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ओ स्त्री! कल आना || आचार्य प्रशांत (2018)

Author Acharya Prashant

Acharya Prashant

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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सैक्स (यौन क्रिया) से सम्बन्धित बहुत विचार आते हैं तो उन्हें कैसे कम या नियन्त्रित कर सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँ ही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो, जो तुमको पता है कि थोड़ी देर की उत्तेजना के अलावा तुम्हें कुछ नहीं देगा? समय यूँ ही कम है तुम्हारे पास, उसमें से भी तुमने समय थोड़ी देर के मसाले को दे दिया; अब क्या होगा? समय और कम बचेगा न! सैक्स में कोई बुराई नहीं थी, अगर उससे तुमको मुक्ति मिल जाती। मैं सेक्स के माध्यम से कह रहा हूँ, अगर सैक्स के माध्यम से तुमको तुम्हारे दुखों से तुम्हारे बन्धनों से मुक्ति मिलती होती तो मैं कहता, तुम सैक्स के अलावा कुछ करो ही मत, तुम दिन-रात अपनी वासना को ही पूरे करने में मग्न रहो। लेकिन ऐसा होता है क्या?

अरे! सब यहाँ व्यस्क बैठे हैं, प्रौढ़ हैं, चढ़ी उम्र के लोग हैं, सब अनुभवी हैं; कुछ बोलिए! ऐसा होता है? कि तुम जो यौन कृत्य होता है, उसमें पचास बार संलग्न हो जाओ कि पाँच सौ बार कि पाँच हज़ार बार; ऐसा होता है कि अब अन्त आ गया? अब इसके बाद किसी उत्तेजना की कोई आवश्यकता नहीं, पार पहुँच गये; ऐसा होता है?

या ऐसा होता है कि जो अधूरापन पहली बार था, जो अधूरापन बीसवीं बार था, जो अधूरापन दो-सौवीं बार था, वही अधूरापन… (अब भी है)।

तो कभी-न-कभी तो तुम्हें ईमानदारी से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा न कि भई, यहाँ बात बन नहीं रही है, इस दुकान का माल खरा नहीं है, बहुत आज़मा लिया, यहाँ…(नकार में सिर हिलाते हुए)।

या तो तुम नये-नवेले बिलकुल छैल-छबीले होते—पन्द्रह की उम्र के—और तुम कहते कि साहब, हमने दुनिया का कुछ अनुभव लिया नहीं, हम बिना जाने किसी चीज़ का त्याग कैसे कर दें। उतने छोटे तो हो नहीं।

दुनिया को भी देख लिया, तमाम तरह की इच्छाओं में लिप्त होकर देख लिया; वहाँ चैन मिल जाता हो तो चले जाओ। और चैन न मिलता हो, ये जानते हुए भी उधर जा रहे हो तो स्वयं को ही धोखा दे रहे हो, फिर तुम्हारा कौन भला कर सकता है?

सही काम करने के लिए भी जीवन बहुत छोटा है तो व्यर्थ काम करने के लिए तुमने समय कहाँ से निकाला? चोरी करी न? जो समय जाना चाहिए था, किसी सार्थक दिशा में उसको तुमने लगा दिया वासना की सेवा में। चोरी करी कि नहीं करी?

तो जो लोग इस तरह के उपद्रवों से परेशान हों कि वासना सताती है, गुस्सा सताता है, लालच या कुछ भी, कोई नशा सताता है; उनके लिए समाधान सिर्फ़ एक है—अपने जीवन को, अपने समय को, अपनी ऊर्जा को, अपने दोनों हाथों को, अपने सारे संसाधनों को पूरे तरीक़े से झोंक दो किसी सच्चे उद्यम में। उसके अलावा कोई तरीक़ा नहीं।

तुम्हारे शरीर की निर्मिति ही ऐसी है कि वासना इसको सताएगी, वासना के बीज इसी में मौजूद हैं। तुम सिर्फ़ ये कर सकते हो कि जब वासना सताए तो तुम उससे बोलो, ‘ओ स्त्री! कल आना।’; क्या करना? कल आना।

पिक्चर ने बताया था, वो कहानी भी मध्य प्रदेश के ही किसी गाँव की थी, ‘ओ स्त्री! कल आना’। तुम उसे ये नहीं कह सकते कि मत आना क्योंकि लौटकर तो वो आएगी। क्यों आएगी लौटकर? क्योंकि वो तुम्हारी देह में ही निवास करती है।

शरीर की एक-एक कोशिका आत्मसंरक्षण के लिए तत्पर है।‌ उसे न सिर्फ़ अपनेआप को बचाना है बल्कि अपनेआप को बढ़ाना है; संरक्षण ही नहीं करना है, संवर्धन भी करना है। एक कोशिका कहती है, ‘मैं कई गुनी हो जाऊँ’; यही तो वासना है, और क्या है! जब वासना आए, तुम कहो, ‘मैं अभी व्यस्त हूँ, ओ वासना! कल आना।’ और कहाँ व्यस्त हो तुम? तुम किसी महत् प्रयोजन में समर्पित हो, तुम कोई ऊँचा काम कर रहे हो, तुम कोई मीठा काम कर रहे हो; तुम कोई ऐसा काम कर रहे हो, तुम्हें फुर्सत नहीं।

किसी भी तरह के आवेग का झोंका आया, तुमने अनुभव किया लेकिन तुमने उससे कहा, ‘थोड़ी देर बाद! अभी हम कुछ ऐसा कर रहे हैं, जो छोड़ा नहीं जा सकता। बेशक़ीमती है।’; ‘देखो, माफ़ करना! अभी हम मन्दिर में हैं, पूजा से उठ नहीं पाएँगे।’; ‘देखो, माफ़ करना! अभी हम किसी ऊँचे भवन का निर्माण कर रहे हैं, काम से उठ नहीं पाएँगे। थोड़ी देर में आना न!’ और तुम कहोगे, ‘थोड़ी देर में आना’, वो थोड़ी देर में लौटकर आएगी; जब वो लौटकर आए, तुम्हें पुनः व्यस्त पाए और तुम उससे फिर कहो, ‘ओ स्त्री! कल आना।’, और कोई तरीक़ा नहीं है।

शब्द समझो! ‘वासना’। कभी तुमने पूछा नहीं? ‘वासना तो ठीक है, वास कहाँ करती है?’ जो तुममें वास करे सो वासना। जिसका तुममें वास हो सो वासना। उसकी हत्या नहीं कर सकते तुम क्योंकि उसमें और तुममें कोई भेद नहीं है, तुम्हारे ही शरीर का नाम है वासना। तुम्हारा शरीर कामवासना का उत्पाद है और तुम्हारा शरीर लगातार अपनी सुरक्षा हेतु और अपने प्रसार हेतु तत्पर है, आतुर है; इसी का नाम कामवासना है।

शरीर की अपनी कुछ माँगे हैं, शरीर के अपने ढर्रे हैं, शरीर के अपने इरादे हैं; तुम शरीर से ज़रा भिन्न हो अजितेश! तुम्हारा इरादा कुछ और है, शरीर का इरादा कुछ और है।

तुम हो एक अधूरी अहंवृत्ति; जो अपने होने से परेशान है, जो मिट जाना चाहती है। शरीर है प्रकृति का यन्त्र और प्रकृति का उत्पाद; जो अपने होने को बचाए रखना चाहता है। तुम देख रहे हो, तुम दोनों के इरादों में कितना फ़र्क है? शरीर की हसरत है, बचा रहूँ और तुम्हारी गहरी हसरत है, मिट जाऊँ। अब बात कैसे बनेगी? कैसे बनेगी बोलो?

अब बताओ तुम्हें किसकी हसरत पूरी करनी है, अपनी या शरीर की? जल्दी बोलो! तुम और शरीर एक नहीं हैं हालाँकि तुमने उससे नाता बहुत गहरा जोड़ लिया है पर फिर भी दोनों अलग-अलग हो, दोनों की दिशाओं में बड़ा अन्तर है।

और जो बात मैं कह रहा हूँ, वो समझने के लिए बहुत गहरा अध्यात्म नहीं चाहिए; बचपन से ही तुम्हारा अनुभव रहा है, तुम पढ़ने बैठते थे, तुम्हें नीन्द आ जाती थी। देख नहीं रहे हो अन्तर? निश्चित रूप से शरीर अपनी ही चलाता है, कोई है तुम्हारे भीतर, जो कह रहा है, ‘पढ़ाई करो!’ और शरीर कह रहा है, ‘मुझे तो सोना है।’

जिन्होंने व्रत-उपवास रखे हों, वो खुली बात जानते होंगे बिलकुल। एक ओर कोई चेतना है, जो कह रही है, ‘आज निराहार रहना है।’ और दूसरी ओर शरीर है, जो कह रहा है, ‘कुछ खा ही लें!’ देख नहीं रहे हो, शरीर के इरादे हमेशा दूसरे होते हैं?

और कितनी ही बार तुमने ग़लत पक्ष का समर्थन किया है, कितनी ही बार तुमने शरीर को जिताया है। कितनी ही बार हुआ है न कि तुमने व्रत-उपवास में भी धान्धली कर दी है? चलो ख़ुद नहीं करी तो किसी को करते देखा होगा कि गये, एक लड्डू, थोड़ा-सा पानी—‘शरीर सत्तर प्रतिशत जल ही तो है, थोड़ा-सा पी लिया तो अधर्म थोड़े ही हो गया!’

सुबह ट्रेन् पकड़नी है और शरीर कह रहा है, ‘रज़ाई से प्यारा कुछ होता नहीं। कौन बाहर निकले!’; ये सब देखा है या नहीं देखा है? देख नहीं रहे हो कि शरीर को इस बात से कोई मतलब ही नहीं कि तुम ट्रेन् पकड़ो या न पकड़ो; उसको मतलब बस एक बात से है, ‘आराम मिलना चाहिए!’

आराम माने सुरक्षा। मस्त पड़े हुए हैं, कौन ठंड में बाहर निकले, दौड़ लगाए, प्लेटफ़ॉर्म तक जाए, कौन ये सब झंझट करे! इसको आराम दे दो, इसको रोटी दे दो और इसको सैक्स दे दो, इसके अलावा इसे कुछ चाहिए नहीं; न इसको ज्ञान चाहिए, न इसे मुक्ति चाहिए, न इसे भक्ति चाहिए। अब बताओ, ऐसे का साथ देना है?

कोई तुम्हारे पड़ोस में रहता हो, जिसको न ज्ञान चाहिए, न भक्ति चाहिए, न मुक्ति चाहिए; उसका साथ दोगे? तुम्हारे पड़ोस में कोई आ गया है और उसको सिर्फ़ खाना है, सोना है और मैथुन करना है; इन तीन के अलावा उसे कुछ करना ही नहीं; उसका साथ दोगे? उससे दोस्ती रखोगे? इसी पड़ोसी का नाम है शरीर।

अब क्या करो तुम! वो आ गया पड़ोस में तो कुछ तो उससे नाता बन ही गया है पर जितना कम नाता रखो, उतना अच्छा। शरीर को पड़ोसी की तरह ही रखो, ज़रा दूरी बनाकर, सिर पर मत चढ़ा लो उसको।

अब तुम कुछ काम कर रहे हो, ये पड़ोसी आ गया, घंटी मार रहा है, घुसना चाहता है; क्या जवाब देना है? ‘ओ पड़ोसी कल आना!’, ‘ओ पड़ोसी!’? ‘कल आना।’

और वो कल फिर आएगा क्योंकि बसा तो वो पड़ोस में ही है। मानवजन्म लिया है तुमने तो ये दुर्भाग्य है तुम्हारा कि शरीर हमेशा अगल-बगल ही रहेगा; पर उसे पड़ोसी ही रहने देना, उसे घर का सदस्य मत बना लेना। शरीर की अपनी वृत्तियाँ हैं। चूँकि उसे सुरक्षा चाहिए इसीलिए उसमें मालकियत की बड़ी माँग रहती है। ये जो तुममें ईर्ष्या आदि उठते हैं, इनको भी मानसिक मत समझ लेना; ये भी करतूतें शरीर की ही हैं।

जिसको तुम मन कहते हो, वो भी शरीर से अलग नहीं है। मन भी शरीर के रोएँ-रोएँ में वास करता है। भ्रम, तुलना, हिंसा; ये सब किसी बच्चे को सीखने नहीं पड़ते, ये उसके शरीर में ही निहित होते हैं, इसीलिए पशुओं में भी पाये जाते हैं। तुम्हारा मस्तिष्क ही नहीं, तुम्हारे सिर के बाल भी ईर्ष्या में पगे हुए हैं।

ये सब भावनाएँ, ये सब वृत्तियाँ जिस्मानी हैं। इन सबको यही कहना है, ‘ओ ईर्ष्या! कल आना।’, ‘ओ मोह! ओ क्रोध! …(कल आना।)’।

यही तो चीज़ें हैं, जो हमें जानवरों से जोड़ती हैं। जानवरों को भी क्रोध आता है, जानवरों को भी मोह रहता है, जानवरों को भी ममता रहती है।

हाँ, जानवरों को बोध नहीं रहता। जिस्म का बोध से कोई लेना-देना नहीं।

प्र: लेकिन रोज़ शरीर जीतते ही जा रहा है।

आचार्य: तुम जिता रहे हो। वो नहीं जीतेगा‌; वो अधिक-से-अधिक तुम्हारे दरवाज़े पर घंटी बजा सकता है, ये तुम्हारा निर्णय होता है कि तुम दरवाज़ा खोल दो और आगन्तुक को भीतर स्थान दे दो। नहीं तो ये भी हो सकता है कि दरवाज़े की झिर्री से तुम उससे कहो, ‘कल आना!’।

ये मत कहो, शरीर जीत रहा है; ये कहो कि तुम रस ले रहे हो शरीर को जिताने में।

स्त्री भी बस पीछे से आवाज़ देती थी; मुड़कर देखोगे या नहीं देखोगे, ये तुम तय करते थे।

अब बताने वाले तुमको बता गये थे कि बचने का तरीक़ा है; जब आवाज़ दे, मुड़कर देखना मत।

पर वो आवाज़ में ही कुछ ऐसी मिठास, कुछ ऐसी कशिश होती है कि मुड़ ही जाते हो। और उसके बाद न जाने कहाँ नंग-धडंग क़ैद में पड़े हुए हो।

याद है न कहानी? आवाज़ आयी नहीं कि मुड़कर देख लिया तुरन्त, ये नहीं कि अपना काम करो।

अब एक बात बताओ! कोई है जिससे वास्तविक प्रेम है तुम्हें और उसकी तरफ़ चले जा रहे हो तुम, दौड़े जा रहे हो तुम और पीछे से तभी तुम्हें आवाज़ आती है, ‘अजितेश!’; मुड़कर देखोगे क्या?

प्र: नहीं।

आचार्य: यही तो मैं तब से समझा रहा हूँ। ये जो स्त्री है, जिसका नाम देह है; इसके चक्कर में पड़ते ही वही हैं, जिनके पास जीवन में कोई सार्थक काम, कोई सार्थक लक्ष्य नहीं होता। तुम्हारे जीवन में वास्तविक प्रेम हो तो वो बुलाती रहे पीछे से, तुम मुड़कर ही नहीं देखोगे। यही बात तुम्हें परेश ने समझायी, ‘तुम्हें समय कहाँ से मिला?’।

तुम लगे हुए हो किसी सार्थक उद्यम में, वो देती रहेगी पीछे से आवाज़, तुम्हें सुनाई ही नहीं पड़ेगी। तुम्हें पता है, तुम्हें किस दिशा जाना है; तुम मुड़कर ही नहीं देखोगे।

मुड़कर वही देखते हैं, जो यूँ ही टहल रहे होते हैं, जो पेड़ से टूटे हुए पत्ते होते हैं; जिनका न ठौर, न ठिकाना; जो कहीं के नहीं हैं, जिनको हवा जिधर को ले जाए, बस ले ही जाए। वो मुड़कर देख लेंगे।

कोई भी क़ीमती काम सोच लो। चलो! चाहे यही सोच लो कि कोई प्रियजन अस्पताल में भर्ती है और तुम उसको देखने के लिए दौड़े जा रहे हो और पीछे से आवाज़ आती है, ‘अजितेश!’; तुम रुकोगे क्या? तुम्हारे पास दवाइयाँ हैं, बहुत आवश्यक है कि अभी जो तुम कर रहे हो, उसको पूरा करो; तुम रुकोगे? नहीं रुकोगे। कौन है जो रुक जाता है? कौन है जो उस पड़ोसी की, जो उस वासना की आवाज़ पर मुड़कर पीछे देखता है? वही जो व्यर्थ टहल रहा है, मटरगश्ती कर रहा है।

व्यर्थ मत टहलो, मटरगश्ती मत करो, जीवन के पल-पल को ऊँचे-से-ऊँचे काम से आपूरित रखो, भरा हुआ‌। ख़ाली हो ही नहीं तुम; जो ख़ाली होगा, वो फँसेगा।

चन्देरी पुराण में ये नियम नहीं था, ये मैं बता रहा हूँ, ‘जो ख़ाली होगा वो फँसेगा।’ और जीवन बहुत छोटा है, ख़ाली रखने का सवाल ही नहीं पैदा होता।

तुम तो पूरी जान से, पूरी ताक़त से अपने जीवन के कोने-कोने को भर दो सच्चाई के नाम से, सुधार के नाम से, राम के काम से। जो भी तुम्हें ऊँचे-से-ऊँचा उपक्रम मिले, उसके सामने बिक जाओ, उसी के हो जाओ क्योंकि अगर उसके नहीं होगे तो किसके हो जाओगे? कोई न कोई तो तुम्हें खींच ले ही जाएगा। राम से नहीं खिंचोगे तो काम से खिंचोगे।

ये मत कहना कि किसी से नहीं खिंचोगे, वो व्यर्थ की कपोल कल्पना है, वो नहीं होने वाली और उस कल्पना पर भी बहुत लोग चलते हैं, वो कहते हैं, ‘नहीं साहब, हम किसी के नहीं होंगे।’, वो सम्भव नहीं है, मनुष्य को वो विकल्प उपलब्ध ही नहीं है।

जो राम का नहीं है, समझ लो काम का है और जिसको काम का नहीं होना, उसको एक ही उपाय है, राम का हो जाए, ख़ाली बैठे ही नहीं। जब वो आए तो बोले, ‘हम व्यस्त हैं।’, कहाँ व्यस्त हो? ‘हम राम की सेवा में व्यस्त हैं।’ और राम की सेवा का मतलब भजन-कीर्तन-आरती मात्र ही नहीं होता।

कोई भी ऐसा काम जो अहंता से न उठा हो; कोई भी ऐसा काम जिसमें तुम्हारे स्वार्थ ही न शामिल हों; कोई भी ऐसा काम जिसमें करुणा हो, जिसमें दूसरों की भलाई हो, जिसमें रचनात्मकता हो, जिसमें संगीत हो; ये सब राम के काम हैं।

राम के काम से मेरा आशय मात्र उन कामों से नहीं है, जो धार्मिक माने जाते हैं। गणितज्ञ हो तुम और गणित में गहरे पैठ जाते हो, ये राम का ही काम है; कलाकार हो तुम और सुन्दर कलाकृति बनाते हो या संगीत रचते हो, ये राम का ही काम है; राजनेता हो तुम और साफ़ राजनीति करते हो, ये राम का ही काम है; खिलाड़ी हो तुम और अपनेआप को पूरी तरह झोंक कर खेलते हो, ये राम का ही काम है। और झोंककर खेल रहे हो, कहाँ फुर्सत होगी तुम्हें फिर कि इधर-उधर की व्यर्थताओं में लिप्त हो जाओ!

प्र२: आचार्य जी, अगर कोई काम ढूँढ नहीं पा रहे हैं तो?

आचार्य: बेटा वो काम कभी दूर का नहीं होता, उस काम को पाने का सीधा तरीक़ा होता है कि आज और अभी तुम्हारे सामने तुलनात्मक रूप से, अपेक्षतया जो भी ऊँचे-से-ऊँचा लक्ष्य उपलब्ध हो, उसको पकड़ लो।

हो सकता है, आज जो तुम्हें ऊँचा लग रहा है, कल तुम्हें नीचा लगे; पर आज तो तुम्हारे सामने वही उच्चतम विकल्प है न? तो तुम उसी को पकड़ लो। उसको पकड़ लो और ये तैयार रहो कि कल इससे ऊँचा कुछ मिला तो उसके हो जाएँगे।

पर अभी बैठे-बैठे इन्तज़ार मत करो, यह मत कहो कि जब उच्चतम मिलेगा, सिर्फ़ तब हम पहला कदम उठाएँगे। अगर इन्तज़ार करोगे तो ये इन्तेज़ारी जीवनभर की हो जाएगी।

भाई, अभी तुम अपने सामने मान लो पाँच विकल्प देखते हो कि मेरे पास करने के लिए, जीने के लिए पाँच रास्ते हैं। इन पाँच रास्तों में तुलनात्मक रूप से जो एक रास्ता तुम्हें शुद्धतम और उच्चतम लगे, उस पर चल दो।

उसको सीढ़ी का एक पायदान मानना, उसपर क़दम रखोगे तो अगला कदम रखने की हैसियत और दृष्टि मिल जाएगी और ऐसे ही और ऐसे ही और ऐसे ही और ऐसे ही तुम सीढ़ी पर चढ़ते चले जाओगे।

पर ये कहो सीधे कि मुझे तो उछल के आसमान चूम लेना है तो वो कभी होने नहीं वाला। यहाँ तो कदम-दर-कदम ही यात्रा होनी है, सोपान-दर-सोपान ही चढ़ाई होनी है।

प्र३: आचार्य जी, यदि हम पूरी तरह से डूबकर कुछ भी काम करते हैं तो क्या वो एक तरीक़े से उपासना ही है? ध्यान ही है क्या वो?

आचार्य: नहीं, बात कोई भी काम करने की नहीं है। तुम्हारे सामने जो उच्चतम विकल्प हो, उसको करो। तुम्हारे सामने से पाँच रास्ते फूटते थे, तुमने उनमें चुन ही ग़लत रास्ते को लिया, अब तुम उसमें डूबकर अगर चलोगे भी तो ग़लत दिशा में ही तो चले।

ये बहुत बड़ा भ्रम है और कृपया इससे निजात पाएँ सभी लोग। अक्सर अध्यात्म के नाम पर एक शिक्षा ये बतायी जाती है कि जो कुछ भी कर रहे हो, उसको पूरे मनोयोग से करो, डूब कर करो, अपनी पूरी शक्ति और समर्पण से करो, फिर तुम जो कुछ भी कर रहे हो, वही तुम्हारी मुक्ति का साधन बन जाएगा।

नहीं, ऐसा नहीं है। अगर आप कसाई हैं और आप डूबकर के क़त्ल करें तो उससे आपको मुक्ति नहीं मिल जाएगी। सबसे पहले तो ये देखना होता है कि तुम जो कर रहे हो, क्या वो करना ज़रूरी है या उससे बेहतर कुछ करने का विकल्प है तुम्हारे पास। जो ऊँचे-से-ऊँचा विकल्प अभी तुम्हें उपलब्ध हो व्यवहारिक रूप से, उसको पकड़ो, उसपर आगे बढ़ो और उसमें डूबने की कोशिश करो।

तो डूबना पीछे की बात है, नम्बर् दो की बात है; पहली बात क्या है? सही काम पकड़ना। सही काम पकड़ो, फिर उसमें डूबो। तुम काम ही व्यर्थ कर रहे हो और उसमें डूबो तुम तो ये तो तुमने और अपने साथ अन्याय कर लिया।

कि जैसे कोई पहले ही दलदल में हो और कहे कि अब डूबना भी है। डूबना भली बात है पर ये तो देख लो कि काहे में डूब रहे हो। डूबने भर से थोड़े ही होगा कि डूबकर करो, डूबकर जियो, डूबकर पियो। क्या? ज़हर? ‘कहाँ डूब रहे हो?’, पहले ये देखना ज़रूरी है।

प्र४: आचार्य जी, जो यह होता है कि सत्र के बीच में नीन्द आना या पाँव में दर्द होना या जैसे लोग कहते हैं कि ‘कुण्डलिनी शक्ति’; ये सब अहंवृत्ति के ही अलग-अलग खेल या अलग-अलग रूप हैं?

आचार्य: सत्र में नीन्द आए, यह मत कहो कि सत्र तो आधी रात तक चलेगा उसके बाद सोएँगे; नीन्द से कहो, ‘एक जवाब सुन लूँ? ये वाला सुन लूँ, फिर..’। थोड़ी देर की मोहलत माँग लो, बोल दो, ‘बस ये वाला जवाब ख़त्म होने दो’।

नीन्द में इतना सब्र होता कि वो जवाब ख़त्म होने तक तुम्हारी प्रतीक्षा कर सकती तो वो नीन्द क्यों होती? फिर वो जाग्रति होती न! तुम उससे कहोगे, ‘सब्र कर।’, वो ग़ायब हो जाएगी। वृत्तियों को सब्र नहीं आता। बस तुम इसी बात का इन्तज़ार कर लो, उपयोग कर लो।

क्या उपयोग करना है? वृत्तियों को सब्र नहीं आता। नीन्द को बोलोगे, ‘दस मिनट इन्तज़ार कर।’ या तो वो तत्काल तुम पर चढ़ जाएगी या दस मिनट बाद भी नहीं आएगी। आज़माकर देख लेना।

नीन्द कहती है, ‘अभी सो!’; अगर तुमने उससे दस मिनट की मोहलत माँग ली तो समझ लो तुम्हें चार घंटे की मोहलत मिल गयी। ये आज़माया है कभी? बहुत भूख लग रही हो, बहुत भूख लग रही हो, एकदम भीतर से आवेग उठता हो कि अभी कुछ खा लें, तुम उस क्षण को टाल दो बस किसी तरीक़े से, उसके बाद तीन-चार घंटे तक भूख नहीं आएगी।

यही बात नीन्द की है, अगर आप रोज़ दस बजे सोते हैं तो दस बजे आपको तगड़ा झोंका आएगा नीन्द का और दस से साढ़े दस तक वो आपको व्यथित रखेगा, आपको लगेगा अभी बिस्तर पकड़ लें; पर अगर आपने उसको साढ़े दस तक टाल दिया तो फिर दो-तीन बजे तक के लिए आप मुक्त हो गये। वृत्तियाँ सब्र नहीं जानतीं, वो फिर चली ही जाती हैं। टालना सीखो।

प्र५: सर् मोक्ष की प्राप्ति कैसे होती है?

आचार्य: (मुस्कुराते हुए) किसकी प्राप्ति?

प्र५: मोक्ष।

आचार्य: वो क्या है?

प्र५: कहते हैं न! परमात्मा से मिलते हैं कि जीवन के बाद वहीं जाना है सबको। तो कैसे प्राप्ति होगी? सबके लिए उद्देश्य होगा कोई-न-कोई भेजने का? धरती पर अगर आएँ हैं तो कोई-न-कोई उद्देश्य होगा सबका?

आचार्य: आपको मिल भी जाए परमात्मा, आप उसका करेंगे क्या? आपकी इच्छाएँ क्या हैं? आपकी इच्छा ये है कि आज खाना बढ़िया मिले, नयी गाड़ी आ जाए, पतिदेव इधर-उधर ताका-झाँकी न करें, अपना घर पड़ोसी के घर से ज़रा एक मंज़िल ऊपर का हो, बच्चा परीक्षा में अच्छे नम्बर ले आए। आपको तो ये सब चाहिए न?

परमात्मा का करेंगे क्या? आ गया परमात्मा, अब क्या करेंगे उसका?

प्र५: जैसे गुरु एक सीढ़ी रहते हैं, पहुँचाने के लिए।

आचार्य: कहाँ?

प्र५: दिखाने के लिए कि सही क्या है।

आचार्य: कहाँ पहुँचाने के लिए?

प्र५: भगवान के समीप पहुँचाने के लिए।

आचार्य: आपको तो शौपिंग मौल् (सामान ख़रीदने) जाना है, भगवान के पास जाकर क्या करेंगे?

प्र५: उनके निकट पहुँचेंगे तो…

आचार्य: किसके निकट?

प्र५: भगवान के।

आचार्य: कौन है वो?

प्र५: अभी तो छवि यही बसी हुई है, जैसे हम संसार के बारे में देखते हैं, ऐसी-ऐसी मूर्ति दिखती है या फिर बोले कि कोई मूर्ति नहीं है; कहीं तो हम जा रहे हैं न!

आचार्य: आपको शौपिंग (ख़रीददारी) करनी है। अपनी रोज़मर्रा की इच्छाओं पर ध्यान दीजिए। बात को थोड़ा ज़मीन पर लेकर आते हैं, थोड़ा व्यवहारिक बनाते हैं; आपके पास कुछ इच्छाएँ हैं एक से दस तक, क्रमांक एक से लेकर दस तक। उन इच्छाओं में परमात्मा कहीं आता है? आता है क्या?

श्रोता: ग्यारहवें पर।

आचार्य: ग्यारहवें पर आएगा। और अगर मैं कहूँगा कि बीस इच्छाओं की सूची बनाएँ तो फिर इक्कीसवें नम्बर् पर आएगा। तो इच्छाएँ तो कुछ और हैं, परमात्मा मिल भी गया तो क्या लाभ होगा? और जो आपको चाहिए, वो परमात्मा देने में इच्छुक नहीं होता।

प्र५: परमात्मा कैसे मिलेंगे?

आचार्य: चाहिए कहाँ हैं?

प्र५: अगर चाहिए।

आचार्य: अगर की बात नहीं होती। चाहिए क्या? अगर की बात नहीं होती। बात ये थोड़े ही होती है कि अगर मैं चाहूँ तो परमात्मा कैसे मिलेगा। प्रश्न पहले ये आता है कि चाहिए भी है क्या?

जब आप चाहते हैं कि परमात्मा मिले तो समझिए कि उसके मिलने की शुरुआत हो गयी। सारी दिक्क़त है शुरुआत में ही, सारी दिक्क़त है उसको चाहने में ही। हम पचास चीज़ें चाहते हैं, उन पचास चीज़ों में परमात्मा कहाँ है? और परमात्मा कोई छवि नहीं है, जो पचास चीज़ें आप चाहते हैं न, उनसे मुक्ति का नाम परमात्मा है।

परमात्मा को चाहने का मतलब है, ये चाहना कि मैं जो चाहता हूँ, वो न चाहूँ क्योंकि मैं जो चाहता हूँ, वो चाह-चाहकर मेरी कौन-सी चाहत पूरी हो गयी।

प्र६: आचार्य जी, फिर वो परमात्मा को भी चाहना चाहिए या नहीं चाहना चाहिए?

आचार्य: बँधे हुए को तो मुक्ति चाहनी ही चाहिए, बँधा हुआ अगर मुक्ति नहीं चाहेगा तो फिर तो वो अपनी वर्तमान स्थिति को ही स्वीकार कर चुका है।

प्र६: चाहने में भी तो कहीं न कहीं कष्ट होता है कि हम चाह रहे हैं और नहीं मिल रहा। मतलब ठीक-ठीक पता नहीं है कि वो…

आचार्य: और फ़िलहाल जो चाहते हो, वो चाहने में कष्ट नहीं होता है?

प्र६: फ़िलहाल तो अभी नहीं चाह रहा कुछ भी।

आचार्य: दो-चार मिनट बात होगी, चाहतों झड़ी लग जाएगी।

प्र६: नहीं है, आचार्य जी।

आचार्य: क्या काम करते हो?

प्र६: मैं डाकघर में हूँ, डाक सहायक।

आचार्य: चार महीने तनख़ाह न मिले तो?

प्र६: नहीं जानता, क्या करूँगा।

आचार्य: बिलकुल नहीं जानते, क्या करोगे? जाकर फ़रियाद नहीं करोगे, ‘मुझे मेरी तनख़ाह चाहिए!’?

प्र६: नहीं, वहाँ तो देखा जाए तो कि जीवन चलाने के लिए चूँकि…

आचार्य: करोगे या नहीं करोगे? उसका जस्टिफ़िकेशन् (औचित्य) मत दो। करोगे या नहीं?

प्र६: जीवन चलाने के लिए तो…। फ़रियाद नहीं करूँगा लेकिन कहीं-न-कहीं कुछ तो करुँगा।

आचार्य: तुम क्यों देख रहे हो कि जीवन कैसे चलेगा? जिसने जीवन दिया है, वो देखेगा। तुम जाकर के फ़रियाद करोगे या नहीं कि चाहिए?

प्र६: चाहिए।

आचार्य: चाहिए न?

प्र६: जी।

आचार्य: तो ये मत बोलो कि नहीं चाहिए। पचास चीज़ें हैं, जो तुम्हें चाहिए। हाँ, ये हो सकता है कि वो तुम्हें मिली हुई हों अभी तो तुम्हें लग रहा है कि नहीं चाहिए। ठीक वैसे, जैसे कि जिसने पानी पी रखा हो, उसे लगता है कि उसे पानी नहीं चाहिए। दो-चार चीज़ें अगर छिनने लग गयीं तो तुम्हें पता चलेगा कि चाहतों की सूची कितनी लम्बी है और जो कुछ भी छिनने लगेगा, उसके छिनने में क्या अनुभव होता है? कष्ट।

तो तुमने कहा, ‘परमात्मा को चाहने में कष्ट है कि चाह रहे हैं, मिल नहीं रहा है’। फ़िलहाल भी जो तुम चाह रहे हो, उसको चाहने में भी बहुत कष्ट है। हाँ! कभी वो कष्ट खुला हुआ है, कभी छुपा हुआ है। जब तक वो कष्ट छुपा हुआ रहता है, लोग कहते हैं, सुख। छुपे दुख का नाम सुख हो जाता है और जब वो दुख उघड़ जाता है तो तुम कह देते हो दुख।

प्र७: आचार्य जी, परमात्मा ने इसीलिए तो पैसे हमको दिये हैं कि उन सब की चाह हम छोड़ दें और परमात्मा की चाह में लग जाएँ।

आचार्य: ठीक है; कितने पैसे में परमात्मा की चाह करोगे? कितने में? अरे! अभी कह रहे हो, परमात्मा ने तनख़ाह इसीलिए दी है कि बाक़ी चाहतें छोड़कर के बस भजन-कीर्तन करो, परमात्मा का नाम लो, परमात्मा की चाहत करो; यही कहा न?

प्र५: बन्धनों से मुक्ति हो।

आचार्य: बन्धनों से मुक्ति हो। ठीक है। तय कर लो कि इतने पैसे अगर मिलते रहें तो और कुछ नहीं माँगेंगे। ये तय कर लो। ठीक? और फिर अडिग रहना कि आस-पास वालों की तनख़ाह बढ़ती जा रही है, साल दर साल उनको इन्क्रीमेन्ट (अधिक वेतन) मिलता जा रहा है, हमें कुछ नहीं मिल रहा, हमने तो तय कर लिया था कि इतना बस मिलता रहे। ये तय कर लो।

बेटा, ये सबकुछ यथास्थिति बनाए रखने के बहाने हैं। ये सबकुछ अपनी सुरक्षा का तन्त्र क़ायम रखने के उपाय हैं। तुम्हारी बात तथ्य के तल पर सही हो सकती है लेकिन तात्विक तल पर नहीं। मुक्ति की इच्छा, ‘मुमुक्षा’ किन्हीं भी शर्तों का पालन नहीं करती, जहाँ उसपर कोई भी शर्त रख दी गयी, वो भ्रष्ट हो जाती है, उसपर दाग़ लग जाता है। ‘परमात्मा महीने का चालीस हज़ार मिलता रहे तो तेरा रहूँगा।’, ये तुम सौदा कर रहे हो? शर्त रख रहे हो? ये प्रेम निवेदन है या हेकड़ी है?

मुक्ति उनके लिए है, जो सर्वप्रथम ज़रा ज़िद्दी हों, संवेदनशील हों और छोटी-से-छोटी ग़ुलामी भी बर्दाश्त करने को तैयार न हों। जो छोटी भी ग़ुलामी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं होता, उसके साथ सबसे पहले तो ये होता है कि वो तन-मन से प्रकृति से स्वयमेव एक दूरी बना लेता है क्योंकि शरीर लगातार ग़ुलाम है, मन लगातार ग़ुलाम है और तुम कह रहे हो, तुम्हें ग़ुलामी चाहिए नहीं; जिसे ग़ुलामी चाहिए नहीं, वो ग़ुलाम से तादातम्य कैसे कर लेगा? तन-मन तो ग़ुलाम हैं लगातार।

और जिसने घुटने टेक दिये या समझौता कर लिया कि थोड़ी बहुत चलेगी तो ठीक है, उसकी थोड़ी बहुत चलती रहती है। जब भीतर एक कसमसाहट उठती है, ‘जो बन्धन जीवन में पकड़ रखा है, वो क्यों पकड़ रखा है?’ तब आदमी कहता है कि मेरी सर्वोपरि इच्छा है मुक्ति।

मुक्ति किससे होती है? बन्धन से ही न? जिसे बन्धनों से कोई विरोध या समस्या ही न रह गयी हो, उसके लिए मुक्ति शब्द व्यर्थ हो जाता है। सबसे पहले तो बन्धनों के प्रति विरोध होना चाहिए, आक्रोश होना चाहिए।

प्र८: आचार्य जी, इससे अपनों के बीच में कुछ वो हो जाता है, कुछ बोल देते हैं उनको, फिर पीड़ा होती है।

आचार्य: पराया कौन है? और कैसे तुमने ये अपने-पराये का भेद किया?

प्र८: जो पहले से, जन्म से पास हैं, वो अपने।

आचार्य: ठीक है, तुम्हें अब इसी आधार पर अगर जीना है कि अधिकांश विश्व तुम्हारे लिए पराया ही है और दो-ही-चार लोग तुम्हारे अपने हैं तो तुम्हारा खेल तो वहीं ख़त्म हो गया।

आज तुम्हारा चेहरा देखा है, मैं जन्म से तुम्हारे पास था? तो फिर अपने-पराये से सम्बन्धित प्रश्न मुझसे क्यों पूछ रहे हो? तुम तो अपना मानते ही सिर्फ़ उसको हो, जिसका तुमसे जन्म का और देह का रिश्ता हो। मेरा न तुमसे जन्म का रिश्ता है, न देह का रिश्ता है; मैं तुम्हारा अपना कैसे हो गया?

प्र८: आचार्य जी, वो मुझे अपना मानते हैं।

आचार्य: पर अभी प्रश्न तो तुमने करा न कि अपनों को पीड़ा होती है, अगर मैं सच्चाई पर चलूँ। अभी उन्होंने आकर के अपने-पराये की बात करी या तुमने करी?

प्र८: उनको पीड़ा मेरी वजह से होती है।

आचार्य: उन्हें पीड़ा हो रही है, इससे तुम्हें पीड़ा हो रही है न? दुनिया में इतने लोग हैं, उन्हें पीड़ा हो रही है, उससे तुम्हें पीड़ा हो रही है?

प्र८: वो मेरी वजह से नहीं हो रही है न!

आचार्य: अरे बाबा! तुम्हारी ही वजह से दुनिया में बहुत लोगों को पीड़ा हो रही है, जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं है पर इस वक़्त स्थिति ये है धरती पर कि तुम्हारा होना ही अपनेआप में हिंसा है। तुम्हारे होने से तुम बिजली का उपभोग करते हो, तुम डीज़ल्-पेट्रोल् का उपयोग करते हो, तुम लोहे का उपयोग करते है और इसकी वजह से न जाने कितनी हिंसा हो रही है। उन सबको पीड़ा होती है, पूरी दुनिया को पीड़ा होती है, इसका तुम्हें अफ़सोस होता है क्या? तुम्हें दो-ही-चार लोगों की पीड़ा से अफ़सोस क्यों होता है? क्योंकि उनसे तुम्हारा शरीर का नाता है।

अगर तुम्हें उन्हीं से नाता बनाना है, जिनसे तुम्हारा शरीर का नाता है तो तुम मुझसे क्यों बात कर रहे हो? बोलो, बोलो!

प्र८: मुझे लगता है कि मेरी वजह से उनको तकलीफ़ हो रही है।

आचार्य: मुद्दे पर जाओ, तुम्हारी वजह से बहुतों को तकलीफ़ होती है, तुम्हें इस बात से कष्ट क्यों नहीं है?

प्र८: उसकी जानकारी मुझे नहीं है।

आचार्य: जानकारी लेना क्यों नहीं चाहते? वो जानकारी क्यों छुपाई रखना चाहते हो?

प्र८: वो सामने नहीं है न!

आचार्य: वो सामने है। अगर सामने न होती तो इतने लोगों को कैसे पता होता?

प्र८: बिजली से कैसे परेशानी होती है, मुझे नहीं पता।

आचार्य: पता कर लो; बहुत लोग हैं, जो भली-भाँति जानते है कि हर किलोवाट् के तुम्हारे प्रयोग से कितने जानवर ख़त्म हो रहे हैं।

प्र८: उपयोग तो करेंगे ही।

आचार्य: तो उनको पीड़ा होगी ही, क्या फ़र्क पड़ता है फिर। जैसे यहाँ कह देते हो, ‘उपयोग तो करेंगे ही’, वैसे ही वहाँ भी कह दो, ‘आपको पीड़ा होगी ही, मुझे क्या फ़र्क पड़ता है!’ मूल बात पर आओ। तुम्हें अपनी देह से बड़ा तादात्म्य है, इसीलिए जो लोग तुमसे देह के माध्यम से जुड़े हुए हैं, उनको लेकर के सतर्क रहते हो।

ये पहली बात।

दूसरी बात, देह के रास्ते भी जिनसे सम्बन्धित हो, उनमें भी जो लोग तुम्हारे स्वार्थों पर आघात कर सकते हैं, उनको लेकर के दूने सतर्क रहते हो। जिसको पीड़ा दी तुमने और वो पलटकर तुम्हें दूनी पीड़ा पहुँचा देगा, उसको पीड़ा देने से तो बहुत ही घबराते हो।

तो ये जो हमारी तथाकथित करुणा होती है, ये वास्तव में दो चीज़ों का मिश्रण होती है और दोनों विषैली चीज़ें। पहली, देहभाव और दूसरी, स्वार्थ। हर आदमी करुणावान है, हर आदमी को प्रेम छलछला रहा है पर सिर्फ़ किसके प्रति? जिनसे जिस्म का नाता है।

कवि हुए हैं ‘धूमिल’। उनकी पंक्तियाँ थीं, पच्चीस साल पहले पढ़ीं थीं, भूलती नहीं हैं। कहते थे, ‘जैसे कोई मादा भेड़िया अपने छौने को दूध पिला रही हो और साथ-ही-साथ किसी मेमने का सिर चबा रही हो’।

ममता तो तुम्हें बहुत है पर सिर्फ़ उससे, जिससे तुम्हारा देह का नाता है। अपने छौने को तो दूध पिला रही हो और साथ-ही-साथ किसी मेमने का सिर चबा रही हो। हमारी करुणा और प्रेम दो झूठे सिद्धान्तों पर खड़े हैं; पहला, देहभाव और दूसरा, स्वार्थ। दस-बारह साल पहले एक लड़का था, छात्र था तब वो, उससे किसी कॉलेज के सेमिनार् (सम्मिलन) में मुलाक़ात हुई तो उसने बहुत पीड़ा के साथ, बहुत ज़ोर देकर सवाल पूछा कि मैं कुछ करना चाहता हूँ अपनी पढाई के बाद, अपनी इन्जीनियरिंग (अभियांत्रिकी शिक्षा) के बाद; पर मेरे पिताजी मुझे करने नहीं देते, मैं क्या करूँ। मैंने उसे कुछ उत्तर दिया होगा। एक बात मुझे उस संवाद में साफ़-साफ़ याद है कि वो लड़का बार-बार ये कहे कि नहीं, पिताजी की राय महत्वपूर्ण है, मैं उनको दुख नहीं देना चाहता, मैं उनके खिलाफ़ नहीं जाना चाहता। बड़ा पितृभक्त था, बड़ा प्रेम था उसमें ऐसा लगे पिता के प्रति।

वो लड़का मुझे दोबारा मिला दस-बारह वर्ष के बाद, स्थितियाँ बदल चुकी थीं, पिताजी रिटायर (सेवानिवृत्त) हो चुके थे, रिटायर ही नहीं हो चुके थे, उन्हें दिल के दो दौरे आ चुके थे, अब वो लगातार बिस्तर पर ही पड़े रहते थे और ये लड़का, ये दस वर्ष से किसी बड़ी कम्पनी में लगा हुआ था, अच्छा कमा रहा था, शादी कर चुका था, समाज में एक सशक्त जगह पर पहुँच चुका था।

जब मेरी इससे दुबारा मुलाक़ात हुई, तब ये एक कम्पनी छोड़कर दूसरी कम्पनी में जा रहा था। मैंने चुटकी ली; मैंने कहा, ‘अब जब तुम एक कम्पनी छोड़कर के दूसरी कम्पनी में जा रहे हो तो पिताजी की सहमति ली है?’, बोला, ‘पिताजी? इन मामलों में पिताजी का क्या हस्तक्षेप? उनका क्या लेना-देना है?’, मैंने कहा, ‘नहीं, एक बार पूछ तो लो कि कम्पनी बदल रहा हूँ, आपकी अनुमति है? या कम-से-कम सहमति है?’, ‘पिताजी से कौन पूछता है ये सारी बातें?’

मैं मुस्कुराया। मैंने कहा, ‘बारह वर्ष पहले तू ही था, जो मुझसे कह रहा था कि पिता से इतना प्रेम है मुझे कि पिता मुझे जिस दिशा में कहेंगे करियर् (आजीविका) बनाने को, मैं उसी दिशा जाऊँगा और आज तू कह रहा है कि पिता से कौन पूछता है ये सारी बातें, ये तो मैं तय करूँगा, मैं जानकार हूँ, मेरा हिसाब-किताब, मेरी ज़िन्दगी।

मैंने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि पिता के प्रति तेरा प्रेम कम हो गया है, वास्तविक बात ये है कि पिता से प्रेम कभी था ही नहीं; उस समय तू आर्थिक रूप से और मानसिक रूप से पिता पर आश्रित था तो तेरे लिए ज़रूरी था कि पिता की आज्ञा का पालन करे; वो प्रेम नहीं था, मजबूरी थी।

आज पिता कमज़ोर हो चुके हैं, हर तरीक़े से कमज़ोर हो चुके हैं तो वहीं पिता जिनके नाम की तू दुहाई देता था, जिनको तू प्रातः स्मरणीय बताता था, आज उन पिता की कोई हैसियत नहीं तेरी नज़र में। ऐसा नहीं कि हैसियत कम हो गयी है, हैसियत कभी थी ही नहीं, रिश्ता स्वार्थ का था।’

ये दूसरा सिद्धान्त है, जिसपर हम अपनों से जुड़े होते हैं। पहली बात तो ये कि जुड़ोगे उन्हीं से, परवाह उन्हीं की करोगे, जिनसे नाता जिस्म का हो और दूसरी बात ये कि उनकी भी परवाह सिर्फ़ तब तक करोगे, जब तक तुम्हारा स्वार्थ सिद्ध होता है।

ये आम ज़िन्दगी का चलन है। इस चलन को जो तोड़ सके, वो मुक्त है।

प्र९: आचार्य जी, अभी तो मेरे जीवन में कोई समस्या नहीं आ रही है मगर एक प्रश्न जो सदैव रहता है कि आत्मज्ञान, मोक्ष इनके बारे में कि जैसे रमण महर्षि जी ने जो कहा है कि विचार किसको आ रहा है, कौन है जो आत्मज्ञान चाहता है।

तो इसपर जब हम पहुँचते हैं तो ‘आइ ’ (मैं) को पकड़कर रखें? क्योंकि वह दिखता तो है नहीं ‘आइ ’ जैसा। नहीं समझ में आता है, जब भी देखने जाते हैं। वह प्रश्न, वह दुविधा भी समाप्त हो जाती है उस क्षण के लिए।

फिर दोबारा जब जाते हैं तो क्या हर बार ‘आइ ’ को फिर से पकड़कर रखें? या ऐसा क्यों कि समय में क्यों जाते हैं? हम वर्तमान से आगे क्यों? मतलब अधूरापन क्यों रहता है?

आचार्य: अरे बाबा! क्यों मुद्दे को उलझा रहे हो? रमण महर्षि ने कहा है, ‘पता करो कि कौन है, जो बोध चाहता है, मुक्ति चाहता है।’ थोड़ी देर पहले हम इसपर चर्चा कर चुके हैं; मुक्ति किसको चाहिए? जो बन्धन में हैं। तो बार-बार अगर तुम्हें मुक्ति का विचार आता है तो निष्कर्ष साफ़ है, बन्धन में हो। इसमें आइ (मैं) और आइ को होल्ड करना (पकड़ना); ये किन बातों में उलझ रहे हो?

मुक्त कौन होना चाहता है? बन्धन मुक्त होना चाहता है और कौन मुक्त होना चाहता है! तो देखो न कि कहाँ बँधे हुए हो, इसीलिए बार-बार तुम्हें मुक्ति का ख़्याल आता है। मुक्त को थोड़ी ही मुक्ति का ख़्याल आता है, क़ैदी को ही तो मुक्ति का ख़्याल आता है। कहीं-न-कहीं क़ैदी हो और क़ैदी कहाँ हो, ये जानना है तो अपनी दिनचर्या को देख लो, दिख जाएगा कहाँ क़ैदी हो।

मामले को ज़बर्दस्ती गूढ़ मत बनाओ, जटिल मत बनाओ कि मैं आइ को खोजने निकला हूँ! आइ को खोजने मत निकलो; दुकान पर बैठे वहीं हो, वहीं फँसे हुए हो, ये तुम्हारी समस्या है, इसमें और कोई गहरा तत्व नहीं है।

अध्यात्म के नाम पर सीधी बात को पेंचदार नहीं बना देते।

प्र९: पर उनका तो आत्मविचार पूरा इसी पर है कि आइ को पकड़ो, आइ को देखो।

आचार्य: आइ माने क्या? अहंकार। हाँ, वही बन्धन है, उसी को पकड़ना है और कौन-सा आइ होता है? आत्मा तो पकड़ में आएगी नहीं। या वो कह रहे थे कि जाओ, आत्मा को पकड़ो? कौन जा रहा है आत्मा को पकड़ने? दूसरी आत्मा? जब रमण महर्षि कह रहे हैं कि मैं को पकड़ो तो ये मैं कौन-सा है? सच्चा या झूठा?

झूठा। सच्चे को तो पकड़ा जा नहीं सकता। तो झूठा मैं माने कौन? बँधा हुआ मैं। उसी को तो कह रहा हूँ, अपने बन्धनों को देखो, कहाँ पर बँधे हुए हो।

और वो बन्धन कहाँ दिखाई देंगे? वो आत्मविचार से नहीं दिखाई देंगे। चौबीस घंटे जो खा रहे हो, जो पी रहे हो, जिससे मिल रहे हो, जिससे रुपया ले रहे हो, जिसको रुपया दे रहे हो, वहीं-कहीं बन्धन है। उस बन्धन पर सीधे उंगली रखो। हिम्मत रखो। बन्धन को बन्धन बोल पाने की हिम्मत रखो कि हाँ, यही बन्धन है। भले ही उसका कुछ भी और नाम हो, फिर भी कहो, ‘बन्धन यही है’।

प्र१०: आचार्य जी, क्या अहंवृत्ति सत्य को पाना चाहती है?

आचार्य: हाँ, पर अपने तरीक़े से। वो कहती है, ‘मरूँ भी नहीं और स्वर्ग भी मिल जाए। मैं क़ायम रहूँ और सत्य भी मिल जाए।’ अहंवृत्ति सत्य को तो चाहती है पर ख़ुद मिटे बिना।

प्र१०: तो वो मिटती कैसे है?

आचार्य: सत्य को पाकर। सत्य मिलता है पर उस तरीक़े से नहीं मिलता, जिस तरीक़े से अहम् उसको चाहता है। सत्य के प्रेमी और साधक, सच्चाई के दीवाने तो सभी हैं; दिक्क़त बस यह है कि सत्य हमें अपने-अपने व्यक्तिगत तरीक़े से चाहिए। हम कहते हैं, ‘वैसे मिले, जैसे हमें अनुकूल लगता हो।’, बस इसलिए नहीं मिलता। उसके मिलने में कोई बाधा नहीं है, सच को लुका-छिपी खेलने में कोई मज़ा नहीं आ रहा है।

प्र१२: जो भी जैसे महत्वपूर्ण है, करने लायक़ है, वो प्रति क्षण रहता है, कोई थोपने वाली बात नहीं है तो इससे दिनचर्या का कुछ रहता है क्या?

आचार्य: दिनचर्या माने दिन भर क्या कर रहे हो। इसी को तो दिनचर्या कहते हैं न?

प्र१२: आचार्य जी, क्या इसे बाँधकर रखना चाहिए?

आचार्य: सही काम खुला छोड़कर होता हो तो खुला छोड़ो, बाँधकर होता हो तो बाँधकर करो, झुककर होता है तो झुककर करो, कूदकर होता हो तो कूदकर करो।

सच के सामने कोई शर्त नहीं रखी जाती; वो जैसे मिलता हो, वैसे सही। उसके सामने ये मत कह देना कि देखो साहब, हम उछलते नहीं हैं तो तुम अगर ऊपर होगे तो हम तुम्हें नहीं पकड़ेंगे; देखो साहब, हम झुकते नहीं हैं तो तुम अगर नीचे होगे तो हम तुम्हें नहीं पकड़ेंगे। वो नीचे है तो झुकना सीखो। वो उपर है तो उड़ना सीखो। वो पीछे है तो मुड़ना सीखो। वो सामने है तो दौड़ना सीखो।

वो तुम्हें बताएगा कि तुम्हें क्या करना है, तुम नहीं तय करोगे कि मुझे तो सिर्फ़ सामने को बढ़ना अच्छा लगता है, नाक की सीध में; तो सच अगर सामने होगा तो ले लेंगे और अगर सामने नहीं है तो भाई, हमें ख़ता माफ़ करिएगा।

तुम्हारे हिसाब से काम नहीं चलना है; वो दायें बुलाए, दायें जाओ और शिकायत मत करो कि अभी बाँयें बुलाया था, अब दायें बुला रहा है। जहाँ बुलाए, जाओ। दीवानगी है ये तो।

इश्क़ में यही तो होता है। शिकायतें थोड़ी ही होती हैं कि अरे! अभी दायें बुलाया, अब बायें बुला रहे हो। नहीं आना? नहीं आना? मत आओ। उसकी गरज थोड़ी ही है, गरज तुम्हारी है। तड़प कौन रहा है? तुम तड़प रहे हो न? तो गरज तुम्हारी है; वो जिधर मिलता हो, उधर को जाओ।

प्र१३: आचार्य जी, जीवन में सफल मनुष्य कौन होता है?

आचार्य: जीवनमुक्त को ही शास्त्रों ने जीवन में सफल कहा है। जो जीते-जी जीवभाव से, प्रकृति से मुक्त हो गया, उसका जीवन सफल हो गया। उसी को जीवनमुक्त भी कहा जाता है।

प्र१३: एक साधारण मनुष्य को इस दिशा में जाने के लिए क्या करना होगा?

आचार्य: उसे साधारण ही रहना होगा। साधारण मनुष्य कहाँ है? दिखाइएगा! हम सब असाधारण मनुष्य हैं। अहंकार इसी में नहीं है कि जो साधारण है, वो अपनेआप को असाधारण बताए; ज़्यादा बड़ा अहंकार इसमें है कि जो असाधारण बना हुआ है, वो विनम्र बनकर कहे, ‘मैं तो साधारण हूँ।’, अजी! आप साधारण हैं? कहाँ साधारण हैं?

साधारण समझते हो क्या होता है? ऐसे समझ लो कि जो कोई धारणा न रखे, सो साधारण। है कोई यहाँ पर धारणामुक्त? जो धारणामुक्त नहीं है, वो साधारण कैसे हुआ? हम साधारण नहीं हैं, हम सहज नहीं हैं, हम सरल नहीं हैं। जो साधारण हो गया, वो जीवनमुक्त हो गया।

हम तो ‘सधारणा’ हैं। साधारण होने में और सधारणा होने में अन्तर समझना। जो धारणा रखकर जिए, वो है ‘सधारणा’। सधारणा। हाँ, अंग्रेज़ी में आप ‘साधारण’ लिखो या ‘सधारणा’ लिखो, वर्तनी क़रीब-क़रीब एक-सी आएगी। अंग्रेज़ी का ज़ोर ज़्यादा है तो भ्रमित हो जाते हो, सधारणा हो और कहते हो अपनेआप को साधारण।

प्र१४: आचार्य जी, जैसे बच्चे जो होते हैं, उनमें तो कोई सिद्धान्त नहीं होता।

आचार्य: अरे कहाँ! (हँसते हुए)। कभी बच्चे नहीं थे तुम क्या?

प्र१४: था।

आचार्य: फिर! अँगूठा क्यों चूसते थे? ये सब किसने बता दिया कि बच्चों में धारणा नहीं होती और मासूमियत से ही छलछला रहे होते हैं?

प्र१४: चार-पाँच साल से पहले का कुछ याद ही नहीं है।

आचार्य: गर्भ में जब तुम्हारा चौथा घंटा होता है, तब भी तुम में वृत्तियाँ होती हैं। शुक्राणु और अण्डाणु; ये वृत्तियों के ही नाम हैं। किसने कह दिया कि बच्चा सरल और मासूम पैदा होता है? वृत्तियाँ ही जन्म लेती हैं, आत्मा थोड़े ही जन्म लेती है। आत्मा का तो न जन्म है, न मृत्यु। तो फिर ये जन्म कौन ले रहा है? आत्मा तो सदा अजन्मी है और अमर्त्य है तो सोचा नहीं कभी कि फिर ये जन्म कौन लेता है गर्भ से? सब गड़बड़झाला जो है, वही जन्म लेता है। पर ये बात समझ में ही नहीं आती, लगता है कि अरे! देवता पधारे हैं।

प्र१५: आचार्य जी, फिर प्रकृति ने क्यों ये बन्धन हमारे ऊपर लाद दिये हैं?

आचार्य: आप कौन हैं? किस पर बन्धन लादे हैं प्रकृति ने? प्रकृति अपना काम कर रही है, प्रकृति एक तन्त्र, एक व्यवस्था है। आप प्रकृति नहीं हो, आप प्रकृति बन गये; इसमें प्रकृति का क्या दोष है?

प्रकृति नहीं आयी थी अपनेआप को आप पर लादने, आप गये हो प्रकृति से आलिंगनबद्ध होने।

प्र१५: शरीर में फिर से न आना इसीलिए कहा जाता है, उसी को मोक्ष कहा जाता है?

आचार्य: हाँ। तो शरीर ये थोड़े ही कहता है कि मैं पुनः चेतना में न आऊँ। चेतना कहती है न कि मैं पुनः गर्भ में न प्रवेश करूँ? मुक्ति किसकी होती है? शरीर की होती है क्या? शरीर की नहीं होती, मुक्ति आपकी होती है।

आप कहते हो कि मुझे शरीर में पुनः प्रवेश न करना पड़े। आप ये थोड़े ही कहते हो कि दुनिया से सारे शरीर मिट जाएँ। विश्व में जो कुछ है, वो शरीर मात्र है। ये (वस्तु) भी क्या है? यह शरीर ही है। आप कहते हो कि मुक्ति मिले और शरीरों से मेरा जो तादात्म्य है, जो मोह है, शरीरों से मेरी जो लिप्तता है, वो मिटे। ये (वस्तु) थोड़े ही प्रार्थना करता है कि अहम् मुझे कभी न पकड़े। ये करेगा क्या? इसी तरीक़े से आप शरीर नहीं हो, आप कुछ और हो, जिसने शरीर को पकड़ रखा है और व्यर्थ पकड़ रखा है। मुक्ति शरीर को नहीं चाहिए, मुक्ति आपको चाहिए। किससे चाहिए मुक्ति? देहभाव से, शरीर से।

शरीर का काम आपके बिना भी सुचारु रूप से चलेगा। शरीर तो जैसे पौधा अपनी क्रिया, अपना चक्र पूरा करता है; उसको आपकी कोई बहुत ज़रूरत है ही नहीं। आप अनुपस्थित हो जाओ, शरीर तब भी चलता रहेगा।

शरीर की मूलभूत प्रणालियों के लिए कभी ग़ौर किया है कि चेतना की कोई ज़रूरत ही नहीं होती है; दिल की धड़कन हो, चाहे साँस हो; ये आपका सहयोग माँगते ही नहीं।

इसी तरीक़े से वृत्तियों का आवेग भी आपका सहयोग नहीं माँगता। क्रोध आपसे अनुमति लेकर आता है क्या? हाँ, जब वो आ जाता है, तब आप उसे समर्थन दे देते हो। पर जब क्रोध उठता है पहले पहल; क्रोध के पहले क्षण को याद करिए, उसने आपसे अनुमति ली थी? कामवासना के पहले क्षण को याद करिए, उसने आपसे अनुमति ली थी? भय के पहले क्षण को याद करिए, अचानक से उठता है न? न जाने कहाँ से?

तो ये सब शरीर के अपने काम हैं। उसे तो आपके समर्थन की, अनुमति की ज़रूरत भी नहीं है। हाँ, चूँकि आप लिप्त हो शरीर से तो जब भय उठता है तो फिर आप उस भय को प्रोत्साहन ज़रूर दे देते हो। आप कह देते हो, ‘मैं भयभीत हूँ।’, आप कोमा (अनिश्चितकालीन मूर्च्छा) में चले जाओ, शरीर का काम चलता रहता है; आप कहीं नहीं हो, शरीर का कामकाज चल रहा है।

प्र१५: आचार्य जी, प्रकृति में इतनी शक्ति होती है तो ऐसा लगता है कि उससे मुक्त होना तो असम्भव है। उसका नियन्त्रण इतना रहता है।

आचार्य: वो तो तुम्हारी छटपटाहट पर है। मुक्त होना सम्भव है या असम्भव है, ये तो तुम्हारी तड़प की बात है। तड़प तुम्हारी गहरी है तो तुम कहोगे कि सफलता मिले या न मिले कोशिश तो मैं ज़रूर करूँगा। और तुममें तड़प ही नहीं है तो तुम कह दोगे, ‘नहीं, प्रकृति बहुत भारी चीज़ है। माया का शिकंजा बहुत मज़बूत है। इसे कौन काट पाया!’, फिर तो ठीक है…!

प्र५: तड़प कैसे जगाएँ?

आचार्य: तड़प कैसे? ज़बर्दस्ती थोड़े ही है। यह तो ऐसी सी बात है कि कोई आधे घंटे सुबह ग़ुसलख़ाने में बैठा रहे। अब नहीं है तो नहीं है, कुछ बातें ज़बर्दस्ती नहीं होतीं। मुझे परेशान करोगे तो ऐसे ही उदाहरण दूँगा।

(श्रोतागण हँसते हैं।)

प्र१५: आचार्य जी, जैसे कोई सार्थक कार्य है, वो आत्मा तो नहीं करेगी, शरीर का तो मुझे उपयोग करना ही पड़ेगा।

आचार्य: शरीर सब जानता है, सब कर लेगा। शरीर में तुम्हारा मस्तिष्क भी शामिल है। मस्तिष्क में क्या है? बुद्धि। वो कर लेगी।

तुम सिर्फ़ अहंकार हो, तुम अगर बुद्धि के साथ जुड़ जाते हो तो तुम बुद्धि को भी भ्रष्ट कर देते हो। तुम्हारी कहीं कोई ज़रूरत नहीं है। आत्मा तुम हो नहीं और प्रकृति को तुम्हारी ज़रूरत नहीं है, तुम व्यर्थ ही घूम रहे हो इधर-उधर महत्वपूर्ण बने हुए।

प्रकृति अपना काम ख़ुद कर लेगी, तुम वहाँ घुसे रहते हो, ‘हम कर रहे हैं।’ और जहाँ तुमने हाथ रखा, वहीं मामला ख़राब हुआ। कोशिश करो कि सोच-सोचकर साँस लूँगा; अब एक ली, अब दो ली; देखना पाँच-दस मिनट में फेफड़े जवाब दे जाएँगे। जहाँ तुमने कहा कि मैं करूँगा, वहीं सब गड़बड़ हो जाएगा।

बुद्धि अपना काम करना जानती है, उसके पास संश्लेषण की भी क्षमता है, विश्लेषण की भी क्षमता है, स्मृति भी उपलब्ध है; ये पूरी व्यवस्था है, माँसपेशियों में ताक़त है, ये हाथ हैं, ये इन्द्रियाँ हैं; ये सब अपना-अपना काम करना जानते हैं। तुम घुसे रहते हो बीच में।

प्र१६: आचार्य जी, आपने कहा, ‘आत्मा को अपने माध्यम से अभिव्यक्त होने दो।’ पर कोई क़ायदा, कोई व्यवस्था तो होनी चाहिए न, जिससे अभिव्यक्त हो पाए?

आचार्य: पहले ये बताओ, क्या आत्मा है? वो प्रश्न का विषय नहीं होती। अभी ये जैसे फटी-फटी आँखों से जिसको देख रहे हो न, आँखें तत्पर हो रही हैं जिसको एक बार देख लेने को, वो आत्मा है।

आँखें तत्पर तो बहुत हैं पर वो आँखों से दिखाई नहीं देगी। क्यों? क्योंकि वो आँखों के पीछे होती है, आँखों के आगे नहीं।

प्रश्न तो आ गया, ‘आत्मा क्या है?’ पर उत्तर में वो मिलेगी नहीं। क्यों? क्योंकि वो प्रश्न के पीछे होती है, उत्तर में नहीं। जिसको पाने के लिए ये सारा उत्पात, ये सारी धमाचौकड़ी मचा रखी है, उसका नाम आत्मा है।

प्र१६: पर उसको जानते ही नहीं तो कैसे…?

आचार्य: यही तो बात है, इसी में उसकी दिलकशी है कि गोरी के रुख से पर्दा कभी उठता नहीं है। तभी तो उसमें इतना आकर्षण है।

प्र१७: आचार्य जी, जैसे कभी-कभी ऐसा होता है कि मन में विचार भी नहीं होते और पता नहीं चलता कि समय कहाँ गया तो क्या उस स्थिति को ध्यान कहेंगे?

आचार्य: ये तो ध्यान था न, कुछ ध्यान नहीं रहा।

प्र१७: नहीं, उसके बाद जैसे नीन्द से उठकर जब हमें लगता है कि हमें रात को कुछ हुआ है, वैसा कुछ।

आचार्य: जो स्थिति बीत जाए, वो दिन-रात का खेल थी, वो धूप-छाँव थी। कभी सूरज वहाँ था, यहाँ छाँव थी; अभी सूरज वहाँ गया, अब छाया नहीं है यहाँ पर।

जो भी स्थिति अनुभव में आए और फिर अनुभव मिट जाए, उसको बहुत गम्भीरता से मत लेना, उसका सत्य से, आत्मा से कोई लेना देना नहीं। हालाँकि अहंकार को बड़ा अच्छा लगता है, ये कहना कि पन्द्रह मिनट के लिए मुझे समाधि का स्वाद मिला था। वृत्तियों का ही खेल है, प्रकृति का खेल है, हवा का झोंका है; आया, चला गया। सारे अनुभव आते हैं और मिट जाते हैं। आत्मा पहली बात तो अनुभव नहीं और अगर उसे अनुभव कहना ही चाहते हो तो आत्मा वो अनुभव है, जो अमिट है। जो न शुरू होता है, न ख़त्म होता है।

इसीलिए समझाने वालों ने समझाया कि आत्मा कोई अनुभव नहीं है, सत्य या आत्मा सारे अनुभवों का आधार है। सब अनुभवों के बीच जो बैठा है, सब अनुभवों से अस्पर्शित, सो आत्मतत्व है। वो अपनेआप में कोई अनुभव नहीं होता, कह मत देना कि बीते शुक्रवार रात साढ़े ग्यारह से पौने बारह तक मुझे आत्मा के दर्शन हुए थे। इस तरह की बकवास बहुत चलती है आध्यात्मिक हलकों में, बचकर रहना। या कि सुबह-सुबह सात बजे बैठता हूँ ध्यान लगाने, तब सत्य से सम्पर्क बनता है। ये मूर्खता की बात है।

वो मन का मौसम है। हाँ, मन के मौसम तुम बदल सकते हो और कुछ मौसम तुम्हें हो सकता है, अपने लिए ज़्यादा अनुकूल लगें; कुछ मौसम हो सकता है, तुम्हारे लिए ज़्यादा फ़ायदेमन्द हों; पर मन के बदलते मौसमों को आकाश नहीं कहते। कुछ मौसम ज़्यादा अच्छे होते हैं और कुछ मौसम ज़रा प्रतिकूल होते हैं, मैं इससे इनकार नहीं कर रहा हूँ लेकिन मौसम तो मौसम है और आसमान आसमान है।

मौसम बदलते रहते हैं। आसमान भी बदलता है क्या? जो अदले-बदले सो मौसममात्र। ठीक है? उसके रंग रूप देख लो, उसका रसपान कर लो पर ये भूल मत करना कि तुमने रसपान को ही आसमान कह दिया।

रस कितना भी मीठा हो, है तो अनुभव मात्र ही न!

प्र१७: आचार्य जी, वृत्ति क्या होती है?

आचार्य: जो तुम्हें गोल-गोल फँसाए रखे सो वृत्ति; जो तुम्हें वर्तुल में घुमाए रखे, वृत्त में घुमाए रखे सो वृत्ति; जिसमें चलते तो लगातार रहो पर पहुँचो कभी नहीं सो वृत्ति। वृत्त समझती हो न? इंग्लिश मीडियम् हो? वृत्त माने? ये वृत्त कहलाता है, ये (वृत्ताकार इशारा करते हुए)। तो इस पर दौड़ते हैं, दौड़ते हैं और लगातार यही लग रहा है कि मंज़िल मिल ही जाएगी। क्यों? क्योंकि अभी रास्ता शेष दिख रहा है। इसको कहते हैं वृत्ति।

थोड़ी शौपिंग और कर लें, ये बौयफ़्रैन्ड नहीं तो (अगला); ये वृत्ति। चालीस से पचास, पचास से साठ, अस्सी, एक-दो-छ: लाख, दस लाख; ये? (बढ़ते जा रहा)।

जन्मे, मरे; जन्मे, मरे; जन्मे, मरे; ये? (वृत्ति)। क्रोध, पछतावा; क्रोध, पछतावा; क्रोध, पछतावा; ये? (वृत्ति)। उत्तेजना का उफ़ान और फिर सूखा मैदान; ये? वृत्ति।

और वही चीज़ अपनेआप को बार-बार दोहरा रही है, दोहरा रही है, दोहरा रही है। इसी को सन्तों ने कालचक्र कहा है, जीवन-मरण का चक्र कहा है, चौरासी का फेरा कहा है, इसी से बार-बार बाहर निकलने की बात करी है।

जैसे कोई पागल बना रहा हो तुम्हें, जैसे किसी ने बुद्धू बना दिया हो; एक पिक्चर देखी थी मैंने—तुम लोग इस तरह के सवाल करते हो, कहा मैं उपनिषदों की बात करूँ? तो में पिक्चरों की बात करूँगा—तो उसमें था कादर ख़ान और शक्ति कपूर। देखो, बात इसी तल पर तुम्हें समझ में आएगी।

तो शक्ति कपूर जौनपुर से आया होता है। ठीक है? कहाँ? बम्बई। अब कादर ख़ान एक कोने पर भिखारी बनकर बैठा हुआ है। ठीक? तो शक्ति कपूर जाता है कादर ख़ान के पास, एक जगह का पता पूछता है। बोलता है, ‘वहाँ कैसे जाना है?’ तो कादर ख़ान कहता है, ‘जौनपुर के हो?’, शक्ति कपूर कहता है, ‘तुम तो अन्धे हो, तुम्हें कैसे पता?’, बोलता है, ‘चमेली का तेल लगाया है तुमने। तो ऐसे पता है मुझे।’, तो इससे पूछता है कि अच्छा, वहाँ कैसे जाना है तो कादर ख़ान कहता है, ‘अच्छा, झुको तो बताता हूँ। पास आओ, गला ख़राब है।’ तो जैसे ही झुकता है तो भिखारी एक खट् से चाकू निकाला है। बोलता, ‘जो माल है, सब यहीं पर रख दो।’

तो पूरा उसका सब माल-वाल, ये अपनी अटैची लेके रहे उत्तर प्रदेश से और सब माल-वाल उसका वो अन्धा भिखारी बम्बई का वहीं रखवा लेता है। बोलता है, कपड़े-वपड़े भी उतार दो; सब अपना उतार देता है। शक्ति कपूर फिर कहता है कि अब सब लूट तो लिया ही है, मुझे जहाँ जाना है, वहाँ का रास्ता तो बता दो। मुझे जहाँ जाना है, वहाँ का रास्ता तो बता दो। लूटने के बाद किससे प्रश्न पूछ रहा है? जिसने लूटा है उसी से। ‘जहाँ जाना है, वहाँ का रास्ता तो बता दो।’

तो कादर ख़ान कहता है, ‘ऐसा करो, इधर जाओ।’, शक्ति कपूर बोलता है, ‘ठीक है’; बोलता है, ‘फिर वहाँ से दाएँ मुड़ना’, कहता है, ‘ठीक!’, ‘फिर वहाँ से लाल बत्ती आएगी।’ बोलता है, ‘ठीक!’, बोलता है, ‘वहाँ से फिर दायें मुड़ना’, कहता है, ‘ठीक!’, कहता है, ‘फिर आगे जाना।’, कहता है, ‘ठीक!’, ‘वहाँ तिराहा आएगा।’, ‘हाँ!’, ‘वहाँ से उधर को जाना।’, कहता है, ‘ठीक!’, ‘फिर वहाँ से बाएँ मुड़ना’, ‘ठीक!’, कहता है, ‘फिर?’, बोलता है, ‘फिर तुम ठीक वहीं आ जाओगे फिर मेरे सामने।’

‘तुम्हारे सामने दोबारा क्यों आऊँगा?’ तो कादर ख़ान बोलता है—ध्यान देना—‘ताकि मैं तुम्हें दोबारा लूट लूँ।’ ये वृत्ति है। एक बार जिसके हाथों लुटे, उसी से दुबारा लुटने की उत्सुकता को कहते हैं वृत्ति। एक बार जो ग़लती करी, उसी ग़लती को दोहराने की आदत को कहते हैं वृत्ति।

कादर ख़ान लूट रहा है शक्ति कपूर को और शक्ति कपूर कादर ख़ान से ही पूछ रहा है कि लूट तो लिया, अब मुझे मेरी मंज़िल का रास्ता भी बता दो। और वो भी खुले आम बता रहा है, बोल रहा है, ‘इधर जाओ, उधर जाओ, उधर जाओ, उधर, उधर जाओ और फिर घूम-फिर करके मेरे पास वापस आ जाओ।’ और वो पूछ रहा है, ‘तुम्हारे पास क्यों वापस आ जाऊँ?’ तो कह रहा है, ‘ताकि मैं तुम्हें दोबारा लूट लूँ।’

अब वो बात मज़ाक की थी। मैंने कहा, ये बात तो आध्यात्मिक है। मोनिका ऐसे ही समझें। समझ में आ रही है बात? जिस दुकान पर एक बार लुटे, उसी दुकान पर बार-बार जाना कहलाती है (वृत्ति)।

प्र१८: आचार्य जी, ये तो आदत हो गयी?

आचार्य: हाँ, वही है। वृत्ति आदत है। तुम्हारी पुरानी से पुरानी आदत का नाम है (वृत्ति)।

प्र१९: आचार्य जी, जैसे आप अपनी मौज में जी रहे हैं या जो भी दीवानगी है। आपको जो अच्छा लग रहा है, आप वो कर रहे हैं। मगर ऐसा हम करते हैं तो बाक़ी लोग कहते हैं कि यह पागलपन है, तो इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

आचार्य: बेटा, मैं वो नहीं कर रहा हूँ, जो मुझे अच्छा लग रहा है; मैं वो कर रहा हूँ, जो करना मेरा फ़र्ज़ है, मेरा धर्म है। और जो करना मेरा धर्म है, वो अक्सर मुझे अच्छा नहीं लगता है, मन को बहुत समझाकर, कई बार मन पर पत्थर रखकर करना पड़ता है। तो कृपा करके ये धारणा तो मन से बिलकुल हटा दो कि मैं वो सब कर रहा हूँ, जो मुझे अच्छा लग रहा है या जिसमें मुझे मज़ा आ रहा है। कष्ट तुम भी झेलते हो, कष्ट मैं भी झेलता हूँ; बस मैं सही काम करने के लिए कष्ट झेलता हूँ और बहुत सम्भव है कि मेरे कष्ट तुम्हारे कष्टों से कहीं ज़्यादा बड़े हों। इतना तो पक्का ही है कि दुखरहित, पीड़ारहित जीवन नहीं है मेरा।

दर्द तुम्हें भी हैं, दर्द मुझे भी हैं और मैं तो कई बार दर्द को आमन्त्रित करता हूँ। कई बार बड़ा आसान होता है सुख का रास्ता ले लेना, बड़ा लोभ उठता है, ‘क्यों मुसीबत मोल ली जाए? सीधे-सीधे काम चलाओ!’

वो करना पड़ता है जो करना सम्यक् है, जो करना धर्मोचित है। तुम्हारे मन में अगर ये छवि बैठी हुई है कि धार्मिक आदमी या साधु-सन्त तो अपनी मौज में रहते हैं और जो मन में आता है, करते हैं तो इस धारणा को मन से निकाल दो।

तुम भी लड़ाई लड़ते हो, वो भी लड़ाई लड़ रहे हैं; अन्तर बस इतना है कि तुम ग़लत लड़ाई लड़ रहे हो, वो सही लड़ाई लड़ रहे हैं। कुरुक्षेत्र में मौजूद तुम भी हो और वो भी हैं, बस वो कृष्ण के साथ रहते हैं; तुम देख लो कहाँ रहते हो। लड़ाई में तो दोनों मौजूद हैं।

जो देह लेकर आया है, मनुष्य बनकर आया है, उसे संघर्ष, संग्राम तो करना ही पड़ेगा। ये भूल जाओ कि जीवन कभी भी युद्ध से या पीड़ा से रिक्त हो सकता है। जब तक देह है, तब तक लड़ाई तो चलेगी; बस सही लड़ाई लड़ो। वरना बड़ी बेवकूफ़ी की बात है, ख़ून भी बहा रहे हो और जन्म भी गँवा रहे हो।

ख़ून तो बहना ही है तो कम-से-कम सही उद्देश्य के लिए बहे। दुख तो झेलना ही है, कष्ट तो झेलना ही है, अब देह धारण करी है तो कष्ट तो झेलना पड़ेगा तो कम-से-कम सही दिशा में कष्ट झेलो।

प्र२०: आचार्य जी, ‘सही-ग़लत क्या है?’ कैसे जानें?

आचार्य: बहुत तरीक़े हैं। जो जाग्रत हैं, उनका हृदय बताता है, सही-ग़लत क्या है। जो जाग्रत नहीं हैं, उनको कहा गया है कि या तो वेदों की सुन लो, शास्त्रों की सुन लो या गुरुओं की सुन लो। और तरीक़ा क्या है? या तो तुम्हारा अपना अन्त:करण आत्मा का डाकिया बन जाए, तुम्हारा मन ऐसा हो जाए कि जैसे तुम्हारी आत्मा की आवाज़; फिर तुम्हारा मन ही तुमको बता देगा, क्या सही, क्या ग़लत।

पर उसके लिए मन ऐसा चाहिए, जिसे आत्मा से बहुत प्यार हो। आत्मनिष्ठ मन चाहिए। मन वैसा न हो, जिसकी ही सम्भावना ज़्यादा है।

लाखों में से किसी एक का मन ऐसा होता है कि मन की मर्ज़ी, परमात्मा की मर्ज़ी। मन ऐसा जोड़ दिया है परमात्मा से कि मन में जो लहर उठती है, वो परमात्मा का ही सन्देश होता है। ऐसा हो सकता है पर ऐसा होता तो लाख में किसी एक के साथ है। पर तुम्हारे साथ ऐसा न होता हो तो फिर ग्रन्थों की, गुरुओं की, इनकी सुन लो और कोई विकल्प नहीं है।

प्र२१: आचार्य जी, ओशो को सुना था, वो बोलते हैं कि उधार का ज्ञान काम नहीं आया, जीवन में डूबो तो बात बने। उधार का ज्ञान अर्थात्?

आचार्य: वो बोलना यह चाह रहे हैं कि ज़िन्दगी तुम्हारी कुछ और है और ज्ञान तुम्हारा कुछ और है तो तुम अपनेआप को ही बेवकूफ़ बना रहे हो। अगर वास्तव में कुछ जाना है तो वो तुम्हारे कर्मों में भी तो दिखना चाहिए न! ये ज्ञान कौनसा है, जो कर्म में नहीं दिख रहा? फिर निश्चित रूप से पराया ज्ञान है, ये आत्मिक ज्ञान नहीं है। इसी को वो उधार का ज्ञान कह रहे हैं।

कि जानते तो बहुत कुछ हैं और जीते कुछ नहीं हैं। इसको वो कह रहे हैं, ‘उधार का ज्ञान’। अगर वास्तव में जाना है तो उसको जीवन बनने दो।

‘जीवन में डूबो’। डूबो से आशय है कि ईमानदारी से ज़िन्दगी को देखो कि उसमें तुम्हारा ज्ञान कितना परिलक्षित हो रहा है।

प्र२२: आचार्य जी, क्या यह सम्भव है कि जीवन में व्यक्ति हमेशा सही काम ही करे?

आचार्य: सही-ग़लत सत्य के लिए होते नहीं, सही-ग़लत तो हमेशा जीव के लिए होते हैं। जो भटका हुआ है, वो अगर सही दिशा में एक क़दम ले लेगा तो मंज़िल पर नहीं पहुँच जाएगा पर उसने सही काम कर दिया।

सही काम हमेशा सापेक्ष होता है, तुम्हारी निवर्तमान् स्थिति के सन्दर्भ में होता है। कोई रोशनी से बहुत दूर अन्धेरे में पहुँच गया है, वो एक सही क़दम लेगा तो भी अभी अन्धेरे में ही रहेगा, उछलकर वापस प्रकाश स्रोत पर नहीं आ जाएगा पर उसने सही काम कर दिया।

तो जो भी तुम्हारी स्थिति है, वहाँ पर तुम सही काम कर सकते हो पर उस सही काम से ये उम्मीद मत रखना कि वो तुमको तत्काल मुक्ति इत्यादि दे देगा।

चार साल का बच्चा अ से ‘अनार’ लिख दे, उसने सही काम कर दिया न? उसके लिए यही सही है।

सही-ग़लत हमेशा—दोहराऊँगा—तुम्हारी स्थिति के सन्दर्भ में होते हैं, तुम कहाँ स्थित हो। आत्मा की तो कोई स्थिति होती नहीं, तुम्हारी स्थिति होती है न? तो तुम अपनी स्थिति को देखो, कहाँ पहुँच गये हो। जहाँ भी पहुँच गये हो, वहाँ से एक क़दम बढ़ाओ मुक्ति की दिशा में; यही सही है। एक क़दम।

प्र२३: आचार्य जी, अभी मैं जिस बन्धन में हूँ, वहाँ मेरी कुछ ज़िम्मेदारियाँ भी हैं। क्या मुझे वो ज़िम्मेदारियाँ निभानी चाहिए या उन्हें छोड़ देना चाहिए?

आचार्य: तुमको अगर इन ज़िम्मेदारियों में आनन्द मिलता है तो निभाए जाओ। कोई एक आख़िरी लक्ष्य तो होना चाहिए न? किसी को यही रिश्ते-नाते इत्यादि निभाने में आनन्द मिलता है तो उसे कुछ और करने की ज़रूरत नहीं है, वो करता जाए। आपको किसने बताया ज़िम्मेदारी माने क्या? वो बच्ची घूम रही है छोटी-सी, उसको आप बताओगे न कि ज़िम्मेदारी क्या है? आपको कैसे पता कि आप ज़िम्मेदारी समझकर जो सारे कर्म कर रहे हो, उसी का नाम ज़िम्मेदारी है?

इस ज्ञान के साथ आप पैदा तो नहीं हुए थे न? ये तो इधर-उधर से सुन लिया है, ज़िम्मेदारी माने ये, ज़िम्मेदारी माने वो; और आयातित ज्ञान का यही लक्षण होता है कि उससे चैन नहीं मिलता। आख़िरी कसौटी चैन है। ज़िम्मेदारी से या किसी भी और तरीक़े से अगर तुम्हें चैन मिलता है तो जो कर रहे हो, करते जाओ, मत रुकना और अगर चैन नहीं मिल रहा तो जो भी कुछ कर रहे हो, वही ग़लत है।

कसौटी तो सुकून है न! जहाँ सुकून न मिलता हो, वो जगह तुम्हारे लिए ठीक कैसे हो सकती है?

और जिसको सुकून नहीं मिल रहा, वो दूसरे के प्रति क्या ज़िम्मेदारी निभाएगा! जो बेचैन है, वो तो क़रीब-क़रीब विक्षिप्त है। तुम अपनी विक्षिप्तता में दूसरे का क्या भला कर दोगी?

प्र२३: सर् बन्धन में अभी बँध चुके हैं, सुकून भी नहीं मिल रहा है तो क्या उन्हें छोड़ दें?

आचार्य: ये मैं बताऊँगा?

प्र२३: जी।

आचार्य: क्यों बताऊँगा? वो बन्धन तुमने चुना है न?

प्र२३: उसमें बँध चुके हैं।

आचार्य: वो बन्धन कैसे बँधा हुआ है? तुम्हारे हाथ-पाँव बँधे हुए हैं? अभी बताओ, तुम्हारे हाथ-पाँव बँधे हुए हैं? तुम बन्धन में कैसे हो?

प्र२३: संसार की वजह से, पति और पत्नी के रूप में।

आचार्य: तो तुम चुन रहे हो न? तुम चुन रहे हो न? चुनना है तो चुनो; नहीं चुनना, मत चुनो। तुम्हें उसमें सुकून मिलता है तो चुनो, नहीं चुनना तो मत चुनो।

अभी भी वही ग़लती कर रहे हो न, जो सदा से की? ‘दूसरे बता दें, क्या मेरी ज़िम्मेदारी है; दूसरे बता दें, क्या मेरा कर्तव्य है’। पहले दूसरों ने बताया, चैन मिल गया? अब पुनः दूसरों से पूछने आयी हो।

बन्धन कहाँ है? मैं जानना चाहता हूँ। किसी ने जेल में बन्द कर रखा है? जो भी तुम रिश्ता-नाता निभा रही हो,‌‌ वो तुम्हारा चुनाव है न? तो तुमने कुछ हिसाब-किताब, कुछ गणित लगाया है, कुछ लाभ-हानि लगायी है और उस लाभ-हानि के आकलन के बाद तुम कहती हो, ‘निभाना है’।

अगर तुम्हारे गणित में लाभ ज़्यादा आ रहा है तो निभाए जाओ और अगर हानि ही हानि दिख रही है तो निभाना बन्द करो। बात सीधी है। इसमें मैं क्या बताऊँगा?

आकलन ठीक रखो न! ये तो जानो कि हानि किसको कहते हैं और सुकून का खोना कितनी बड़ी हानि है। ये तो जानो कि आमतौर पर जिसको लाभ कहा जाता है कि थोड़ी मानसिक सुरक्षा मिल गयी, घर की छाया मिल गयी, कुछ पैसे मिल गये, समाज में कुछ इज़्ज़त मिल गयी; उनकी वास्तविक क़ीमत क्या है। ये सब पता करो थोड़ा।

तोलते तो हो ही। पलड़ा है, इधर देखते हो निभाने से फ़ायदा क्या हो रहा है और इधर देखते हो निभाने से नुक़सान क्या हो रहा है। तोल तो रही ही हो, सही-सही तोलो।

जब तोलोगे तो पता चलेगा कि ये पूरी कहानी ही झूठी है कि हम ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं और निभाने में हमें कष्ट मिल रहा है, असली कहानी दूसरी है।

असली कहानी ये है कि सौदा हुआ है। सौदा ये हुआ है कि कुछ सुविधाएँ मिलती हैं और उनके एवज़ में कुछ काम करने पड़ते हैं और वो सुविधाएँ अगर क़ीमती लगती हों तो इस सौदे को बढ़ाए जाओ और वो सुविधाएँ अगर टुच्ची लगती हों तो सौदे की क्या क़ीमत!

किसी ने तुम्हें बन्धन में नहीं रखा है, कोई नहीं ज़बर्दस्ती कर रहा है तुम्हारे साथ। इस दुनिया में हर आदमी जिस स्थिति में है, उस स्थिति में होने का चुनाव उसने स्वयं किया है। कोई शिकायत न करे! कोई बोले अगर कि घर के बड़े बन्धन हैं, बड़ी ज़िम्मेदारियाँ हैं; क्यों हो उस घर में? अभी बाहर निकलो। पर नहीं निकलोगे क्योंकि उस घर में रहने से सुविधाएँ और लाभ बहुत हैं और उन्हीं का लालच है, जो तुम्हें रोके हुए है; कोई नहीं तुमपर बन्धन डाल रहा।

तो ये कहानी ही झूठी है कि हम तो अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं और बदले में दुख पा रहे हैं। नहीं साहब! यहाँ तो व्यापार के रिश्ते हैं; कुछ लिया जा रहा है, कुछ दिया जा रहा है। तुम देख लो, क्या ले रहे हो, बदले में क्या दिए दे रहे हो।

साफ़ दिखाई दे जाए कि सौदा फ़ायदे का है तो कोई तुम्हारा रिश्ता तोड़ नहीं सकता, मौत भी नहीं तोड़ पाएगी और साफ़ दिखाई दे जाए कि रिश्ता नुक़सान का है तो तुम एक पल को उस रिश्ते में नहीं रुकोगे, तुरन्त बाहर आ जाओगे।

बात दूसरे व्यक्ति की नहीं है, दूसरा तुम्हारा शोषण नहीं कर रहा है, तुम्हारी अपनी नज़र धुँधली है। तुम स्वार्थ और प्रेम में अन्तर करना नहीं जान रहे, तुम सुविधा और सत्य में अन्तर करना नहीं जान रहे। अपनी आँखें साफ़ करो।

शारीरिक बन्धनों की बात दूसरी होती है, किसी ने पकड़कर पेड़ से बाँध दिया कि किसी ने पकड़कर जेल में डाल दिया पर न यहाँ कोई पेड़ से बँधा है, न यहाँ कोई जेल में बन्द है।

आप जिन बन्धनों की बात कर रहे हैं, वो बन्धन मानसिक हैं और मानसिक कोई बन्धन नहीं होता, मानसिक सिर्फ़ सौदे होते हैं, उन सौदों में हम अपनेआप को बेचते हैं। मैं पूछ रहा हूँ, बेच तो रहे हो, देख लो, किस क़ीमत बेचा है।

प्र२४: आचार्य जी, हम अपने ही परिवारजनों से स्वयं को हीन मानने लगते हैं, उसको हम कैसे नियन्त्रित करें? अथवा क्या यह हीनभावना ग़लत है?

आचार्य: तुम्हें हो नहीं रहा है, तुम्हें पता चल रहा है कि तुम्हें हो रहा है। सबको है। सबको है। तुम्हें पता चल गया, अच्छी बात है। गुप्त रोग सामने आ जाए तो बुरा थोड़े ही है।

कहा था न हमने कि ईर्ष्या तन की हर कोशिका में बैठी हुई है। अहंवृत्ति का मतलब ही होता है हीनवृत्ति। तो तुम्हें पता चल गया, ये अच्छी बात है, पता चल गया।

इसमें कोई बड़ा विलक्षण काम नहीं हो गया है। इतिहास को देखोगे तो भाई ने भाई को हमेशा मारा है। छोटी बात हो, बड़ी बात हो; इर्ष्या छ: महीने के बच्चों से लेकर के अस्सी साल के बुड्ढों तक सब में मौजूद होती है। तो तुम अलग प्रश्न क्या पूछ रहे हो।

प्र२४: नहीं आचार्य जी, मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे सबको ऐसा नहीं होता है।

आचार्य: सबको। सबको। कुछ इतने सजग नहीं होते कि उन्हें पता चल जाए कि भीतर ये भावना उठ रही है और कुछ इतने डरपोक होते हैं कि जब भावना उठती है तो उसको दबा देते हैं या छुपा देते हैं या व्यक्त नहीं करते। सबको।

प्र२४: आचार्य जी, क्या आपको भी ईर्ष्या होती है?

आचार्य: अरे! ये क्या है? (शरीर)। ये वही करेगा जो इसे करना है; इसमें एक जगह नहीं, हर जगह भय का, ईर्ष्या का, लोभ का, मोह का वास है लगातार। मेरा काम तो बस कहना है कि कल आना। द्वार वो मेरा भी खटखटाती है, जैसे तुम्हारा। बस मैंने बाहर लिख रखा है, (ओ स्त्री! कल आना।)

श्रोता: आप भगा देते हो, मैं प्रवेश करने देता हूँ।

प्र२४: लेकिन आचार्य जी, ये जानते हुए भी कि ठीक है, ये ईर्ष्या सबको होती है, मेरे को भी हो रही है लेकिन कहीं-न-कहीं से तो वो आपको अन्दर से वो कचोटती भी है कि…

आचार्य: ये सब करने का समय कहाँ से आया तुम्हारे पास? मैं तुम्हारे सामने बैठा हूँ, मुझे फुर्सत कहाँ है कि मैं ईर्ष्या के लिए दरवाज़ा खोलूँ। वो खटखटाती भी रहेगी, मुझे पता ही नहीं चलेगा; मैं मग्न हूँ तुम्हारे साथ। तुम्हें फुर्सत कैसे मिली?

मग्न नहीं हो, ख़ाली बैठे हो तो आती है, तुम्हें उठा ले जाती है।

‘ईर्ष्या आयी’, ‘मैं ईर्ष्यालु हूँ’, इन दोनों के बीच में जो सम्भावना है, उसका नाम तुम हो। ‘ईर्ष्या आयी’ और ‘मैं ईर्ष्यालु हूँ’, ये दोनों एक ही वक्तव्य नहीं हैं। इन दोनों वक्तव्यों के बीच में ज़रा जगह है, ज़रा सम्भावना है; उस सम्भावना का नाम है ‘मैं’।

मैं चुन सकता है कि इन दोनों वक्तव्यों को एक ही कर देना है या इन दो वक्तव्यों को पृथक् रखना है। आएगी, ये पक्का है। ‘इर्ष्या आयी’, ये पक्का है। ‘मैं इर्ष्यालु हो गया’, ये तुम्हारे हाथ की बात है।

प्र२५: आचार्य जी, अहंकार भी क्या इर्ष्या जैसा ही भाव है?

आचार्य: अहंकार कोई भाव नहीं है; अहंकार तुम्हारा होना है, तुम्हारी हस्ती है। अहंकार कोई एक भावना नहीं है, अहंकार मूलभावना है, मैं-भावना है, जिस भी भावना को तुमने कह दिया, ‘मैं भावुक हुआ’, वहाँ अहंकार है।

समझना। इसको ऐसे कहा जाए कि ये शरीर है, ये मस्तिष्क है; इनकी अपनी वृत्तियाँ हैं और वो चलती रहती हैं। उदाहरण के लिए ‘साँस लेना’; तुम कह सकते हो कि शरीर की वृत्ति है। ये सब वृत्तियाँ शरीर की हुई। तुम अलग हो और तुम्हारी एक ही वृत्ति है, तुम्हारी वृत्ति है चिपकना।

शरीर की वृत्ति है सोना माँगना, पानी माँगना, भोजन माँगना। ठीक? और तुम्हारी क्या वृत्ति है? चिपकना। तुम्हारी एक ही वृत्ति है आसक्ति, तादात्म्य।

तो सारी भावनाएँ किसको उठती हैं? शरीर को उठती हैं। भावना, विचार; ये सब मस्तिष्क की तरंगे हैं, ये सब भीतरी रसायनों का खेल हैं। तो भावना किसकी वृत्ति है? शरीर की वृत्ति है। लेकिन उस भावना के साथ सम्पृक्त हो जाना किसकी वृत्ति है? तुम्हारी।

तो भावना के उठने पर तुम्हारा ज़ोर नहीं है पर भावुक हो जाने पर तुम्हारा ज़ोर है।

अन्तर समझ में आ रहा है? शरीर को वृत्तियाँ उठेंगी ही उठेंगी। वो यन्त्र है, वो उसकी प्रकृति है, उसमें कुछ चीज़ें होंगी; उसमें ईर्ष्या भी सम्मिलित है, उसमें डर इत्यादि सारे विकार सम्मिलित हैं; वो सब शरीर में होते ही होते हैं। तुम इनसे सम्बन्धित मत हो जाना।

‘ईर्ष्या उठी।’, ‘मैं ईर्ष्यालु हो गया।’; इन दोनों के बीच में, मैं कह रहा हूँ, ज़रा-सा फ़ासला है, उस फ़ासले का पूरा उपयोग करो। ये दोनों एक ही बात नहीं हैं। ‘ईर्ष्या का उठना’, ‘मैं ईर्ष्यालु हो गया।’; ये दोनों एक ही बात नहीं हैं। अभी अन्तर है इनमें, उस अन्तर में तुम्हारे लिए सम्भावना है, वो अन्तर ही तुम्हारी मुक्ति की उम्मीद है।

अन्तर समझ में आ रहा है? शरीर को वृत्तियाँ उठेंगी ही उठेंगी, वो यन्त्र है। वो उसकी प्रकृति है, उसमें कुछ चीज़ें होंगी, उसमें ईर्ष्या भी सम्मिलित है, उसमें डर इत्यादि सारे विकार सम्मिलित हैं; वो सब शरीर में होते ही होते हैं, तुम इनसे सम्बन्धित मत हो जाना।

‘ईर्ष्या उठी।’, ‘मैं ईर्ष्यालु हो गया।’, इन दोनों के बीच में मैं कह रहा हूँ, ज़रा-सा फासला है; उस फासले का पूरा उपयोग करो। ये दोनों एक ही बात नहीं हैं। ‘ईर्ष्या का उठना’, ‘मैं इर्ष्यालु हो गया।’ ये दोनों एक ही बात नहीं हैं, अभी अन्तर है इनमें। उस अन्तर में तुम्हारे लिए सम्भावना है, वो अन्तर ही तुम्हारी मुक्ति की उम्मीद है।

प्र२६: आचार्य जी, शरीर की समाप्ति के साथ ‘मैं’ का क्या? वो क्या है?

आचार्य: वो एक वृत्ति है, वो एक भटकी हुई वृत्ति है, जिसका अपना कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। वो चिपकना भर जानता है। वो इससे (मग से) चिपका, उसे चैन मिला? जल्दी बोलो! (चषक से) चिपका, उसे चैन मिला? जल्दी बोलो! वो इससे (गिलास से) चिपका, उसे चैन मिला? वो इससे (नियंत्रक यंत्र से) चिपका, उसे चैन मिला? वो इससे (बालों से) चिपका, चैन मिला? सोना, रुपया, पैसा, आदमी, औरत, बच्चा; इन सबसे वो चिपका—पद, प्रतिष्ठा—उसे चैन मिला? नहीं मिला न?

तो अहम् जिस भी वस्तु से चिपक सकता है, चिपकता है; उसे चैन नहीं मिलता। हम समझना चाह रहे हैं कि अहम् क्या है। अहम् जिस भी वस्तु से चिपक सकता है, चिपकता है; उसे चैन तो मिला नहीं। नहीं मिला न? ठीक।

हमें कुछ सन्तों ने, फ़क़ीरों ने बताया है कि उन्हें चैन मिल गया। उनका अहम् किससे जाकर चिपका था? क्योंकि अहम् तो चिपकू है, वो तो चिपकेगा। उनका अहम् किससे के चिपका था?

श्रोता: सत्य से।

आचार्य: सत्य से। ठीक। अहम् सत्य से जाकर चिपक गया तो सन्तों ने कहा, ‘चैन मिल गया’। हम समझना चाह रहे हैं कि हम क्या हैं। अब सत्य तो पूर्ण होता है, सत्य से तो कुछ चिपक ही नहीं सकता, सत्य से जो चिपकेगा वो भी क्या होगा? (सत्य)। पर सत्य तो दो होते नहीं? मतलब अहम् क्या है फिर वास्तव में?

श्रोतागण: कुछ भी नहीं। असत्य।

आचार्य: असत्य होता तो सत्य से कैसे चिपक जाता?

श्रोता: है ही नहीं अहम् कुछ।

आचार्य: अहम् सत्य ही है, जो अपनेआप को भुलाए बैठा है और अपनेआप को असत्य मान रहा है। तभी तो उसे चैन सिर्फ़ सत्य के साथ मिलता है। तो वास्तव में अहम् कुछ है ही नहीं। अब बताओ मुझे कि फिर शरीर के जाने के बाद अहम् का क्या होगा। वो कुछ था ही नहीं, उसका क्या होगा? वो तो भ्रम था।

श्रोता: फिर पुनर्जन्म?

आचार्य: किसका? भ्रम का? किसका? किसी का नहीं।

श्रोता: फिर ये जन्मना-मरना क्या है?

आचार्य: भ्रम। जब तक भ्रमित हो, तुम्हारा होता रहेगा। और भ्रमित के साथ जो कुछ होगा, वो क्या होगा? भ्रम ही तो होगा। तो किसने कह दिया कि वास्तव में पुनर्जन्म होता है! लेकिन होता तो है। जब तक भ्रमित हो, यही लगता रहेगा कि पुनर्जन्म चल रहा है; है नहीं। अरे! जब जन्म ही नहीं है तो पुनर्जन्म कहाँ से आ गया पगले! पर तुम्हारा जन्म में भी यक़ीन है तो पुनर्जन्म में होना स्वाभाविक है। बात समझ में आ रही है, अहम् क्या है?

ये देख लो कि अहम् को चैन कहाँ मिलता है। सत्य के साथ मिलता है न? और सत्य तो असंग है, मतलब उसका कोई साथी नहीं हो सकता। अहम् को चैन किसके साथ मिला? सत्य के साथ। और सत्य क्या होता है? असंग, जिसका कोई साथी नहीं होता। इसका मतलब अहम् क्या है? कुछ नहीं, कुछ नहीं, भ्रम मात्र है। उसकी कोई हस्ती ही नहीं है पर अपनी दृष्टि में उसको लगता रहता है, मैं हूँ।

इसीलिए समझाने वालों ने दोनों तरह समझाया। कुछ ने कहा, ‘अहम् है ही नहीं’ और कुछ ने कहा कि अहम् वास्तव में सत्य ही है, सत्य जो अपनेआप को भूल गया है। कैसे भूल गया है? उसकी मर्ज़ी। लीला। लेकिन सत्य तो अपनेआप को भूल ही नहीं सकता तो इसीलिए अहम् भ्रम है।

अगर वो भूल भी रहा है तो जान-बूझकर भूल रहा है न! तो क्या भूला है, वो भूलने का अभिनय कर रहा है।

तो इसीलिए अहम् ले-देकर है ही नहीं कुछ। एक भूल है अहम्। मृगमरीचिका है अहम्, जो प्रतीत तो होती है, है नहीं। आकाशकमल है अहम्; लगता है कि है, है नहीं। पर उसके लगने, न लगने के चक्कर में आदमी बर्बाद हो जाता है। (मुस्कुराते हुए)

प्र२७: ईर्ष्या का उठना और ईर्ष्यालु होना तो जब ईर्ष्या उठती है तो उसी समय हो जाते हैं न ईर्ष्यालु।

आचार्य: हमने कहा, ‘बीच में सम्भावना है कि बच जाओगे’।

श्रोता: पता कैसे चलेगा अन्तर का?

आचार्य: ये साधना है। यही साधना है। साधना वास्तव में अपने चुनाव के अधिकार का परिष्कार है, सम्वर्धन है। साधना वास्तव में ऐसा ही है, जैसा चुनाव में वोट (मत) डालना कि सरकार तो बननी ही है, कहीं कोई बेकार सरकार न बन जाए। किसी-न-किसी की हुकूमत तो चलेगी; कहीं हुकमरान ग़लत न बैठ जाए।

और याद रखना, गद्दी पर जो भी बैठेगा, तुम्हारी मर्ज़ी के बिना तो नहीं बैठ सकता। तय तो तुम ही करते हो कि गद्दी पर कौन बैठेगा। ठीक? यही बात।

गद्दी पर बैठाते भी तुम ही हो और भुगतते भी फिर तुम ही हो। तो चुनाव का दिन वो सम्भावना है, जिस दिन तुम तय कर सकते हो कि (सरकार किसकी बनेगी)। उस दिन बेहोश मत हो जाना।

श्रोता: सरकार तो मेरे अकेले वोट से नहीं आती, बहुत सारी चीज़ें…

आचार्य: यहाँ तुम्हारे अकेले वोट से आती है।

श्रोता: आचार्य जी कभी ग़लत चुन लिया तो कोई बुरा तो नहीं न?

आचार्य: पूर्णता के लिए, सत्य के लिए कभी कुछ बुरा हो ही नहीं सकता। तात्विक दृष्टि से देखो तो कभी कुछ बुरा घटा ही नहीं। लेकिन सिर तो तुम्हारा फिर भी फूटेगा‌।

तुम्हारा सिर फूट जाए, अस्तित्व को क्या अन्तर पड़ता है। कुछ बुरा हुआ है क्या? इतने लोग रोज़ जी रहे हैं, मर रहे हैं; बुरा तो कभी कहीं घटित होता ही नहीं; पर किसके लिए? पूर्ण के लिए कभी कुछ बुरा घटित नहीं होता, तुम्हारे लिए तो बेटा होता है; अच्छा भी होता है, बुरा भी होता है। अभी सिर फूटेगा तुम्हारा, तुरन्त चिल्लाओगे, ‘अरे! बड़ा बुरा हुआ’।

तो ये सब बातें मत बोला करो, जिनको तुम जानते ही हो कि सीधी-सीधी झूठ हैं। तुम्हारे लिए तो कुछ अच्छा, कुछ बुरा होता ही है। आज ही रात खाना न पाओ तो कहोगे, ‘बुरा हो गया’ और कह रहे हो, ‘नहीं, बुरा क्या है?’

प्र२८: साधना में विधियों की क्या भूमिका है?

आचार्य: साधना माने विधि। बिना विधि के कोई साधना नहीं होती। साधना माने विधि। प्रश्न ये नहीं है कि विधियों का क्या उसमें रोल (भूमिका) है, प्रश्न ये है कि विधि कौन चुन रहा है, उचित विधि का पता कैसे चले। साधना में कोई-न-कोई विधि तो होगी ही होगी। जो कोई ये कहे कि साधना बिना विधि के भी हो सकती है तो ये भी एक विधि ही हुई। तो कोई-न-कोई विधि तो चलेगी ही। प्रश्न ये है, उस विधि को चुनने वाला कौन है?

पागल अपने उपचार की विधि अगर स्वयं चुनेगा, तब तो हो चुका उपचार; इसी प्रकार साधक अगर स्वयं तिकड़म लगाकर के विधि चुनेगा तो हो चुकी साधना। विधियों के साथ समस्या ही यही है कि साधक चुनने निकल पड़ता है अपने अनुसार विधि।

विधि या तो आत्मा चुनेगी या गुरु चुनेगा; साधक न चुनने बैठ जाए। या तो तुम्हारी आत्मा से इतनी निकटता हो कि भीतर से ही तुम्हें पता चल जाए कि कौनसी विधि उचित है मेरे लिए या फिर चुपचाप गुरु जो विधि बताए, उसका पालन करो; छेड़खानी मत करो, दख़लंदाज़ी मत करो।

और ये भी याद रखना कि कोई एक विधि सदा तुम्हारे लिए उपयुक्त नहीं होगी। ये भी हो सकता है कि प्रातःकाल एक विधि ठीक हो, दोपहर दूसरी, संध्या तीसरी और ये भी मत सोचना कि जितनी विधियाँ तुम्हें चाहिए, वो सब की सब तुम्हें किताबों में मिल जाएँगी।

जीवन की स्थितियाँ प्रतिपल बदलती हैं और अनन्त हैं इसीलिए विधियाँ भी तुम्हें बहुत सारी चाहिए। कह सकते हो कि तुम्हें कोई ऐसी विधि चाहिए, जो तुम्हें लगातार सही विधि से अवगत कराती चले‌।

मूल विधि जानते हो, क्या है? मूल। मूल। ध्यान की सर्वोत्तम विधि जानते हो क्या है? ध्यान। ध्यान से प्रेम हो तो ध्यान स्वयं बता देता है कि ध्यान में कैसे रहोगे, सत्य से प्रेम हो तो सत्य स्वयं बता देता है मुझ तक कैसे पहुँचना है।

हज़ार तरीक़ों से बताता है और चूँकि तुम सब अलग-अलग हो इसीलिए सबको अलग-अलग विधियाँ चाहिए। कुछ हद तक साझी विधियाँ काम करेंगी, कुछ हद तक, उसके बाद काम नहीं करेंगी।

इसीलिए जो प्रचलित विधियाँ हैं ध्यान की, उनपर चलकर साधकों को कुछ लाभ अवश्य होता है पर उसके बाद लाभ नहीं होता, हो ही नहीं सकता।

वो शुरुआत के लिए होती हैं, शुरुआत से आगे नहीं ले जा सकतीं। आरम्भिक चरण के लिए जो प्रचलित विधियाँ हैं, वो कुछ मदद कर देंगी; आरम्भ से आगे तो तुम्हें तुम्हारा प्रेम ले जाएगा, उसके बाद तो मामला निजी हो जाता है। उसके बाद सामूहिक विधि काम नहीं आएगी कि सब बैठकर के माला जप रहे हैं तो हम भी माला जप रहे हैं, फिर सामूहिक काम नहीं होगा।

उसके बाद तो तुम्हें अपने एकान्त में प्यारे से पूछना होगा कि बता तुझ तक आने के लिए क्या करूँ। और वो बताएगा फिर कि तुम इस विधि का पालन करो और सुबह कुछ बताएगा, दोपहर कुछ बताएगा; एक स्थिति में कुछ बताएगा, दूसरी में कुछ बताएगा और तुम्हें सिर झुकाकर, आँख मूँदकर उसकी आज्ञा का पालन करना पड़ेगा।

प्र२९: आचार्य जी, बीच का जो अन्तर बढ़ाने की बात हो रही थी, जिसको आपने साधना कहा, तो सुबह भी आप बात कर रहे थे कि युद्ध, छोटे-छोटे युद्ध; तो जैसे-जैसे आप जागरूक होते जाते हो, जैसे-जैसे अपनी ग़लतियों के बारे में दिखाया जाता है तो आपको आप जब कोशिश करने उतरते हो, उस अन्तर को बनाकर रखने की तो आपको पता लगता है कि साधनाकाल जैसी तो कोई चीज़ होती नहीं; आप साधना करोगे कब? ऐसा नहीं है कि कोई प्रयोगशाला है, जिसमें आप जाकर तैयारी करोगे।

आचार्य: आप साधना नहीं कर सकते, आप साधक ही हो जाओ। इन दोनों बातों में अन्तर समझना। जो साधना कर रहा है, उसके पास तो विकल्प है साधना न करने का। और साधक होने का मतलब होता है कि और मैं कुछ हूँ ही नहीं, प्रतिक्षण मेरा एक ही दायित्व है, अपनी सम्भावना को विकास देना, आकार देना, पोषण करना उसका।

प्र२९: और ये ऐसे, जो मुझे समझ में आया कि आप खींचे जा रहे हो, एक भी आपने ग़लती करी तो आ वापस वहीं।

आचार्य: जैसे टेनिस में या स्क्वाश में लम्बी रैली खेलो लो और फिर?

प्र२९: एक छोड़ दिया तो पीछे का सारा भी गया।

आचार्य: चालीस शॉट की रैली खेल ली, एक छोड़ दिया तो ऐसा थोड़ी ही होता है कि आपको आंशिक दण्ड मिलेगा बस, पूरा ऑउट् ही गया। या ‘एक बट्टा चालीस’ (१/४०) तुम्हें पेनाल्टी (दण्डधारा) लगेगी? कितनी लगेगी? जितना करा था, सब लुटा दिया।

प्र२९: तो जब ये साधने के चक्कर में डर लगता है तो जब डर लगता तो…

आचार्य: डर आता है और मैं चुनता हूँ ये कहना कि मैं डर गया।

प्र२९: नहीं, जैसे जब आप उसको साधने में प्रयासरत हो तो एक सावधानी चाहिए होती है, वो सावधानी अपने साथ डर लाती है एक तरीक़े का।

आचार्य: ठीक है, तो एक नहीं दो आएँ; ‘ओ स्त्रियों! कल आना।’ भाई! ईर्ष्या के विरुद्ध जब तुम सजग हुए तो तुमने पाया कि ईर्ष्या अपने साथ डर को भी लायी है तो ठीक है, दोनों को भगा दो भाई! संवेदनशीलता चाहिए। पहला झोंका आए और तुम तभी कह दो कि कुछ बदबू आयी, मैं यहाँ से जा रहा हूँ।

मैं एक होटल में रुका हूँ, वहाँ छत पर छोटे-छोटे-छोटे यन्त्र लगे हुए हैं; वो किसलिए लगे हैं? वो स्मोक डिटेक्टर् (धूम संसूचक) हैं। वो क्या करते हैं? वो ये करते हैं कि तुमने कमरे में अगरबत्ती भी जला दी तो पानी बरसा देंगे। ये संदवेदनशीलता है कि ज़रा-सा भी अगर धुआँ हुआ तो मुझे बर्दाश्त नहीं है; तभी जग बैठूँगा, तभी उठ जाऊँगा।

ये नहीं कि बर्दाश्त कर रहे हैं, कर रहे हैं और जब तक अंगड़ाई लेकर के, जम्हाई लेकर के उठे, तब पता चला कि स्थिति हद पार कर गयी है। अब तो हम गये ईर्ष्या के साथ, अब वापस लौटने का कोई तरीक़ा ही नहीं है।

श्रोता: वृत्ति संसूचक बन जाओ।

आचार्य: इसको प्रेम भी कहते हैं। सन्तों ने इसको ऐसे कहा है कि हमें ज़रा-सी भी जुदाई बर्दाश्त नहीं है; हम शान्ति के साथ हैं, ईर्ष्या आती है, शान्ति हिलती है, जुदाई हमें अच्छी ही नहीं लगती। ज्ञान की भाषा में कहोगे तो ये एक सजगता है। भक्ति की भाषा में कहोगे तो ये प्रेम है।

प्र३०: आचार्य जी, जैसे आपने कहा कि अहम् मिथ्या है और शरीर अपना काम करता है तो जब एक ही कार्य को दो शरीर करते हैं, एक सफल होता है, एक असफल होता है तो शरीर क्या एक जगह कार्य पूर्ण दक्षता से नहीं करता?

आचार्य: एक में अहम् छेड़ख़ानी कर रहा होगा, दूसरे में कम कर रहा है या नहीं कर रहा है। इसको समझना ही चाहते हो तो दो शरीरों को मत लीजिए, एक की ही बात करिए कि एक ही आदमी कभी एक काम ठीक से कर लेता है और दूसरे काम में बिलकुल उपद्रव।

शरीर एक व्यवस्था है, जो बुद्धि के माध्यम से अपना काम करना जानती है, उसको अहम् भावना की ज़रूरत नहीं है और अहम् भावना जो काम करना चाहती है शरीर के माध्यम से, वो काम हो नहीं सकता। अहम् भावना शरीर के माध्यम से क्या चाहती है? चैन। वो हो नहीं सकता काम। शरीर जितने काम चाहता है, वो काम हो जाएँगे।

शरीर को भोजन चाहिए, भोजन मिल जाएगा; अहम् को भोजन नहीं चाहिए, अहम् को भोजन के माध्यम से चैन चाहिए। पेट क्या माँगता है? खाना। खाना मिल जाएगा और पेट को जितना खाना चाहिए, वो खाना उपलब्ध हो सकता है। पेट की माँग अनन्त नहीं होती, अहम् की माँग अनन्त होती है।

अन्तर समझना। वृत्तियाँ शरीर की भी हैं पर शरीर की वृत्तियाँ अनन्त नहीं होतीं, उनका अन्त होता है; तुम खाना एक बार इतना खा लो, उसके बाद भूख बचती है क्या? पर मन की भूख कभी नहीं मिटती, वो अहम् की भूख है। पेट की भूख मिट जाती है। हाँ, वो लौटकर आएगी, चक्रवत् होती है लेकिन मिटती रहती है। मन की नहीं।

इसीलिए मैं कहता हूँ, शरीर की वृत्तियों को बुरा बोलो ही मत; न उन्हें दबाने की कोशिश करो, न उन्हें उभारने की कोशिश करो; वो ठीक हैं अपनी जगह।

नीन्द आती है, सो जाओ; शरीर की वृत्ति है। भूख लगती है, खा लो; शरीर की वृत्ति है। ठीक है? शरीर नहीं गड़बड़ है, शरीर तो बेचारा एक प्राकृतिक उत्पाद है, उसमें क्या गड़बड़! क्या नहीं!

गड़बड़झाला है तुम्हारा शरीर के साथ चिपक जाना। जब तुम शरीर के साथ चिपक जाते हो, बेचारा शरीर भी बर्बाद हो जाता है; पेट की भूख तो सीमित थी, अहम् परमात्मा पाना चाहता है पिज़्ज़ा के माध्यम से तो फिर पेट इतना बड़ा हो जाता है।

जानवर कभी देखे हैं, ज़रूरत से ज़्यादा खाते हुए? क्यों नहीं खाते ज़रूरत ज़्यादा? क्योंकि जानवरों का सिर्फ़ पेट खाता है। आदमी का पेट नहीं खाता, आदमी का अहम् खाता है और आदमी पिज़्ज़ा के माध्यम से जो माँग रहा है, वो उसे पिज़्ज़ा में कभी मिल नहीं सकता।

तो आदमी फिर बहुत सारा खाता है, ये सोचकर कि और खालूँ तो शायद मिल जाए। मिलता नहीं, फिर पेट इतना बड़ा हो जाता है।

जो गुण अध्यात्म की दृष्टि से उपयोगी बताये गये हैं, उनमें एक गुण लज्जा भी है। लाज आनी चाहिए अपनी दुर्गति पर। जाओगे तुम सन्तों के यहाँ तो वो गाते हैं, ‘घर जाऊँ कैसे? बाबुल से नज़रें मिलाऊँ कैसे?’, लाज आती है। ‘लागा चुनरी में दाग़, छुपाऊँ कैसे!’

लज्जा आनी चाहिए कि तेरा भरोसा हमने बिलकुल ही तोड़ दिया, बार-बार तूने हमें सुधरने का, पाक-साफ़ रहने का मौक़ा दिया और बार-बार हमने ग़लत चुनाव किया। लज्जा बहुत उपयोगी है, जब परमात्मा के सामने आए और लज्जा बहुत घातक है, जब समाज के सामने आए।

जब तुम लजाने लग जाते हो कि अरे! कोई दूसरा मुझे देख न ले तो वो लज्जा बड़ी व्यर्थ है और आमतौर पर हमें वही लज्जा होती है। सड़क पर गिर गये फिसलकर, तुरन्त देखते हैं, किसी ने देखा तो नहीं, इधर-उधर। घर में लड़का फ़ेल् (अनुत्तीर्ण) हो गया,‌ तुरन्त छुपाते हैं, किसी को पता न चले। लड़का गँजेड़ी निकल गया, पुलिस ले गयी थी, दो दिन थाने में रहा, उसका गाँजा छूटे-न-छूटे, ये ख़बर दबनी चाहिए, एकदम पता नहीं चलना चाहिए दुनिया को कि अपना कुलदीपक दो रात हवालात रौशन करके आया है।

ये लज्जा सड़ी हुई चीज़ है। लेकिन उसके सामने लाज आनी चाहिए। परमात्मा के सामने, ग्रन्थों के सामने, गुरु के सामने बड़ी लज्जा आनी चाहिए, नजरें झुकी रहनी चाहिए, सिर झुका रहना चाहिए।

‘तुमने हमें इतना दिया, हम फिर भी किसी क़ाबिल नहीं निकले। तुम मौक़ा दिए जाते हो, हम मौक़ा गँवाए जाते हैं।’

पर लाज भी बड़ी विचित्र बात है, सिर्फ़ सन्तों को ही आती है। सन्त बार-बार गाते हैं कि अवसर छूटो जाए रे! बीत गये दिन भजन बिना रे! आम आदमी को लाज ही नहीं आती।

सन्त परमात्मा के सामने खड़ा होता है और रो पड़ता है कि किसी क़ाबिल नहीं निकला मैं। आम आदमी परमात्मा को भी आँख दिखाता है, ‘ग़लती सारी तुम्हारी है, तुम्हीं ने ऐसा बनाया है हमें।’

तो पुराने लोगों ने अगर लज्जा को आभूषण बताया था तो सही ही बताया था। लज्जा वास्तव में आभूषण है पर सही लज्जा।

जेठ के सामने घूँघट डालकर घूम रही हैं, इसको लज्जा नहीं बोलते, ये बेहूदगी है। या बाज़ार में निकले हैं पर्दा करके, ये नहीं लज्जा है; ये लज्जा का विकृतिकरण है। अध्यात्म की दृष्टि से देखो तो सब जीव स्त्रियाँ हैं, परमात्मा मात्र पुरुष है। उसके सामने लज्जा आनी चाहिए और सिर्फ़ उसके सामने और किसी के सामने नहीं। संसार के सामने पूर्ण निर्लज्जता चाहिए और परमात्मा के सामने बस गोरी की आँखें झुकी ही रहें।

फिर बुरा लगता है, बड़ी ग्लानि उठती है भीतर। फिर ये सवाल नहीं पूछोगे कि एक बार ग़लती करके आदमी दोबारा दोहराए तो। फिर ऐसा लगता है कि कैसे मुँह दिखाएँगे; ‘जाकर बाबुल से नज़रें मिलाऊँ कैसे? घर जाऊँ कैसे? लागा चुनरी में दाग़, छुपाऊँ कैसे!’ शर्म आनी बहुत ज़रूरी है। बेशर्मी की संस्कृति घातक है।

श्रोता: आचार्य जी, अगर प्रेम है तो फिर लज्जा का कोई फिर कहाँ कुछ…

आचार्य: वो जो प्रेमी है, वो तो प्रेम निभा रहा है, तुमने नहीं निभाया न! इसी बात की तो लज्जा कि तुमने प्रेम का मान नहीं रखा। प्रेम है, किस तरफ़ से है? उसकी तरफ़ से है। तुम प्रेम की आबरू नहीं रख पाये, इसी बात की तो लाज। वो देता रहा और तुम इस लायक़ भी न हो पाये कि ले पाओ। इसी बात की तो लाज।

अब समझ में आ रहा है, क्यों कहा उन्होंने कि पानी गये न ऊबरे, मोती मानस चून? लज्जा है, जिसको पानी कहा जा रहा है; आदमी में पानी होना चाहिए, लाज होनी चाहिए, जिस आदमी का पानी मर गया, उसके लिए कोई सम्भावना नहीं। ‘पानी गये न ऊबरे, मोती मानस चून।’

पूरी ईसाइयत सिन् (त्रुटि) और गिल्ट (ग्लानि) पर आधारित है कि अनुभव करो और मानो कि तुम पापी हो और फिर प्रायश्चित करो, रिपेन्टेन्स (प्रायश्चित)।

लाज आनी चाहिए न कि हाय! ये मैंने क्या कर दिया, ईशु मुझे क्या देने आया था और मैंने क्या कर डाला! उसके प्यार का मैंने क्या सबक दिया! पूरी ईसाइयत ही इसी पर है कि लाज करो, थोड़ी शर्म करो।

और ईसाई मत से ज़्यादा सिन् की बात कोई करता भी नहीं; यही उसकी विशेषता भी है। वह बार-बार तुम्हें याद दिलाता है कि तुमने कुछ बहुत ग़लत कर रखा है और ग़लत करे जा रहे हो। एक तरह से देखो तो ईसाई-मत आदमी की बेहयाई के खिलाफ़ आन्दोलन है; ‘कितने बेहया, कितने निर्लज्ज!’

प्र३१: लोगों से धोखे का डर रहता है, उसको कैसे दूर करें?

आचार्य: तो धोखे का थोड़े ही तुम्हें डर रहता है, तुम्हें तो डर यह रहता है कि कुछ खो न जाए। धोखे से तुम्हें एक लाख रुपये मिल जाए तो डर लगेगा? धोखे का थोड़े ही डर है, डर ये है कि धोखे से कहीं कुछ नुक़सान न हो जाए।

बहुत लोगों को धोखे से बहुत फ़ायदा भी हो जाता है; सोच रहे थे कुछ और, हो कुछ और गया। देखो कितने फ़ायदे हुए धोखे से। तो क्यों है डर नुक़सान का?

प्र३१: कुछ भी, पैसे का, रिश्ते का, मुख्य समस्या डर है।

आचार्य: फिर क्या होगा? जब चीज़ें खो जाएँगी, तब क्या होगा? जिन चीज़ों के खोने का भय है, वो खो जाएँगी तो क्या होगा?

प्र३१: दुख।

आचार्य: ठीक है, दुख होगा तो क्या होगा?

श्रोता१: एक वीडियो आपका ध्यान आ रहा है, जिसमें आपने कहा था कि जो चीज़ संसार से मिली है अगर वो छिन भी जाती है तो वो तो तुम्हारी थी ही नहीं चीज़।

श्रोता२: दुख तो तब भी होना है तो अभी क्यों कर रहे हो? वो खोएगा या नहीं, वो तो एक सम्भावना है; अभी तो आप डरकर दुखी हो ही रहे हो।

आचार्य: ये एक ओढ़ी हुई मजबूरी है कि कुछ खो गया तो दुख होना ही होना है। तुम्हारा सबकुछ भी चला जाए तो भी तुम झेल तो लेते ही हो, बल्कि जब चीज़ें तुम्हारे पास से खोती हैं, तब दुख हो, न हो, उनके खोने की कल्पना कर-करके तुम ख़ूब दुख अनुभव कर लेते हो।

आज से पहले कुछ खोया नहीं है क्या? तो? खोई हुई चीज़ के साथ तुम भी खो गये? और जिस भी चीज़ को तुमने पकड़ रखा है, वो खोएगी नहीं कभी क्या? तो!

जब तुम्हारी पहली वस्तु को ही खो जाना है—क्या है तुम्हारी पहली वस्तु? देह—जब उसको ही खो जाना है तो देह के माध्यम से तुमने और जो वस्तुएँ पकड़ी हैं, वो नहीं खोएँगी क्या? तो क्यों बवाल मचाते हो?

सोचना है तो पूरा सोचो, जान लगाकर सोचो, आधा-अधूरा नहीं न कि हाय-हाय! कि जैसे किसी की गर्दन कट रही हो, उसे गर्दन का कुछ पता नहीं, कह रहा है, ‘अरे! दाढ़ी मेरी नहीं छिननी चाहिए!’ दाढ़ी पहले आयी थी या मुंडी? जब मुंडी ही नहीं बचेगी, तो तुम दाढ़ी से क्या लगन लगा रहे हो!

ये सब रिश्ते-नाते दाढ़ी के बाल हैं, देह से उपजे हैं, जब देह ही नहीं बचेगी तो दाढ़ी के बाल क्या बचेंगे! और तुम्हें तो दाढ़ी के बाल ही नहीं, दाढ़ी के बाल के रंग से भी आसक्ति रहती है; कहते हो, ‘मेहन्दी लगायी थी!’

गर्दन कट रही है, भैसेंवाला खड़ा है अपना गँड़ासा लेकर के। भैसेंवाले को जानते हो न? मेरा दोस्त। कौन? (मृत्यु)। और यहाँ बात ये हो रही है कि दाढ़ी की ज्यूँ न छूट जाए।

जब किसी चीज़ के साथ बहुत दिल लगाते हो, उस वक़्त सतर्क रहा करो। दिल लगाना आसान है, उसके बाद सजग होना मुश्किल है। ये जो जल्दी से तादातम्य बना लेते हो न कि ये मेरी चीज़, ये मेरा रिश्ता, ये मेरी इ़ज्ज़त, ये मेरा रुपया; एकदम बल्ब जल जाया करे, बिजली कौंध जाया करे कि रिश्ता जो बना रहा हूँ मैं, अब यही दुख का कारण बनने वाला है।

भीतर एक व्यवस्था रहे, सर्किट् ब्रेकर् (परिपथ वियोजक) कि सर्किट् (वैद्युतपरिपथ) में जहाँ एक सीमा से ज़्यादा करेन्ट (धारा) प्रवाहित होगा, तहाँ सर्किट् ब्रेक (परिपथ वियोजन) हो जाएगा; उसी को कहते हैं फ़्यूज़ (विगलन); सर्किट् पिघल जाएगा, मेल्ट कर जाएगा, फ़्यूज़ कर जाएगा।

दिमाग़ में थोड़ी-बहुत गतिविधि चलती रहती है, जहाँ उस सीमा से ज़्यादा गतिविधि चले, तहाँ सर्किट टूट जाए कि ल्यो! अब कुछ नहीं चलेगा।

तो साधना यही है, भीतर सर्किट् ब्रेकर् लगा देना गड़बड़ हुई नहीं, सर्किट् डाउन् (परिपथ टूटा)। ल्यो! अब कुछ नहीं चलेगा यहाँ। तो तुमने गड़बड़ी को ही विधि बना लिया, अब तुम नहीं हार सकते। माया के खिलाफ़ तुमने माया को ही विधि बना लिया, अब तुम्हें कोई और विधि चाहिए ही नहीं।

‘मुझे परेशान नहीं होना है।’ इस लक्ष्य के लिए तुमने क्या विधि बनायी? जैसे ही परेशानी आएगी, सर्किट् डाउन्। लो, अब परेशान तुम हो ही नहीं सकते। माया का आना ही माया के खिलाफ़ अलार्म (सूचक) बन गया।

प्र३२: कृष्णमूर्ति जी को थोड़ा-बहुत पढ़ा, तो उसमें एक चीज़ वो बार-बार बोलते हैं कि मुहर नहीं लगाने का, नाम नहीं देने का। तो आचार्य जी, जब भी कोई चीज़ देखते हैं तो नाम देना तो अपनेआप हो ही जाता है, मुहर तो लग ही जाती है।

आचार्य: वो मस्तिष्क का काम है, उसे करने दो। मस्तिष्क के काम करने में और तुम्हारे उस काम को स्वीकृति देने के बीच में—मैंने कहा—तुम्हारी मुक्ति की सम्भावना है।

मस्तिष्क कुछ करता है, वो एक रासायनिक प्रतिक्रिया है। मस्तिष्क ने इसको (वस्तु को) देखा, पदार्थ का इन्द्रियों से सर्म्पक हुआ, यहाँ (मस्तिष्क) पर विद्युत् की एक पतली-सी धारा बही और भीतर की प्रक्रियाओं ने तुरन्त एक नाम उछाल दिया, ‘पीला पर्दा’। ये सब यन्त्रवत् हो रहा है, ये सब बिलकुल जड़ प्रक्रिया है, इसमें चेतना कहीं नहीं है, ये काम मशीन भी कर लेगी। तुम्हारा काम है, इस प्रक्रिया को प्रक्रिया जानना और उससे अलग खड़े रहना, उस प्रक्रिया में सहभागी न हो जाना।

प्र३२: नाम रखने वाली घटना तो हो गयी न!

आचार्य: हो गयी न! वो प्रक्रिया का हिस्सा था, नामकरण प्रक्रिया का हिस्सा था। वो मना कर रहे हैं, उस प्रक्रिया का हिस्सा बनने से। तुम मत प्रक्रिया का हिस्सा बनो। तुम उसको रोक नहीं सकते। प्रक्रिया को रोक नहीं सकते तुम; लेकिन तुम उसका हिस्सा बनने से इनकार कर सकते हो। इन दोनों बातों में बहुत अन्तर है।

उसको रोकने अगर चले गये तो उसी प्रक्रिया का हिस्सा बन गये। तुम उसे रोकना भी मत, न उसका समर्थन करना।

सारी साधना कुछ और नहीं है। साफ़ समझ लो! अपने खिलाफ़ जाने को साधना कहते हैं। अच्छा कुछ लग रहा है पर कर कुछ और रहे हैं, इसको साधना कहते हैं; बड़ी-बड़ी बातें सब एक तरफ़। जिसको मन कहते हो न? मन कह रहा है, ‘ऐसा कर लें!’ पर तुम कहते हो, ‘नहीं, ऐसा नहीं होगा, कुछ और होगा।’ यही साधना है। सौ बात की एक बात। साधना का मतलब ही है अपना विरोध। इसीलिए तो दुष्कर है। साधना का मतलब ही यही है, ‘नहीं’। किसको बोला, ‘नहीं’? ख़ुद को।

मूल मन्त्र क्या है? ‘न’। मूल मन्त्र है? ‘न’; छोटे-से-छोटा, ‘न’। बस इसी का पाठ किया करो, ‘न’। कुछ भी उठे; उत्तर में, ‘न’। यही उपनिषदों की ‘नेति-नेति’ (यह नहीं - यह नहीं) है।

‘न’ लेकिन तभी कह पाओगे, जब ‘हाँ’ कहने के लिए कुछ विराट मौजूद हो। नहीं तो ‘न’ कहना बड़ा मुश्किल हो जाएगा; मन पलटकर कहेगा, ‘अच्छा! मुझे तो ‘न’ बोल दिया, तो ‘हाँ’ किसको बोल रहे हो?’ और तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं है तो वो चढ़ बैठेगा।

इसी को आज मैं पहले मिनट से कह रहा हूँ; ‘व्यस्तता’। ‘हाँ’ में व्यस्त होना ज़रूरी है, तब ‘न’ कहना आसान हो जाता है। तब तुम कह देते हो, ‘कल आना।’, ‘न। अभी को न। कल आना।’

तो ‘न’ और ‘हाँ’ ये साथ-साथ चलने चाहिए। अगर ‘हाँ’ नहीं बोली है तुमने सच्चाई को तो झूठ को ‘न’ बोलना बहुत मुश्किल होगा। सच को ‘हाँ’, झूठ को ‘न’। थोड़ा बहुत आगे-पीछे हो सकते हैं कि पहले उसको ‘न’ बोली, फिर जब समय उपलब्ध हो गया, जगह उपलब्ध हो गयी तो कुछ ऐसा खोज लिया, जिसे ‘हाँ’ बोला जा सकता है या पहले कुछ मिल गया बहुत अच्छा, फिर उसको थोड़ा ‘न’ बोल दिया। पर ले-देकर मोटी-मोटी बात यही है कि ‘हाँ’ और ‘न’ चलेंगे साथ-साथ ही।

जिसने ‘न’ कहना सीख लिया है, उसको ‘हाँ’ वाली वस्तु भी मिल जाएगी और जिसने ‘हाँ’ कहना सीख लिया है, वो बेखौफ़, बेधड़क ‘न’ बोलने लग जाएगा। तो दोनों आएँगे।

इसीलिए कोई पूछे कि ज्ञान पहले या भक्ति पहले तो मैं बोलता हूँ, ‘साथ’। दोनों में कोई अन्तर ही नहीं है। भक्ति का अर्थ होता है, परमात्मा को ‘हाँ’ बोलना; ज्ञान का अर्थ होता है, संसार को ‘न’ बोलना। एक ही बात।

कभी कुछ आगे, कभी कुछ आगे। ले-देकर दोनों एक ही हैं; जैसे चलते हो तो कभी एक टाँग आगे, कभी दूसरी टाँग आगे, पर हैं तो साथ-साथ ही।

प्र३३: आचार्य जी, एक और बात जिद्दू कृष्णमूर्ति जी की जो दो प्रसिद्ध उक्तियाँ हैं, “ ऑब्ज़र्वर् इज़् द ऑब्ज़र्व्ड (दृष्टा दृश्य है)” और “ थिंकर् इज़् द थॉट् (विचारक विचार है)”। तो वो मतलब कभी देखने की काफ़ी कोशिश की लेकिन वो कभी समझ में ही नहीं आया कि ‘विचारक विचार है’ और ‘दृष्टा दृश्य है’; किस तरीक़े से? जुड़ी हुई परिघटना किस तरीक़े से?

आचार्य: कहाँ-कहाँ देखा? कैसे नहीं समझ में आया?

प्र३३: जैसे ईर्ष्या है, एक तरह का विचार ही है; तो दिखता है कि मुझे ईर्ष्या हुई; मैं और ईर्ष्या एक हैं, ऐसा नहीं प्रतीत होता।

आचार्य: जिस समय तुम सोच रहे होते हो, उस वक़्त तुम्हारी सोच के अलावा तुम्हें कुछ भी सच्चा लग रहा होता है क्या? नहीं न? कोई और सम्भावना छोड़ते ही नहीं न? नहीं छोड़ते न? तो पूरी तरह सोच ही तो बन जाते हो अपनी! यही वो कह रहे हैं। और “ऑब्ज़र्वर् इज़् द ऑब्ज़र्व्ड ” से तात्पर्य है कि अहम् पूरी दुनिया को अपने लिए एक भोग्य पदार्थ के रूप में देखता है; तुम अगर गिद्ध हो तो इस कुर्सी पर तुम्हारे लिए बस माँस बैठा है, तुम अगर एक कामुक स्त्री हो तो तुम्हारे लिए इस कुर्सी पर सिर्फ़ एक पुरुष बैठा है, तुम अगर चिकित्सक हो तो तुम्हारे लिए इस कुर्सी पर एक मरीज़ बैठा है, तुम अगर नाई हो तो यहाँ जो बैठा है, उसकी दाढ़ी बहुत बढ़ी है और बाल काटने लायक़ हैं। बात समझ में आ रही है?

तुम अगर अखाड़ा चलाते हो तो यहाँ जो बैठा है उसका वज़न ज़रा ज़्यादा है, इसको वर्जिश करायी जाए, इसका वज़न कम किया जाए। तुम जो-कुछ हो, उसी मुताबिक तुम देख लोगे कि यहाँ कुर्सी पर कौन बैठा है।

प्र३४: आचार्य जी, आपकी एक विडियो है, जिसमें मैं देख रहा था कि मैं कौन हूँ। तो उसमें आप कहते हैं कि तीन चरणों की प्रक्रिया है कि प्रथम चरण ही पर्याप्त तो है कि हर क्षण जानते रहो कि तुम अभी क्या बन गये हो, ‘तुम अभी कामना हो’, ‘तुम इस क्षण में लालची हो’; बस वही जानते रहना है हर क्षण। पर यह हर क्षण हो नहीं पाता है, मतलब बह जाते हैं। तो यह जानता भी कौन है?

आचार्य: तुम। जो भी कुछ करने लायक़ काम है, वो तुम करते हो; तुम जो अपनेआप को मानते हो, समझते हो। सत्य को कोई ज्ञान नहीं होता, सत्य ज्ञान से बिलकुल अछूता है; ज्ञान तुम्हें ही होता है, अज्ञान भी तुम्हें ही होता है, धारणा भी तुम्हें है, धारणा से मुक्ति भी तुम्हें है।

तुम कह रहे हो कि भूल जाया करते हैं बीच में बार-बार; जब भूल गये, उस वक़्त की बात करना ही व्यर्थ है, सारी सावधानी तुम कब ले सकते हो? जब तुम्हें याद है। एक आदमी सो गया, उसके बाद क्या उसको याद है कि उसे जगना है? अगर वो जगना चाहता है तो उसे सारी सावधानी कब रखनी है? जब वो जगा ही हुआ है।

तुम सो रहे हो और तुम्हें सुबह उठना है जल्दी, तो जगने की तैयारी भी तुम कब करोगे? सोने के बाद या जगी हुई अवस्था में? तो ये मत कहो कि हम भूल जाया करते हैं; हम सो जाया करते हैं। जब भूल जाते हो, सो जाते हो, तब की बात बेकार है। अब तो सो गये; अब क्या होगा? जब जगे हुए हो, तब कोई तरीक़ा तैयार कर लो, जो सोने से तुम्हें उठा दे।

बेहोशी के बाद होश का कोई नामलेवा ही नहीं बचता, होश में ही तुम्हें होश की कद्र है। तो जब होश में हो, तब ये बन्दोबस्त कर लो कि बेहोशी से भी बाहर आ सको।

प्र३५: आचार्य जी, तो फिर जैसे गुस्सा आए या कभी जलन आए तो फिर उसकी तैयारी पहले कैसे फिर करेंगे?

आचार्य: जब क्रोध नहीं है, उस समय अगर तुम सही जीवन जी रहे हो तो पहली बात तो क्रोध आने की सम्भावना कम रहेगी, दूसरी बात क्रोध आया भी तो तुम्हारे लिए उससे अछूते रहना सम्भव हो पाएगा।

एक बार क्रोध चढ़ ही गया तुम्हारे सिर पर, अब तुम क्या-क्या करोगी? अब तो पागल हो, अब तो खून सवार है। कुछ नहीं हो सकता।

जब क्रोधित नहीं हो, जब होश में हो, तब पूछो अपनेआप से कि ‘अभी सब ठीक है? कुछ और, और सुधार करूँ? थोड़ा और साफ़ जियूँ?’ उससे क्रोध का उफान भी ज़रा मद्धम रहेगा और जब क्रोध उठे तो तुम्हारे लिए क्रोध का दृष्टा बना रहना भी सम्भव हो पाएगा।

मैं इसको ऐसे कहा करता हूँ कि जब तुमको दिल का दौरा आ ही गया, तब तुम निकलोगे क्या जौगिंग (हल्की दौड़) करने कि चिकित्सक ने कहा था कि रोज़ ज़रा टहला करिए और थोड़ी जौगिंग किया करिए, इससे दिल बढ़िया रहता है? अब दिल का दौरा आया तो तुम निकले हो जौगिंग करने!

तो ये व्यर्थ बात है। जब दौरा नहीं आया है, तब कुछ तैयारी कर लो भई!

सच्चाई न देखनी पड़े इसीलिए हम दुनिया को वैसे देखते हैं, जैसा देखने में हम क़ायम रहें। अगर मेरी हस्ती है ही उलझनों की तो मैं चाहूँगा ही कि दुनिया उलझनों से भरी हुई रहे; अगर मैं मक्खी हूँ तो मैं चाहूँगा कि दुनिया गन्दी रहे।

दुनिया क्या है? दुनिया कुछ भी नहीं है, जो तुम हो, उसकी गूँज है दुनिया। समझाने वाले इसीलिए बोल गये हैं कि तुम्हारा प्रक्षेपण है दुनिया, प्रोजेक्शन् (प्रक्षेपण) है दुनिया।

जीव के लिए ही दुनिया है न? अन्यथा तो दुनिया है भी नहीं। कोई देखने वाला न हो तो बताओ दुनिया कहाँ है? इसीलिए दुनिया जैसी भी है, तुम्हारे लिए है, उसका कोई वस्तुगत, ऑब्जेक्टिव (वस्तुगत) एग्ज़िस्टेन्स (अस्तित्व) नहीं है।

श्रोता: जो डरा हुआ है, वो हर जगह डर देखेगा।

आचार्य: वो हर जगह डरने के तरीक़े खोज लेगा, वो हर जगह डर नहीं देखेगा। डर को एक विषय चाहिए न डरने के लिए? अगर डरे रहना तुम्हारी पहचान बन गयी है और तुमने इस पहचान के साथ साझा कर लिया है, इस पहचान को आदत बना लिया है तो तुम डरने के लिए विषय खोज ही लोगे। ‘वो देखो कितनी भयानक पेन्टिंग (चित्रकला) है! मुझे डरना है।’

‘कितनी भयानक बात बोली इसने! छुप जाओ कुर्सी के नीचे।’ जिसे डरना है, उसे वाक़ई ऐसा ही लगेगा कि सामने कुछ भयंकर हो रहा है। सामने कुछ भी नहीं हो रहा, सामने वही हो रहा है, जो तुम चाहते हो कि होए।

जिस चीज़ से तुम्हारा बिलकुल रस उठ गया हो, जिस चीज़ में तुम्हारा कोई स्वार्थ न बचा हो, वो चीज़ तुम्हें दिखाई देनी बन्द हो जाएगी। कह सकते हो कि वो घटना तुम्हारे लिए घटनी ही बन्द हो जाएगी।

जो चीज़ तुम्हारे लिए अब अर्थहीन हो गयी हो, वो चीज़ तुम्हारे सामने से विलुप्त हो जाएगी, तुम्हारे सामने रहेगी ही नहीं। तुम्हें दिखाई ही वही देता है, जो अभी तुम्हारे लिए अहमियत रखता है; जो चीज़ तुम्हारे लिए अहमियत नहीं रखती, वो तुम्हें दिखाई ही नहीं देगी। वास्तव में नहीं दिखाई देगी।

वो सुना है न? बुद्ध बैठे थे साधना में, उनके सामने से औरत भाग गयी, गुज़र गयी, कुछ आदमी उसका पीछा कर रहे थे, वो आए बुद्ध को रोककर पूछा, ‘अभी यहाँ से औरत निकली है, किधर को गई?’ बुद्ध बोले, ‘कोई गुज़रा तो ज़रूर था, आदमी था या औरत था, ये तो हमें दिखा ही नहीं।’ क्योंकि उन्होंने अब स्त्री देखनी छोड़ दी है तो उन्हें स्त्री दिखाई भी नहीं पड़ती।

जिस चीज़ में तुम्हारा रस नहीं रहा, वो चीज़ तुम्हारी दुनिया से ग़ायब हो जाएगी।

श्रोता: विपरीत भी होगा। वो उक्ति है, ‘जैसा आपका मन, वैसा आपका संसार’।

आचार्य: हाँ, बिलकुल! और जिस चीज़ में तुम्हारा रस है, उसको तुम पैदा कर लोगे। फिर तुम चाँद को भी देखोगे तो उसमें तुम्हें औरत दिखाई देगी। कहोगे, ‘महबूबा है मेरी’।

बुद्ध को तुम स्त्री भी दिखा रहे हो तो उन्हें दिखाई नहीं दे रही और शायर को तुम चाँद भी दिखा रहे हो तो कह रहा है, ‘औरत है’; लटक रही है ऊपर से, अभी गिरेगी, टपकी बस।

जो तुम चाहते हो, वो तुम निर्मित कर लेते हो और जो तुम नहीं चाहते, वो लुप्त हो जाता है।

YouTube Link: https://www.youtube.com/watch?v=WHRobtlRwZk

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