ईश्वर कौन है, और उसने संसार की रचना क्यों करी? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ईश्वर कौन है और उसने संसार कि रचना क्यों करी?
आचार्य प्रशांत: ठीक है, बैठो। तो यह बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है क्योंकि सत्य में या ब्रह्म में हमारी कोई रुचि हो-न-हो लेकिन ईश्वर में सबकी रुचि होती है और धर्म का सम्बन्ध ही ज़्यादातर ईश्वर से जोड़कर देखा जाता है, हैं न। ठीक।
ईश्वर माने क्या? सबसे पहले तो जो ईश्वर की आम परिभाषा है कि ईश्वर वो जिसने श्रृष्टि की रचना की, ईश्वर वो जिसने श्रृष्टि की रचना की। जैसे ही आप कहेंगे कि एक रचित वस्तु है श्रृष्टि, एक चीज़ है, श्रृष्टि वैसे ही वेदान्त आपसे तत्काल क्या पूछेगा, किसके लिए है श्रृष्टि? ठीक है? तो आप कहेंगे, ‘श्रृष्टि तो है ही क्योंकि मैं उसका अनुभव कर पाता हूँ। मेरी देह है, मैं अनुभव कर रहा हूँ और देह अगर एक कुर्सी पर बैठी है तो कुर्सी भी है, कुर्सी मंच पर रखी है तो मंच भी है।‘ फिर धरती है और धरती है तो फिर पूरी-की-पूरी सौरमण्डल है, नक्षत्र है, आकाशगंगाएँ हैं, समूचा ब्रह्माण्ड है, सब कुछ है फिर तो।
तो ईश्वर का सम्बन्ध फिर सीधे-सीधे हो गया यह जो देख रहा है श्रृष्टि को और जो दिख रही है श्रृष्टि, इन दोनों से। ठीक है? क्योंकि जब हम ईश्वर का पारिभाषिक गुण ही यह बता रहे हैं कि वो है श्रृष्टि का रचनाकार, तो हमें देखना पड़ेगा कि श्रृष्टि माने क्या? श्रृष्टि माने ये दो, एक देखने वाला और एक दिखाई देने वाला दृश्य। अब यह जो देखने वाला और दिखने वाला है इन्हीं दोनों के लिए एक संयुक्त नाम होता है प्रकृति। प्रकृति माने यही दो— दृष्टा और दृश्य, अनुभोक्ता और भोग्य विषय, इन दोनों के लिए एक नाम है प्रकृति।
अब प्रकृति में जो एकमात्र नियम चलता है वो चलता है कारण, कॉज़ेशन का। ऐसे कि गेंद ऊपर जाती है तो नीचे आती है, नीचे यूँ ही नहीं आ गयी पहले ऊपर गयी थी इसलिए नीचे आ गयी। ठीक है? मेज़ पर हाथ मरूँगा तो आवाज़ होगी, आवाज़ यूँ ही नहीं होगी उसके पीछे एक कारण था। तो प्रकृति का संचालक कोई नहीं है। प्रकृति को चलाने वाला कोई नहीं है, प्रकृति को चलाने वाला तो बस कर्मफल का नियम है, कारणता, उसके अलावा कुछ नहीं है जो प्रकृति को चलाता हो।



