(गीता-14) चिंताओं की नदियाँ, समुद्र को चंचल नहीं कर पातीं || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर(2022)

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।
जिस प्रकार अनेक नदियों का जल समुद्र में निरन्तर प्रविष्ट होता रहता है, किन्तु समुद्र उससे विक्षुब्ध नहीं होता अर्थात् बढ़ नहीं जाता, इस प्रकार आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित जिस योगी के मन में विषय की चिन्ताएँ प्रविष्ट होकर भी उसे चंचल नहीं कर सकतीं, वही परम-शान्ति प्राप्त करता है, किन्तु जो विषय भोग की कामना करता है, वह कभी स्थायी शान्ति नहीं पा सकता।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ७०
आचार्य प्रशांत: जिस तरह अनेक नदियों का पानी समुद्र में लगातार मिलता रहता है लेकिन समुद्र उससे विक्षुब्ध नहीं हो जाता, माने परेशान नहीं हो जाता, माने बढ़ नहीं जाता, माने अपनी अवस्था बदल नहीं देता। जिस तरह इतनी नदियाँ आकर के अपना पानी उड़ेलती रहती हैं समुद्र में लेकिन समुद्र, समुद्र जैसा ही रहता है। उसी तरह आत्मज्ञानी विषयों की चिन्ताएँ लेकर भी चंचल नहीं हो जाता।
जैसे समुद्र इतनी नदियों को लेकर भी बदल नहीं जाता, क्षुब्ध नहीं हो जाता, उसी तरह आत्मज्ञानी के मन में भी चिन्ताओं की इतनी नदियाँ प्रवेश करती हैं पर वो उसके मन रूपी समुद्र को चंचल नहीं कर पातीं, वह शान्त रहता है। लेकिन जो विषयों की, भोगों की कामना करते हैं वो कभी स्थायी शान्ति पा नहीं सकते।
अब ये बात समझिए। किसी ने अभी थोड़ी देर पहले प्रश्न पूछा था, ‘आचार्य जी, आप संस्था में रहते हैं, आपको संस्था के लोगों पर कभी गुस्सा आता है, कभी दुख होता है?’ हाँ, गुस्सा भी आता है बहुत, दुख भी बहुत होता है, सब होता है। आपको ये कल्पना भी क्यों हो रही है कि कोई एक आदर्श स्थिति है जिसमें न दुख है, न चिन्ता है, न क्षोभ है, न क्रोध है? वो सब रहेगा।









