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जिनका मूर्ति के सामने सर न झुकता हो || आचार्य प्रशांत (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं किसी भी मूर्ति के सामने सर नहीं झुका पाता हूँ, जैसे मेरी आत्मा इजाज़त नहीं देती इसके लिए। कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिए।

आचार्य प्रशांत: यहाँ कोई ऐसा नहीं है जो मूर्ति-पूजक न हो।

मूर्ति का मतलब समझते हो? मूर्त माने जानते हो क्या होता है? मूर्त माने प्रकट, मूर्त माने भौतिक, मूर्त माने पदार्थ। और पूजा माने क्या होता है? जिसके सामने सर झुका दिया जाए; जब सर झुका दिया तो पूजन।

कोई है यहाँ ऐसा जो पदार्थ के सामने सर नहीं झुकाए हुए है? मूर्ति-पूजा माने किसी प्रकट चीज़ के सामने सर झुका देना। हमारा तो दिन में सौ दफ़े सर झुका ही रहता है; और प्रकट चीज़ों के सामने ही तो झुकता है, अलौकिक के सामने थोड़ी सर झुकता है? अभी पुलिस यहाँ आ जाए तो सर झुका दोगे कि नहीं? और पुलिस मूर्त है कि नहीं? मूर्त माने क्या? प्रकट, भौतिक, प्रत्यक्ष। पुलिस मूर्त है कि नहीं है? बॉस तुम्हारा मूर्त है कि नहीं है? पैसा मूर्त है कि नहीं है?

तो जब उन सब मूर्तियों के सामने सर झुकाते ही रहते हो, तो कुछ जानकार लोगों ने, प्रेमी लोगों ने तुम्हें एक विधि दी। उन्होंने कहा, 'सर तो तुम्हारा भाई ऐसा है जो झुका ही रहता है हर समय। कभी पैसे के सामने झुक जाता है, कभी डर के सामने झुक जाता है, कभी वासना के सामने झुक जाता है; कभी एक शख्स के सामने झुकता है, कभी दूसरे के सामने झुकता है। हर समय तो तुम्हारा सर झुका ही रहता है। तो तुम एक काम करो, तुम संसार के सामने सर झुकाना बंद करो! लेकिन सर को जो ये झुकने की आदत है, तो इस आदत की खातिर हम तुमको एक मूर्ति दिए देते हैं, वो मूर्ति ऐसी होगी जो बाकी सारी मूर्तियों का खंडन कर देगी।'

वास्तव में मूर्ति-पूजा तुमसे कहती है कि बाकी मूर्तियों की पूजा बंद करो। तुम अरबों मूर्तियों की पूजा कर रहे हो; मूर्ति-पूजा का सिद्धांत है कि बाकी मूर्तियों की पूजा जाए, अब शिव की मूर्ति रख दी है और मात्र शिव की पूजा होगी। शिव की पूजा का अर्थ ये नहीं है कि किसी विशिष्ट शिव की पूजा शुरू हो गई। शिव की पूजा सकारात्मक बात नहीं है, कि कोई नई चीज़ तुमने शुरू कर दी; शिव की पूजा पूरे तरीक़े से निषेध है, नकार है, किस बात का? बाकी मूर्तियों की पूजा करने का।

तो सनातन-धर्म हो, और वो सारे धर्म जो बिल्कुल मूर्ति-पूजा के विरोधी हैं, जैसे इस्लाम, वास्तव में वो बात एक ही कह रहे हैं। इस्लाम कहता है, 'किसी मूर्ति को मत पूजना।' और जब तुम शिव के सामने सर झुकाते हो, तब भी ठीक यही हो रहा है, कि अब शिव के सामने सर झुका दिया, अब किसी और मूर्ति के सामने सर नहीं झुकेगा। कोई मूर्ति हो, कोई शख्सियत, कोई विचार, कोई लालच, कोई डर; अब सर नहीं झुकेगा क्योंकि अब सर शिव की मूर्ति के सामने झुक गया।

मूर्ति-पूजा का विरोध वो करे जो किसी मूर्ति के सामने झुकता नहीं हो।

हम तो हर चौराहे, हर नुक्कड़, हर दफ़्तर, हर घर, सर झुकाए ही रहते हैं; और वो मूर्तियों के सामने ही झुकाते हैं। तो हमारे मन में मूर्ति-पूजा का कैसा विरोध? कहते हो, 'मेरी आत्मा इजाज़त नहीं देती।' ये कैसी आत्मा है जो हर जगह सर झुकाने की इजाज़त दे देती है और इनके सामने, कृष्ण के सामने सर झुकाने की इजाज़त नहीं देती? अभी भीतर वासना का उद्वेग उठे, तुम्हारा सर झुक जाएगा; अभी भीतर रुचियों का आवेग उठे, तुम्हारा सर झुक जाएगा; अभी भीतर से भूख या प्यास उठे, तुम्हारा सर झुक जाएगा; इनके सामने नहीं झुक सकता। इनके सामने झुकने का ये मतलब नहीं है कि कोई बंसी-बजैया है, ग्वाला है, उसके सामने सर झुका दिया। दोहरा रहा हूँ इस बात को, यहाँ सर झुकाने का मतलब होता है कि अब सर कहीं और नहीं झुकेगा; और जब सर कहीं और झुकना बंद हो जाता है, तब फिर ये भी मूर्ति नहीं रह जाती।

एक दफ़े धर्मशाला में था, तो मेरे साथ थे; रहते ही हैं। किसी ने पूछा कि आप तो अद्वैत की बात करते हैं, और विशुद्ध-अद्वैत में मूर्तियों का कोई स्थान नहीं हो सकता, तो बगल में आपने मूर्ति क्यों रखी?

अब मेरा कोई विशेष आग्रह भी नहीं था कि रखा जाए, पर प्रेम-पूर्वक ही लोग रख देते हैं, तो मुझे अच्छा ही लगता है। मेरा विशेष आग्रह इसलिए नहीं रहता क्योंकि ये नहीं भी रखे गए तो ये हैं; वहाँ नहीं होंगे तो यहाँ (हृदय में) हैं, वहाँ हैं भी तो भी यहाँ हैं। जो सर्वत्र ही है उसकी मूर्ति रखो या नहीं रखो, मुझे अंतर नहीं पड़ता; नहीं रखी तो भी, और रख दो तो भी मुझे कोई विरोध नहीं है। तो मूर्ति रखी हुई थी। साहब ने सवाल किया, 'विशुद्ध-अद्वैत में मूर्ति की क्या जगह है?' मैंने कहा, 'मूर्ति है कहाँ? शिव हैं। तुम्हें मूर्ति दिखती है?' मैंने कहा, 'मुझे मूर्ति दिखाओ! मुझे मूर्ति दिख ही नहीं रही। शिव हैं; उधर भी, इधर भी, चारों ओर।'

तो जब बाकी मूर्तियों के सामने सर झुकना तुम्हारा बंद हो जाएगा, तब ये मूर्ति भी दिखनी बंद हो जाएगी, कहोगे, 'शिव हैं, मात्र शिव, और कोई नहीं। मूर्ति कहाँ है?' मूर्ति तक तुम्हें ले ही इसलिए जाते हैं ताकि तुम अमूर्त में प्रवेश कर सको, ताकि मूर्ति से आगे जा सको। मूर्ति इसलिए नहीं होती कि तुम मूर्ति को जाकर के जन्माष्टमी पर खीर चटाओ; वो मूर्ति के साथ दुराचार है। मूर्ति इसलिए नहीं होती कि मूर्ति लेकर के उसको झूला झुलाओ; ये तुमने मूर्ति को अपने अहंकार का एक हिस्सा बना लिया।

मूर्ति इसलिए होती है कि ‘मूर्ति’ को देखो और ‘मूर्त’ से आगे निकल जाओ।

बाहर वाले मूर्त से आगे तुम तब निकलोगे जब भीतर जो कुछ मूर्त है उससे आगे निकल जाओ। मूर्त माने मानसिक; जब भीतर तुम मन से बाहर निकल जाओगे, मन से आगे निकल जाओगे, तब बाहर तुम मूर्ति से आगे निकल जाओगे।

प्र२: आचार्य जी, आपकी किताबों पर सिर्फ़ आपकी ही फ़ोटो (तस्वीर) क्यों छपी होती है?

आचार्य: तुम किसी ऐसे के पास आज तक गए हो जिसकी फ़ोटो न देखी हो कभी?

तुम्हें तो परमात्मा के पास भी जाना होता है तो पहले क्या करते हो? उसकी मूर्ति बनाते हो। जिस दिन तुम ऐसे हो जाओगे कि चित्र से, रूप से, रंग से, नाम और आकार से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं रहेगा, उस दिन इस चित्र की भी ज़रूरत नहीं रहेगी। भीतर जो कुछ है वो बार-बार तुम्हें यही बताएगा कि शरीर, नाम, रूप, रंग, चेहरा धोखा हैं, आने-जाने वाली चीज़ हैं, भ्रम हैं; पर भीतर तुम पहुँच सको इसलिए पहले बाहर तक तो आना ज़रूरी है न? तुम उन ही द्वारों पर जाते हो जिन द्वारों से तुम्हारा परिचय है, अपरिचित से घबराते हो; तो तुम्हें अपरिचित तक भी अगर ले जाना है, तो किसी परिचित के माध्यम से ले जाना पड़ेगा।

जैसे, बाप अपने बेटे की उँगली पकड़े और किसी नए मैदान में ले जाए। बेटा घबरा रहा हो, बाप कहे, 'ना! मैदान तेरे लिए नया है; मैं तो पुराना हूँ। इस नए देश को नहीं जानता, इस नए आयाम को नहीं जानता, तू मुझे तो जानता है न? मेरे साथ है तू, चल!'

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