प्रश्नकर्ता: हम ध्यान में डर क्यों जाते हैं?
आचार्य प्रशांत: हम ध्यान में डर क्यों जाते हैं? डर का या बेचैनी का या किसी भी तरह के विचित्र या विशिष्ट अनुभवों का सामना किस-किस का हुआ है, ध्यान में? कि ध्यान की किसी भी विधि का उपयोग किया। श्रवण भी ध्यान की एक विधि ही है। अभी आप बैठे हैं सुनने के लिए, यह भी ध्यान की एक विधि ही है। और ध्यान की और पच्चीसों, पचासों, सैकड़ों विधियाँ हो सकती हैं। कोई कुछ करता है, कोई कुछ करता है; कोई कुछ भी नहीं करता! वह भी ध्यान है।
यह अनुभव हुआ है कि ध्यान में ऐसे अनुभव होने लगते हैं, जो कि अन्यथा नहीं होते? और उनमें से अधिकांश अनुभव ध्यान से विमुख करने वाले होते हैं। शरीर में किसी भाग में अचानक विचित्र संवेदना पैदा हो जाएगी, जैसे कहीं झुरझुरी उठी हो। एक महाशय ने कहा, उनको ऐसा लगता था जैसे तलवे पर चीटियाँ रेंग रही हों। अचानक कुछ ऐसा याद आने लगेगा जो कि अन्यथा याद नहीं आता।
जिन ध्वनियों पर आमतौर पर कान नहीं धरते, वो ध्वनियाँ महत्वपूर्ण लगने लगेंगी। और अगर ध्यान गहराया, तो उठ करके भाग देने का मन भी होता है। ऐसा लगता है जैसे कुछ छूटा जा रहा हो। यह अनुभव प्रायः बहुत ध्यानियों में देखे जाते हैं। जिसने भी शांत होने की चेष्टा की, वहीं यह ख़बर लेकर आता है कि अशांति विघ्न डालती है। जा रहे हैं शांति की ओर, और सामना किससे हो गया? अशांति से। तो यह बात बड़ी विचित्र लगती है, कि बढ़ तो रहे थे शांति की ओर और मिल गई अशांति, यह कैसे हो गया!
ध्यान में डर उत्पन्न नहीं हो जाता, उपज नहीं जाता, पैदा नहीं हो जाता; ध्यान में डर उद्घाटित हो जाता है, बेपर्दा हो जाता है। पैदा होने और प्रकट होने में अंतर है, या नहीं है? क्या अंतर है? पैदा होना उसका होता है, जो न हो और आ गया। और उद्घाटन या प्राकट्य कहते हैं जब दिख नहीं रहा था और दिख गया। दिख नहीं रहा था और दिख गया। ध्यान रोशनी है, ध्यान प्रकाश है। ध्यान का अर्थ ही है कि सच्चाई को ध्येय बनाना है। जब आपने सच्चाई को लक्ष्य किया, तो आप कहलाते हो ध्यानी या ध्याता। सच्चाई यदि ध्येय है, तो प्रक्रिया कहलाती है ध्यान। सच्चाई कहीं जाती तो है नहीं। जो जाने लग जाए कि आने लग जाए, वह तो सच्चाई हुई नहीं। सच्चाई तो पारिभाषिक रूप से, मौलिक रूप से वही है, जो न आएगी और न जाएगी।







