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ईश्वर कैसे मिलेंगे? || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, बहुत लम्बे समय तक कई वर्ष मैंने ध्यान की विधियों का प्रयोग करा, उसके बाद ईश्वर ने मुझे ओशो जी के पास भेज दिया और अन्ततः ओशो जी से ईश्वर ने मुझे आपके पास भेज दिया। तो अब आप ही मुझे बताइए कि मुझे ईश्वर कैसे मिलें। (शुभम, झारखण्ड से)

आचार्य प्रशांत: चलो, तुम्हारे सवाल से ही देख लेते हैं कि ईश्वर कैसे मिलेंगे। कह रहे हो कि पहले ध्यान कि कुछ विधियों का सहारा लेते थे ईश्वर को पाने के लिए, ठीक है? फिर कह रहे हो कि ईश्वर ने तुमको ओशो जी के पास भेज दिया, फिर कह रहे हो कि ओशो जी के बाद ईश्वर ने तुम्हें मेरे पास भेज दिया।

तो ईश्वर तुमसे कैसे मिलने आये थे? तुम्हें किस तरह से निर्देश देते थे? ईश्वर तुम्हें कैसे निर्देश देते थे कि अब जाओ ओशो जी के पास, या कि हो गया अब ओशो जी के पास, बहुत समय हो गया, अब तुम प्रशांत जी के पास जाओ। ये तुम्हें सूचनाएँ ईश्वर से किस तरह से मिलती थी? लिफ़ाफ़ा आता था, ईमेल आती थी, व्हाट्सएप आता था, वो ख़ुद आते थे, द्वार खटखटाते थे? कैसे? कैसे होता था? या जब तुमने ध्यान करना भी शुरू किया था तो ये तुम्हें कैसे पता चला था कि ध्यान करना चाहिए?

मैं तुम्हारे इसी प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ कि तुम ईश्वर से मिलना चाहते हो। तुम कह रहे हो कि आचार्य जी, मुझे ईश्वर से मिलवाइए। उससे पहले तुम कह रहे हो ईश्वर ने मुझे यहाँ भेजा, वहाँ भेजा, ये करवाया, वो करवाया। जैसे तुम्हें ईश्वर ने अभी तक सहायता दी, निर्देश दिये उसी से समझ जाओ कि ईश्वर से कैसे मिलना है।

ईश्वर कोई व्यक्ति तो है नहीं कि सामने आकर के तुम्हारे खड़े हो जाएँगे; वो किसी भाषा में तो बोलते नहीं कि तुमसे हिन्दी, अंग्रेज़ी, बांग्ला किसी भाषा में संवाद करेंगे।

ईश्वर क्या हैं? ईश्वर तुम्हारे ही भीतर की वो ताक़त है जो तुम्हें सत्प्रेरणा देती है। ईश्वर ऐसे हैं जैसे दूर कहीं कोई रोशनी हो। अन्धेरा जगत है जिसमें दूर कहीं कोई रोशनी है और तुम्हें उस रोशनी तक पहुँचना है, ठीक है? तुम्हें उस रोशनी तक पहुँचना है, जैसा तुम यहाँ कह रहे हो कि तुम ईश्वर तक पहुँचना चाहते हो। कैसे पहुँचोगे उस रोशनी तक? तुम्हारी दुनिया में तो अन्धेरा-ही-अन्धेरा है, तुम्हारे रास्ते पर भी अन्धेरा छाया हुआ है, उस रोशनी तक कैसे पहुँचोगे? उस रोशनी का ही सहारा लेकर। वही रोशनी तुम्हें दिखा रही है कि रास्ता कहाँ ऊबड़–खाबड़ है, कहाँ मोड़ ले रहा है, कहाँ चढ़ाई है, कहाँ काँटे हैं, कहाँ अवरोध है, किधर को चढ़ना, किधर को मुड़ना, ये सब तुम कैसे देख पा रहे हो? उसी रोशनी के प्रकाश में जिस तक तुम पहुँचना चाहते हो।

तो ईश्वर लक्ष्य भी है और पथ प्रदर्शक भी, ईश्वर मंज़िल भी है और मंज़िल तक ले जाने वाला हमसफ़र भी, हमराही भी, मित्र भी, बशर्ते तुम उसकी ओर पीठ न करो। रोशनी सामने है। उस रोशनी का प्रयोग करके तुम रास्ता देख पाओ इसके लिए बहुत ज़रूरी है कि तुम्हारी आँखें लगातार सामने की ओर ही रहे। तुम उसकी ओर पीठ भी कर सकते हो फिर न तो कोई रोशनी, न रोशनी तक पहुँचने वाला कोई रास्ता। किसी बाहरी ईश्वर में विश्वास करना फ़िज़ूल है। कोई बाहरी ईश्वर या गॉड होता भी नहीं है। अरे! बाहर ही कुछ नहीं होता तो बाहर ईश्वर कहाँ से हो जाएगा?

तुम्हारे ही मन के केन्द्र का नाम है ईश्वर। तुम्हारे ही इरादों की सच्चाई का नाम है ईश्वर। और यहाँ जो मूल बात है उसको पकड़ लो अच्छे से — जिस तक तुम्हें पहुँचना है वही तुम्हें उस तक पहुँचने की, स्वयं तक पहुँचने की शक्ति भी देगा, बुद्धि भी देगा। ये बात है ईश्वर के साथ।

तुम्हारे ही भीतर से कोई प्रेरणा उठी होगी न जो तुमने तय किया कि अब तुम्हें मेरे वीडियोज़ देखने हैं और तुमने चार महीने, छः महीने, साल भर जितना भी होगा वो वीडियो वगैरह देखे होंगे। ये बात तुमसे विवश करके तो नहीं करायी गयी, तुमने स्वयं ही फ़ैसला लिया न। वो तुम्हारे भीतर की सच्चाई जो तुमसे ये फ़ैसला करवा रही है, उसको ईश्वर बोलते हैं। उसके बाद स्वयं तुमने ये फ़ैसला किया होगा कि अब तुम शिविर में भाग लोगे और मुझसे सवाल वगैरह पूछोगे — ये भी तुमसे किसी ने मजबूरन या ज़बरदस्ती तो नहीं करवाया, तुम्हीं ने स्वयं फ़ैसला करा न। यही सब जो तुम फ़ैसले कर रहे हो इन्हीं में ईश्वर छुपा हुआ है।

तुम्हारे भीतर दोनों हैं — सच्चाई भी, झूठ भी; ईश्वर भी, माया भी। और तुम्हें पूरी छूट है, तुम किसी भी ओर जा सकते हो। ईश्वर तुम्हें फिर कैसे मिलेंगे? जो तुम्हारा प्रश्न है, ईश्वर तुम्हें मिलेंगे जीवन में ईश्वर का चुनाव करके। ज़िन्दगी के बड़े-से-बड़े चुनाव हों या छोटे-से-छोटे चुनाव हों, ले-देकर हर चुनाव में दो ही तुम्हारे सामने रास्ते होते हैं — एक रास्ता सच का, एक झूठ का, एक ईश्वर का, एक माया का।

ईश्वर तुम्हें मिलेंगे या नहीं मिलेंगे, ये ईश्वर पर नहीं निर्भर करता और ये किसी गुरु वगैरह पर भी नहीं निर्भर करता है, ये तुम्हारे चुनाव पर निर्भर करता है। लालच में, डर में, भ्रम में, बेहोशी में निर्णय लोगे तो तुमने माया को चुन लिया; प्रेम में, सच्चाई में, करुणा में, निस्वार्थ–निष्काम निर्णय लोगे तो तुमने ईश्वर को चुन लिया — ऐसे मिलते हैं ईश्वर।

तो अपने प्रश्न को थोड़ा बदलो। ये मत पूछो कि तुम्हें ईश्वर कैसे मिलेंगे। तुम ये पूछो कि तुम ईश्वर को कैसे मिलोगे, क्योंकि ईश्वर तो तुम्हें मिले हुए हैं, वो तुम्हारे ही भीतर बैठे हुए हैं; तुम ईश्वर से दूर भागते हो। कभी उन्हें पीठ दिखा देते हो, कभी उनकी सुनते नहीं, कभी उनको चुनते नहीं। तुम्हें चुनना है ईश्वर को, तुम उन्हें चुनते चलो। जैसे एक-के-बाद-एक तुमने यहाँ अभी उल्लेख करा कि सीढ़ियाँ चढ़ते गये हो, वैसे ही सीढ़ियाँ चढ़ते–चढ़ते अन्ततः जो आख़िरी है, उस तक भी पहुँच जाओगे।

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