प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हाल ही में वीडियो प्रकाशित हुआ है जिसका नाम है — “हिन्दू इतने देवी-देवताओं को क्यों पूजते हैं?” तो उसमें भी आपने यही समझाया था कि पूजन या पूजा तो देवी-देवताओं की ही हो सकती है, क्योंकि ब्रह्म की हम पूजा कर नहीं सकते। उसी सिलसिले में उसी वीडियो पर एक टिप्पणी आयी है जो में आपसे, आपकी आज्ञा हो तो मैं पढ़ना चाहूँगा।
ये भी एक मुस्लिम आपके श्रोता हैं, जिनकी ओर से यह टिप्पणी आयी है। और उनका मानना या उनकी टिप्पणी का जो सार है, वो यह है कि मैं तो स्थूल वस्तुओं की भी पूजा नहीं करूँगा क्योंकि इस्लाम बोलता है कि अल्लाह की ही पूजा होती है। मैं पढ़ देता हूँ एक बार — वो कहते हैं कि — वीडियो पर टिप्पणी लिखकर — कहते हैं कि मैं संतुष्ट नहीं हूँ गुरु जी, क्योंकि मालिक को छोड़कर किसी की भी पूजा नहीं की जा सकती है। पूजा के लिए तो सिर्फ़ मालिक ही है।
बाक़ी दुनिया की चीज़ों से मदद ली जा सकती है, लेकिन पूजा सिर्फ़ और सिर्फ़ मालिक और ब्रेकेट में लिखा है अल्लाह या ट्रूथ (सत्य) की ही की जा सकती है। आप गुरु जी हैं, मैं आपकी रेस्पेक्ट (सम्मान) करता हूँ और भी जो हो सकता है, वह सब करूँगा, मगर वरशिप या पूजा सिर्फ़ एक अल्लाह की ही करूँगा, क्योंकि पूजा के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे मालिक हैं। इस्लाम में सबसे बड़ा पाप मालिक को छोड़कर किसी की इबादत, पूजा या वरशिप करना है।
आचार्य प्रशांत: बहुत-बहुत बढ़िया बात लिखी है, और मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। देखो, मैं जो बात समझाना चाहता हूँ, वो ‘एक मालिक’ की पूजा के ख़िलाफ़ नहीं है। वो ‘एक मालिक’ की पूजा को सच्चाई और गहराई देने के लिए है। मैं भी कह रहा हूँ, ‘एक ही मालिक है, उसी की पूजा करनी है। एक मालिक है, उसी की करनी है। ठीक है।‘
मैं ‘आत्मा’ नाम से कहता हूँ। वेदान्त में जो एक है, एकमात्र सत्य, उसका क्या नाम है, आत्मा या ब्रह्म। मात्र एक वही है, वही है, वही है, वही है। तो सहमति हो गयी पूरी कि एक मालिक की ही पूजा करनी है। उसको आत्मा कहते हैं। बस एक है, उसी की पूजा और कुछ भी नहीं। लेकिन हम इस बात की थोड़ा आगे गहराई में जाते हैं।




