प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सैक्स (यौन क्रिया) से सम्बन्धित बहुत विचार आते हैं तो उन्हें कैसे कम या नियन्त्रित कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँ ही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो, जो तुमको पता है कि थोड़ी देर की उत्तेजना के अलावा तुम्हें कुछ नहीं देगा? समय यूँ ही कम है तुम्हारे पास, उसमें से भी तुमने समय थोड़ी देर के मसाले को दे दिया; अब क्या होगा? समय और कम बचेगा न! सैक्स में कोई बुराई नहीं थी, अगर उससे तुमको मुक्ति मिल जाती। मैं सेक्स के माध्यम से कह रहा हूँ, अगर सैक्स के माध्यम से तुमको तुम्हारे दुखों से तुम्हारे बन्धनों से मुक्ति मिलती होती तो मैं कहता, तुम सैक्स के अलावा कुछ करो ही मत, तुम दिन-रात अपनी वासना को ही पूरे करने में मग्न रहो। लेकिन ऐसा होता है क्या?
अरे! सब यहाँ व्यस्क बैठे हैं, प्रौढ़ हैं, चढ़ी उम्र के लोग हैं, सब अनुभवी हैं; कुछ बोलिए! ऐसा होता है? कि तुम जो यौन कृत्य होता है, उसमें पचास बार संलग्न हो जाओ कि पाँच सौ बार कि पाँच हज़ार बार; ऐसा होता है कि अब अन्त आ गया? अब इसके बाद किसी उत्तेजना की कोई आवश्यकता नहीं, पार पहुँच गये; ऐसा होता है?
या ऐसा होता है कि जो अधूरापन पहली बार था, जो अधूरापन बीसवीं बार था, जो अधूरापन दो-सौवीं बार था, वही अधूरापन… (अब भी है)।
तो कभी-न-कभी तो तुम्हें ईमानदारी से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा न कि भई, यहाँ बात बन नहीं रही है, इस दुकान का माल खरा नहीं है, बहुत आज़मा लिया, यहाँ…(नकार में सिर हिलाते हुए)।




