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सिर्फ़ यहाँ झुकना तुम || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हाल ही में वीडियो प्रकाशित हुआ है जिसका नाम है — “हिन्दू इतने देवी-देवताओं को क्यों पूजते हैं?” तो उसमें भी आपने यही समझाया था कि पूजन या पूजा तो देवी-देवताओं की ही हो सकती है, क्योंकि ब्रह्म की हम पूजा कर नहीं सकते। उसी सिलसिले में उसी वीडियो पर एक टिप्पणी आयी है जो में आपसे, आपकी आज्ञा हो तो मैं पढ़ना चाहूँगा।

ये भी एक मुस्लिम आपके श्रोता हैं, जिनकी ओर से यह टिप्पणी आयी है। और उनका मानना या उनकी टिप्पणी का जो सार है, वो यह है कि मैं तो स्थूल वस्तुओं की भी पूजा नहीं करूँगा क्योंकि इस्लाम बोलता है कि अल्लाह की ही पूजा होती है। मैं पढ़ देता हूँ एक बार — वो कहते हैं कि — वीडियो पर टिप्पणी लिखकर — कहते हैं कि मैं संतुष्ट नहीं हूँ गुरु जी, क्योंकि मालिक को छोड़कर किसी की भी पूजा नहीं की जा सकती है। पूजा के लिए तो सिर्फ़ मालिक ही है।

बाक़ी दुनिया की चीज़ों से मदद ली जा सकती है, लेकिन पूजा सिर्फ़ और सिर्फ़ मालिक और ब्रेकेट में लिखा है अल्लाह या ट्रूथ (सत्य) की ही की जा सकती है। आप गुरु जी हैं, मैं आपकी रेस्पेक्ट (सम्मान) करता हूँ और भी जो हो सकता है, वह सब करूँगा, मगर वरशिप या पूजा सिर्फ़ एक अल्लाह की ही करूँगा, क्योंकि पूजा के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे मालिक हैं। इस्लाम में सबसे बड़ा पाप मालिक को छोड़कर किसी की इबादत, पूजा या वरशिप करना है।

आचार्य प्रशांत: बहुत-बहुत बढ़िया बात लिखी है, और मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। देखो, मैं जो बात समझाना चाहता हूँ, वो ‘एक मालिक’ की पूजा के ख़िलाफ़ नहीं है। वो ‘एक मालिक’ की पूजा को सच्चाई और गहराई देने के लिए है। मैं भी कह रहा हूँ, ‘एक ही मालिक है, उसी की पूजा करनी है। एक मालिक है, उसी की करनी है। ठीक है।‘

मैं ‘आत्मा’ नाम से कहता हूँ। वेदान्त में जो एक है, एकमात्र सत्य, उसका क्या नाम है, आत्मा या ब्रह्म। मात्र एक वही है, वही है, वही है, वही है। तो सहमति हो गयी पूरी कि एक मालिक की ही पूजा करनी है। उसको आत्मा कहते हैं। बस एक है, उसी की पूजा और कुछ भी नहीं। लेकिन हम इस बात की थोड़ा आगे गहराई में जाते हैं।

वो जो एक मालिक है न, जिसे आत्मा कहते हैं, वो बिलकुल निर्गुण है। जो निर्गुण है, उसका तुम विचार नहीं कर सकते। निर्गुण माने क्या होता है? प्रकृति में गुण होते हैं। जैसे, वैसे तो जो शास्त्रीय तौर पर गुण हैं, वो तो सत, रज, तम हैं।

(काले रंग के एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण को दिखाते हुए) पर ऐसे मान लो तुम — बस व्यवहार के लिए, उदाहरण के लिए कि काला होना इसका एक गुण है। ठीक है। तो मुझे अगर इसको ढूँढना है, तो मेरी आँखें किसी चीज़ को तलाश रही होगी जो कि काली हो, क्योंकि काला होना इसका एक गुण है। ठीक है।

इसी तरीक़े से इसके आकार को इसका एक गुण मान लो। तो मेरी आँखें — मुझे इसको ढूँढना है — तो किसी ऐसी चीज़ को ढूँढ रहीं होंगीं जो इस तरीक़े से हो, चौकोर हो। इसका जो वज़न है, वह भी इसके गुण में आता है। इस पर जो लिखा हुआ है, इसका जो ब्रान्ड, वह भी इसके गुण में आ गया। ठीक। तो मैं इसे खोज सकता हूँ।

मैं इसे खोज सकता हूँ, मेरे हाथ में आएगा, मैं इसे मूल्य भी दे सकता हूँ। मैंने इसको खोजा भी इसीलिए क्योंकि मैं इसे मूल्य देता हूँ। मैं इसे खोजूँ, मैं इसे मूल्य दूँ, उन दोनों ही चीज़ों के लिए ज़रूरी है कि इसमें कुछ गुण हों। ये काला हो, इसके कुछ कर्म हों, इसकी कुछ उपयोगिता हो, ये दिखाई देता हो, ये पकड़ में आता हो, इसके बारे में विचार किया जा सकता हो, इसकी कोई जानकारी हो, तब तो इसको मूल्य दिया जा सकता है, है न।

आत्मा निर्गुण होती है। वो जो सबसे ऊँचा है, वो जो मालिक है, वो निर्गुण है; ऐट्रिब्यूटलैस। उसके बारे में न कुछ कहा जा सकता है, न सोचा जा सकता है। अगर न कह सकते हो, न सोच सकते हो, तो मुझे बताओ, उसकी पूजा भी कैसे करोगे? यह बहुत-बहुत सूक्ष्म बात है; रुक जाओ। ध्यान से समझो पहले। तुरन्त विरोध में मत आ जाना।

जिसके बारे में विचार भी नहीं किया जा सकता, उसकी पूजा कैसे करोगे और पूजा करते ही तुमने उसको नीचे ला दिया बिलकुल, क्योंकि पूजने के लिए कोई-न-कोई छवि तो बनानी पड़ेगी। समझना इस बात को। यहाँ तक कि तुमने उसको एक नाम भी दे दिया, तो तुमने एक छवि बना दी। यहाँ तक कि तुमने उसको यदि मालिक भी कह दिया, तो तुमने एक छवि बना दी।

कैसे बना दी? उसको तुम मालिक कह रहे हो, तो नौकर कौन है, तुम। वो मालिक है, तुम बन्दे हो। बन्दा माने दास, नौकर, सेवक। बन्दे तुम हो गये न। बन्दे तुम हो। ‘मालिक’ शब्द ‘बन्दे’ से सम्बन्धित है, रिलेटिव (सम्बन्धी) है। ठीक। और बन्दा निर्गुण नहीं है। (स्वयँ की ओर इशारा करते हुए) ये बन्दा है। यह तो निर्गुण नहीं है न? मुझसे सम्बन्धित जो कुछ भी होगा, अगर मैं सगुण हूँ, तो वो भी…।

मुझसे सम्बन्धित क्या-क्या है? मैं सगुण हूँ, यह मेरी शर्ट है, तो इस शर्ट को भी क्या होना पड़ेगा, सगुण होना पड़ेगा। मैं हूँ, मेरे शब्द हैं। मैं यदि सगुण हूँ, तो मेरे शब्दों को भी सगुण होना पड़ेगा। मैं अगर सगुण हूँ, तो मेरे भाई को भी…। मैं अगर सगुण हूँ, तो मेरे मालिक को भी सगुण होना पड़ेगा न। होना पड़ेगा न।

तो इसलिए वेदान्त कहता है कि आत्मा को स्वामी भी मत कहो, कुछ मत कहो, मौन हो जाओ, चुप हो जाओ। तुमने उसके बारे में कुछ भी कह दिया, तो तुमने उसे निर्गुण से सगुण बना दिया, माने तुमने उसे उसके स्थान से खींचकर नीचे गिरा दिया। क्योंकि तुम उसके बारे में जो कुछ भी कहोगे, स्वयं से सम्बन्धित करके ही कहोगे न।

जैसे तुमने कहा ‘मालिक’, तो किसका मालिक, तुम्हारा मालिक। तुमसे सम्बन्धित हो गया न। जो तुमसे सम्बन्धित हो गया, जो सगुण से सम्बन्धित है, वो भी सगुण हो गया। जिसके बारे में तुमने कुछ भी कह दिया, उसे तुमने मेन्टल डोमेन (मानसिक क्षेत्र) में ला दिया, मन के दायरे में ला दिया। जिसे तुमने मन के दायरे में ला दिया, वह तो बहुत छोटी चीज़ हो गया।

आत्मा मनोतीत है, मन के आगे है। उसके विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता। मन उसका विचार नहीं कर सकता। उपनिषद् कहते हैं, ‘वाणी उसका उल्लेख नहीं कर सकती। एक शब्द नहीं बोल सकती उसके बारे में। आँखें उसे खोजती हुई जाती हैं, उसे देख नहीं सकतीं। कितना भी सुन लो, कान उसे फिर भी न सुन पाएँगे। मन कितना भी सोच ले, उसका विचार नहीं कर पाएगा।‘

तो अब बताओ, उसकी पूजा कैसे कर लोगे, क्योंकि पूजा करने के लिए तुम्हें कुछ तो चाहिए न? तुम कुछ भी कह दो कि, ‘जो निर्गुण है, निराकार है, मैं तो उसकी पूजा कर रहा हूँ।‘ फिर तुम बात को समझे नहीं। पूजा करते ही तुमने उसको सगुण बना दिया। तुम जिस क्षण बोलते हो कि तुम पूजा कर रहे हो, इबादत कर रहे हो, उस क्षण तुमने निर्गुण को सगुण बना दिया।

अगर शुद्ध रूप से देखो, तो फिर तो जो असली मालिक है, उसकी इबादत करी नहीं जा सकती, या फिर उसकी इबादत सिर्फ़ मौन में हो सकती है। एकदम मौन हो जाओ, वही इबादत है। ऐसा मौन जिसमें तुम ही न बचो। जब तुम नहीं बचे, तब तो है मालिक की इबादत, नहीं तो नहीं है।

तो इस बात को ध्यान में रखते हुए फिर सनातन धर्म में यह परम्परा चली — उन्होंने कहा कि देखो, यह पाखण्ड होगा, अगर हम कहें कि हम निर्गुण की उपासना करते हैं। तो हम मानते हैं कि एक मात्र सत्य वही है जो निर्गुण है, निराकार है। लेकिन उसकी पूजा वास्तव में करी नहीं जा सकती।

तो फिर किसको पूजें और पूजने का मतलब यह नहीं है कि जिसकी पूजा कर रहे हैं, उसको सत्य मान लिया है। यहाँ तो परम्परा अस्त्र पूजन की भी है, यंत्र पूजन की भी है। कारीगर लोग, अपने जो उनके उपकरण होते हैं, उनकी भी पूजा कर लेते हैं। इसका मतलब यह थोड़े ही है कि उन अस्त्रों को, उन उपकरणों को या उन यंत्रों को वो सत्य का स्थान दे रहे हैं।

पूजा का मतलब बस झुकना है। पूजा का मतलब यह नहीं है कि तुमने कह दिया कि यही आख़िरी सत्य है। पूजा का मतलब है आदर प्रकट करना। अब यह ग़लती करी है सनातन धर्म ने कि भूल गये कि जिसकी पूजा कर रहे हो वह माध्यम मात्र है, अन्तिम सत्य नहीं है।

यहाँ पर ग़लती सनातन धर्म की है कि तुमने प्रतीकों को ही सत्य मान लिया। प्रतीकों को ही सत्य मान लिया। लेकिन प्रतीक हैं अपनेआप में बहुत महत्वपूर्ण, क्योंकि इन प्रतीकों के बिना तुम सत्य तक पहुँच नहीं सकते। प्रकृति की उपासना करता है सनातन धर्म।

प्रकृति के सहयोग के बिना आप सत्य तक पहुँच नहीं सकते। यही बात देवी आराधना का आधार है। देवी माने प्रकृति। प्रकृति ही बन्धन है और प्रकृति ही तुम्हें मुक्ति देगी, अगर तुम उसको साफ़-साफ़ समझो। तो इसलिए देवी की पूजा की जाती है। देवी माने प्रकृति, कि देवी तू ही कष्ट देती है, तू ही कष्ट से मुक्ति भी देगी।

समझ में आ रही है बात?

सनातन धारा ने ग़लती यह कर दी कि उसने जो माध्यम था, उसको तो पूरा आदर दिया, पर भूल गयी वो, बहुत लोग भूल गये सनातन धर्म के, कि माध्यम सिर्फ़ माध्यम होता है। माध्यम मंज़िल नहीं बन जाता। माध्यम मंज़िल नहीं बन जाता।

लेकिन माध्यम को इतना आदर देने के कारण सनातन धर्म बहुत उदार हो गया। क्यों उदार हो गया, क्योंकि सब कुछ तो माध्यम ही है न। मैं जिसको भी समझने लग जाऊँ, वही मुझे सत्य तक ले जाने का माध्यम बन जाएगा। तो सब पूजनीय हो गये।

बड़ी सहिष्णुता आ गयी सनातन धारा में, बड़ी टॉलरेंस (सहिष्णुता) आ गयी । दुनिया के उदार-से-उदार लोगों में है सनातनी। जो कोई उनके पास आया, उसको शरण दी, यह सब करा। हिंसा कम करते हैं, मारते कम हैं। उसकी वजह यही है कि उन्होंने जितने ज़रिए हो सकते थे, जितने माध्यम हो सकते थे प्रकृति के अन्दर, सबकी पूजा की और पूजा करते-करते ये पाया कि अरे! सब कुछ ही तो माध्यम है।

मैं पेड़ से अगर जाकर के बड़े प्रेम से पूछूँ, बड़े मौन से पूछूँ, तो पेड़ भी सच्चाई बता देता है। तो मैं पेड़ को काटूँ कैसे? तो तुम पाते हो कि सनातन धारा में लोग होते हैं जो पेड़ों से बड़ा प्यार करते हैं। पेड़ कट रहे होते हैं, वो पेड़ों से लिपटकर खड़े हो जाते हैं — पेड़ों को काट मत देना काट मत देना।

यह उदारता इसीलिए है, क्योंकि सत्य से बड़ा प्यार रहा है सनातन धर्म को। इतना प्यार रहा है कि कहा है कि जो कुछ भी सत्य की ओर ले जाता है, वो भी आदरणीय हो गया। वो इतना प्यारा है कि जो उसकी ओर ले जाता है, वो भी प्यारा हो गया। यह बात समझो।

वो जो है, निर्गुण, निराकार, वो इतना प्यारा और इतना मूल्यवान है कि जो कुछ भी मुझे उसकी ओर ले जाता है, वह सब कुछ मुझे प्यारा हो गया। और क्या है जो उसकी ओर ले जाता है? सब कुछ ही ले जा सकता है। यह माइक ले जा सकता है, यह रुमाल ले जा सकती है। कुछ भी।

तो तुम पाओगे कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में अनगिनत प्रतीकों का पूजन चल रहा है। शायद कुछ भी ऐसा न हो जिसकी पूजा नहीं होती। पत्थर तक की पूजा होती है, रेत की पूजा होती है, पानी की पूजा होती है, बादल की पूजा होती है, कीड़े की पूजा होती है, जानवर की पूजा होती है, पहाड़ की पूजा होती है।

आप बताइए तो यहाँ किस चीज़ की पूजा नहीं होती? इसका मतलब यह नहीं है कि उनको मान लिया गया है कि यही तो सत्य हैं। नहीं, उनको सत्य नहीं मान लिया गया है। उनको सत्य तक ले जाने वाला साधन माना गया है। यह सत्य तक ले जाएँगे। और सत्य इतना प्यारा है कि जो साधन उस तक ले जा रहा है, हम उसको भी प्रणाम करते हैं, हम उसको भी नमन करते हैं। यह है विचार।

अब ग़लती इसमें यह हुई कि बहुत लोगों ने साधन को ही सत्य मान लिया, मैने कहा, ‘माध्यम को ही मंज़िल मान लिया।‘ वहाँ पर सनातन धारा की ग़लती है।

लेकिन आप जो बात बोल रहे हैं, उसमें भी ग़लती है। इस्लाम की ग़लती यह है कि वो जो मंज़िल है, उसकी तो बात कर रहा है। मंज़िल तक ले जाने वाले माध्यमों की बात ही नहीं कर रहे। आप भूल रहे हो कि उस तक ले जाने के लिए माध्यम आपको इस दुनिया में ही मिलेंगे। वहाँ तक जाने के दरवाज़े इस दुनिया से ही खुलते हैं।

आप दुनिया की तौहीन करके और दुनिया में जो कुछ भी है, उसको आदर न देकर के उस तक भी नहीं पहुँच पाएँगे। विचार करके देखिएगा, हो सकता है मेरी बात ग़लत हो। पर सही हो, तो ध्यान दीजिएगा। आप कहने लग जाएँ, ‘वो जो एक मालिक है, मैं तो बस उसकी इबादत करता हूँ। और जो यहाँ बाकी सब कुछ है, उसके प्रति तो मेरे पास कोई भाव ही नहीं।

जानवरों को लेकर के मेरे पास कोई भाव नहीं, कोई प्रेम नहीं। प्रकृति के और जितने तत्व हैं, उनको में आदर नहीं दे पाता।‘ अगर आप इस दुनिया को आदर नहीं दे पा रहे हो, तो वहाँ तक कैसे पहुँचोगे? यह मत सोचिएगा कि इस दुनिया में जो कुछ है, आप उसकी उपेक्षा करेंगे, अनादर करेंगे, उसके प्रति निर्दयता दिखाएँगे, तो वहाँ आप ऊपर पहुँच जाएँगे। ऊपर नहीं पहुँचेंगे आप।

ऊपर पहुँचने का — फिर दोहरा रहा हूँ — ऊपर पहुँचने की सीढ़ी नीचे से ही शुरू होती है। तो दोनों तरफ ग़लती हुई है। सनातन मार्गियों ने साधन पर इतना ज़ोर दिया कि भूल गये कि साधन साधन मात्र है, सत्य नहीं है। कि मूर्ति मूर्ति मात्र है, कि मूर्ति अमूर्त तक जाने का माध्यम मात्र है, मूर्ति अपनेआप में सत्य नहीं हो गयी । यह बात सनातन मार्गी भूल गये। लेकिन जो सिद्धान्त था सनातन धारा में, वो अति उत्कृष्ट था। बहुत गहरी बात थी। इतनी गहरी बात कि आम आदमी को समझ में न आए।

बात आप यह समझ पा रहे हैं?

व्यावहारिक बात करनी है न। सिर्फ़ यह कहने से थोड़े ही होगा कि एक है मालिक, और सिर्फ़ उसकी इबादत करनी है। इबादत करते ही उस एक मालिक को तो वैसे भी तुमने सगुण बना ही दिया है न। तो उस मालिक को सगुण बनाने से अच्छा यह है कि यहाँ जो कुछ सगुण है, उसके निकट आओ, उसे जानो, उसको पहचानो। उसको जानोगे, पहचानोगे, तो मालिक के ज़्यादा क़रीब आ पाओगे।

यह बात स्पष्ट हो रही है कुछ?

क्या कहा जा रहा है? तो मूल रूप से कोई अन्तर नहीं है। मूल रूप से यही बात है — ‘हाँ, आत्मा एकमात्र सत्य है। सौ सत्य नहीं होते। एक सत्य होता है, बिलकुल सही बात है। और ‘एक सत्य’ भी नहीं होता। वेदान्त और आगे जाता है। वेदान्त कहता है, ‘उसे एक भी नहीं कह सकते। क्योंकि एक कहने का मतलब यही है कि तुमने गिनती शुरू कर दी है। और गिनतियाँ सारी कहाँ होती हैं, मन में होती हैं।

तो फिर से तुमने सत्य को मन के भीतर की बात बना दिया। मन के भीतर तो जो कुछ होता है, बहुत छोटा होता है। तो हम यह भी नहीं कहेंगे कि मालिक एक है। वेदान्त फिर कहता है, ‘मालिक अद्वैत है।‘ अद्वैत माने कि उसकी गिनती ही नहीं की जा सकती। दो नहीं हैं। दो का मतलब यह नहीं है कि एक है। एक भी नहीं है। भी नहीं है।

यह आदि शंकराचार्य का बड़ा मज़ेदार कथन है। उनसे कोई पूछता है कि क्या दो हैं। द्वैतवाद को लेकर के किसी ने प्रश्न किया, ‘क्या दो हैं?’ उन्होंने जवाब दिया, ‘दो कहाँ से होंगे? एक भी नहीं है।‘ (हँसते हुए) कहते हैं, ‘दो तो तब होंगे न, जब पहले एक हो। अरे! एक भी नहीं है।‘ दो से आशय है दुनिया, दो से आशय है विविधता। क्या यह संसार है, सत्य है।

तो क्या कह रहे हैं आचार्य शंकर, बोलते हैं, ‘अरे! यह तो तब सत्य होगा न, जब एक हो। एक भी नहीं है।‘ एक माने रचयिता। एक किसका प्रतीक होता है? — कि वह एक ईश्वर जिसने आप सबको बनाया। और दो किसका प्रतीक होता है? — कि यह दुनिया जिसमें सब द्वैतवाद है, यह सब विविधता है, इतने सारे हैं, दो उसका प्रतीक होता है। तो उनसे पूछने वाला पूछ रहा है कि क्या दो हैं। वह बोले, ‘एक भी नहीं है, तो दो कहाँ से आएँगे? दो के लिए पहले एक तो चाहिए।‘ ‘तो क्या है?’

‘उसको या तो अद्वैत बोल सकते हो, या शून्य बोल सकते हो।‘

दोनों में ही, अद्वैत बोलने में और शून्य बोलने में ही, मन मौन हो जाता है, क्योंकि शून्य को लेकर भी मन कोई छवि नहीं बना सकता, और अद्वैत को लेकर भी मन कोई छवि नहीं बना सकता। पर ‘दो’ बोलने में तो छवि बनती है। दुनिया पूरी छवियों का ही मेला है। ‘एक’ बोलने में भी छवि बन जाती है।

तो अगर तुम वन गॉड (एकमात्र ईश्वर) की बात कर रहे हो, तो वहाँ भी गड़बड़ ही हो जाती है, क्योंकि वहाँ भी छवि बन जाती है। छवि नहीं बननी चाहिए, बिलकुल सही बात है, छवि नहीं बननी चाहिए। कोई कल्पना नहीं करनी चाहिए।

न उसका कोई चित्र बनाना चाहिए, न उसके बारे में कोई कहानी कहनी चाहिए, न यह कहना चाहिए कि उसका कोई बाप है, न यह कहना चाहिए कि उसके कोई बच्चे हैं। कोई छवि नहीं बनानी चाहिए। लेकिन आचार्य शंकर कह रहे हैं कि तुमने अगर यह भी कह दिया कि एक है, तो तुमने छवि बना दी। यह भी मत बोलो कि एक है। बस चुप हो जाओ, बस चुप हो जाओ, मौन।

बुद्ध भी यही करा करते थे। महात्मा बुद्ध से जाकर कोई पूछे, ‘है?’ (मौन के संकेत हेतु होठों पर ऊँगली रखते हुए) कुछ गिने-चुने प्रश्न थे जिनके बारे में उन्होंने कभी कोई उत्तर ही नहीं दिया। बस मौन हो गये।

उनसे कोई जाकर पूछता था, ‘है?’ — चुप (पुनः होठों पर ऊँगली रखकर), क्योंकि उन्होंने अगर यह भी कह दिया कि नहीं है, तो उन्होंने कुछ तो कह दिया न। वो जो परम सत्य है, वो ऐसा है कि जिसके विषय में तुमने इतनी सी भी ध्वनि निकाल दी, तुमने उसको नाम दे दिया, तुमने कुछ भी कर दिया, तो तुमने उसको नीचे गिरा दिया, अपमान कर दिया उसका।

तो बुद्ध मौन हो जाते थे। उसी मौन का दूसरा नाम अद्वैत है। अहंकार को इस बात से बड़ी तृप्ति मिलती है जब वह कहता है कि देखो, वो अदृश्य है, इसलिए हम उसका चित्र नहीं बनाते। तुम चित्र नहीं बनाते, पर तुमने नाम तो दे दिया न। तो चित्र भर न बनाने से क्या होगा? नाम देते ही तुमने उसको अदृश्य कहाँ रहने दिया?

अच्छा एक बात बताइए। आपके दिमाग़ में हज़ार तरीक़े के नाम होंगे। नाम हैं हज़ार तरीक़े के? क्या एक भी नाम ऐसा है जिसको आप दिमाग़ में आने दें और कोई साथ में चित्र न उभरे? प्रयोग करके बताइए। कोई भी ऐसा नाम ले लीजिए, कोई भी नाम, जो नाम रहे, लेकिन उसका कोई चित्र न हो। कर सकते हैं? करिए। करिए, करिए, कल्पना करिए, प्रयोग करिए।

इसका विपरीत प्रयोग भी करिए। आपके दिमाग़ में चित्र-ही-चित्र, छवियाँ-ही-छवियाँ होती हैं। आप कोई भी छवि दिमाग़ में आने दीजिए। बताइए, क्या उस छवि के साथ कोई नाम नहीं जुड़ा हुआ? नहीं जुड़ा हुआ? छवि है तो नाम है, और नाम है तो छवि है।

तो फिर यह कहने से क्या फ़ायदा कि उसका नाम भर है, पर कोई छवि नहीं बन सकती? जहाँ नाम दे दिया, वहाँ छवि तो अपनेआप बन ही गयी न; भले ही आप स्वीकार न करो। भले ही आप उस छवि को इमारत पर न उकेरो या काग़ज़ पर न बनाओ, पर छवि तो कहीं-न-कहीं बन ही गयी है।

तो सनातन धर्म ने कहा, ‘जब छवि उसकी बननी ही है, जब ले-देकर के व्यावहारिक बात यही है कि पूजा तो छवि की ही होनी है, भले ही तुम मानो चाहे न मानो, भले ही तुम कितनी सतर्कता रख लो; पर व्यावहारिक बात, ज़मीनी बात यह है कि जब पूजा छवि की ही होनी है, तो क्यों न हम जीती-जागती छवियों की पूजा कर लें भाई?

जब पूजा छवि की ही होनी है, तो यह सब जो जीती-जागती छवियाँ घूम रही हैं, इनकी पूजा करने में क्या समस्या हो गयी और पूजा का मतलब यह नहीं है कि यह सब जो जीती-जागती छवियाँ घूम रही हैं, मैं इनको सत्य या हक़ मान रहा हूँ। नहीं।

पूजा करने का मतलब बस यह है कि मैं तुमको आदर दे रहा हूँ, तुम्हारा नमन कर रहा हूँ और कह रहा हूँ, ‘धन्यवाद है तुम्हारा कि तुम्हारे निकट आकर के मैं उस एक सत्य के पास आ जाता हूँ। तुम्हारे निकट आता हूँ, तो उसके निकट आ पाता हूँ।‘ पूजा का मतलब यह नहीं है कि गाय की पूजा हो रही है, या पत्थर या पेड़ की पूजा हो रही है।

इसका मतलब यह बिलकुल भी नहीं है। कौन कहता है कि गाय की पूजा का मतलब है कि गाय को मान लिया है कि गाय ही अन्तिम सत्य है? नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। गाय हो या कोई और जीव-जन्तु हो, कोई बुज़ुर्ग हो, किसी को कुछ मान लिया हो, पत्थर की कोई मूर्ति बना दी हो, उसकी पूजा में भाव बस इतना सा है, ‘यहाँ सिर झुकाता हूँ, तो मेरा अहंकार झुक जाता है।

यहाँ सिर झुकाता हूँ, तो अहंकार से आगे आत्मा तक जाने का रास्ता आसान हो जाता है।‘ इसका मतलब यह नहीं है कि मूर्ति में आत्मा है। नहीं, मूर्ति आत्मा नहीं है, मूर्ति सत्य नहीं है, बिल्कुल सही बात है; लेकिन मूर्ति द्वार है अमूर्त तक जाने का। यह है पूरा विज्ञान।

समझ में आ रही है बात?

ग़लती लेकिन उसमें जहाँ हो रही है, वह याद रखें। सनातन मार्गियों ने ग़लती यह करी है कि प्रतीकों के अर्थ भूल गये हैं। मूर्ति को अन्तिम समझ लिया है। मूर्ति को द्वार जानना भूल गये हैं। यहाँ सनातन मार्गियों ने ग़लती करी है।

यह ग़लती न करें, तो जो पूरी व्यवस्था बनायी गयी है पूजा की, उससे श्रेष्ठ कोई व्यवस्था हो नहीं सकती। सनातन व्यवस्था जो है, जिसमें प्रकृति पूजन का स्थान है, वह बड़ी गहरी बात है और बड़ी व्यावहारिक बात है। उसके बहुत लाभ हैं। वह एकदम आपको अन्त तक, मुक्ति तक लेकर जा सकती है, बशर्ते आप उस मार्ग पर ज्ञान से चलें।

जो भी प्रतीक आपके सामने आये जिसको आप नमन कर रहे हैं, आपको उस प्रतीक का ज्ञान होना चाहिए, अर्थ होना चाहिए। कोई फ़ायदा नहीं है हरि-हरि करने से, भगवान-भगवान करने से, किसी मूर्ति की पूजा करने से, किसी प्रतीक को आदर देने से, अगर आप हरि का अर्थ ही नहीं समझते।

हरि का ज्ञान हुए बिना हरि पूजन से कुछ नहीं मिलेगा। ओम क्या है, यह जाने बिना आप पचास हज़ार बार ओम-ओम करते रहो, ओंकार-ओंकार करते रहो, आपको कोई लाभ नहीं होगा। मंत्रों का, श्लोकों का अर्थ जाने बिना आप उनको दोहराते रहो, आपको कुछ नहीं मिलेगा समय की बरबादी के अलावा।

तो सनातन व्यवस्था में बहुत अच्छे-अच्छे प्रतीक उपलब्ध हैं, पर उनका अर्थ जानो। यूँ ही नहीं, बस बैठकर के गायत्री मंत्र का पाठ कर रहे हो, कोई और मंत्र उठा लिया, महामृत्युंजय मंत्र उठा लिया, यह सब चल रहा है। गाड़ी चला रहे हो, उसमें संस्कृत में श्लोक बज रहे हैं, मतलब किसी का कुछ नहीं पता, और सुने जा रहे हो। उससे कुछ नहीं मिलेगा। हाँ, समझ जाओ, तो तर जाओगे।

समझ में आ रही है बात?

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