्धन छोड़ते हो तो दूसरा पकड़ लोगे। आप जब तक हो बन्धन अनिवार्य है। बन्धन को छोड़ने को तो एक बार को हम फिर भी रज़ामन्द हो जाएँगे, बँधे हुए को छोड़ने को रज़ामन्द नहीं होते। और जिसे बँधना ही है वो बेड़ियाँ तलाश लेगा, तुम लाख कोशिश करो उसे आज़ाद रखने की वो बेड़ियाँ तलाश लेगा। उसे बहाने मिल जाएँगे और उसके बहाने तर्कयुक्त होंगे, तुम उसके बहानों को गलत नहीं साबित कर पाओगे।

Vedanta does not talk of a personal past life, the person that you are or I am, we have no past or future life. Rebirth or reincarnation happens at a general, at a macro level, not at a personal level. It’s the “I” tendency that exists and keeps repeating its existence. Read more...

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आप हमेशा बोलते हैं कि ऊँचे उद्देश्य रखने चाहिए जिससे कि उसमें किसी भी तरीक़े का कोई डेविएशन नहीं होता है। अब ऊँचे उद्देश्य रखने की सामर्थ्य और साहस नहीं मिल पाता है क्योंकि अपनेआप को बहुत जगह मैं बेहोश पाता हूँ। कभी कुछ चीज़े साफ़…

प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे कर्म में कोई विश्वास नहीं है, भक्ति में कोई श्रद्धा नहीं है। मुझे धर्म की कोई समझ नहीं है, तो परमात्मा की कृपा मुझ पर होगी या नहीं? परमात्मा से मेरा कभी साक्षात्कार होगा?
आचार्य प्रशांत: तो अभी जैसे भी हो तुम, उससे अगर संतुष्ट ही…

जिन वज़हों से एक आदमी दुखी है, उन्हीं वज़हों से पूरी दुनिया दुखी है, चाहे कोई भी हो। आदमी हो और आदमी का दर्द अलग-अलग नहीं है। बच्चे और बूढ़े का दर्द अलग-अलग नहीं है। ऊपर-ऊपर से लगेगा कारण अलग हैं, स्थितियाँ अलग हैं, गहराई में दर्द, दर्द एक है। दुख के यही मूल कारण हैं। न जानना ‘अज्ञान’, और न झुकना ‘अविश्वास।’

आचार्य प्रशांत: आनंद फ़िल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन की जो आपसी नोंक-झोंक होती थी, बड़ी दिलचस्प थी — कि ज़िंदगी तुमको बड़ी चाहिए कि लंबी चाहिए। ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी चाहिए या लंबी चाहिए?’
लंबी चाहिए तो खूब नकारात्मकता से भरे रहो। जितना तुम शक्की रहोगे, प्रकृति ने संयोग…

Questioner: I have a question on an excerpt from you.
“Aloneness is not about being free of others and living without others. Aloneness is to live without oneself. Aloneness does not have much to do with the so-called others; aloneness has everything to do with the one called oneself.”
I’d…

प्रश्नकर्ता: पिछले कुछ दिन से एक सेक्सुअल थॉट (यौन विचार) मन पर छाया रहता है। पॉर्न (अश्लील सामग्री) भी देखने लगा हूँ। जब अध्यात्म से नहीं जुड़ा था, तब भी मन इतना नहीं भागता था उन बातों की तरफ़; अभी एकदम से बहुत ज़्यादा हो गया है। पहले मुझे लगता…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, पिछले एक साल से आपको सुन रहा हूँ और आपकी अनुकम्पा से ग्रन्थ भी पढ़ने शुरू किये हैं तो अभी प्रतिदिन कुछ नया सीखने को मिलता है, मन बिलकुल लगा रहता है और जैसा पहले चला करता था, उससे बिलकुल बदल गया है जीवन।…

Acharya Prashant: Everybody in his own personal way is seeking fulfillment and that is love. If you are young you may seek fulfillment in somebody's body, if you are middle-aged you may seek fulfillment in wealth and prestige, if you are old you may seek fulfillment in security and property…

आचार्य प्रशांत: सिर्फ़ एक व्यक्ति है जिसका सच तुम्हें पता हो सकता है, किसका?
श्रोतागण: अपना।
आचार्य: तो उसकी ओर क्यों नहीं देखते?
जिस एक आदमी का तुम्हें सच पूरा पता हो सकता है उसकी ओर क्यों नहीं देख रहे? क्यों इधर-उधर निहारते हो ? क्यों मन को भटकने देते…

आचार्य प्रशांत: केला तक तो खाते हो तो छिलका उतारकर खाते हो और बातें किसी की यूँही समूची निगल लेते हो, बिना देखे कि इसमें क्या लगा है। डॉक्टर हैं, बच्चों को समझाते होंगे सब्जी भी पहले रगड़-रगड़ कर धोना, छिलका उतारना, फिर पकाना और बातें कीचड़ मेंं लथपथ हो…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न यह है कि क्या आपके मन में भी प्रश्न उठते हैं। अगर उठते हैं तो उनका उत्तर आप कहाँ खोजते हैं?
आचार्य प्रशांत: बेटा आपके मन में जितने उठते होंगे उससे कई गुना ज़्यादा। और आप अपने प्रश्नों के जितने उलझे हुए जवाब अपनेआप…

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, छठा अध्याय, दूसरा श्लोक।
जिसको संन्यास कहते हैं उसको तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी व्यक्ति योगी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं संकल्पों के त्याग का तात्पर्य समझना चाहता…

Acharya Prashant: Our normal life is our nemesis. And it is our nemesis precisely because it appears normal. It is not normal. It is normal only by comparison. It is normal only relative to your neighbour. It is the life that your neighbour is leading. It is the life that…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि एक ही चीज़ का लम्बे समय तक सॉल्यूशन (हल) नहीं मिल पाता। जैसे मान लीजिए कि कोई मानसिक समस्या है, उसमें काफ़ी समय बीत गया और उस पर मनन-मंथन भी काफ़ी हुआ, लेकिन उससे उबर नहीं पाये हम, उससे…

आचार्य प्रशांत डिप्रेशन तब तक नहीं हो सकता जब तक अपनेआप को बहुत मजबूर अनुभव न करो। और मजबूर हम नहीं होते, मजबूर हमें हमारी अन्धी कामनाएँ बनाती हैं। अन्यथा कोई मजबूर नहीं है। कामनाओं में भी कोई दिक्क़त नहीं है, अगर वो अन्धी न हों। जो कामना आपको अन्धेरे…

Acharya Prashant: A quiver full of the best of arrows but no bow, how do you fight the battle of life? Can you imagine the amusing as well as tragic situation of the person who has a great arrow without a bow? He will be sharpening and sharpening his weapon,…

भाषा हमें बहुत सारे देती है नाम। और ये जो सारे नाम हैं, ये हमें भरोसा दिला देते हैं कि अपूर्ण अहंकार, पूर्ण हो सकता है। ‘इस नाम से बात नहीं बनी तो उस नाम से बात बनेगी; तो उस नाम से बात बनेगी, तो उस नाम से बात बनेगी।…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम अंकिता रावत है। सर, जैसे कि मन हमेशा चीज़ों की ओर आकर्षित होता है तो आकर्षित का मतलब होता है कि हमें वहाँ खुशी मिलेगी, हम उसके पीछे भागते हैं और वो और अन्त में हमें दुख ही होता है, मतलब खुशी और दुख का…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं आपको पिछले दो सालों से सुन रहा हूँ। ये मेरा पहला सत्र है। तो पिछले काफ़ी टाइम से में तनाव में रहा। सत्र में आने से पहले काफ़ी चीज़ों, आपके सारे पुराने वीडियोज़ में देख रहा था। तो उसमें आपने ये कहा था कि अपनेआप…