बहुत ज़रूरी है कि सनातन धर्म को रिक्लेम किया जाए। उसको वापस ऋषियों के पास पहुँचाया जाए। नहीं तो ये जो उल्टा-पुल्टा अर्थ चल गया है, आस्तिकता-नास्तिकता का। अभी तो चलिए, फिर भी मेरे जैसे कुछ हैं जो बता देंगे। काल की धार आगे बढ़ेगी, ये बताने वाला भी कोई नहीं रहेगा। आने वाली पीढ़ियों को यही लगेगा कि यही होती है आस्तिकता, कि जैसे पश्चिम में गॉड बिलीवर और गॉड फियरिंग होता है। इसी को आस्तिक बोलते हैं भारत में। वो यही मानने लग जाएँगे।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा सवाल आस्तिकता और नास्तिकता को लेकर है। तो आस्तिकता का मतलब समझा जाता है कि जो लोग मंदिर जाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं या किसी विशेष धर्म का पालन करते हैं, और नास्तिकता का मतलब कि जो बंदा कोई ईश्वर में विश्वास नहीं करता है। और सर, इसको लेकर सोशल मीडिया पर भी काफ़ी बहस चलती है कि जो नास्तिक लोग हैं, वो रैशनल होते हैं और साइंटिफ़िक होते हैं, और जो आस्तिक लोग हैं, वो अंधविश्वासी होते हैं।
तो सर, मैं आपसे ये समझना चाह रही थी कि ये सच्ची आस्तिकता और नास्तिकता क्या होती है।
आचार्य प्रशांत: ये तो मुद्दा पेचीदा है, पर आज मौसम अच्छा है। आज इसको ज़रा मज़ेदार तरीक़े से समझते हैं। ठीक है? चलो, कहानी है पूरी। कहानी सुननी है आस्तिकता की? ठीक है, कहानी से समझेंगे।
एक लड़का है, ठीक है, लड़की भी हो सकती है, पर लड़का ही बोले देते हैं। लड़का है एक। बहुत दिल से जीना चाहता है, बहुत जीवन है उसके भीतर, जोश भरा हुआ है, जगत के प्रति उत्कंठा भरी हुई है। जवान है, और एक जवान आदमी की पूरी ऊर्जा, पूरे जोश, सब जज़्बातों-भावनाओं के साथ वो बहुत कुछ करना चाहता है, जीना चाहता है। कुछ लोग आते हैं, उसको बताते हैं कि वो एक बहुत अच्छा काम कर रहे हैं समाज के लिए, वो उनके साथ चला जाता है। कहता है, मैं भी तुम्हारे साथ जुड़ना चाहता हूँ, वहाँ कोई संस्था है जो काम कर रही है। कुछ कहते हैं कि हम दुनिया बदल देंगे। कहता है, मैं भी तुम्हारे साथ जुड़ूँगा। वो वहाँ जाता है, दो-चार महीने रहता है, पता चलता है यहाँ तो मामला दूसरा है, धोखा चल रहा है। उसका दिल-सा टूट जाता है।



