घटिया इंसानों के खास लक्षण (बचकर रहना!) || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

आचार्य प्रशांत: यहाँ चल रहे हैं उपनिषद् और उसके (एक श्रोता की ओर संकेत) दिमाग में खाना और खटिया है। ये आदमी घटिया है। सब घटिया है। किसी एक की नहीं बात हो रही है आदमी ही घटिया है। ‘आचार्य जी, आप तो मनुष्यमात्र के गौरव की ज़रा भी परवाह नहीं करते। हम ईश्वर की सन्तानें हैं। क्या हमारी किंचित भी गरिमा नहीं?’ नहीं, हम ईश्वर की नहीं जंगल की सन्तानें हैं, होश में आओ। किसी ईश्वर ने बड़े अनुराग से बड़े लाड़ से हमें नहीं बनाया है। हम गोरिल्ला से निकलकर आये हैं। ‘पर आचार्य जी, मनुष्य तो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है न।’ नहीं, ओरंगउटान की। खुद को देखो, अपनी हरकतों को देखो, अपने विचारों को देखो। तुम्हें वाकई लगता है कि हमारे भीतर कुछ भगवत्ता जैसा है? किसी भगवान ने हमारा निर्माण करा है? वाकई लगता है? किसको झाँसा दे रहे हो?
गनीमत ये है कि ज़्यादातर जो हमारी करतूतें हैं वो दिमाग में ही रह जाती हैं। वो कभी प्रकट होकर कार्यान्वित होकर के सामने नहीं आती है। नहीं तो कोई गलतफ़हमी नहीं रह जाती कि हम किसकी औलादें हैं। कानून का, पुलिस का, दंड का, समाज का ज़रा डर है। इसीलिए हमारे भीतर की पशुता एकदम समक्ष प्रकट नहीं होती। तो हमें ज़रा सा बोलने का अधिकार मिल जाता है कि देखिए हम तो बड़े अच्छे बड़े गरिमावान लोग हैं।
और किसी तरह से यन्त्र ऐसा एक बना दिया जाए कि आपके दिमाग में जो विचार हैं, यही दीवार पर लिख जाएँगे अपनेआप। तो क्या करोगे? और विज्ञान ऐसी तकनीक कोई-न-कोई खोज निकालेगा। कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। क्योंकि जितने विचार होते हैं, वो होती तो सब मस्तिष्क के सर्किट की तरंगें ही हैं। उनको पढ़ा जा सकता है। जैसे इइजी होता है, इसीजी होता है, वैसे ही ब्रेनवेव्स (मस्तिष्क की तरंगें) को भी रीड किया जा सकता है। और जिस चीज़ को पढ़ा जा सकता है उसको किसी भाषा में अनुवादित भी किया जा सकता है तो हिन्दी में अंग्रेजी में यहाँ लिखा जाएगा जो कुछ सोच रहे हो। उसके बाद बोलना कि हम तो भगवान की औलाद हैं।
अहंकार ने बड़ी ज़ोर से अपनी पीठ थपथपायी और कहा कि भगवान ही मेरा बापू, भगवान ही मेरी माई। अध्यात्म की ज़रूरत ही इसीलिए है न क्योंकि हमारी शुरुआत ही गड़बड़ होती है। मान लो इस बात को। कर लो मुझसे नफ़रत लेकिन मान लो इस बात को। मुझे मालूम है कि कोई आपको मुँह पर बोले कि आप ठीक नहीं हो — आप क्या ठीक नहीं हो? पूरी मनुष्यता ही ठीक नहीं है, न आप ठीक हो, न वो ठीक है, न मैं ठीक हूँ, कोई ठीक नहीं है तो बुरा तो लगता ही है। हम अपनेआप को यही सुनाना चाहते हैं कि साहब हम बड़े ऊँचे लोग हैं। अध्यात्म की ज़रूरत ही इसीलिए है क्योंकि हम ऊँचे नहीं है।



