प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये है कि बहुत सारी कहानियों में, जैसे राम और कृष्ण की कहानी हम पढ़ते हैं या कोई और भी। इन अवतारों को बचपन से ही बहुत ऐसे दिखाया जाता है कि इनमें बचपन से ही सारे गुण थे, या ये बचपन से ही अच्छे थे, निपुण थे हर कार्य में। आपका भी जब मैं डिस्क्रिप्शन (विवरण) पढ़ रही थी, तो उसमें लिखा हुआ था कि आप बचपन से ही असाधारण बालक थे। तो क्या एक एक्स्ट्रा ऑर्डनेरी स्टेट (असाधारण अवस्था) विकसित की जा सकती है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, दोनों तरह की बातें मिलती हैं कथाओं में। ये तो मिलता है कि बचपन से ही विशेष थे, लेकिन साथ-ही-साथ जो साधारण मानवीय गुण हैं, वो भी अवतारों के वर्णन में खूब देखने को मिलते हैं। तो आप नहीं कह सकते कि आपको अवतारों में बस विशिष्टताएँ ही मिलती हैं।
सीता खो गयी हैं, राम रो रहे हैं, इसमें आपको मानवीयता नहीं दिख रही है? ये तो कोई भी साधारण पति या प्रेमी करेगा। कुछ जान नहीं पा रहे हैं, तो इंसानों को तो छोड़ दो, पेड़-पौधों, पक्षियों से पूछ रहे हैं, “तुम देखी सीता मृगनयनी?” इसमें आपको कौनसी सिद्धि दिखाई दे रही है? कोई विशेष सिद्धि वगैरह होती, तो आँख बन्द करते, पता चल जाता कि रावण ले गया।
यहाँ तो उनको पूरी तरह मानवीय ही दिखाया गया है न? अगर मानवीय नहीं दिखाएँगे, तो अवतार की जो पूरी प्रक्रिया है, वो बाधित हो जाएगी। अवतार क्या होता है? अवतार वो होता है जो बहुत कुछ आपके जैसा है, लेकिन आपके जैसा होते हुए भी वो संकल्प और साहस करता है आत्मा जैसा होने का; उसको अवतार बोलते हैं।
उसमें दोनों चीज़ें पायी जाती हैं एक साथ। अवतार आदर्श नहीं हो सकता। आदर्श का क्या मतलब होता है? आदर्श का मतलब होता है कि एक विचार है, एक कल्पना है, और उसी कल्पना के तल पर उसका निर्माण कर दिया गया है। लेकिन अवतार कोई तभी हो सकता है, जब उसमें आपको कुछ मानव सुलभ गुण और दुर्बलताएँ भी देखने को मिलें। अगर आपको कोई ऐसा अवतार मिलता है जिसमें आपको कोई कमियाँ, कोई खामियाँ नज़र नहीं आ रही हैं, तो वो अवतार है ही नहीं।










