प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, बहुत लम्बे समय तक कई वर्ष मैंने ध्यान की विधियों का प्रयोग करा, उसके बाद ईश्वर ने मुझे ओशो जी के पास भेज दिया और अन्ततः ओशो जी से ईश्वर ने मुझे आपके पास भेज दिया। तो अब आप ही मुझे बताइए कि मुझे ईश्वर कैसे मिलें। (शुभम, झारखण्ड से)
आचार्य प्रशांत: चलो, तुम्हारे सवाल से ही देख लेते हैं कि ईश्वर कैसे मिलेंगे। कह रहे हो कि पहले ध्यान कि कुछ विधियों का सहारा लेते थे ईश्वर को पाने के लिए, ठीक है? फिर कह रहे हो कि ईश्वर ने तुमको ओशो जी के पास भेज दिया, फिर कह रहे हो कि ओशो जी के बाद ईश्वर ने तुम्हें मेरे पास भेज दिया।
तो ईश्वर तुमसे कैसे मिलने आये थे? तुम्हें किस तरह से निर्देश देते थे? ईश्वर तुम्हें कैसे निर्देश देते थे कि अब जाओ ओशो जी के पास, या कि हो गया अब ओशो जी के पास, बहुत समय हो गया, अब तुम प्रशांत जी के पास जाओ। ये तुम्हें सूचनाएँ ईश्वर से किस तरह से मिलती थी? लिफ़ाफ़ा आता था, ईमेल आती थी, व्हाट्सएप आता था, वो ख़ुद आते थे, द्वार खटखटाते थे? कैसे? कैसे होता था? या जब तुमने ध्यान करना भी शुरू किया था तो ये तुम्हें कैसे पता चला था कि ध्यान करना चाहिए?
मैं तुम्हारे इसी प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ कि तुम ईश्वर से मिलना चाहते हो। तुम कह रहे हो कि आचार्य जी, मुझे ईश्वर से मिलवाइए। उससे पहले तुम कह रहे हो ईश्वर ने मुझे यहाँ भेजा, वहाँ भेजा, ये करवाया, वो करवाया। जैसे तुम्हें ईश्वर ने अभी तक सहायता दी, निर्देश दिये उसी से समझ जाओ कि ईश्वर से कैसे मिलना है।
ईश्वर कोई व्यक्ति तो है नहीं कि सामने आकर के तुम्हारे खड़े हो जाएँगे; वो किसी भाषा में तो बोलते नहीं कि तुमसे हिन्दी, अंग्रेज़ी, बांग्ला किसी भाषा में संवाद करेंगे।


