
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा सवाल आस्तिकता और नास्तिकता को लेकर है। तो आस्तिकता का मतलब समझा जाता है कि जो लोग मंदिर जाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं या किसी विशेष धर्म का पालन करते हैं, और नास्तिकता का मतलब कि जो बंदा कोई ईश्वर में विश्वास नहीं करता है। और सर, इसको लेकर सोशल मीडिया पर भी काफ़ी बहस चलती है कि जो नास्तिक लोग हैं, वो रैशनल होते हैं और साइंटिफ़िक होते हैं, और जो आस्तिक लोग हैं, वो अंधविश्वासी होते हैं।
तो सर, मैं आपसे ये समझना चाह रही थी कि ये सच्ची आस्तिकता और नास्तिकता क्या होती है।
आचार्य प्रशांत: ये तो मुद्दा पेचीदा है, पर आज मौसम अच्छा है। आज इसको ज़रा मज़ेदार तरीक़े से समझते हैं। ठीक है? चलो, कहानी है पूरी। कहानी सुननी है आस्तिकता की? ठीक है, कहानी से समझेंगे।
एक लड़का है, ठीक है, लड़की भी हो सकती है, पर लड़का ही बोले देते हैं। लड़का है एक। बहुत दिल से जीना चाहता है, बहुत जीवन है उसके भीतर, जोश भरा हुआ है, जगत के प्रति उत्कंठा भरी हुई है। जवान है, और एक जवान आदमी की पूरी ऊर्जा, पूरे जोश, सब जज़्बातों-भावनाओं के साथ वो बहुत कुछ करना चाहता है, जीना चाहता है। कुछ लोग आते हैं, उसको बताते हैं कि वो एक बहुत अच्छा काम कर रहे हैं समाज के लिए, वो उनके साथ चला जाता है। कहता है, मैं भी तुम्हारे साथ जुड़ना चाहता हूँ, वहाँ कोई संस्था है जो काम कर रही है। कुछ कहते हैं कि हम दुनिया बदल देंगे। कहता है, मैं भी तुम्हारे साथ जुड़ूँगा। वो वहाँ जाता है, दो-चार महीने रहता है, पता चलता है यहाँ तो मामला दूसरा है, धोखा चल रहा है। उसका दिल-सा टूट जाता है।
वो वापस आता है वो कहीं पढ़ने जाता है, जहाँ पढ़ने जाता है, वहाँ उसको बताया जाता है, ये विद्यालय है, ठीक? यहाँ पर तुम्हें विद्या मिलेगी। और वहाँ जाता है देखता है कि अरे, विद्या तो कुछ नहीं मिल रही है; यहाँ तो बस समाज में कैसे समायोजित हो जाना है और रोटी-कपड़ा कैसे बनाना है, इसका प्रशिक्षण मिल रहा है। फिर से उसका दिल टूट जाता है, बुरा लगता है।
वो जाता है, वो ज्ञानियों की संगति में बैठने लगता है। बोलता है, आप बताइए, आप क्या-क्या मुझे दे सकते हैं। वो जो कुछ भी दे सकते हैं, वो उनसे प्रति-प्रश्न करता है। और जब प्रति-प्रश्न करता है तो कईयों के पास उत्तर नहीं होते, और कई तो ऐसे होते हैं जो नाराज़ ही हो जाते हैं। भीतर की दरार और गहरी हो जाती है उसके। आ रही है बात समझ में?
वो अपने कुल-कुटुंब, रिश्तेदारों पर नज़र डालता है, वो पाता है कि सब रिश्ते स्वार्थ के हैं। वो पाता है कि बचपन में उसको बताया गया था, ये तुम्हारे मामा हैं, ये प्यार करते हैं; वो चाची तुमसे प्यार करती हैं; वो ताऊ हैं; ये-ये हैं, ये दादी हैं; वो बाबा हैं, और ऐसा है-वैसा है और ये सब बहुत प्यार करते हैं, प्यार करते हैं, प्यार करते हैं। और वो बड़ा हो गया है, अपनी दृष्टि से देख पा रहा है कि प्यार तो है नहीं, यहाँ तो स्वार्थ की डोर है। सब बँधे हुए हैं उससे, और वो खींचती रहती है डोर। कठपुतलियाँ नाचती रहती हैं।
फिर उसके जीवन में एक लड़की आती है और उसको लगता है रोशनी आ गई। शुरू के कुछ महीने ऐसे जैसे कि निस्वार्थ प्रेम मिल गया हो, फूल खिल गए हों बिल्कुल, खुशबू ही खुशबू। वो बैठा हुआ है उसके साथ, बहुत समय तक बात कर रहा है, ऐसा है, वैसा है। जैसे वो उसके साथ बैठकर आत्मीयता से, गंभीरता से बातें करता था, वैसे ही एक दिन वो किसी दूसरी लड़की के साथ कुछ बात करना शुरू कर देता है, बहुत गहरी बात भी नहीं, ऐसे ही। वो देख लिया जाता है और आज उसे उस लड़की का कोई दूसरा ही रूप देखने को मिलता है।
वो फिर से झन्ना जाता है। एक ढाँचा आकार लेने लगा था भीतर, वो ढाँचा चरमराने लग जाता है। इसके भीतर एक सवाल उठता है, “क्या कुछ है भरोसे लायक? क्या ज़िंदगी जीने लायक है?” पर इसको लगता है, नहीं है, शायद। ये अपना घर-द्वार छोड़कर दूर निकल जाता है, क्योंकि जिस तरफ़ देख रहा होता है, उसको छल ही छल, भ्रम ही भ्रम, यही दिख रहे होते हैं, दूर निकल जाता है। और सिर्फ़ एक सवाल अपने साथ ले जाता है सब छोड़ देता है, न रुपया ले जाता है, न पैसा ले जाता है अपने साथ, वो यादें भी नहीं ले जाना चाहता अपने साथ।
एक सवाल ले जाता है अपने साथ — “क्या कुछ है? ये जैसा सब दिखाई पड़ता है आधा-अधूरा, खंडित, टूटा हुआ, भ्रामक, क्या इसके आगे भी कुछ है जिस पर भरोसा किया जा सके, या बस यही-यही है सब, कीचड़, गंदगी, फैलाव? क्या कुछ है?” यही प्रश्न बनता है आस्तिकता का प्रश्न। अस्ति माने ‘है।’ यहाँ से खोज शुरू होती है आस्तिकता की, कि यही सब कुछ है, जैसे ये दुनिया दिखाई देती है? बौनों का समाज, धोखों से भरा जीवन, दुख, कष्ट, रोग, पीड़ा, बेहोशी में जन्म, बेहोशी में मृत्यु, यही सब कुछ है, या इसके आगे भी कुछ है?
अगर कुछ है, उसने कहा, तो मैं कहूँगा कि जीवन जीने लायक है। मूल बात है, ‘है’ अस्ति। तो मैं कहूँगा, अस्ति, हाँ, जीवन जीने लायक है। नहीं तो मैं जियूँ क्यों? आस्तिकता का प्रश्न कोई बाहर की किसी वस्तु या विषय या छवि को लेकर नहीं है। आस्तिकता का प्रश्न मूलतः ये है कि जीवन जीने लायक भी है क्या? या यही सब कुछ जो हमें दिन-रात प्रतीत होता है, यही दृश्य, यही अनुभूतियाँ, यही जगत, यही प्रपंच, यही सब कुछ है? तो यहाँ से फिर दार्शनिक आधार पर आस्तिकता की बात शुरू होती है। आस्तिकता यहाँ से शुरू होती है, बड़ी उसकी शुद्ध शुरुआत है।
आस्तिकता का प्रश्न अस्तित्ववादी प्रश्न है, ऑनटोलॉजिकल प्रश्न है, एक दार्शनिक प्रश्न है। तो आस्तिक इस अर्थ में वो हुआ जिसने कहा, कि “नहीं, ये जो दिखाई दे रहा है, इसके आगे भी कुछ है,” वो आस्तिक है। ये जो दिखाई दे रहा है, ये जो मैं सोचता रहता हूँ, ये जो मेरी भावनाएँ हैं, मेरे विचार हैं, मेरी कल्पनाएँ हैं, मेरी छवियाँ हैं, इनके आगे भी कुछ है। क्योंकि ये जो जवान लड़का था, इसने इस स्थूल जगत को भी धोखेबाज़ पाया था और विचारों और भावनाओं का भी छल उसने देखा था। वो इनका, किसी का, भरोसा करने को तैयार नहीं। न तो वो इंद्रियों का भरोसा करने को तैयार है, न मन की कल्पनाओं का भरोसा करने को तैयार है, उसके सामने सब खंडित होकर चूरा-चूरा टूटे पड़े हैं। उसे नहीं भरोसा करना।
वो पूछ रहा है, “क्या इंद्रियों और मन से आगे कुछ है? अगर है तो मैं कहूँगा, अस्ति ‘है।’” ये आस्तिक हुआ। ये शुद्धतम परिभाषा है आस्तिकता की। ये वेदांत, उपनिषदों की परिभाषा है आस्तिकता की। जो कहे कि इंद्रियों और मन से अतीत कुछ है, जिसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता; जो अज्ञेय है, जो अनिर्वचनीय है, जो निर्गुण है, निराकार है; जिस तक न कान जा सकते, न आँखें जा सकती, न शब्द जा सकते, न कल्पना जा सकती, न जिसका कोई रूप हो सकता, न छवि हो सकती, न जिसका संबंध संसार की किसी वस्तु, किसी स्थान से लगाया जा सकता। यदि ऐसा कुछ है तो आस्तिकता।
अस्ति शब्द ट्रांसेंडेंस के लिए प्रयोग में आता है: मनातीत सत्य, शब्दातीत सत्य, इंद्रियातीत सत्य। समझ में आ रही है बात? तो शुरुआत यहाँ से होती है, आधार दार्शनिक है, कि इसी में सड़ के मर जाना है, यही सब जो कीचड़ दिखाई दे रही है वस्तुओं की, विचारों की, भावनाओं की, संबंधों की — इसी में सड़ के मर जाना है या कुछ और भी है? जिसने कह दिया है, वो आस्तिक। लेकिन जो आगे है, वो ऐसा होना चाहिए कि जिस तक ज़बान न पहुँच पाए, आँख न पहुँच पाए, मन न पहुँच पाए, चित्त न पहुँच पाए, कुछ न पहुँच पाए। जिसने उस बियॉन्डनेस को, उस ट्रांसेंडेंस को नमन कर लिया, मात्र वही आस्तिक है। समझ में आ रही है बात?
नास्तिक कौन है? जिसने कह दिया, नहीं साहब, यही सब जो है न, यही है। या नहीं कुछ है इसके आगे भी, वो क्या है? जिसका मैं किस्सा बना सकता हूँ, जिसकी मैं कहानी बना सकता हूँ, तो वो भी नास्तिक हो गया।
जो कह रहा है कि इंद्रियों से, विचारों से, भावनाओं से, कल्पनाओं से आगे और कुछ नहीं है, उसको बोलते हैं नास्तिक।
समझ में आ रही है बात? कहानी यहाँ से शुरू होती है।
अब समय बदला। ये बात है वेदांत की और वेदांत अपने आप में कोई अलग इकाई नहीं, वेदांत माने वेदों का शिखर। वेदांत माने वेदों का आख़िरी और उच्चतम हिस्सा, जहाँ आकर वेद भी समाप्त हो जाते हैं। वेदों की निष्पत्ति को कहते हैं, वेदांत।
तो मैंने कहा, अब समय बदला, बात आगे बढ़ी। तो ये जो बात थी वेदांत की, चूँकि वेदांत वेद का हिस्सा है तो ये बात वेद की मान ली गई कि ये वेदों की बात है। आस्तिकता वेदों की बात है। तो अब ये कहा जाने लगा कि जितने भी दर्शन, बहुत सारे दर्शन आए, वेद आए और वेदों के बाद फिर बहुत सारे दर्शन आते हैं, बहुत सारे दर्शन। उन कुछ दर्शनों का भी हम नाम लेंगे, समझाएँगे आपको। तो भी बहुत सारे दर्शन आ गए।
तो अब ये कहा जाने लगा कि जो-जो दर्शन वेदों की सत्ता में, अथॉरिटी में, विश्वास रखते हैं, उनको हम आस्तिक बोल देंगे। ठीक है? तो अब बात दार्शनिक और अस्तित्ववादी, ऑनटोलॉजिकल अपने आधार से थोड़ा नीचे गिर गई। क्योंकि समय बदला है न, तो विकृति आ गई, थोड़ा डिस्टॉर्शन आ गया तो नीचे गिर गई। अब बात दर्शन से गिर करके ग्रंथ के स्तर पर आ गई है। कह रही है कि जो आकर के बोल देगा कि वेदों को मानते हैं, वो आस्तिक हो गया। जो आकर बोल देगा, वो वेदों को मानते हैं वो आस्तिक हो गया।
तो जिन्होंने भी कह दिया कि हम वेदों को मानते हैं, वो सब आस्तिक हो गए, भले ही वो ईश्वर आदि को न मानते हों या ईश्वर को लेकर मौन हों, वो सब आस्तिक हो गए।
तो हमारा षट्दर्शन है। आप जानते ही हैं — छ: दर्शन हैं, प्रमुख दर्शन। वो सब के सब क्या माने जाते हैं? वो आस्तिक दर्शन हैं। जबकि उनमें से कई ऐसे हैं जो ईश्वर को लेकर या तो मौन हैं या ईश्वर को नकार ही देते हैं। आप मीमांसा को ले लीजिए या सांख्य को ले लीजिए, वहाँ ईश्वर के लिए स्थान ही नहीं है। लेकिन वो भी आस्तिक दर्शन गिने जाते हैं, क्योंकि वो वेदों को मानते हैं। वेदों को किस अर्थ से मानते हैं? कि वेदान्त ने कहा है, कि जीवन मुक्ति के लिए है। जीवन मुक्ति के लिए है, इस बात को सांख्य भी मानता है, इस बात को योग भी मानता है, इस बात को न्याय-वैशेषिक भी मानते हैं। तो इसलिए ये सब आस्तिक दर्शन माने जाते हैं।
वो वेदों को किसी और अर्थ में नहीं मानते ये दर्शन, सिर्फ़ एक अर्थ में मानते हैं, कि वेदान्त का लक्ष्य क्या है? वेदान्त का लक्ष्य माने वेद का लक्ष्य। वेदान्त वेद ही है, तो वेदान्त का जो लक्ष्य है वो वेद का लक्ष्य है। वेदान्त का लक्ष्य क्या है? मुक्ति। और सांख्य का भी क्या लक्ष्य है? मुक्ति। कि पुरुष है, प्रकृति है, इनका द्वैतवादी जोड़ा है, तो पुरुष कैसे मुक्त हो पाए? यही बात योग में है, यही बात आगे मीमांसा और बाक़ी दर्शनों में है। तो इस अर्थ में ये सब आस्तिक हो गए। और मीमांसा तो सीधे-सीधे कहता है कि वेद ही परम सत्य है, तो ये आस्तिक है। समझ में आ रही है बात?
तो वेद को मानने का भी आशय यही है कि आप मुक्ति को मान रहे हो। लेकिन भाई, अब समय बदल चुका है। तीन ऐसे दर्शन आए जो कह रहे हैं, हम वेद को नहीं मानते। इसका अर्थ ये नहीं है कि वो मुक्ति को नहीं मानते थे; वो वेद को नहीं मानते थे। वो तीन कौन-से दर्शन हैं जो बहुत प्रसिद्ध हैं? बौद्ध, जैन और लोकायत दर्शन, जिसको चार्वाक दर्शन कहते हैं। ठीक है?
इनमें से बौद्ध दर्शन और जैन दर्शन तो ख़ासकर मुक्ति की बात करते हैं, वो दर्शनों का लक्ष्य ही यही है, मुक्ति, निर्वाण वहाँ पर बौद्ध धर्म में। लेकिन वो वेदों को नहीं मानते। वो कहते हैं कि वेद को हम नहीं मानते, मुक्ति को मानते हैं। क्योंकि वो वेद को नहीं मानते तो उनको कह दिया गया कि ये नास्तिक दर्शन हैं। समझ में आ रही है बात कुछ?
एक काम करो, टेबल बनाओ। रो में लिखो, उनमें पहली हेडिंग दो – “अद्वैत,” उसके नीचे दो – “बौद्ध दर्शन।” ये रो हेडिंग्स हैं। उसके नीचे और जगह छोड़ के लिखो – “द्वैत।” अद्वैत के साथ लिख दो – “ज्ञान, अद्वैत (ज्ञान)।” द्वैत में लिख दो – “भक्ति, द्वैत (भक्ति)।” और सबसे नीचे लिख दो, मज़े के लिए – “चार्वाक” लिख दो। ठीक है?
तीन कॉलम बनाओ, देखिए सब लोग सबसे पहले लिखेंगे – “दार्शनिक अस्तित्वगत आधार।” कहानी यहाँ से शुरू हो रही है। तीन कॉलम आपने बनाए हैं। ठीक है? तीन कॉलम हैं, एक, दो, तीन। तो अपने पेज को तीन हिस्सों में बाँट लीजिए और ऐसे तीन कॉलम बना लीजिए। तीन कॉलम और ये चार रो। हम चार में नीचे भी कुछ और जोड़ सकते हैं चाहे तो, पर अभी मैंने यहाँ पर ये चार दर्शन लिए हैं, कुछ और दर्शनों की भी अगर समय रहा तो कर लेंगे बात।
तो पहले कॉलम की हेडिंग है – “दार्शनिक अस्तित्वगत आधार,” जहाँ से हमारी कहानी की शुरुआत हो रही है। ठीक है? फिर उसके बाद समय बीतता है तो कौन-सा आधार आ जाता है? “शास्त्रीय आधार (वेद सत्ता)।” फिर उसके बाद लिखिए, आख़िरी कॉलम – “वर्तमान लोकधार्मिक आधार।” और इस पूरे पेज के ऊपर की हेडिंग दे दीजिए – “कहानी आस्तिकता की।* सबसे ऊपर क्या लिखना है? “कहानी आस्तिकता की,” और उसके नीचे ये आपने टेबल बनाया है। ठीक है?
पहला था – “दार्शनिक अस्तित्वगत आधार,” जहाँ से कहानी शुरू हो रही है। फिर आता है वहाँ से थोड़ा सा बदल कर समय से – “शास्त्रीय आधार,” जिसमें कहा गया कि आस्तिक वो है जो वेद सत्ता को मानता है। और फिर आगे बात और भी ज़्यादा बिगड़ गई, संकुचित हो गई, संकीर्ण हो गई और वो हो गया – “वर्तमान लोकधार्मिक आधार,” जिसमें आस्तिक वो माना जाता है जो ईश्वर में विश्वास करता है। वही जो आपने शुरुआत करी थी कि जो ईश्वर में विश्वास करे उसको आस्तिक बोलते हैं। ये वर्तमान लोकधार्मिक आधार है आस्तिकता का कि हम आस्तिक उसको मानेंगे जो ईश्वर में विश्वास करे।
तो जब शुरुआत हुई कहानी की, जब दार्शनिक आधार पर तय होता था कि कौन आस्तिक है और कौन नहीं, जब दार्शनिक आधार पर तय, तो तब अस्ति माने क्या था? जब दार्शनिक आधार पर ऋषियों ने पहले चिंतन किया तो उन्होंने अस्ति का अर्थ क्या कहा? कि जो बियॉन्ड में बात करे, जो अतीत को नमन करे, जो कहे कि परम सत्य के बारे में न सोचा जा सकता है, न उसकी कोई छवि होती है, न उसकी कोई कहानी होती है, न उसका कोई रूप होता है, न रंग होता है, न कर्म होता है, न क्रिया होती है, न अतीत होता है, न भविष्य होता है, न पसंद होती है, न नापसंद, सिर्फ़ वो आस्तिक है।
तो जब बात शुरू हुई थी, अगर हम उसी आधार पर देखें तो आपकी पहली चीज़ है – “अद्वैत वेदान्त।” तो दार्शनिक आधार पर जो अद्वैत दर्शन है, जिसको ज्ञान मार्ग कहेंगे आप, वो कौन-सा मार्ग हुआ? आस्तिकता का। तो वहाँ लिख लीजिए जो पहली सेल है – “आस्तिकता।”
अगर पूर्णतया दार्शनिक आधार पर देखा जाए तो जो “बौद्ध दर्शन” है, वो भी क्या हुआ? वो भी आस्तिक दर्शन हुआ, क्योंकि बुद्ध और विशेषकर जो माध्यमिक शून्यता है, वो तो इस पूरे जगत को ही कह देती है, कि क्या है? ये शून्य है और इससे मुक्त होना ही दुख से मुक्ति का मार्ग है। तो वहाँ भी कहा जा रहा है कि ये सब जो है ये छल-प्रपंच है, जो दिखाई दे रहा है ये नकली है। वास्तविकता क्या है? उसके बारे में हम कुछ कह नहीं सकते। तो फिर बौद्ध मत भी आस्तिक है, क्योंकि वो भी ये जोड़ा है दृश्य और दृष्टा का, इसको प्रपंच मानता है, छल मानता है, धोखा मानता है। समझ में आ रही है बात? इसको क्या कहते हैं बौद्धिज़्म में? इसको कहते हैं, डिपेंडेंट को-ओरिजिनेशन। उसके लिए क्या शब्द है?
श्रोता: प्रतीत्यसमुत्पाद।
आचार्य प्रशांत: हाँ, प्रतीत्यसमुत्पाद, मैं उस पर निर्भर हूँ, वो मुझ पर निर्भर है और दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। पर हम दोनों का ही कोई निजी, ठोस, स्वतंत्र आधार नहीं है। तो वो भी नहीं है, मैं भी नहीं हूँ, वॉइड है। तो इस तरह से देखो तो जो बौद्ध दर्शन है, वो भी दार्शनिक आधार पर आस्तिक दर्शन है।
फिर आओ जो “द्वैत भक्ति” है। अब यहाँ मामला गड़बड़ हो जाता है, कुछ कह नहीं सकते, कहानी रोचक हो जाती है, क्योंकि यहाँ पर कहा जा रहा है कि कोई अतीत सत्य नहीं है। अब द्वैत से आशय कई तरह के द्वैत दर्शन हैं। द्वैत दर्शन में ‘माध्वाचार्य का द्वैत’ तो है ही, उसमें फिर ‘बिशिष्टाद्वैत’ भी है, ‘द्वैताद्वैत’ भी है, और ‘अचिन्त्य भेदाभेद’ भी है। ये सब द्वैत दर्शन ही हैं और यही पूरा जो है, कुल मिलाकर इसको भक्ति वेदान्त कहा जाता है। जितने द्वैत अर्थ निकाले गए वेदान्त के, उन सब को मिलाकर के भक्ति वेदान्त बोलते हैं। वो सब द्वैतवादी ही हैं, आपस में उनमें थोड़े-थोड़े फ़र्क़ हैं।
तो जो “द्वैत भक्ति” है, वहाँ मामला अब थोड़ा सा रोचक हो जाता है। पता नहीं उसको आस्तिक बोलें कि नास्तिक बोलें, क्योंकि वहाँ किसी ईश्वर में विश्वास है और उस ईश्वर को भी गुण और रूप और रंग देकर के बात होती है, और तीन सत्ताएँ मानी जाती हैं, ईश्वर की, जगत की और जीव की। और जीव के लिए कोई मुक्ति नहीं है, जीव को लगातार क्या करना है द्वैत में? जीव के लिए तो मुक्ति यही है कि वो ईश्वर की सेवा करता रहे। समझ में आ रही है बात?
अब ये सारी बातें तो मनातीत नहीं हैं न, आर दे बियॉन्ड माइंड? नहीं। ये सारी बातें शब्दातीत भी नहीं हैं। यहाँ कुछ भी ट्रांससेंडेन्टल तो है ही नहीं। इसमें बियॉन्डनेस तो है ही नहीं, तो बड़ा मुश्किल है कि द्वैत भक्ति को आस्तिक बोलें कि नास्तिक बोलें। तो मैं आप पर छोड़ता हूँ, आप जानो, तो मैं अभी यहाँ पर लिख दूँगा – आस्तिक/नास्तिक?
दार्शनिक आधार पर अब “चार्वाक” है वो तो बिल्कुल मज़ेदार नास्तिक है। वो तो इस पूरी चर्चा पर हँसेंगे ज़ोर से, कहेंगे कुछ नहीं है, कहाँ बात कर रहे हो बियॉन्ड ट्रांससेंडेन्टल! कुछ न बियॉन्ड है, न कुछ ट्रांससेंडेन्टल है, जो है यही है मौज करो। लेकिन सतही बात नहीं है उनकी, बहुत गहरी बात है। लेकिन हमारी चर्चा के उद्देश्य से इतना कहना काफ़ी है कि वो इसके बियॉन्ड जो सेंसुअल वर्ल्ड है, जो इन्द्रियों के अनुभव में आने वाला जगत है, इसके आगे वो कुछ मानते नहीं थे। तो जब दार्शनिक आधार की बात होगी, तो नास्तिक हो गए सीधे-सीधे।
लेकिन हमने कहा, हवा चली, ज़माने बदले, कालान्तर में आस्तिकता का अर्थ हो गया कि जो वेदों को माने, वो आस्तिक है। तो छ: दर्शन हैं, वो सब के सब वेद को मानते थे। वो इस अर्थ में वेद को मानते थे कि वो मुक्ति की बात करते हैं, और वेद में वेदान्त है, वेदान्त भी मुक्ति की बात करता है, तो माने वेद मुक्ति की बात करते हैं। सब जो हैं। तो इस आधार पर देखो तो अद्वैत, जो ज्ञान मार्ग है, वो क्या हुआ? आस्तिक। क्योंकि भाई, वो तो मानता ही है वेदों को, तो वो आस्तिक हो गया।
अब बौद्ध दर्शन जो वास्तव में अगर तुम देखो, दार्शनिक तल पर, ऑन्टोलॉजिकल तल पर अगर देखो, तो बौद्ध दर्शन सचमुच आस्तिक दर्शन है। जब वेद सत्ता को मानने को शर्त बना दिया गया, तो बौद्ध दर्शन फिर कहला गया नास्तिक दर्शन। और जो द्वैत वेदान्त है, भक्ति वेदान्त है, वो तो आस्तिक ही है, निश्चित रूप से, क्योंकि वेदों की सत्ता को स्वीकार करता है। और चार्वाक तो वेद मानने से रहे, ये बढ़िया लोग हैं, इनके साथ कोई चर्चा ही नहीं है। ये सिरे से नास्तिक हैं।
अब समय और आगे बढ़ा, और आगे बढ़ा, और जो बात दर्शन से शुरू हुई थी और वेद सत्ता को मानने तक पहुँची थी, वो अब लोकधर्म बन गई। और लोकधर्म बनकर अब आस्तिकता का मतलब क्या हो गया? थीज़्म। क्यों हो गया? क्योंकि भारत पर विदेशी प्रभाव छा गया। और जो अब्राहमिक धर्म हैं, वहाँ थीज़्म चलता है। थीज़्म माने – गॉड को मानते हो कि नहीं मानते हो? वहाँ पर धारणा ये थी कि तुम थीस्ट हो कि एथिस्ट हो। थीस्ट वो है जो भगवान को मानता है। एथिस्ट कौन है? जो नहीं मानता है।
तो भारत में भी आस्तिक-नास्तिक का अर्थ बिल्कुल विकृत हो गया, क्योंकि भारत तो अब उनके अधीन आ गया था। जबकि आस्तिकता का भगवान और ईश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। सांख्य-योग आस्तिक दर्शन है न, उसमें कहीं कोई भगवान ईश्वर नहीं है पर वो आस्तिक दर्शन है। मूल रूप से आस्तिकता का जो रूप आज आप देख रहे हो, कि जो भगवान जी को मानता है उसको आस्तिक बोल देते हो, ये बात ही ग़लत है। ये बात ही बहुत विकृत है, और ये विकृत कैसे हुई? ये विकृत हुई अब्राहमिक धर्मों के प्रभाव में।
देखिए,
थीज़्म का मतलब होता है ईश्वर में विश्वास। आस्तिकता का मतलब होता है सत्य को नमन।
दोनों में बहुत अंतर है। दो शब्द हैं, बहुत अलग-अलग। ईश्वर और सत्य अलग बात है, और विश्वास और बोध अलग-अलग बात है। थीस्ट पश्चिम में, थीस्ट वो है जो गॉड बिलीवर हो। और भारत में आस्तिक वो है जो सत्य के प्रति जिज्ञासा रखता हो, बोध की उत्कंठा रखता हो, मुमुक्षु हो। वो होता है आस्तिक। तो एथिस्ट को नास्तिक नहीं बोला जा सकता है। एथिज़्म बिल्कुल अलग चीज़ है। आप कन्फ्यूज़ हो रहे हैं, आप उसको नास्तिकता से जोड़ कर के थीइज़्म और एथीइज़्म, इनके केंद्र में क्या बैठा है? गॉड। लेकिन आस्तिकता और नास्तिकता, इनके केंद्र में क्या बैठा है? ट्रुथ, द ट्रुथ बियॉन्ड सेंसज़ ऐंड मेंटेशन।
अगर गॉड को मानो तो क्या कहलाओगे? थीस्ट। और गॉड को नहीं मानोगे तो क्या कहलाओगे? एथीस्ट। ये पश्चिमी अवधारणा है। ये बात इस्लाम में चलती है, यहूदी धर्म में चलती है और ईसाइयत में चलती है। लेकिन वो लोग जब भारत पर चढ़ बैठे तो ये बात भारत ने भी मान ली और ये भारत के लोकधर्म में घुस गई बात। अब जितने लोकधर्मी हैं वो इस बात को मान रहे हैं जैसे यही असली बात हो।
तो थीइज़्म और एथीइज़्म के केंद्र में बैठा हुआ है गॉड। लेकिन आस्तिकता और नास्तिकता के केंद्र में गॉड का कोई लेना-देना नहीं है। आस्तिकता और नास्तिकता के केंद्र में सत्य है। जो कहे कि इस जगत के पार एक अज्ञेय सत्य है, जहाँ जाकर मेरी वाणी मूक हो जाती है, वो आस्तिक है। जिसके बारे में कुछ बोलना गुस्ताख़ी हो जाती है, ऐसा अनिर्वचनीय सत्य है, वो आस्तिक है। ‘है’ – अस्ति।
और जो कहे, “नहीं, नहीं, नहीं, सत्य यही है; ये सब जो दिखाई दे रहा है, ये जगत सत्य है, मैं सत्य हूँ, जीव सत्य है, जगत सत्य है, और मैंने कल्पना कर ली है तमाम तरह के लोकों की और ये और वो, वो सब भी सत्य है।” वो नास्तिक है। ये मूल बात है, ये मूल सिद्धांत है।
तो थीइज़्म, एथीइज़्म और आस्तिकता-नास्तिकता बिल्कुल अलग बातें हैं। इन्हें आपस में बिल्कुल नहीं जोड़ा जाना चाहिए, इनमें कोई रिश्ता ही नहीं है आपस में। लेकिन वो जो थीइज़्म, एथीइज़्म की चीज़ थी, वो भारत पर भी फिर हावी हो गई कालांतर में।
तो अगर आप ये देखोगे, जो वर्तमान चल रहा है विकृत लोकधर्म चल रहा है, उसमें तो यही है कि जो गॉड को मानता है वो आस्तिक है। अगर उस तरीक़े से देखोगे तो मामला गड़बड़ा जाता है, कहानी ज़बरदस्त मोड़ ले रही है। अब जो ज्ञान-मार्ग है, अद्वैत मार्ग है, वहाँ कहना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि वो आस्तिकता का है कि नास्तिकता का। क्योंकि अब आस्तिकता-नास्तिकता की परिभाषा क्या हो गई है? ईश्वर को मानना।
लेकिन जो वेदान्त का तत्व है, जो असली बात है अद्वैत, वहाँ तो ये है कि ईश्वर भी पारमार्थिक नहीं है, व्यवहारिक तल पर तुमको ईश्वर को मानना हो, उससे तुम्हें कुछ लाभ होता हो तो तुम मान लो; वरना तो सही बात तो ये है कि ब्रह्म के ऊपर जब माया आरोपित हो जाती है तो उसको ईश्वर बोलते हैं। तो ईश्वर माया ही है। माने अहंकार जब ब्रह्म को नहीं समझ पाता तो ईश्वर-ईश्वर करने लग जाता है।
तो अद्वैत वेदांत में सच पूछो तो पारमार्थिक तल पर ईश्वर के लिए कोई स्थान ही नहीं है। हाँ, व्यवहारिक तल पर है, कि ईश्वर से तुम्हें लाभ होता हो तो तुम ईश्वर को मान सकते हो, मना भी नहीं करा जा रहा। तो अब बड़ा मुश्किल हो जाता है कि अगर अब आस्तिकता का अर्थ है ईश्वर को मानना, तो जो ज्ञान-मार्गी है, जो अद्वैती है, उसको आस्तिक कहें कि नास्तिक कहें, बड़ा मुश्किल है। क्योंकि परिभाषा ही इतनी गंदी कर दी है कि इस परिभाषा पर जो असली आस्तिक है वो अब नास्तिक हो जाएगा।
तुमने परिभाषा ये कर दी है कि अगर आप गॉड को मानते हो तो आप आस्तिक हो। और अद्वैत में जो वेदान्त का केंद्र है, जो वेदान्त की एसेंस है — अद्वैत — उसमें गॉड के लिए कोई बहुत जगह नहीं है। उसमें ट्रुथ के लिए जगह है, वहाँ सत्य की बात होती है, गॉड-गॉड थोड़ी करता है अद्वैत।
तो अब यहाँ पर मैं आपके लिए लिख देता हूँ – आस्तिक/नास्तिक। अगर पैमाना ये है, अगर कसौटी ये है कि तुम्हें गॉड को मानना पड़ेगा तो आस्तिक कहलाओगे, तो भाई अद्वैत का पता नहीं मुझे कि अब मैं उनको आस्तिक बोलूँ कि नास्तिक बोलूँ, वो बिल्कुल एकदम बात बीचों-बीच आकर खड़ी हो जाती है। परमार्थिक तल पर जाओगे तो वहाँ पर तो फिर कोई जगह नहीं है किसी बाहरी रचयिता ईश्वर के लिए। हाँ, व्यवहारिक तल पर ठीक है, तुम्हें मानना है, मान लो। तो मैं इसीलिए कह रहा हूँ कि मामला अब बिल्कुल बॉर्डर का हो गया।
फिर आते हैं बौद्ध दर्शन। तो बौद्ध दर्शन में तो कोई क्रिएटर गॉड है ही नहीं, तो वो तो पूरा ही नास्तिक हो गया, सब नास्तिक हो गए। जो वर्तमान परिभाषा बन गई है जो बाहरी प्रभावों के कारण, इस्लाम का प्रभाव, ईसाइयत का प्रभाव। ये सब थिस्टिक रिलिज़न्स हैं।, यहाँ पर गॉड इज़ ऐट द सेंटर ऑफ़ रिलिज़न। जो इंडिक रिलिज़न्स हैं न बेटा, उसमें गॉड इज़ नॉट ऐट द सेंटर ऑफ़ रिलिज़न। ट्रुथ इज़ ऐट द सेंटर ऑफ़ रिलिज़न। और अद्वैत शिखर इसीलिए है वेदान्त का क्योंकि वो कहता है कि गॉड से आगे है ट्रुथ। सत्य ईश्वर से आगे की बात है।
हाँ, जो द्वैत-भक्ति है, वो अब पूरे तरीक़े से आस्तिक होगी क्योंकि वहाँ तो ईश्वरवाद पूरे तरीक़े से है, तो वहाँ पूरी आस्तिकता है। बल्कि उनको ही आस्तिक माना जाएगा। आज के समय में जो भक्त है आप उसको ही आस्तिक मानते हो। उसके अलावा तो सब नास्तिक हैं। चार्वाक हैं उनके बारे में, ये अच्छे लोग हैं, ज़्यादा सोचना नहीं पड़ता। कोई बात-वात नहीं कहते हैं, सीधे लाके लिख दो, नास्तिक।
तो ये है कहानी आस्तिकता की। वास्तविक आस्तिकता आपकी कल्पना की बात नहीं है, आपके विश्वास की बात नहीं है।
वास्तविक आस्तिकता आपके बोध की बात है। जो कुछ भी मानने से इंकार कर दे, वो आस्तिक है। जो किस्से, कहानियों, कल्पनाओं को नमन करके बैठा हो, वो तो नास्तिक है वास्तव में।
अगर मैं मूल आधार की बात करूँ, अगर मैं ऋषियों के तत्व की बात करूँ। हाँ, जो वर्तमान में दुनिया में चल रहा है, उसको मानो। तो जो बात ऋषियों ने कही, ऋषियों की बात नास्तिकता की थी। तो आपको चुनना पड़ेगा कि आप किसको अपना धर्म बोलते हो, वो जो ऋषियों ने दिया, वो आपका धर्म है या जो अब ये चलने लग गया है पिछली कुछ शताब्दियों से, इसको अपना धर्म मान रहे हो आप। अगर ये आपका धर्म है, तो ये वैसा ही है एथिस्टिक जैसा पश्चिम में चलता रहा है। तो फिर यहाँ फिर तो थीज़्म और एथिज़्म को तय करेगा आपका गॉड में विश्वास। इफ यू आर अ बिलीवर, देन यू आर अ थीस्ट। इफ यू आर अ नॉन बिलीवर, बिलीफ, आस्था, जिसके पास ये सब कुछ है, उसको आप बोल दोगे वो आस्तिक है। ये तब होगा जब आप समाज में जो चल रहा है, इसी को पैमाना बना लो।
लेकिन जो ओरिजिनल, असली परिभाषा थी, जो ऋषियों से आई थी, उसको मानोगे तो जो किसी बात में विश्वास न रखता हो, वो आस्तिक है। जो विश्वास ही न रखता हो, जिससे पूछोगे, "क्या आप गॉड में विश्वास रखते हैं?" तो बोलेगा, "मैं विश्वास में ही विश्वास नहीं रखता।" "क्या आप गॉड में यकीन करते हैं?" मैं यकीन करने में यकीन नहीं करता। मैं जानता हूँ, मैं एक चैतन्य जीव हूँ। मेरा स्वभाव है जानना, मानना नहीं। मैं यकीन क्यों करूँ? यकीन माने मानना, मैं कुछ नहीं मानता। चेतना का स्वभाव है जानना, मैं जानता हूँ। जो ये कह दे, मात्र वो आस्तिक है। ठीक है? तो ये है बात।
जो सब लोकधर्मी हैं, अगर आप सत्य के साधक हो तो वो तुरंत आपको नास्तिक ही घोषित कर देंगे। जबकि असली बात ये है कि ये जो पूरा लोकधर्म है, ये पूरी नास्तिकता चल रही है। ये सब जो अपने आप को आस्तिक बोलते हैं न, अंधभक्ति का प्रदर्शन करके अपने आप को आस्तिक बोलते हैं। सच्चाई ये है कि सब नास्तिक हैं। क्यों? क्योंकि इनका जानने में कोई, इनका सारा काम है मानने का। इन्हें कुछ नहीं जानना, ये तो इसी दुनिया को माने बैठे हैं, यही है सब कुछ।
और इसके आगे अगर कुछ है तो वो क्या है? या तो ये स्थूल जगत को मानते हैं, नहीं तो फिर सूक्ष्म जगत को, जो मेरी कल्पनाओं का जगत है, वहाँ चला जाऊँगा। स्वर्ग है, नरक है, ये लोक है, वो लोक है। है तो वो भी तुम्हारे ही मन का उत्पाद ना। मन भी तो एक इंद्रिय ही है, आँखों से दिखाई दे, वो भी भौतिक। और जो मन में तुम्हारे भावना उठ रही है, वो भी भौतिक। भावना भी भौतिक होती है, कल्पना भी भौतिक होती है। तो ये है कहानी।
अब आप जानो, मैं नहीं जानता हूँ कि आस्तिक किसको बोलना है, नास्तिक किसको बोलना है। आधार की बात है। जो आधार ऋषियों ने दिया था, उसको लोगे तो कोई आस्तिक निकलेगा। और जो आधार अभी चल रहा है दुनिया में, भारत में, क्योंकि भारत बेचारे की त्रासदी ये है कि ग़ुलाम बना रहा है, ग़ुलाम बना रहा तो भारत, जो बाहर की जितनी विचारधाराएँ थीं, वो भारत पर भी हावी हो गईं। तो जो वर्तमान में चल रहा है, माने जो पूरी आयातित और विदेशी बातें हैं, अगर उनको लोगे तो फिर कोई और आस्तिक निकलेगा। आ रही है बात समझ में?
पूरा पन्ना भर गया। हाँ, मैंने कहा था कि इन चार के अलावा और भी हैं जिनकी बात हो सकती है। ठीक है? तो चार रोचक नाम लिए जाते हैं आमतौर पर आस्तिकता, नास्तिकता का जब मुद्दा आता है, पश्चिम की ओर से।
प्लेटो (यूनानी दर्शनिक), काण्ट (जर्मन दर्शनिक) जिनकी चर्चा आज सत्र में भी हुई थी। हाइडेगर (जर्मन दर्शनिक) और हाल ले लो तो विट्गेंस्टाइन (ब्रिटिश दार्शनिक)।
अब प्लेटो देखो, क्या कह रहे हैं। प्लेटो कह रहे हैं, वो ऑब्जेक्ट्स को देखते थे, सारे। ये ऑब्जेक्ट्स हैं दुनिया के। बोलते थे, "ये सब जो ऑब्जेक्ट हैं न, ये फॉर्म के इंपरफेक्ट मैनिफेस्टेशंस हैं, और फॉर्म ऐसी है जिस तक हम कभी पहुँच नहीं सकते।” उदाहरण के लिए दुनिया भर में ऐसे मग हैं, तो कहते थे जितने भी ये मग हैं, ये एक परफेक्ट कप के रिप्रेजेंटेशंस हैं। उसको बोलते थे, "जो परफेक्ट कप है, उसको बोलते थे फॉर्म।” कहते थे, "उस तक हम कभी पहुँच नहीं सकते।"
और सारी फॉर्म्स के ऊपर जो फॉर्म बैठी होती थी, उसको बोलते थे द गुड। द गुड, गॉड नहीं गुड, बोलते थे, वहाँ तक एकदम नहीं पहुँचा जा सकता। भाई, इतने सारे कप बनते हैं, पर क्या कोई भी कप परफेक्ट होता है? ये ऐसा बनता है, इससे पहले इसकी एक मानसिक छवि होती है, उससे ये निकलता है। तो कह रहे हैं, ये उससे निकलता है, और उसके भी ऊपर कुछ और बैठा है, जिससे सारी मानसिक छवियाँ निकलती हैं। जहाँ सारी फॉर्म्स निकलती हैं। और जो हाईएस्ट फॉर्म है, उसको तो बोलते थे * “द गुड।”*
तो ट्रांसेंडेंस में यकीन प्लेटो से ही शुरू हो जाता है। ट्रांसेंडेंस की बात, क्योंकि वो भी कह रहे हैं कि ये जो है सामने न, ये नहीं है असली चीज़, असली चीज़ इसके आगे है।
तो ऋषियों के अगर अर्थ में लोगे तो प्लेटो को आप आस्तिक बोलोगे। पर अगर आप कहो कि क्रिएटर गॉड, तो क्रिएटर गॉड ? को नहीं मानते थे प्लेटो, उस अर्थ में नास्तिक कहलाएँगे। हाँ, वो एक प्रिंसिपल की बात करते थे, कि यहाँ पर जो केओस सारा है प्रकृति में, जिस प्रिंसिपल से वो जो केओस है, वो एक शेप लेता है। डेम्यूर्ज बोलते थे उसको। लेकिन वो किसी क्रिएटर गॉड को नहीं मानते थे। तो वो नास्तिक हो जाएँगे।
लेकिन आप अगर उपनिषदिक ऋषियों के दृष्टिकोण से देखोगे, तो प्लेटो क्या हुए? आस्तिक हुए। इसी तरीक़े से काण्ट, जिनकी आज हमने बात करी, वो भी कहते थे कि सब जो दिखाई दे रहा है, ये फिनोमिना है। ये नहीं है, इसके पार है असली चीज़। असली चीज़ क्या है? नॉमिना। और पर वो नॉमिना क्या है? वो तुम समझ नहीं सकते। कोई समझ नहीं सकता। तो इस अर्थ में काण्ट भी आस्तिक हुए। वो भी कहते थे, ये सब नहीं है और जो असली चीज़ है उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, कुछ कहा नहीं जा सकता। तो काण्ट भी आस्तिक हुए।
लेकिन काण्ट अब लोकधार्मिक आधार पर आस्तिक हैं कि नहीं, ये बड़ा मुश्किल है कहना। बताओ, क्यों? क्योंकि काण्ट कहते थे, ये क्रिएटर गॉड वग़ैरह का तो पता नहीं। लेकिन समाज में नैतिकता बनी रहे, इसके लिए ठीक है एक गॉड को मानना। फॉर द पर्पस ऑफ एथिक्स, गॉड को मान लो। तो काण्ट का बड़ा रोचक केस हो गया।
ये सब वो हैं जिनकी बात मैं कर रहा हूँ। जो वास्तविक अर्थों में तो आस्तिक हैं, पर लोकधार्मिक अर्थों में फँस जाते हैं। प्लेटो भी वास्तविक अर्थ में आस्तिक हैं क्योंकि वो कहते हैं कि ये सब जो है, इसके आगे कुछ है। प्लेटो की एक है एलगोरी ऑफ द केव। आप सब पढ़ेंगे और कल कम्युनिटी पर उसके बारे में लिखेंगे।
देखिए, ये बातें हैं। आप गीता कम्युनिटी, ये सब बातें आपको स्पष्ट होनी चाहिए। आप तक ही अगर स्पष्टता नहीं पहुँचेगी, तो आप औरों तक कैसे पहुँचाओगे? वो कहते हैं कि एक गुफा है, उस गुफा में कुछ है। और गुफा की दीवारों पर, अब गुफा में बहुत अच्छी रोशनी तो होगी नहीं। गुफा की दीवारों पर उसकी तरह-तरह की परछाइयाँ पड़ रही हैं। सब परछाइयाँ उसी चीज़ की हैं, जो चीज़ उस गुफा में मौजूद है।
मान लो, ऐसे समझ लो अभी कि कई मशाले हैं और वो मशाले भी ऐसे-से कर रही हैं। है न? स्टेबल सोर्स ऑफ लाइट नहीं है, फ्लिकर कर रहा है। तो जो परछाइयाँ पड़ रही होंगी दीवारों पर, वो क्या हो रही होंगी? वो भी बदल रही हैं, विकृत हो रही हैं। तो परछाइयों से इतना तो तुम्हें पता चलेगा, कुछ है, पर ये नहीं बता पाओगे ठीक-ठीक कि क्या है और ठीक-ठीक क्या है, ये कभी परछाइयों को देख के पता चल भी नहीं सकता।
तो ये आस्तिकता की घोषणा है, कुछ है तो। पर जैसे केन उपनिषद् कहते हैं न, कि “मन से और वाणी से और चक्षु से और श्रोत्र से अतीत है।” समझ में आ रही है बात?
अब फिर आते हैं हाइडेगर। उन्होंने सीधा ही मना कर दिया। बोले, कुछ नहीं, ये है जो तुम लेकर घूमते रहते हो न। पश्चिमी संदर्भ में, ये जो गॉड गॉड करते रहते हो, कोई गॉड नहीं है। बेकार की बात मत करो, वो बीइंग की बात करते थे, बीइंग। वो बीइंग, उनका लगभग वैसा ही जैसा सत्-ब्रह्म, लगभग। कहते थे, ये गॉड वग़ैरह कुछ नहींक् ब्रह्म सत्य है। बीइंग और बीइंग को तुम बीइंग ऑफ़ द सेल्फ भी कह सकते हो, आत्मा। तो इस अर्थ में हाइडेगर भी एकदम आस्तिक हुए। लेकिन लोग धार्मिक नजरिए से देखोगे तो नास्तिक निकलेंगे।
फिर विट्गेंस्टाइन, इन्होंने भाषा, फिलॉसफी ऑफ़ लैंग्वेज पर बहुत काम किया। तो बोलते थे, "तुमने ये सब जो गॉड के बारे में चला रखा है ना, ये वर्ड प्ले है। ये तुम्हारे ही शब्दों का खेल है, जो तुमने चला रखा है और उसको गॉड गॉड कर रहे हो।" हालाँकि उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से कभी नहीं कहा कि गॉड है कि नहीं है कुछ नहीं। और वास्तविक आस्तिक थे, प्रार्थना बहुत करते थे, बहुत करुण व्यक्ति थे। प्रार्थना करते हुए ऐसे आते थे, विवरण कि रो पड़ते थे।
लेकिन फिर भी कहते थे, लैंग्वेज उनका कार्यक्षेत्र था। लैंग्वेज पर काम करते बहुत कहते थे, "तुमने ये जो कहानियाँ बना रखी हैं, ये तो सब तुम्हारी ही कहानियाँ हैं।" इनका सत्य से कोई लेना देना नहीं। सत्य क्या है? उसके लिए उन्होंने एक शब्द दिया था—बहुत सुंदर, अनसेएबल। अनसेएबल। इसको सुनते ही किसकी याद आती है? अनिर्वचनीय। ये सत्य के लिए विट्गेंस्टाइन का शब्द है — अनसेएबल। और उनकी कुछ उक्ति हैं, कुछ इस तरीक़े की, कि “वो जिसको कहा नहीं जा सकता, उसे कहा भी नहीं जाना चाहिए।” ठीक है?
अब इसके ठीक-ठीक शब्द क्या हैं? आप लोग खोज करके लाएँगे और कम्युनिटी पर लिखेंगे। बोलते थे, "वो जिसको कहा नहीं जा सकता, उसके बारे में कुछ कहा भी नहीं जाना चाहिए।" मत उड़ाओ, इतनी कहानियाँ। समझ में आ रही है बात?
तो दुनिया भर में, जिन्होंने सचमुच जानना चाहा है, समझना चाहा है, आज वो सब बेचारे एक अजीब दुविधा में फँसे हैं। ऋषियों की तरफ़ से देखें तो वो सब के सब आस्तिक हैं। पर प्रचलित, ये जो लोकधर्म है और अंधभक्ति है, इसकी ओर से देखें तो सब नास्तिक हो जाते हैं।
ये कहते हैं, "साहब, हम आस्तिक मानेंगे ही उसी को, जो गॉड बिलीवर है। वरना हम आस्तिक नहीं मानेंगे।" और चूँकि ये बहुत पढ़े-लिखे नहीं होते। इसीलिए ये एक बहुत सीधे प्रश्न का जवाब भी नहीं दे पाते कि, "ये तो बता दो कि इतने सारे हमारे दर्शन हैं, षड्दर्शनों में, आस्तिक दर्शनों में, जहाँ गॉड/ईश्वर जैसी कोई चीज़ नहीं है, फिर उनको आस्तिक दर्शन क्यों बोलते हैं?"
वो इसलिए बोलते हैं क्योंकि आस्तिकता का गॉड से कोई लेना देना है ही नहीं। आस्तिकता का लेना देना ट्रुथ से है, जो मुक्ति चाहता हो, वो आस्तिक है। वास्तविक मुक्ति, ये नहीं कि इस दुनिया से हटके किसी और दुनिया में पहुँच जाऊँ। जो स्वर्ग चाहता हो, वो आस्तिक नहीं है। क्योंकि वो एक दुनिया से हटकर दूसरी दुनिया चाहता है। जो मृत्यु लोक से हटकर कोई और लोक चाहता हो, वो आस्तिक नहीं है। क्योंकि वो अभी भी चाहता है। वो इस दुनिया की अपेक्षा कोई दूसरी दुनिया चाहता है। जो ऐसी पूर्ण मुक्ति चाहता है कि वो बचे ही न किसी लोक में रहने के लिए, मात्र वो आस्तिक है।
तो अब ये आप पर निर्भर करता है, आप आधार कौन सा लेना चाहते हैं। जो आधार आपको ऋषियों ने दिया था, वो आधार लोगे तो एक आदमी आस्तिक निकलेगा, और आज के समाज में लोक धर्म में जो आधार चल रहा है, उस आधार को लोगे तो कोई बिल्कुल दूसरा उल्टा आदमी आस्तिक निकलेगा। अब ये आप जानो। आ रही है बात समझ में?
कहानी लंबी चली, रोचक थी?
प्रश्नकर्ता: सर, जैसे आपने उनकी बात करी कि वास्तविक अर्थों में जो नास्तिक थे, वो आस्तिक थे, उनको आजकल नास्तिक समझा जाता है। तो इससे मेरे जेहन में दो नाम आए, एक तो जीसस क्राइस्ट और भगत सिंह। तो एक तरह से भगत सिंह…
आचार्य प्रशांत: हाँ, हाँ, हाँ। देखो, जो भी व्यक्ति मुक्ति का आकांक्षी है और कल्पनाओं में विश्वास नहीं करता, उसको आस्तिक कहेंगे ऋषि। इस अर्थ में भगत सिंह ने बिल्कुल ठीक लिखा है। “व्हाई एम आई एन एथिस्ट” वो एथिस्ट हैं, पर नास्तिक नहीं है। वो एथिस्ट हैं और आस्तिक है।
बल्कि और बताता हूँ तुमको। अब कान खड़े कर लो। जो वास्तविक आस्तिक होगा, उसे एथिस्ट होना पड़ेगा, और जो थीस्ट है, ज़्यादा संभावना है कि वो नास्तिक है। ऋषियों ने जो बात दी है, और जो बात पश्चिम में चली है और अब्राहमिक धर्मों की ओर से आई है, वो बात उल्टी है बिल्कुल। हम सोचते हैं, आस्तिक माने थिस्ट और नास्तिक माने एथिस्ट। उल्टा है। ज़्यादा संभावना ये है कि भगत सिंह जैसा कोई जो वास्तविक आस्तिक है, उसे एथिस्ट होना पड़ेगा।
तीन तल हैं आस्तिकता, नास्तिकता का निर्णय करने के। ये समझ में आ गई है न बात? पहला तल है, “दार्शनिक/अस्तित्ववादी” तल। जो पूछता है, कि तुम सिर्फ़ इस दुनिया को मानते हो या इसके बियोंड कुछ है उसको। तो ये पहला और वास्तविक तल है। और दूसरा तल है, जिस पर तुम निर्णय कर सकते हो कि आस्तिक या नास्तिक, वो क्या है? कि “जो वेद को माने, वो आस्तिक और जो वेद को न माने, वो नास्तिक।” और फिर जो तीसरा तल है, उसमें वेद के लिए भी जगह नहीं है। वहाँ पर कहते हैं, “जो भगवान को माने, वो आस्तिक; जो भगवान को न माने, नास्तिक।”
तो आस्तिकता, नास्तिकता की परिभाषा ही बिल्कुल एकदम उलट के रख दी है। जो ऋषियों ने दी थी और जो आज चल रही है, वो बिल्कुल 180 डिग्री हो गई है। ऋषियों से पूछोगे तो कहेंगे, कि यहाँ तुम्हारी संस्था में आस्तिकता का सबसे बड़ा यज्ञ चल रहा है। बहुत आनंदित होंगे ऋषि, देख के यहाँ जो हो रहा है, गीता कम्युनिटी पर। वो कहेंगे, "आस्तिकता का यज्ञ है ये।" और बाहर निकलोगे, लोकधर्मियों से पूछोगे तो कहेंगे, "ये आचार्य सबको नास्तिक बना रहा है।"
अगर पूरी कहानी समझ में आई होगी तो दिखाई दिया होगा कि जिसको आप सनातन धर्म कहते हो न, उसका अपहरण हो गया है। वो हाईजैक कर लिया गया है। वो अब ऋषियों का धर्म नहीं है। वो लोग धार्मिक बाबाओं का धर्म हो गया। अंधभक्ति का धर्म हो गया है। पर वो कहते हैं, कि बस जो हमारे हिसाब से चले, वो आस्तिक है। तुम्हें हमारी मान्यताएँ माननी होंगी। तुम्हें हमारी कहानियाँ माननी होंगी, तो तुम आस्तिक हो।
बहुत ज़रूरी है कि सनातन धर्म को रिक्लेम किया जाए। उसको वापस ऋषियों के पास पहुँचाया जाए। नहीं तो ये जो उल्टा-पुल्टा अर्थ चल गया है, आस्तिकता-नास्तिकता का। अभी तो चलिए, फिर भी मेरे जैसे कुछ हैं जो बता देंगे। काल की धार आगे बढ़ेगी, ये बताने वाला भी कोई नहीं रहेगा। आने वाली पीढ़ियों को यही लगेगा कि यही होती है आस्तिकता, कि जैसे पश्चिम में गॉड बिलीवर और गॉड फियरिंग होता है। इसी को आस्तिक बोलते हैं भारत में। वो यही मानने लग जाएँगे।
जबकि भारत का दर्शन बहुत आगे की और बहुत ऊँची बात करता है इससे। ये बहुत छोटी बात है, कि गॉड बिलीवर हो तो तुम आस्तिक हो। बहुत छोटी बात है ये। भारत ने इससे बहुत आगे की ऊँचाइयाँ छुई हैं, पर वो सारी बातें एकदम खो जाएँगी।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आचार्य जी।