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ईश्वर कौन है, और उसने संसार की रचना क्यों करी? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
81 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ईश्वर कौन है और उसने संसार कि रचना क्यों करी?

आचार्य प्रशांत: ठीक है, बैठो। तो यह बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है क्योंकि सत्य में या ब्रह्म में हमारी कोई रुचि हो-न-हो लेकिन ईश्वर में सबकी रुचि होती है और धर्म का सम्बन्ध ही ज़्यादातर ईश्वर से जोड़कर देखा जाता है, हैं न। ठीक।

ईश्वर माने क्या? सबसे पहले तो जो ईश्वर की आम परिभाषा है कि ईश्वर वो जिसने श्रृष्टि की रचना की, ईश्वर वो जिसने श्रृष्टि की रचना की। जैसे ही आप कहेंगे कि एक रचित वस्तु है श्रृष्टि, एक चीज़ है, श्रृष्टि वैसे ही वेदान्त आपसे तत्काल क्या पूछेगा, किसके लिए है श्रृष्टि? ठीक है? तो आप कहेंगे, ‘श्रृष्टि तो है ही क्योंकि मैं उसका अनुभव कर पाता हूँ। मेरी देह है, मैं अनुभव कर रहा हूँ और देह अगर एक कुर्सी पर बैठी है तो कुर्सी भी है, कुर्सी मंच पर रखी है तो मंच भी है।‘ फिर धरती है और धरती है तो फिर पूरी-की-पूरी सौरमण्डल है, नक्षत्र है, आकाशगंगाएँ हैं, समूचा ब्रह्माण्ड है, सब कुछ है फिर तो।

तो ईश्वर का सम्बन्ध फिर सीधे-सीधे हो गया यह जो देख रहा है श्रृष्टि को और जो दिख रही है श्रृष्टि, इन दोनों से। ठीक है? क्योंकि जब हम ईश्वर का पारिभाषिक गुण ही यह बता रहे हैं कि वो है श्रृष्टि का रचनाकार, तो हमें देखना पड़ेगा कि श्रृष्टि माने क्या? श्रृष्टि माने ये दो, एक देखने वाला और एक दिखाई देने वाला दृश्य। अब यह जो देखने वाला और दिखने वाला है इन्हीं दोनों के लिए एक संयुक्त नाम होता है प्रकृति। प्रकृति माने यही दो— दृष्टा और दृश्य, अनुभोक्ता और भोग्य विषय, इन दोनों के लिए एक नाम है प्रकृति।

अब प्रकृति में जो एकमात्र नियम चलता है वो चलता है कारण, कॉज़ेशन का। ऐसे कि गेंद ऊपर जाती है तो नीचे आती है, नीचे यूँ ही नहीं आ गयी पहले ऊपर गयी थी इसलिए नीचे आ गयी। ठीक है? मेज़ पर हाथ मरूँगा तो आवाज़ होगी, आवाज़ यूँ ही नहीं होगी उसके पीछे एक कारण था। तो प्रकृति का संचालक कोई नहीं है। प्रकृति को चलाने वाला कोई नहीं है, प्रकृति को चलाने वाला तो बस कर्मफल का नियम है, कारणता, उसके अलावा कुछ नहीं है जो प्रकृति को चलाता हो।

और हम कहते हैं ईश्वर प्रकृति को रचता है और चलाता है। जहाँ तक रचने की बात है कोई वस्तु है नहीं जिसे रचा गया हो, एक प्रक्षेपित छवि है जिसके मूल में दृष्टा बैठा हुआ है। तो अगर आप बिलकुल खरी-खरी बात कहना चाहेंगे तो आप कहेंगे कि जो यह दृश्य श्रृष्टि है, इसको रचने वाला तो दृष्टा ही है तो रचनाकार का किस्सा तो यहीं ख़त्म हो गया।

आपने रचा है और इसी कारण सबके जगत अलग-अलग होते हैं। दोनों तरीक़े से अलग होते है, तथ्य के तरीक़े से भी और अर्थ के तरीक़े से भी।

अगर किसी एक ने ही रचा होता तो एक ही चीज़ होती न जो रचित है, पर नहीं, सबके जगत अलग-अलग होते हैं। हम अभी बात कर रहे थे कल ही कि मैं आपसे जो कह रहा हूँ कि लिखिएगा कि मैंने क्या कहा तो आप सब अलग-अलग बातें लिखेंगे और इतना ही नहीं यदि अभी यहाँ पर मनुष्यों के अलावा अन्य प्रजाति के जीव ले आए जाए तो उन्होंने तथ्य के तौर पर भी बहुत कुछ ऐसा सुना होगा जो आपने नहीं सुना होगा। तो जगत सबके अलग-अलग होते हैं। पहली बात तो यह कि अगर यहाँ पर दूसरे जीव हों तो उनके तथ्य ही दूसरे होंगे और अगर दूसरे नहीं भी जीव हैं सिर्फ़ एक ही प्रजाति, मनुष्य प्रजाति के जीव भी जो यहाँ बैठे हैं तो मैं जो बात कह रहा हूँ उसके अर्थ सबने अलग-अलग निकाले होंगे।

तो हम अपने अनुसार —जैसे हम बने बैठे हैं— हम अपने अनुसार तथ्य और अर्थ दोनों की रचना करते हैं, इसमें ईश्वर का क्या काम? आपका जगत तो आपके द्वारा रचित है ईश्वर ने कहाँ रचा है? आप बदल जाते हो आपका जगत बदल जाता है, कि नहीं बदल जाता है? आपको अभी कुछ ऐसी सूचना दे दी जाए जो अभी आपको बिलकुल पता ही नहीं है, एक क्षण में आपकी दुनिया बदल जाएगी। बताइए ईश्वर ने रची है क्या?

आपको कुछ नयी सूचना मिल गयी आप ही बदल गए, आपकी पूरी दुनिया बदल जाती है तो ईश्वर नहीं रचनाकार है, रचनाकार तो अहंकार है। कोई पूछे कि दुनिया किसने रची है तो कहिए कि अहंकार ने रची है, अहंता ने रची है। इसमें ईश्वर का काम नहीं है और न ईश्वर इस दुनिया का संचालक है, संचालक तो कार्य-कारण का नियम है। गाड़ी आगे कैसे बढ़ रही है? ईश्वर नहीं बढ़ा रहा। बढ़ाने वाला बढ़ा रहा और बढ़ाने वाला माने जो कर्ता है, वो अहंकार है। और अहंकार दो काम करता है न, एक प्रक्षेपण और दूसरा कर्तृत्व। अहंकार के हम यही दो गुण सदा देखते है न, एक वो प्रक्षेपक है और दूसरा वो कर्ता है।

अब जिन्होंने समझा है ज्ञानियों ने, ऋषियों ने, उन्होंने ये दोनों काम तो अहंकार के जिम्मे डाले हैं, प्रक्षेपण भी और कर्तृत्व भी तो बनाने वाला भी कौन है? अहंकार। और चलाने वाला भी कौन है?

लेकिन जो नहीं समझते वो कह देते हैं कि ईश्वर ने बनाया है और ईश्वर ने चलाया। न ईश्वर ने बनाया, न ईश्वर ने चलाया। बनाने वाला भी अहंकार है, चलाने वाला भी अहंकार है। तो जहाँ तक निरहंकार माने सत्य की बात है वहाँ फिर क्या है? वो क्या करता है? साहब, वहाँ न कुछ बना है न कुछ चला है, वहाँ तो जो है वो अटल, अचल, अडिग, मौन, पूर्ण है। वहाँ रचना का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि अनन्त कुछ रच नहीं सकता अपने अतिरिक्त और अपने जैसा ही वो कुछ रचेगा तो वो अनन्त में ही समाया हुआ होगा।

अनन्त का अर्थ समझते हैं? अनन्त माने जिसमें दूसरे की गुंजाइश हो ही नहीं। ऐसा रचनाकार जिसके पास रचने की भी गुंजाइश नहीं है क्योंकि रचना भी रचनाकार से भिन्न हो जाती है।

तो सत्य न तो कुछ रचता है न ही कुछ चलाता है। तो सत्य है क्या? वो कुछ भी नहीं करता? करता क्या है दिन भर? वहाँ न दिन है, न रात है, बस बैठा रहता है? न वहाँ बैठने को कुछ है, न खड़े होने को कुछ है। तो है क्या? चुप हो जाओ, इतने सवाल नहीं करते।

सत्य का काम न बनाना है न चलाना है पर हमारी बहुत रुचि रहती है कि बनाया किसने, चला कौन रहा? ईश्वर के मत्थे यही दो चीज़ें तो हम डालते हैं। हे सृजनहार हे रचनाकार ऐसे ही तो संबोधित करते हैं न। क्यों करते हैं उसका मनोवैज्ञानिक कारण समझिए। हमारे लिए बड़ा ज़रूरी है, हमारी विवशता है मानना कि दुनिया है। क्योंकि नहीं मानेंगे कि दुनिया है तो कैसे मानेंगे कि हम हैं? और जैसे ही बात आती है अपने अन्त की —और आपका अन्त ही आपका सत्य है— जैसे ही बात आती है अपनी समाप्ति की वैसे ही छक्के छूट जाते हैं हमारे, हमारे लिए एक चीज़ माननी बहुत ज़रूरी है कि हम हैं, हम हैं।

ईश्वर की उत्पत्ति कहाँ से हो रही है, समझिएगा। हम डरे हुए लोग हैं और हम भ्रमित लोग हैं। हमारे लिए बहुत ज़रूरी है मानना कि हम हैं, अहम् है तो पूरी दुनिया को होना पड़ेगा। अभी आरंभ में ही कहा था न मैंने हम हैं तो इस कुर्सी को होना पड़ेगा, कुर्सी है तो मंच को होना पड़ेगा, मंच है तो पृथ्वी को होना पड़ेगा, पृथ्वी है तो अन्य ग्रहों को भी होना पड़ेगा, सूर्य को होना पड़ेगा, चाँद को होना पड़ेगा फिर पूरे ब्रह्माण्ड को होना पड़ेगा। माने मेरे होने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि मैं मानूँ....।इसी को कहते हैं कि एक झूठ के पीछे सौ झूठ बोलने पड़ते है। मूल झूठ क्या है? मैं हूँ। मानेंगे नहीं कि हम हैं ही नहीं।

बुद्ध समझा-समझा कर थक गए, ‘अरे! तुम नहीं हो बाबा। जिसको तुम अपनी हस्ती, अपना अस्तित्व कहते हो, वो अनस्तित्व है। जिसको तुम कहते हो ‘मैं हूँ’, वो तुम्हारा न होना है और जिसको तुम आत्मा बोल देते हो उसमें आत्मा जैसा कुछ नहीं है वो अहंकार मात्र है।’ तो बुद्ध अहंकार भी नहीं कहते वो कहते हैं, ‘जिसको तुम आत्मा बोल रहे हो वो वास्तव में अनात्मा है’। वो आए, जो उनको करना था करा उन्होंने, कई दशकों तक बोलते रहे फिर उनके पीछे बौद्ध विचारकों की और बुद्धिजीवियों की पूरी श्रृंखला चली पर हमें नहीं समझ आता। हमें नहीं समझ आता। हम कहते हैं, ‘मैं तो हूँ और मैं हूँ तो पूरी दुनिया को होना पड़ेगा।’ और फिर बड़ा मासूम सा चेहरा बनाकर हम सवाल करते हैं ‘अच्छा जी, पूरी दुनिया बनाई किसने? अच्छा जी, सूरज को उगाता कौन है? चाँद को घुमाता कौन है’?

किसी ज्ञानी के पास जाओगे वो कहेगा, ‘सूरज है कहाँ? तुम्हारा सूरज है तुम जानो।’ तो अगर कोई सच्चा उत्तर पूछ रहे हो, यह उत्तर तुम्हें अच्चम्भित कर जाएगा, यह तुम स्वीकार नहीं करोगे पर सच्चा उत्तर पूछ रहे हो कि सूरज को कौन उगाता है? तो यही उत्तर है कि तुम ही उगाते हो, तुम्हारा अहंकार। तो उस सूरज को बनाया भी तुम्हीं ने है और सूरज को चलाया भी तुम्हीं ने है। इस समस्त ब्रह्माण्ड के रचयिता भी तुम हो और कर्ता-धर्ता भी तुम हो और यहाँ कोई नहीं शक्ति है।

अब उसमें समस्या क्या आ जाती है? समस्या यह आ जाती है —मैं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर रहा हूँ कि हमारे लिए ईश्वर नाम की सत्ता आवश्यक क्यों है— समस्या यह आ जाती है कि हम इतने बेहोश लोग हैं कि हमें पता ही नहीं कि हम क्या कर रहे हैं, क्या नहीं कर रहे हैं? कर हम ही रहे हैं पर हमें पता ही नहीं हैं कि हम क्या कर रहे हैं? जैसे कोई नशे में धुत्त, वो बहुत कुछ कर गया हो पर उसको पता तो है नहीं कि वो क्या कर रहा है, तो फिर वो सुबह उठता है अगली, रात भर वो नशे में धुत्त रहने के बाद पूछता है, ‘अरे! यह सब किया किसने?’ अब कोई अगर बोल दे कि यह तेरी ही करतूत है, उसको बड़ी लाज आनी है। तो हमें फिर एक दूसरी शक्ति चाहिए होती है जिसके मत्थे हम अपनी सारी करतूतें मढ़ दें। करा हमनें है पर हमारे जिस भाग ने करा है हम उससे सर्वथा अनभिज्ञ है।

हम अपने मन को नहीं जानते, मन की गहराइयों को नहीं जानते। हम अपनेआप को बस सतह-सतह पर जानते हैं उसके नीचे-नीचे हम क्या कर रहे हैं हमें अपना कुछ पता नहीं। तो वो सब कुछ जो हम ही ने करा है हम उसकी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होते। हम कहते हैं, ‘मैंने नहीं करा, किसी और ने करा होगा।’ अब किसने करा, पड़ोसी ने करा?! पड़ोसी भी मना कर देगा। चाचा ने करा होगा? वो भी मना कर देगा। चची ने करा? चची तन्ना गयी हैं, ‘मैंने तो नहीं करा।’

तो किसने करा, किसने करा? तो किसी ऐसे की बात करनी बहुत ज़रूरी है जो बेचारा आ ही नहीं सकता अपनी सफ़ाई देने। किसी ऐसे की कल्पना करनी बहुत ज़रूरी है जो कभी आकर बोल ही न सकता हो कि माफ़ करियेगा जज साहब! मैं बेगुनाह हूँ, कि मेरे ऊपर मनगढ़ंत आरोप डाले जा रहे हैं। तो हमनें ऐसे एक चरित्र की रचना करी और उसको क्या नाम दिया? ईश्वर। कि उसने करा है, उसने करा है।

एक से एक घटिया तरीक़े के हम काम करते है ज़िन्दगी में और घटिया माने यही नहीं कि जानबूझ कर करे, बेहोशी में करे और जब परिणाम आता है तो कहते हैं, ‘जैसी ईश्वर की मर्ज़ी, जैसी ईश्वर की मर्ज़ी। ओह माय गॉड! ओह माय गॉड!’ ये सारे वक्तव्य हमारी बेहोशी के प्रति हैं सब। तुम ख़ुद कर रहे हो लेकिन ज़िम्मेदारी लेना नहीं चाहते, ले सकते ही नहीं क्योंकि पता ही नहीं है कि ख़ुद कर रहे हैं। उतना गहरा आत्मज्ञान हमें होता ही नहीं कि हम कह सकें कि हम ही कर रहे हैं, तो फिर स्वयं से अलग एक शक्ति की हम कल्पना करते हैं कि कोई तो शक्ति है न जो समूचे ब्रह्माण्ड को चला रही है।

आप जाइएगा ऋषि उद्दालक के पास या अष्टावक्र के पास वो मुस्कुरा कर कहेंगे, ‘तुम चला रहे हो।’ और आपको यक़ीन ही नहीं आएगा और आप कहेंगे, ‘माने क्या बोल रहे हो? इतना बड़ा सूरज है, उसको मैं चलाता हूँ? देखिए, पागल हो गया यह आदमी, कह रहा, सूरज को मैं चलाता हूँ।’ कह रहे हो, ‘मैं छोटा सा आदमी और आप कह रहे हो कि यह जितने सौरमण्डल हैं और आकाशगंगाएँ हैं और यह सब है, मैं कर रहा हूँ?’” धीरे से मुस्कुराएँगे और ऋषि कहेंगे, ‘हाँ, बेटा! तुम ही कर रहे हो, बस तुम जानते नहीं हो कि तुम कर रहे हो। तुम जानते ही होते तो तुम्हारा करना कब का थम गया होता।’ ‘अच्छा, तो सूरज को मैं चला रहा हूँ और यह मेरा भाई है लक्खू, सूरज को यह भी चला रहा है। माने गाड़ी एक और ड्राईवर दो। ऐसा कैसे हो गया? बताइए। ऋषि मुस्कुरा कर बस इतना ही कहेंगे, ‘अभी तुम्हारा समय नहीं आया है, जब समय आ जाएगा तो यह मूढ़ता के सवाल करना बन्द कर दोगे’।”

कहेंगे, ‘नहीं, नहीं, आप बताइए न। दुनिया में आठ सौ करोड़ लोग हैं और आप कह रहे हैं दुनिया को मैं चला रहा हूँ। तो यह बाक़ी सब क्या बेरोज़गार बैठे हैं? बारी-बारी से सबको चलाना चाहिए न। सूरज को मैं ही क्यों चलाऊँ?’ तो ऋषि कहेंगे, ‘तुम माने— लक्खू का भाई नहीं। जब मैं कह रहा हूँ सूरज को तुम चला रहे हो तो मैं चक्खू से बात नहीं कर रहा हूँ। मैं अहम् वृत्ति से बात कर रहा हूँ।’ बोलेंगे, ‘अहम् वृत्ति माने क्या? मेरी ही है न!’ बोलेंगे, ‘हाँ, तुम्हारी ही है पर बेटा तुम उससे परिचित नहीं हो, तुम अपने अस्तित्व की सतह पर जी रहे हो। तुम्हारे भीतर क्या है, तुम कुछ नहीं जानते’।

हिम की बड़ी-बड़ी चट्टानें होती हैं, देखी है? वो टूट करके अंटार्टिका वगैरह में होता है जब समुद्र में आ जाती हैं तो उनका बहुत छोटा सा हिस्सा सतह पर दिखाई देता है, लगभग एक बटा नौ एक बटा दस। दस प्रतिशत दिखाई देता है बस, टाइटैनिक उन्होंने ही डुबाया था। कह रहे हैं, ‘तुम अपनेआप को उतना भी नहीं जानते। वहाँ कम से कम दस प्रतिशत तो है न जो सतह के ऊपर है, नीचे बहुत बड़ा होता है वो पता नहीं चलता वो जहाज में जाकर भिड़ जाता है, जहाज डूब जाता है। तुम अपनेआप को सतह पर भी नहीं जानते। बर्फ कम से कम एक बटा दस रहती है पानी के ऊपर, तुम पानी से ऊपर एक बटा एक हज़ार भी नहीं हो। तुम कुछ नहीं जानते अपने बारे में, सब कुछ तुम ही कर रहे हो।’ नहीं, हो सकता है हम न जानते हो अपने बारे में। देखिये, हमें आपकी बात ठीक लग रही है ऋषि महोदय लेकिन यह तो बताइए यह सब जो बाक़ी लोग हैं इनका क्या है? अब ऋषि फिर मुस्कुराएँगे और हलके से कहेंगे, ‘तुम्हारे अलावा कोई है ही नहीं’।

अब झूम गया चक्खु, बोला, ‘ जो है लक्खू, यह है ही नहीं!’ बोल रहे है, ‘यह है, यह तुममें ही है।’” बोल रहा, “तो आपने हमें ही ख़ासतौर पर क्यों चुना हैं यह बोलने के लिए कि बाक़ी सब नहीं हैं’। तुम ही भर हो। नहीं, तुम्हें नहीं चुना है, चक्खु को नहीं चुना है, उस अहम् वृत्ति को चुना है जो निर्वैयक्तिक है। जो कभी लक्खु नाम लेती है और कभी चक्खु नाम लेती है, और जो वो नाम ले लेती है उस नाम के अतिरिक्त सारे नामों को बेगाना समझने लगती है। वृत्ति एक ही है। लक्खू के मामले में उसका नाम है लक्खु और चक्खु के मामले में उसका नाम है चक्खु। एक ही वृत्ति लेकिन इन दोनों को लग रहा है हम दोनों अलग-अलग हैं। आठ सौ करोड़ इंसानों को लग रहा है हम सब अलग-अलग हैं। सब अलग-अलग नहीं हो, सब एक हो।

जैसे कोई विशाल जड़ हो जो ज़मीन के नीचे मिट्टी के अन्दर सतह के सामानांतर चल रही हो और उससे कभी यहाँ एक अंकुर फूटता है, कभी वहाँ एक अंकुर फूटता है, कभी यहाँ एक अंकुर फूटता है। ये जितने अंकुर हैं ये सब अपनेआप को एक-दूसरे से पृथक जानते है। जानेंगे ही, वो सतह से ऊपर है और सतह के ऊपर-ऊपर जब वो एक दूसरे को देखते हैं तो उनको दिखाई देता है कि मैं अलग और तू अलग। उन्हें पता ही नहीं कि नीचे उनकी जड़ एक ही है और उस जड़ का नाम है, अहम् वृत्ति। वही अहम् वृत्ति है जो चाँद-तारे, सूरज सबको चला रही है, सबको चला रही है। उसमें ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं। समझ में आ रही है बात?

प्रार्थना किससे कर रहे हो तुम? यहाँ कोई है नहीं जिससे प्रार्थना करी जा सके। तो फिर ज्ञानियों ने कहा वास्तविक प्रार्थना मात्र मौन होती है, चुप हो जाना। यह तो छोड़ दो कि प्रार्थना में किसी दूसरे से कुछ माँगा जाता है, वास्तविक प्रार्थना में तो अपने होने को भी समाप्त कर दिया जाता है। आम आदमी प्रार्थना के नाम पर जो करता है वो प्रार्थना का विपरीत है, प्रार्थना में किसी दूसरे की हस्ती को तो छोड़िये अपनी हस्ती को भी मिटा दिया जाता है। और आम आदमी जब प्रार्थना करता है तो कहता है, ‘सुनो तुम, मुझे यह चीज़ चाहिए।’ आपकी प्रार्थना का वक्तव्य यही होता है न? सुनो हे ईश्वर! सुनो तुम, मुझे फलानी चीज़ चाहिए, मुझे फलानी कामना है। इस वक्तव्य में कितने आ गए? दो, तुम और मैं। यह क्या अनर्थ कर दिया? वास्तविक प्रार्थना में तो एक भी नहीं बचता और आपकी प्रार्थना में दो-दो खड़े हो जाते हैं। समझ में आ रही है बात?

अब आगे बढ़ाते है बात को और। तो हम कह रहे हैं कि प्रकृति ही फिर —यह जो पूरा ब्रह्माण्ड है उसके लिए एक नाम है प्रकृति ही। यह जो पूरा ब्रह्माण्ड है उसके लिए एक नाम है प्रकृति— सत्य तो नहीं है लेकिन प्रकृति वो है जिसमें यह जो जीव है, जीव, यह पैदा होता है, फँसता है, खेलता है, खाता है, पीता है, रोता है, जीता है और मर भी जाता है। तो इस जीव के लिए तो आजीवन सम्पर्क रहता है प्रकृति मात्र से। ठीक? और इस जीव को अगर अपने झूठ से मुक्ति पानी है तो उसका भी रास्ता एक ही है प्रकृति।

मैं नहीं हूँ, मैं अपनेआप को समझता हूँ मैं हूँ पर मैं नहीं हूँ। यह भी अगर मुझे समझना है तो यह समझाने मुझे अलौकिक शक्ति तो आएगी नहीं, यह बात भी मुझे जीवन से ही समझनी पड़ेगी। और जीवन माने प्रकृति, जीवन माने सम्बन्ध, जीवन माने वो सब जो आपको अनुभव होते हैं, वही तो जीवन है। तो भारत ने इसीलिए प्रकृति की पूजा करी और उसको देवी बोला। भारत ने प्रकृति की पूजा करी यह कह करके कि मुक्तिदायनी भी प्रकृति ही है। किस अर्थ में? कि उसको जान लो तो वो मुक्ति दे देगी, जीवन को समझ लो तो जीवन से मुक्त हो जाओगे। जिन सब लोगों से, वस्तुओं से, विषयों से तुम्हारा सम्बन्ध है उन विषयों को जान लो, अपने सम्बन्ध को जान लो तो जीवन मुक्ति मिल जाती है और जीवन मुक्ति ही अध्यात्म का उच्चतम आदर्श है।

कुछ मूल बातें हैं सबको पता होनी चाहिए। देखिए, भारत में विशेषकर वेदान्त में धर्म का लक्ष्य स्वर्ग या सुख नहीं है —यह अच्छे से गांठ बंध लीजिए— धर्म और अध्यात्म इसलिए नहीं है कि उससे आपको स्वर्ग मिल जाएगा। ऐसा आदर्श बाहर बनाया गया है, अब्राहमिक धाराओं में यह आदर्श चलता है कि अगर तुम इस दुनिया में अच्छी ज़िन्दगी बिताओगे तो मरने के बाद स्वर्ग, हेवन या ज़न्नत पाओगे। भारत में यह सब नहीं हैं। अगर कोई भारतीय है और सनातनी है और स्वर्ग की बहुत बात कर रहा है तो वो फिर सनातनी है ही नहीं, वो किसी और धारा का होगा। कोई आपत्ति नहीं हमें आप किसी भी धारा के हो सकते हैं लेकिन अगर आपको स्वर्ग का लोभ है, आपको सुख की चाहत है तो अपनेआप को सनातनी मत कहिए। कुछ और कह दीजिये बाक़ी और कोई बात नहीं।

तो स्वर्ग धर्म का लक्ष्य नहीं है पहली बात, दूसरी बात मृत्यु के बाद का मोक्ष भी धर्म का लक्ष्य नहीं है। यह बात निन्यानवे प्रतिशत सनातिनयों को पता ही नहीं है। मरने के बाद कोई मोक्ष वगैरह मिल जाएगा और आप पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाएँगे, यह भी अध्यात्म का लक्ष्य नहीं है। मरने के बाद वगैरह की बात वेदान्त करता ही नहीं है, वेदान्त का सरोकार इस जीवन और उसके दुख, उसके बन्धन से है।

कह रहे हैं, ‘अभी जी रहे हो, अभी परेशान हो मैं अभी की बात करूँगा। मरने के बाद वगैरह की छोड़ो इससे लेनादेना नहीं’। तो लक्ष्य क्या है फिर अध्यात्म का? उसे कहते है जीवन मुक्ति। न स्वर्ग, न मोक्ष अपितु जीवन मुक्ति। जीवन मुक्ति और मोक्ष से क्या अर्थ है? मोक्ष एक अवधारणा है, मोक्ष को यदि आपको मानना है तो आपको पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मानना पड़ेगा। जीवन मुक्ति का अर्थ है अगले जन्म से कोई लेना देना नहीं, तुम जीते जी जीवन से मुक्त हो जाओ। और यह आख़िरी बात है, इसके बाद कोई मोक्ष नहीं बचता, इसके बाद कोई स्वर्ग नहीं बचता। और जीवन मुक्ति के लिए कोई मान्यता नहीं चाहिए, कोई अंधविश्वास नहीं चाहिए।

मोक्ष इत्यादि में विश्वास करने के लिए आपको जीवात्मा को मानना पड़ेगा, आपको पुनर्जन्म को मानना पड़ेगा। जीवन मुक्ति के लिए कुछ नहीं मानना है, जीवन मुक्ति तो बहुत सीधी बात है। हाँ, हम जी रहे हैं बन्धनो में और हमें जीना है बन्धनों से मुक्त होकर यह जीवन मुक्ति है, बस खत्म बात। उच्चतम बात जीवन मुक्ति है। कौन सा स्वर्ग और वहाँ कौन सी अप्सराएँ और कौन सी नदियाँ और जन्नत, हूरें और यह सब? वेदान्त हँसता है इन सब बातों पर, कहता है, ‘बच्चों को कहानियाँ सुना रहे हो क्या? किसके मनोरंजन की बातें बता रहे हो? यह सब। ज़रा बड़े हो जाएँ, ज़रा वयस्कों की मच्योर बातें कर लें?’, ऋषि पूछते हैं। आमतौर पर उन्हें प्रत्युतर में हाँ नहीं मिलती।

ज़्यादातर लोगों को बच्चों के झुनझुनें चाहिएँ, तो उनको फिर इस तरह कि कल्पना चाहिए कि मरने के बाद एक जीवात्मा होती है, वो निकलती है, वो नदी पार करती है। वही सब बातें जो गरुड़ पुराण में आप पढ़ते है। अब गरुड़ पुराण इत्यादि का वेदान्त से कोई सम्बन्ध नहीं है। और यदि वैदिक धर्म वेदों पर आधारित है, यदि प्रथम प्रमाण श्रुति प्रमाण होता है और यदि श्रुतियों को कोई स्वीकार न कर रहा हो तो उसे वैदिक कहा ही नहीं जा सकता। गरुड़ पुराण आदि सनातनी ग्रन्थ माने ही नहीं जाने चाहिए थे क्योंकि उनमें जो बात लिखी हैं वो सीधे-सीधे वेदों की बात के एकदम विरुद्ध हैं और सनातन धर्म में तो आख़िरी बात वेद की ही चलेगी न। अगर कोई पुराण वेद विरुद्ध बात कर रहा है तो पुराण को स्वीकारूँ या वेद को स्वीकारूँ? बता दीजिए।

लेकिन हमारी ज़्यादा रुचि गरुड़ पुराण इत्यादि में है। और उसमें यह सब है कि आत्मा ऐसे निकलती है, इतने दिन यहाँ पँहुचती है फिर उसको फलाना मिलता है फिर एक पेड़ मिलता है, फिर ये होता है वो होता है। और हिन्दुओं ने क्या करा है कि वही बात पकड़ ली है और उसको पकड़ कर बैठे हैं। और पण्डित को बुलाते है और जो मर गया है फिर उसके लिए कपड़े दिए जाते है, उसके लिए कपड़े भी तो चाहिए होंगे अगर वो मर गया है। तो उसको गाड़ी-वाड़ी भी दी जाती है। पण्डितों का बढ़िया चलता है, यहाँ साइकिल लेकर आ रहे हैं, स्कूटर लेकर जा रहे हैं। कह रहे, ‘किसके लिए है?’ कह रहे, ‘फलाने के बाबा मर गये हैं। उनको लम्बा रास्ता तय करना है, बैकुंठ पहुँचना है अन्त में, तो बेटे ने स्कूटर दी है। और स्कूटर मिली है पण्डित जी को पता नहीं वो कैसे पार करेंगे? जाड़े में मृत्यु है तो हीटर दिया जा रहा है। कह रहे, ‘ऊपर तो और ठण्ड होती होगी’।” (नकार का इशारा) समझ में आ रही है बात?

लक्ष्य क्या है? जीवन मुक्ति। तो मुक्ति के लिए इसी जीवन के अलावा कोई साधन नहीं है। जीवन के ही अवलोकन के अलावा कोई तरीक़ा नहीं है मुक्ति का, जिसमें फँस गए हो उसी को जानोगे तो आज़ाद हो पाओगे। जैसे चूहा चूहेदानी में फँस गया हो और चूहेदानी में ही तो कोई रास्ता होगा न बाहर निकलने का। कोई तीली हो सकता है टूटी पड़ी हो चूहेदानी में, हो सकता है बनाने वाले ने कोई गुप्त द्वार छोड़ दिया हो चूहेदानी में जो दिखाई नहीं देता पर टटोलोगे, परखोगे तो पता चलेगा। तो चूहेदानी से बाहर निकलने का रास्ता भी चूहेदानी से जाता है। यह बात तो है न? तो बन्धनों से बाहर छूटने का रास्ता भी जीवन को समझने से आता है, यह ठीक बात है।

इसीलिए भारत ने प्रकृति की बड़ी पूजा करी और दोनों नाम दिए प्रकृति को माया भी कहा और मुक्तिदायनी देवी भी कहा। यह दोनों एक के ही नाम है। माया किसका नाम है? प्रकृति का ही नाम है और मुक्तिदायनी देवी किसका नाम है? वो भी प्रकृति का ही नाम है। यह जो पूरी शाक्त धारा है जिसमें देवी उपासना आती है उसमें देवी दोनों तरह से पूजी जाती हैं महामाया भी कहते हैं, महा माँ भी कहते हैं। जन्मदायिनी भी कहते है मृत्युदायिनी भी कहते हैं और मुक्तिदायिनी भी कहते है। समझ में आ रही है बात?

तो यदि आपको मानना ही है कि ईश्वर कुछ है तो कह दीजिए ईश्वर प्रकृति का ही एक नाम है। ईश्वर प्रकृति का ही एक नाम है क्योंकि वो सारी बातें जो आप ईश्वर के लिए कहते हो वो सारी बातें वास्तव में लागू प्रकृति पर होती हैं। आप कहते हो न ईश्वर क्या है? आप दो नाम देते हो बनाने वाला और चलाने वाला। ये बनाना और चलाना ये दोनों काम हमने कहा अहंकार के हैं और अहंकार किस में पाया जाता है प्रकृति में। तो आपको अगर कहना ही है कि ईश्वर वो जो बनाता है, चलाता है तो कह दीजिए ईश्वर— प्रकृति है। इससे थोड़ा फिर आपको ढ़ांढ़स बना रहेगा नहीं तो लोगों को लगने लग जाता है कि ईश्वर को नहीं मानेंगे तो नास्तिक कहलाएँगे।

नहीं, नास्तिक वो नहीं होता जो ईश्वर को नहीं माने, नास्तिक वो होता है जिसकी सत्य के प्रति कोई जिज्ञासा नहीं है। नास्तिकता की अपनी परिभाषा को थोड़ा ठीक करिए, जो सत्य के प्रति कोई आग्रह नहीं रखता वो होता है नास्तिक। हज़ार में से नौ सौ निन्यानवे लोग, नौ सौ निन्यानवे कट्टर धार्मिक लोग गहरे नास्तिक होते हैं। अगर आपको एक हज़ार लोग मिलेंगे जो अपनेआप को बोलते हों कि हम धार्मिक ही नहीं हैं, हम कट्टर धार्मिक हैं, उन एक हज़ार लोगों में से नौ सौ निन्यानवे गहरे नास्तिक होंगे। पूछिए क्यों? या बता ही दीजिए, क्यों? क्योंकि उनके पास मान्यताएँ, कल्पनाएँ बहुत हैं। फलानी देवी, फलाना देवता, यह ईश्वर यह भगवान, लेकिन सत्य को लेकर के उनमें कोई जिज्ञासा नहीं है। उन्हें ब्रह्म नहीं चाहिए उन्हें स्वर्ग चाहिए। उनकी आस्था, उनकी लॉयल्टी मुक्ति के प्रति नहीं है, अपनी परम्परा, अपनी मान्यता, अपने सुख, अपने आग्रह, अपने पूर्वाग्रह, अपने दल, अपने सम्प्रदाय, अपने समुदाय के प्रति है। उन्हें सत्य नहीं चाहिए, तो सब नास्तिक ही होते हैं।

आस्तिक सिर्फ़ वो होता है जो जानता है। सब हटा दो जो कुछ मेरा है, मैं सब छोड़ने को तैयार हूँ, मुझे बस सत्य चाहिए, मात्र वही आस्तिक है। तो ईश्वर को मानने न मानने से आस्तिकता का कोई सम्बन्ध नहीं। आप मानते रहिए ईश्वर को, आप घोर नास्तिक हैं और बहुत सम्भव है कि आप गहरे आस्तिक हों लेकिन आप कहते हों, ‘ईश्वर माने क्या? कुछ नहीं।’

और सच जानिएगा आज तक जो गहरे आस्तिक हुए हैं वो सब वही रहे हैं जो ईश्वर के प्रश्न पर बस मुस्कुरा दिए। वो कहते है, ‘हमें जो रिश्ता रखना है वो ब्रह्म से रखना है, सत्य से रखना है, आत्मा से रखना है। कभी हम उसको राम, कभी कृष्ण, कभी शिव का नाम दे देते हैं, बाक़ी यह सब किस्से-कहानियों में हमारी कोई रुचि नहीं है, हम आस्तिक हैं’। देखिए, आस्तिक शब्द में क्या है केंद्र में? अस्ति, अस्ति माने है होना। और जो सचमुच है मात्र प्रतीत नहीं होता कि है बल्कि सचमुच है उसको सत्य कहते है। बाक़ी सब वो है जो प्रतीत तो होता है कि है, भासित तो होता है कि है, है नहीं, उसको माया कहते हैं।

तो आस्तिक वो है जो माया को काटकर बस उसकी पूजा करता हो, उससे प्रेम करता हो, जो है, जो है। जो उसमें नहीं उलझा हुआ है जो है नहीं बस मन में चलता रहता है, है तो नहीं बस मन में चलता रहता है। जो मन में उलझा हुआ है उसको ही नास्तिक कहते हैं। जो मन के उलझाव से हटकर के सत्य को समर्पित है उसको आस्तिक कहते हैं। तो ईश्वर में यदि आप विश्वास नहीं करते हैं तो आप नास्तिक नहीं हो गए और न ही ईश्वर में विश्वास करने से आप आस्तिक हो गए।

खैर, हटाइए। हमें जो भीतरी, बड़ी नैतिक एक समस्या, चुनौती खड़ी हो जाती है कि कैसे ईश्वर को न कर दूँ? उसका एक सस्ता आपको समाधान बताए देता हूँ। ईश्वर की पूजा करी जा सकती है, ठीक वैसे ही जैसे देवी की पूजा करी जाती है पर यह कह कर मत करिएगा कि ईश्वर दूर बैठा कोई कर्ता है, करतार है जो मुझे मुक्ति दिला देगा। देवी की पूजा, देवी की उपासना का अर्थ होता है प्रकृति के निकट आना। देवी माने प्रकृति, उपासना माने पास आना, प्रकृति को निकट से जानना ही देवी की उपासना है। और यदि ईश्वर माने प्रकृति तो ईश्वर की पूजा का भी फिर क्या अर्थ हुआ? जीवन को ध्यान से समझना, यही ईश्वर की पूजा है

तो आप बिलकुल कह सकते हैं कि आप ईश्वर को मानते हैं और ईश्वर की पूजा करते हैं, बस पूजा ठीक होनी चाहिए, प्रार्थना ठीक होनी चाहिए। दोहरा करके बताइए ईश्वर की पूजा कैसे करनी है? जीवन को ध्यान से देख करके, जीवन का अवलोकन ही ईश्वर की उपासना है। और ईश्वर से प्रार्थना कैसे करनी है? मौन होकर के। पूजा करनी है जीवन को जानकर के और प्रार्थना करनी है मौन होकर के। समस्या सुलझ गयी, आपको किसी से कहने की ज़रुरत नहीं कि आप ईश्वर को नहीं मानते।

आप ईश्वर को बिलकुल मान सकते हैं, ईश्वर माने प्रकृति। सही ईश्वर को मानिए, कल्पना मत करिए, ईश्वर को अपने मन का कोई विषय मत बना लीजिए। ठीक है? और ध्यान रखिए पूजा आप भले ही प्रकृति की कर लें लेकिन लक्ष्य प्रकृति से परे है, चूँकि वो परे है इसीलिए उसको कहते हैं परम। पूजा आप भले ही देवी की कर लें, कि ईश्वर की कर लें, कि प्रकृति की कर लें एक ही बात है। लेकिन लक्ष्य न ईश्वर है, न प्रकृति है, न देवी है, लक्ष्य तो परम माने मुक्ति, मुक्ति। यह स्पष्ट हुआ है या अभी कुछ अटक रहा है?

ईश्वर को लेकर मैंने दो बातें बोली बनाने वाला, चलाने वाला। कुतर्क मत करने लगिएगा कि नहीं, नहीं ईश्वर का एक और काम भी होता है मिटाने वाला, त्रिपुटी होती हैं न! ब्रह्मा, विष्णु, महेश। अपने दो ही बोला रह गये न अज्ञानी। यह धूर्त अपनेआप को आचार्य बोलने लगा फिर से। कल भी बोल रहा था, मना करा था आज फिर बोल रहा है। देखो, इसे महेश का कुछ पता नहीं, बोल रहा दो ही काम होते हैं। एक तीसरा काम भी तो होता है प्रलय, मिटाना। साहब, वो मिटाने का काम भी वही करता है जो बनाने और चलाने का काम करता है, माने अहंकार।

अहंकार स्वयं अपनी मुक्ति का चयन करता है। अहंकार मिटेगा कि नहीं मिटेगा यह फैसला भी अहंकार का ही होता है, तो मिटाने वाला भी अहंकार ही है। वही अहंकार जब मिटाने का निर्णय ले लेता है तो वो सत्य के बहुत निकट आ जाता है उसी को कहते है शिवत्व। सत्य ही शिव है। इसलिए मिटाने वाले को हम कह देते हैं कि मिटाने वाले का नाम है शिव, और कोई बात नहीं है। आ रही है बात समझ में?

प्र: प्रणाम आचार्य जी, अभी हम समझने की कोशिश कर रहे थे कि ईश्वर क्या है, कौन है। आप कई बार कहते हैं, जैसे कृष्ण पर आपने बोला है, आपने शिव पर बोला है, उस दौरान भी हम ‘मैं’ को जानने-समझने की बात करते हैं। लेकिन फिर ईश्वर से एक जो अगला प्रश्न है कि ईश्वर कहाँ मिलेंगे? एक है कि खुद को जानकर मिलेंगे, मैं को समझकर मिलेंगे या मैं का जब अन्त हो जायेगा। लेकिन मन्दिर के भी आप विरोध में नहीं रहते हैं तो फिर मन्दिर में जाने की भी क्यों ज़रुरत है?

आचार्य: मैं किसी चीज़ के विरोध में नहीं हूँ। मन्दिर तो बड़ी पूजनीय, बड़ी प्यारी जगह हो सकती है। भाई, मैं कौन हूँ? मैं अहंकार हूँ। मैं अपने ही द्वारा रची गयी, अपने ही द्वारा अनुभव की गयी इस दुनिया में भटक क्यों रहा हूँ? मुझे क्या चाहिए? मुझे मुक्ति चाहिए। मैं प्यासा हूँ, मुझे मुक्ति चाहिए। प्यासे को तो पानी जहाँ मिलेगा वो ले लेगा भाई। अगर मन्दिर ऐसी जगह हो पाए जो प्यासे को पानी दे सकती है, तो यह प्यासा अहंकार वहाँ क्यों नहीं जाए? और मन्दिर की अवधारणा यही थी।

देखिए, वैदिक काल में मन्दिरों का कोई सिद्धान्त ही नहीं था। आप ऋग्वेद में जायेंगे तो वहाँ मन्दिर जैसा कुछ है ही नहीं, न वहाँ मन्दिर है, न मूर्ति है। ये मन्दिरों और मूर्तियों की बात तो बहुत बाद में शुरू होती है। और मन्दिर कैसे बनेंगे? ऐसे बनेंगे, वैसे बनेंगे, यह चीज़ वेदों में पाई ही नहीं जाती, यह तो बहुत, वेदों के हज़ार साल बाद और रचे गए थे आगम शास्त्र वगैरह उनमें यह सब बातें आपको मिलती हैं।

मन्दिरों की आवश्यकता क्यों? जिन्होंने कहा मन्दिर होने चाहिए उन्होंने तो इसीलिए कहा न कि जो आपका एक लक्ष्य है, जो आपकी एक प्यास है वो पूरी हो, वो है मुक्ति। ऐसे रहे हैं मन्दिर जहाँ मैं बैठा हूँ और मन शांत हुआ है, मैं कैसे कह सकता हूँ कि मन्दिरों की कोई उपयोगिता नहीं। ऐसे भी मन्दिर है जहाँ जो करतूतें चल रही हैं, देखता हूँ तो सर पीट लेता हूँ। खेद की बात यही है कि निन्यानवे प्रतिशत मन्दिर ऐसे है जहाँ जाकर के कोई लाभ नहीं होगा बल्कि नुक़सान होने की ज़्यादा सम्भावना है। यह बहुत दुर्भाग्य की बात है, ऐसा होना नहीं चाहिए पर हो गया है। आप ऐसे भी कह सकते है कि मन्दिर में बुराई नहीं, न मन्दिर के सिद्धान्त में बुराई है। हमने मन्दिरों की जैसी व्यवस्था कर दी, हम मन्दिरों को जैसे चला रहे हैं, हम मन्दिरों को जिस दृष्टि से देख रहे हैं, खराबी हम में है।

भाई, मूर्ति अगर काम आती है तो मूर्ति पूजा क्यों न की जाए? मेरे पास बहुत बार सवाल आए हैं कि वेदान्त में तो मूर्ति जैसा कुछ है नहीं तो आचार्य जी आप मूर्ति पूजा का विरोध क्यों नहीं करते? और मैंने बार-बार यही कहा है कि मूर्ति पूजा बहुत उपयोगी विधि हो सकती है, मैं क्यों करूँ विरोध? मूर्ति अगर मुझे अमूर्त तक ले जा सकती है तो मैं मूर्ति पूजा क्यों न करूँ? और मूर्ति पूजा सबके लिए उपयोगी विधि है ही नहीं जिनके लिए उपयोगी है वो मूर्ति को ज़रूर पूजें जिनके लिए उपयोगी नहीं है उनके लिए न जाने कितने अन्य रास्ते हैं वो अन्य रास्तों पर चलें। कौन कह रहा है कि सबके लिए अनिवार्य है मूर्ति पूजा। कोई भी चीज़ अनिवार्य रूप से न अच्छी होती है न बुरी होती। आपको अगर वो आपकी मंजिल तक, आपकी मुक्ति तक ले जा सकती है तो वो चीज़ आपके लिए अच्छी है। क्या बुराई है।

प्र: जैसा कि गीता में भी कर्म के सिद्धान्त पर काफ़ी कुछ कहा गया है, बहुत ज़ोर दिया गया है तो कर्म और मुक्ति में क्या सम्बन्ध है?

आचार्य: कर्म माने अहंकार की अभिव्यक्ति, अहंकार है कर्ता। अहंकार क्या है? कर्ता। वही कर्तृत्व समय की धारा में कर्म नाम से अभिव्यक्त होता है।समय न हो तो कर्ता बीज जैसा होता है। समय है नहीं न, आप होंगे बहुत बड़े कर्ता, समय ही नहीं मिला तो कर्म आ पाएगा कहीं से? आप कर्ता हैं। कर्ता क्या है? कर्ता भाव एक वृत्ति है, जिसको आप अहम् वृत्ति कहते हैं न वो कर्तृत्व वृत्ति ही है। कर्तृत्व वृत्ति का ही दूसरा नाम है अहम् वृत्ति। उसको जब समय मिल जाता है तो वो समय में बिखर जाती है, खुल जाती है, खुलकर के उसको कहते है कर्म।

जिन लोगों ने गणित पढ़ी है फौरिएर ट्रांसफॉर्मेशन याद है? या मैक लौरेल एक्सपेंशन? साइन एक्स का एक्सपेंशन हम करते हैं याद है क्या हो जाता है वो फि?र साइन एक्स ईकुअल्स… एक इनफ़ायनाइट सीरीज़ बन जाती है, बन जाती है न। बनती है कि नहीं बनती है? पॉलीनॉमिअल सीरीज़ पूरी। वन प्लस एक्स स्क्वायर अपॉन टू फ़ैक्टोरियल ऐसे करके, प्लस एक्स क्यूब बाय थ्री फ़ैक्टोरियल, बिलकुल यही नहीं है पर इसी प्रकार की प्लस एक्स रेज टू द पॉवर फोर का फोर ऐसे करके बन जाती है न। अब वो एक चीज़ है उसका नाम है साइन एक्स वो खुल करके एक अनन्त श्रृंखला बन जाती है, वो जो अनन्त श्रृंखला है वो कर्मों की अनन्त श्रृंखला है। यह जो साइन एक्स है यह कर्ता है, यही जब खुल जाता है तो कर्म कहलाता है। और इसीलिए एक कर्ता अनन्त कर्म करता है जैसे साइन एक्स का जो एक्सपेंशन है उसमें अनन्त टर्म्स होती हैं। नहीं समझ आया, नहीं आया है।

कर्ता बीज है, कर्म उस बीज से उठे वृक्ष की अनन्त पत्तियाँ हैं। यह समझ में आ गया? कर्ता क्या है? बीज। और वही बीज जब अभिव्यक्ति लेता है तो उसमें अनन्त पत्तियाँ आ जाती हैं लेकिन अनन्त पत्तियों के आने के लिए क्या चाहिए? समय। कर्ता को जब समय मिल जाता है तो जो दिखाई देता है हमें, उसे क्या कहते हैं कर्म। —यह आ रहा होगा समझ में— ठीक है? तो कर्म और कर्ता एक ही हैं। अब पूछा कि कर्म और मुक्ति में क्या सम्बन्ध है? कर्ता अहम् है, अहम् को ही मुक्ति चाहिए। वो अन्य किसी तरीके से मुक्ति पा ही नहीं सकता, उसको कर्म से ही मुक्ति पानी पड़ेगी पर एक बहुत विशेष तरीक़े के कर्म से। वो कर्म भी विशिष्ट होगा और उस कर्म का स्रोत माने बीज, उद्भव भी बहुत विशिष्ट होगा।

अब हम चलते है श्रीकृष्ण के पास। वो कहते हैं, ‘ऐसे कर्म को कहते है निष्काम कर्म और उसके बीज को कहते हैं आत्मज्ञान।’ कर्ता को आत्मज्ञान चाहिए, जब कर्ता को आत्मज्ञान मिलता है तो उसका कर्म बदल करके निष्काम कर्म हो जाता है। अज्ञानी कर्ता, सकाम कर्म। —साथ चल रहे हैं?— अज्ञानी कर्ता, सकाम कर्म। आत्मज्ञानी कर्ता, निष्काम कर्म। अज्ञानी कर्ता, सकाम कर्म, परिणाम भवचक्र। भवचक्र, भव माने होना, होना माने बन्धन में होना। भव माने होना, होना माने बन्धन में होना, बन्धनों का चक्र। अज्ञानी कर्ता, सकाम कर्म, भवचक्र। आत्मज्ञानी कर्ता, निष्काम कर्म, मुक्ति। यह है।

कर्ता को स्वयं से परिचित होना पड़ेगा। मैं करे ही जा रहा हूँ या खुद को देख भी रहा हूँ? मुझे अपना कुछ भी पता है क्या? ज़रा सा भी आत्मज्ञान कुछ सेल्फ नॉलेज है? मेरा खोपड़ा मुझे कुछ बोलता है मैं करने निकल पड़ता हूँ या पूछता भी हूँ कि यह विचार आ कहाँ से गया? और मेरे विचार ऐसे कि थाली का बैंगन, पल-पल पलटते हैं। ऐसे ही हम होते हैं कि नहीं होते हैं? होते हैं नहीं होते हैं? अभी आपको प्यास लगने लगे या भूख लगने लगे, आपको मेरी बातें बेकार लगने लगेंगी। विचार आएगा, ‘नहीं इन बातों में कुछ रखा नहीं है, अभी जो सिद्धान्त बताया वो खरा नहीं है।’ आपको पता ही नहीं है कि आपको यह जो विचार आया है वो इसलिए आया है क्योंकि पेट में अब गुड़गुड़ी हो रही है। हम चूँकि स्वयं को नहीं जानते इसलिए पेट की गुड़गुड़ को हमने सत्र के विरुद्ध ही आपत्ति बना लिया।

आप देखिएगा आपके शरीर में कोई हलचल शुरू हो जाए, आपको लगेगा कि यहाँ से जो बातें कही जा रही हैं उन बातों में कोई विशेष दम नहीं है। आपको यह लगेगा विचार हमें आया है, विचार में कोई बात होगी। विचार में कोई बात नहीं है, पेट में गैस है बस। हमें नहीं पता होता हमारे विचार कहाँ से आ रहे हैं? हमें नहीं पता होता हमारी भावनाएँ कहाँ से आ रही हैं? हमारे लक्ष्य, हमारी कामनाएँ कहाँ से आ रहे हैं? हमें कुछ पसंद है क्यों? न पसंद है क्यों? कहीं से दिल उचट रहा है क्यों? कहीं दिल लग रहा है क्यों? हमें कुछ नहीं पता होता।

कर्ता को स्वयं को जानने से शुरुआत करनी पड़ेगी। खुशखबरी यह है कि स्वयं को जानना बहुत मुश्किल नहीं है क्योंकि भीतर कोई ब्लैक बॉक्स नहीं है कि खोजना पड़ेगा, खोलना पड़ेगा, रीड करना पड़ेगा, अरे! अरे! अरे! खुला हुआ है कर्ता का सारा मामला, किसके रूप में? कर्मों के रूप में। सब कुछ पहले ही खुला हुआ है। कर्म को आप कह सकते हैं कर्ता डीकोडेड। कर्म क्या है? कर्ता डिकोडेड, सब खुला हुआ है। बस क्या देखना है फिर? अपने कर्मों को देखो। अपने कर्मों को देखना ही आत्मज्ञान की विधि है, इसी को आत्मअवलोकन कहते हैं।

जब मैं कर्म कह रहा हूँ तो उसमें विचार भी शामिल है, भावनाएँ भी शामिल है, वृत्तियाँ, सब भीतरी आवेग सब शामिल हैं। जो कुछ भी चल रहा है अपनी दुनिया में उसको देखना ही आत्मज्ञान है और आपका आत्मज्ञान ठोस है कि नहीं इसकी पहचान यह है कि यदि होगा आत्मज्ञान तो कर्म पलट कर बन जाएगा निष्काम कर्म। अगर निष्काम कर्म आपको दिखाई दे रहा है अपने जीवन में तो आत्मज्ञान में भी कुछ दम है, नहीं तो आत्मज्ञान ऐसे ही खोखली ऊपरी बातें हैं फिर। समझ में आई बात?

तो क्या कर्म के रास्ते मुक्ति मिलती है? बिलकुल मिलती है। लेकिन जिस कर्म से मुक्ति मिलती है वो कर्म आप कर ही नहीं पाओगे अगर ज्ञान नहीं है। तो ले-देकर मुक्ति किसके रास्ते मिली? ज्ञान के रास्ते मिली। कर्म के रास्ते मुक्ति निश्चित रूप से मिलती है लेकिन वो कर्म होना चाहिए फिर निष्काम कर्म। और निष्काम कर्म सम्भव है मात्र आत्मज्ञान से। तो फिर मुक्ति किससे मिलती है फिर आत्मज्ञान से। और आत्मज्ञान की विधि क्या है? अपने कर्मों को बहुत निष्पक्ष होकर, बहुत बेदर्द होकर, बड़ी निर्ममता से देखो।

ऐसे मत देखो कि मैंने किया है तो ठीक ही होगा न क्योंकि मैं अच्छा आदमी हूँ। सब अपनी-अपनी नज़र में लगभग अच्छे ही आदमी होते हैं। सौ प्रतिशत नहीं तो अस्सी-नब्बे प्रतिशत, देखिए, थोड़ी-बहुत खोट है, थोड़ी-बहुत खोट है। खोट सबमें थोड़ी-बहुत ही है और दुनिया पूरी तबाह हो गयी। अगर आप सबमें थोड़ी-बहुत ही खोट होती तो दुनिया अभी थोड़ी-बहुत तबाह होनी चाहिए थी न। थोड़ी बहुत खोट से दुनिया पूरी-पूरी कैसे तबाह हो गयी? नहीं? तो ऐसे नहीं देखना है अपनेआपको कि मतलब हम हैं तो अच्छे ही होंगे।

खेल वहाँ से शुरू होता है जहाँ आप कहते हैं, ‘हम अच्छे नहीं हैं।’ खेल आगे बढ़ता है जब आप कहते हैं, ‘हम बुरे हैं।’ खेल और आगे जब बढ़ता है तो आप कहते हैं, ‘हम हैं ही नहीं’। समझ में आ रही है बात कुछ?

प्र: प्रणाम आचार्य जी, हम सब भी प्रकृति का एक छोटा सा हिस्सा ही हैं और प्रकृति को ही हम ईश्वर मान रहे हैं।

आचार्य: मैंने हिस्सा बोला या मैंने स्रोत बोला? आप प्रकृति के हिस्से हैं वास्तव में या प्रकृति के स्रोत हैं? माया तू न गयी मेरे मन से। यहाँ बैठकर समझाता रहा, गला सूख गया, यह(चाय) पीना पड़ रहा है।

प्र: नहीं, जैसे मैं फिजिक्स पढ़ रहा हूँ तो जहाँ तक हम इस श्रृष्टि को देख पाते हैं, यह तो मतलब हमारी सोच से भी परे है। यह इतनी बड़ी है तो क्या और भी जैसे अरबों-खरबों ग्रह हैं वहाँ पर भी ऐसा ही जीवन हो सकता है क्या?

आचार्य: इस प्रश्न का अभी यहाँ जो बातचीत हो रही है उससे कोई सम्बन्ध नहीं है। जो बातचीत हमने करी उसको समझिएगा फिर पूछिएगा।

प्र: नमस्ते सर। जैसा कि मैंने समझा कि सारा कुछ अहम् वृत्ति कर रही है, फिर यह अहम् वृत्ति कहाँ से आई? इसको किसने बनाया किया? आचार्य: क्या बोला था कल मैंने? मानते ही नहीं हैं। (हाथ दिखाते हुए) हाँ भाई। खोजो साँतवी ऊँगली। प्र: नहीं है।

प्र: बट सर, माया का भी कोई शुरुआती बिंदु नहीं है अनादि है, सत्य भी अनादि है फिर क्या अन्तर हुआ? और माया के बारे में भी ज़्यादा कुछ नहीं बोल सकते, हम सत्य के बारे में तो मौन ही होते हैं, तो फिर....

आचार्य: अन्तर यह है कि माया का अन्त होता है सत्य का कोई अन्त नहीं होता है। माया को अनादि इसलिए बोलते हैं क्योंकि माया के आदि में जाना तुम्हें माया के अन्त से दूर कर देता है। माया के आदि की, स्रोत की, बात करोगे तो माया के अन्त से दूर हो जाओगे क्योंकि बात अभी भी किसकी कर रहे हो? और माया में और ब्रह्म में अन्तर यह है कि अनादि तो दोनों है पर दोनों अनन्त नहीं हैं। माया का अन्त होता है और उसी को कहते हैं मुक्ति।

प्र: प्रणाम आचार्य जी, आपने जब बोला कि मैं ही हर जगह है, आपने एक उदाहरण दिया कि ऋषि बोलते हैं कि तुम्हीं हो जो हर जगह है। और आपका पहले भी एक विडियो देखा है जहाँ पर अपने बोला है कि जब हम एक पशु की आँखों में देखते हैं तो अपनेआप को दैखें। तो हम ईश्वर को भी बोलते हैं कि सबमें देखना चाहिए। सबमें ईश्वर कैसे दिखते हैं? हम अपनेआप को इन सबमें कैसे देख पाएँ?

आचार्य: देख कर। पशु की आँखों में स्वयं को देख पाओगे, पहले पशु की आँखों में देखो तो सही।

प्र६: मैं ऋषिकेश में था बीस दिन, तो उधर मैंने कोशिश तो बहुत की पर... आचार्य: कोशिश करके नहीं। बेचारे पशु को परेशान और किया होगा तुमने। उसको पकड़-पकड कर उसकी आँख… (श्रोतागण हँसते हैं)। ऐसे नहीं होता। कृष्णमूर्ति कुछ बहुत सुन्दर हमें शब्द दे गए हैं, फ़्रेज़ेज़ (वाक्यांश) जिसमें से एक है पर्पज़लेस ऑब्जरवेशन। सकाम अवलोकन नहीं, निष्काम अवलोकन। पहले से ही कामना बना कर देखोगे कि वहाँ दिखना चाहिए कि ईश्वर कहाँ हैं, ईश्वर कहाँ हैं? तो कुछ नहीं दिखेगा, कुछ भी नहीं दिखेगा। दिख भी जाएगा, वही दिख जाएगा जो देखना चाहते हो। अधिक से अधिक इतना दिख जाएगा कि जो देखना चाहते थे वो देख लिया। जो है वो नहीं दिखेगा। उपनिषद हमसे कहते हैं सत्य और तुम्हारे बीच में कामनाओं का ही तो स्वर्णिम आवरण है। सब दिख जाएगा तुम्हें, सारी सच्चाई खुल जाए, कामनाएँ गिराओ एक बार, एक बार को पर्दा हटाओ देखो, दिखता है कि नहीं।

प्र: तो पहले निष्काम होकर फिर ही...

आचार्य: इतना कर लो कि ऑब्जरवेशन (अवलोकन) कर रहे हो और उसमें पकड़ में आए कि पीछे डिज़ायर (इच्छा) है तो सतर्क हो जाओ, इतने से बात बन जाएगी। पूछो अपनेआप से कि यह जो कर रहा हूँ इसमें मेरा छुपा हुआ स्वार्थ है कोई? या पहले से तय लक्ष्य है कोई?। पहले से ही तय अगर कर रखा है लक्ष्य तो जो तय कर रखा है लक्ष्य वहीं पहुँच जाओगे और कहाँ पहुँचोगे। और पहले से जो तुमने लक्ष्य तय करा है वो पहले से ही अपनी मौजूद जानकारी के हिसाब से तय करा है, है न।

जिस जगह का अपने नाम भी न सुना हो वहाँ पहुँचने का जीपीएस लगाते हो क्या कभी? तो लक्ष्य भी किस हिसाब से तय करते हो? जो चीज़ें पहले से पता हैं, जिन जगहों का पहले कम-से-कम थोड़ा-बहुत ज्ञान है, उन्हीं जगहों पर पहुँचने की कोशिश भी करते हो आप। तो जब जीपीएस खुद ही लगा रहे हो अतीत की अपनी जानकारी के अनुसार तो किसी नयी जगह पर कैसे पहुँच जाओगे? बस यह देख लिया करो कि मैं कुछ चाह रहा हूँ क्या? चाह रहा हूँ क्या? बहुत ज़ोर से नहीं पूछा जाता यह सवाल, धीरे से।

प्र: तो जब दूसरे में ईश्वर देखने की बात आती है तब पर्पज़पर्पोसेलेस ऑब्जरवेशन ही मतलब एक....

आचार्य: नहीं, ईश्वर देखने की बात मतलब माने क्या देखोगे ईश्वर? कैसे?

प्र: बोलते है जैसे हम लोग नमस्ते भी करते है तो किसी दूसरे के अन्दर जो ईश्वर है उनको

आचार्य: ऐसे, ऐसे करते हो? सचमुच?

प्र: नहीं मतलब, वो कहीं-न-कहीं मन में अब भी है कि....

आचार्य: वो उनके मन में था जिन्होनें तुमको यह बात कही थी, तुम्हारे मन में कुछ नहीं है। जिस चेतना के मुख से स्वतः स्फूर्त पहली बार उद्घोषित हुआ था नमस्तस्यै या नमस्ते, उसको यह भाव था, उसको यह दृश्य था कि सामने की जो सम्भावना है वो परम है बिलकुल। सामने जो खड़ा है भले ही हाड़-मांस में सीमित जीव दिख रहा है लेकिन साहब इसके भीतर अनन्तता बैठी हुई है। उसने बोला था कि नमस्कार। आप तो ऐसे ही बोलते हो नमस्ते।

कोई भी सही काम बोध से ही होता है, यह कितनी बार हम दोहराएँ? परम्परा थोड़े ही काम आयेगी कि अंकल जी को नमस्ते करो बेटा! उससे क्या हो जाएगा। अंकल जी को नमस्ते करने से वो अंकल जी में परम सत्य देखने लगेगा ढाई साल का छोटू। मैं नहीं कह रहा हूँ कि नमस्ते न करने से भी देखने लगेगा लेकिन कम-से-कम कहीं यह संवेदनशीलता तो हो कि बाहरी नमस्ते से कुछ नहीं होता। पता चले कि भीतर है कोई जो नमन नहीं करना चाहता, उसको नमित होना सिखाना है और इस कारण नमस्ते की उपयोगिता है। यह सब कुछ पता नहीं ऐसे ही बस एटीकेट्स (शिष्टाचार) के तौर पर। कह रहे हो, ‘वो देखो आंटी आई, नमस्ते करो बेटा।’ नमस्ते नहीं करा तो थप्पड़ मार दिया ‘बदतमीज़’। इससे क्या मिलेगा?

मशीन से हो जाते हैं बच्चें। घंटी बजी नहीं, घर का दरवाज़ा खुला नहीं कि अंकल नमस्ते! क्या कर रहे हो तुम उन्हें ऑटोमेटन (स्वचालित) बना रहे हो? क्या बना रहे हो उनको? फिर कह रहे हो ‘अब अंकल की आँखों में ईश्वर देखना है।’ माने क्या देखना है? और जो तुम देखना चाहते हो उसके लिए तुमको हर तरीक़े की छवियाँ दे दी गयी हैं क्योंकि देखी तो छवि ही जाती है भाई। तो प्रजापति ब्रह्मा को देखना है, मिल जाएगा, विशाल पुष्प पर वो विराजे हुए हैं। लक्ष्मीपति विष्णु को देखना है वो भी मिल जाएँगे, क्षीर सागर पर शेष नाग के नीचे शयन कर रहे हैं। शंकर भगवान को देखना है वो भी मिल जाएगा। और उसके लिए साधना नहीं चाहिए, उसके लिए किसी साधारण चित्रों की दुकान में चले जाओ वहाँ मिल जाएगा। ऐसे ही वो बना देते हैं, कहते है, ‘यह कैलाश पर्वत है और ठीक उसकी चोटी पर वो बैठे हुए हैं’। छवियाँ ही तो हैं तुम्हारे पास ईश्वर के नाम पर सत्य कहाँ हैं?

और यह कितने दुख की बात है कि अध्यात्म जिसको छवियों का भंजक होना चाहिए था, जिसका काम था मन को छवियों के पार ले जाकर के मौन में स्थापित कर दे, उस अध्यात्म में छवियों का ही बोलबाला हो गया। छवियाँ-ही-छवियाँ, छवियाँ-ही-छवियाँ। एक आम हिन्दू के पूजा घर में जाओ। कम से कम दस से पंद्रह वहाँ मूर्तियाँ होती हैं और जहाँ मूर्तियाँ नहीं होती हैं वहाँ कैलेंडर से काट-काट कर चिपका रखे होते हैं, पचास-साठ-सत्तर तरीक़े की छवियाँ।

मैं छवियों का विरोधी नहीं हूँ, मैं किसी चीज़ का विरोधी नहीं हूँ। जो भी चीज़ काम आए हमें स्वीकार है, जो भी कुछ हमें मुक्ति की ओर ले जाए हम उसके पाँव पड़ जाएँगे। तो मैं तो कहता हूँ, ‘मूर्ति अगर मुक्ति की ओर ले जाती हो तो मूर्ति को निसंदेह पूजो।’” पर आपने ये जो इतनी छवियाँ पकड़ रखी हैं वो आपको ले जा रही हैं क्या मुक्ति की ओर?

इतनी बार समझाया, इतनी बार बोला सनातन धर्म का लक्ष्य न स्वर्ग सुख है, न मरणोपरान्त मोक्ष है। लक्ष्य क्या है? जीवन मुक्ति। जीवन मुक्ति, जीवित रहते, सांस लेते-लेते ज़िन्दगी से आज़ाद हो जाना, जीवन के बन्धनों से, जीवन की मृग मरीचिका से मुक्त हो जाना, यह है सनातन धर्म का लक्ष्य। यह धर्म मात्र का लक्ष्य है, मैं ऐसे क्या बोल रहा हूँ सनातन धर्म जैसे मैं कोई साम्प्रदायिक बात कर रहा हूँ। धर्म मात्र का भी नहीं, यह जीव मात्र के जन्म का लक्ष्य है। कोई भी जीव कहीं भी जन्म ले रहा हो आज, कहीं और किसी देश में, किसी महाद्वीप में सबका एक ही लक्ष्य है यही, बस जीवन मुक्ति। और उसकी जगह आप धर्म के नाम पर न जाने क्या गुल खिला रहे हो। फिर कहते हो पशु की आँख में ईश्वर को देखना है। बड़ी विवशता आ जाती है मुझे मैं उत्तर क्या दूँ? ईश्वर.... और टीवी सीरियल होते हैं वो दिखा भी देंगे। वो ऐसे-ऐसे ज़ूम इन करेंगे फिर उसकी आँख में —मान लो किसी पशु की आँख है— फिर वहाँ दिखा भी देंगे कि कमल दल पर ईश्वर विराजे हुए हैं, वरदहस्त की मुद्रा ऐसे (आशिर्वाद की मुद्रा में)। एक-दो देवियाँ (पंखा करने का इशारा)। और पूरा सविस्तार दिखा दिया जाएगा स्क्रीन पर और जैसे ही आप यह देखोगे आप तत्काल क्या करोगे? नमस्ते। क्यों? भगवन जी आ गए। यह क्या थम.....

हम जिन ऋषियों के वंशज हैं, हम में ज़रा भी सम्मान नहीं उनके लिए। उन्होंने क्या हमें विरासत सौंपी थी और क्या हमने उसको बना दिया? एक तरफ़ हैं उपनिषद और एक तरफ़ हैं आपके ये टीवी सीरियल और पौराणिक ..... क्या बना दिया? यह तो छोड़ो कि हमने ऋषियों की विरासत को क्या बना दिया, यह देखो हमने ऋषियों को भी क्या बना दिया। ऋषियों का भी किस तरह का चित्रण करते हैं हम अपनी आम परम्परा में, संस्कृति में, जनमानस में देखिए ऋषियों की भी क्या छवि है। कि ऋषि माने ऐसे ही हैं, वो घूम रहे हैं कमण्डल लेकर, लोटा लेकर के और आते-जाते किसी को भी श्राप दे दिया, कोई मिल गया उसको वरदान दे दिया। और वरदान भी एक-ही-दो तरह के होते हैं किसी को पैसा दे दिया, किसी को पुत्र दे दिया। ये ऋषियों को पुत्रियों से क्या समस्या है नहीं समझ में आता। जिन ऋषियों को मैंने जाना है वो तो ऐसे नहीं थे कि लिंग का भेद करें। और आपके जो ऋषि हैं वो तो सारे यही नज़र आते हैं।

तो हम में ऋषियों के लिए भी सम्मान नहीं, हमनें ऋषियों का भी कैरीकेचर (विरूप चित्रण) बना दिया बिलकुल और वही चल रहा है, उसी को धर्म बोलते हो। और कोई इस तरह के सड़े हुए धर्म में न रहे तो उसको नास्तिक बोल देते हो। अधिकांश लोग जो मुझे जानते हैं उनकी दृष्टि में मैं नास्तिक हूँ, नास्तिक नहीं महा नास्तिक हूँ। आक्षेप भी यही है ये देखो ये नस्तिकाचार्य। ठीक है, तुम्हारी मूढ़ता को अगर आस्तिकता कहते हैं तो मैं नास्तिक ही भला। लेकिन एक बात बताए देता हूँ कि अगर मैं नास्तिक हूँ तो वशिष्ठ, वाल्मीकि, कृष्ण, याज्ञवल्क्य, अष्टावक्र, अरुणि, उद्दालक जितने नाम गिन सकते हो ये सब नास्तिक थे मेरे बराबर के। तुम आस्तिक रहो। यह जो सड़कों पर तुम नाच-कूद और हो-हल्ला करते हो, तुम्हारे हिसाब से यह आस्तिकता है। क्यों भाई? नमस्ते।

प्र: आचार्य जी, तो फिर आशिर्वाद का क्या मतलब है? जब हम कहते हैं कि हमें आशिर्वाद चाहिए या हम ब्लेस्ड हैं तो उसका क्या मतलब है?

आचार्य: मैं जहाँ से देख रहा हूँ, मेरे सामने गीता जी रखी हुई हैं यह कृष्ण का आशीर्वाद है और हम आपस में ऐसे बात कर पा रहे हैं यह चेतना का आशीर्वाद है। अगर लक्ष्य एक ही है जीवन मुक्ति तो आशीर्वाद भी एक ही हो सकता है, क्या? कि मुक्त हो जाओ। और खोखले शब्दों से तो किसी को कुछ मिलता नहीं। कोई मेरे सामने आए और मैं उसको इतना ही बोल दूँ बस कि मुक्त भव, तो इससे वो मुक्त तो हो नहीं जाएगा।

तो फिर आशीर्वाद वास्तव में हुआएक ऊँची चेतना द्वारा एक साधारण चेतना के लिए किया गया श्रम। कृष्ण हों कि वेद व्यास हों, कोई तो था न जिसकी मेहनत का फूल है गीता। आप लिख लेंगें सात सौ श्लोक उस कोटि के? किसी ने बैठ करके, बड़ा ध्यान लगा कर के, बड़ी मेहनत से गीता हमारे लिए रची है, यह आशीर्वाद है। अर्जुन को बस इतना ही बोल देते कि जाओ मुक्त हो जाओ, अर्जुन को कुछ नहीं मिलना था।

आप मेहनत समझिए पहले, श्रम के अतिरिक्त कोई साधन नहीं है। और श्रम भी कैसा? निष्काम श्रम। कृष्ण को स्वयं क्या मिला गीता से? कृष्ण को स्वयं क्या मिल रहा है? कुछ भी नहीं। और यह भी पक्का है कि अगर कृष्ण अर्जुन को गीता बता रहे हैं तो ठीक उसी वक़्त स्वयं तो बैठ कर लिख नहीं रहे होंगे। किम्वदन्ती एक तरफ़ रखिए कि वो वहीं से रिले(प्रसारण) हो रहा था और संजय बैठे हुए थे और वो सब हो रहा था, हटाइए।

निश्चित रूप से रणक्षेत्र में कृष्ण और अर्जुन के मध्य वार्तालाप तो हुआ लेकिन भगवद्गीता का जो स्वरूप हम आज अपने हाथों में पाते हैं वो किसी के गहरे श्रम का परिणाम है। वो श्रम उस वार्तालाप पर आधारित है निस्संदेह पर ऐसा नहीं है कि बस वार्तालाप को आसानी से, सुगमता से ठीक उसी समय किसी ने लिख दिया और वो चीज़ भावाद्गीता बन गयी। नहीं, किसी ने बहुत सोचा है, अध्याय बाँटे हैं। हम और आप बात कर रहे होते हैं तो अध्याय बाटते हैं क्या? बोलिए।

एक जब सहज संवाद होता है उसका एक प्रवाह होता है, एक स्पॉनटेनिटी (स्वच्छंदता) होती है, उसमें तो ऐसा नहीं हो पाएगा न कि साफ़-साफ़ खंड बटें हुए हैं। इन खण्डों का बँटना ही बताता है कि फिर शांति से, एकांत में, ध्यान में बैठ कर बड़े प्रेमपूर्वक ग्रन्थ की रचना की गयी है। जिसका आधार निस्संदेह ऐतिहासिक है, अर्जुन लड़ना नहीं चाह रहे हैं, कृष्ण उनको लड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और प्रेरित करने के लिए ज्ञान की तमाम बातें बता रहे हैं। ऐसा तो निश्चित रूप से कुरुक्षेत्र में हुआ है यह तथ्य है। फिर उस तथ्य को आधार बनाकर कोई कहता है, ‘आने वाली सब पीढ़ियों को मैं आशीर्वाद देना चाहता हूँ, आने वाली सब पीढ़ियों को मैं आशीर्वाद देता हूँ और वो आशीर्वाद गीता नाम से जाना जाएगा, श्रीमद्भागवद्गीता’।”

तो यह भी देख रहे होंगें कि करुणा और आशीर्वाद एक साथ चलते हैं, प्रेम और आशीर्वाद एक साथ। करुणा नहीं है तो क्या आशीर्वाद? किसी के सर पर ऐसे हाथ रख देना पता नहीं आशीर्वाद है कि नहीं, वो तो अहंकार की भी अभिव्यक्ति हो सकती है, ‘हम बड़े हैं, बेटा नीचे-नीचे रह’”(हाथ के इशारे से)। आशीर्वाद मेहनत माँगता है, कमरतोड़ मेहनत। किसी की भलाई आप यूँ ही नहीं कर पाएँगे। जब आप अपनी भलाई ही आसानी से नहीं कर सकते तो किसी और की भलाई करने के लिए तो काम दूना मुश्किल पाएँगे। दूना क्यों?

जब अपनी भलाई करते हो तो स्वयं से लड़ना पड़ता है, हमारे भीतर वृत्ति रहती है न जो अपना भला होने नहीं देना चाहती। अहम् वृत्ति पगली तो होती है, वो अपनी ही भलाई कहाँ होने देती है। अपना भला करना है तो खुद से लड़ना पड़ता है। दूसरे का भला करना है तो उससे भी लड़ना पड़ता है और खुद से भी लड़ना पड़ता है।

भीतर कोई बैठा है जो कहता है क्यों दूसरे पर समय लगा रहे हो, ऊर्जा लगा रहे हो, क्यों? और वो जो दूसरा है वो तो चाहता ही नहीं कि उस पर समय, ऊर्जा लगाई जाए। वो कहता है, ‘यह ज़रूर दुश्मन है मेरा। यह मुझे बदलना चाहता है ज़रूर मुझे बदलने में इसका अपना कोई स्वार्थ है।’ तो दो-दो से लड़ना पड़ता है। आशीर्वाद मैं कह रहा हूँ बड़ी मेहनत का काम है। दो दो से जूझने को आशीर्वाद कहते हैं। मुँह तो कोई भी बतोला चला सकता है और जब मुँह चलाते हैं तो ऐसे ही मूर्खता वाली बातें भी करते हैं ‘दूधो नहाओ पूतों फलो।’

एक तो सब आशीर्वादों को वीगन कर लीजिए, यह दूध वगैरह नहीं चलेगा। जो दो चीज़ें मुझे पसंद हैं वीगानिस्म और एंटी-नटालिज़्म, यह आशीर्वाद हमारा दोनों के खिलाफ़ है। ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ जो तीसरी चीज़ है जो नहीं होनी चाहिए पितृसत्ता इसमें वो भी है क्योंकि बात पूत कि हो रही है पूतनी की नहीं। वो अभी यह भी नहीं कह रहे हैं कि एक पूत, वो कह रहे हैं ‘पूतों फलो’। माने पेड़ है तो कई फल लगने चाहिए न, सबके घर एक-एक जाएगा।

क्या चल रहा है यह? यह आशीर्वाद है? यह ब्लैसिंग है? ब्लेस करना मुँह चलाने का काम नहीं होता। चाहे ख़ुद को ब्लेस करना हो, चाहे किसी दूसरे को ब्लेस करना हो, जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है।

कभी गीता रचनी पड़ती है, कभी कोई मन्दिर खड़ा करना पड़ता है, कभी कोई विश्वविद्यालय खड़ा करना पड़ता है और जिनके लिए खड़ा करते हो भली-भाँति जानते हो तुम उनका कभी चेहरा भी नहीं देखने वाले, इसी को निष्कामता कहते है। आप जो कर के जा रहे हो उसमें आपकी पूरी ज़िन्दगी लग जाएगी और जिनको उससे लाभ होगा आप कभी उनका चेहरा नहीं देखने वाले, आप जीवित ही नहीं रहोगे उनसे धन्यवाद पाने के लिए। फिर भी आप उनके लिए कर के जा रहे हो, यह आशीर्वाद है।

तो आशीर्वाद को निष्काम और सश्रम दोनों होना पड़ेगा। उसमें क्या मौजूद होगा? श्रम, तो सश्रम। और उसमें क्या नहीं मौजूद होगा? कामना, तो निष्काम। निष्काम शश्रमता ही आशीर्वाद है। अपने लिए नहीं कर रहा हूँ, बहुत मेहनत कर रहा हूँ, अपने लिए नहीं कर रहा हूँ यही ब्लेस्सिंग है, आशीर्वाद है।

प्र: सर, फ़ेथ ईश्वर से कैसे सम्बन्धित है? .

आचार्य: फ़ेथ आप जिसको बोलते हैं वो विश्वास का ही दूसरा नाम है। और बिना किसी सवाल के, बिना ज़रा भी अपनेआप को कुरेदे हम एकदम बेहोशी में कैसे शब्दों का और मुहावरों का इस्तेमाल करे ही जाते हैं। ‘देयर आर सो मेनी फ़ेथ्स इन द वर्ल्ड’ (दुनिया में बहूत सी श्रद्धाएँ हैं), ‘पीपल वरशिप अकॉरडिंग टू देयर फ़ेथ्स’ (लोग अपनी श्रद्धाओं के अनुसार पूजा करते हैं) ये सब सुना हैं न। यह फ़ेथ्स क्या होता है? श्रद्धाएँ? फ़ेथ्स माने क्या? श्रद्धा का बहुवचन निकाल दिया। (कबीर) साहब बोल गए हैं, “भाई रे! दुई जगदीश कहाँ से आया?” सत्य तो एक है दूसरा कहाँ से ले आए? जब सत्य एक है तो श्रद्धाएँ अनेक कैसे हो गयीं? यह फ़ेथ्स क्या है? आमतौर पर आप जिसको फ़ेथबोलते हो अन्धविश्वास है। आपकी निजी मान्यता को आप फ़ेथबोलने लग जाते हो, वो फ़ेथनहीं होती, फ़ेथबहुत अलग चीज़ है।

फ़ेथ का अर्थ होता है एकदम नकार में, फ़ेथका अर्थ होता है, श्रद्धा का अर्थ मुझे अब सुरक्षित अनुभव करने की कोई आवश्यकता नहीं बची। या फिर मुझे सुरक्षित अनुभव करने के लिए कोई मान्यता रखने की कोई आवश्यकता नहीं बची। हमको मान्यता रखनी पड़ती है क्योंकि मान्यता नहीं रखें तो हमारी टाँगे काँपने लगती हैं।

आपको मानना पड़ता है कि आज आप घर जाओगे तो ताला नहीं टूटा होगा मानना पड़ता है न। आप कहीं-न-कहीं माने बैठे हो कि यह जो छत है यह आपके ऊपर गिर नहीं पड़ेगी। आपको मानना पड़ता है कि बच्चें स्कूल गए हैं तो नियत समय पर घर वापस आ भी जाएँगे। मानते हो न यह सब? न मानो तो थर-थर हो जाते हो। और कितनी ही चीज़ें हैं जिनको मानकर ही जी रहे हो, इन मान्यताओं में ईश्वर की मान्यता भी शामिल है। क्योंकि आप जो कुछ मानते हो आपके पास उसको मानने की कोई गारंटी तो है नहीं तो आपकी मान्यता में कुछ दम बना रहे, आपकी मान्यता के पीछे कोई सिक्योरिटी (सुरक्षा) हो, आपकी मान्यता को कोई अंडरराइट (हामीदारी) कर सके इसके लिए आप एक मान्यता और गड़ते हो, ईश्वर की मान्यता।

फ़ेथका अर्थ होता है मुझे अब किसी और मान्यता की ज़रुरत ही नहीं है। जिसे अब कहीं ट्रस्ट (विश्वास) करने की कोई ज़रुरत नहीं बची वो अब फ़ेथमें है। यह तीन अलग-अलग चीज़ें हैं न बिलीफ़, ट्रस्ट और फेथ। और बिलीफ़ से भी और नीचे लाना है तो सुपरस्टीशन। सबसे निचले तल पर क्या होता है? सुपरस्टीशन, अन्धविश्वास। उसके ऊपर क्या होता है? बिलीफ़ माने मान्यता। उसके ऊपर क्या होता है? ट्रस्ट, विश्वास। फ़ेथइन सबसे अलग है, फ़ेथमाने श्रद्धा। लेकिन चूँकि हमारे पास श्रद्धा नहीं होती है तो हम नीचे की ही कोई तीन चीज़ पकड़ कर कह देते हैं फ़ेथहै।

एक से एक अन्धविश्वासी घूम रहे होंगे, किसी का अँगूर में है, कह रहे हैं, ‘आप कुछ कहेंगे नहीं, यह अँगूर नहीं है, कुलदेवता है हमारा।’ कहो, ‘कैसे?’ तो कहेंगे, ‘फ़ेथ है, 'एंड फ़ेथ कैन नॉट बी क्वैश्चंड' (श्रद्धा पर सवाल नहीं करते)। साहब, वो अन्धविश्वास कहलाता है, उसको श्रद्धा नहीं बोलते हैं। और इंसान हो तो इन चार चीज़ों में अन्तर करना सीखो सुपरस्टीशन, बिलीफ़, ट्रस्ट एंड फेथ, एकदम अलग-अलग हैं। और जैसा जानने वालों ने हमसे कहा है कि किसी भी तल पर, किसी एक्सेस पर चार विभाजन नहीं हो सकते सिर्फ़ दो ही हो सकते हैं सत्य और असत्य। तो सत्य तो इनमें से बस एक से ही सम्बंधित है। किससे? श्रद्धा से, फ़ेथसे। बाक़ी नीचे के जो तीनों हैं वो एक तरह से एक ही कोटि में आते हैं।

अंधविश्वास माने सिर्फ़ सुन लिया, परखने की कोई सम्भावना ही नहीं है। परखने की कोई सम्भावना ही नहीं है तब भी मान रहे हैं। ऐसी चीज़ को मान रहे हैं जिसे परखा जा ही नहीं सकता, उदहारण के लिए नारियल के पेड़ पर जिन्न बैठे हैं। यह नहीं कि आपने इसको परखा नहीं, न आप ने इसे परखा है न इसे परखा जा सकता है फिर भी मान लिया। क्यों मान लिया? क्योंकि डरे हुए है। डरे यह हुए हैं कि अगर नहीं माना तो जिन्न मार देगा। जिन्न क्यों मार देगा? क्योंकि हमें बताया गया है कि जिन लोगों ने जिन्न को नहीं माना जिन्न ने उन्हें मार दिया, तो हम भी मानेंगे और बहुत ज़ोर से मानेंगे। इसे कहते हैं अन्धविश्वास। जहाँ परखने की कोई सम्भावना ही न हो, जहाँ वेरिफिकेशन सम्भव ही नहीं है फिर भी माने चलते हो उसे कहते हैं सुपरस्टीशन।

बिलीफ़ किसको बोलते हैं? जहाँ परखा नहीं पर परखा जा सकता था। अंधविश्वास में क्या करा था? न परखा, न परखा जा सकता वो अंधविश्वास है। बिलीफ़ क्या है? परखा जा सकता है पर परखा नहीं। ऐसे (आराम से) बैठे हैं, ‘परखने की क्या ज़रुरत है? परखने की ज़रुरत क्या है? हमें यक़ीन हैं।’ मैं नहीं परखूँगा क्योंकि मुझे तो विश्वास है, यह बिलीफ़ है। बिलीफ़ अंधविश्वास से ऊपर क्यों हैं? क्योंकि कम-से-कम परखा जा सकता है। हो सकता है कि ज़िन्दगी आपको ऐसी ठोकर दे कि आप कहें कि चलो परख लेते हैं, फिर परखेंगे तो कम से कम राज़ खुलेगा। अन्धविश्वास में तो परखने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी गयी है। ‘मैं डाइटिंग पर हूँ इसीलिए आज कल मैं कैलोरीज़ बहुत कम लेती हूँ।’ वजन कम हो नहीं रहा। (श्रोतागण हँसते हैं)

कैलोरी गिनी जा सकती थी कि नहीं? गिनी नहीं उल्टे डॉक्टर के पास पहुँच गए, बोले, “ज़रूर मेरे मेटाबोलिज़्म में कोई समस्या है। मैं खाती कुछ नहीं हूँ और वजन कम नहीं हो रहा बल्कि बढ़ ही रहा है।’ यह आपकी बिलीफ़ है न कि आप कम खाती हैं और इस बिलीफ़ को वेरीफाई करा जा सकता था। कैसे? दिन भर जो खाया है उसकी कैलोरी गिन लेते तो वेरीफाई हो जाता कि बेटा कहीं कम नहीं खाते, अपनेआप को फालतू झूठ बोल रहे हो कि मैं तो कम खाती हूँ। दनादन खा रहे हो फिर कह रहे हो मेटाबोलिज़्म ख़राब है इसलिए वजन नहीं कम हो रहा। यह बिलीफ़ है, जहाँ परखा जा सकता है लेकिन आपने परखा नहीं। ठीक?

ट्रस्ट पर आते हैं, ट्रस्ट क्या है? जहाँ परख लिया लेकिन परखने पर दो शर्तें लगा दीं, पहला ख़ुद ने परखा, दूसरा कुछ बार परखा। एक सीमित प्रयोग करके असीमित निष्कर्ष निकाल लिया। प्रयोग क्या है? सीमित, मुझे दो बार पैसे की ज़रुरत पड़ी, दोनों बार मुझे कहीं-कहीं से मदद आ गयी। कभी एक दोस्त ने कर दी, कभी दूसरे दोस्त ने कर दी और मैंने उससे… यह सीमित एक प्रयोग है न? कभी आपको ज़रुरत पड़ी थी और दो लोगों से मदद आ गयी, उससे आपने असीमित निष्कर्ष निकाल लिया। क्या? जब भी मुझे ज़रुरत पड़ेगी आसमान से मदद ज़रूर उतरेगी, यह ट्रस्ट है। इसमें कम-से-कम प्रयोग करा तो था लेकिन प्रयोग का निष्कर्ष ग़लत निकाल लिया था। जो चीज़ एक-दो बार हुई आपने मान लिया था कि सदा होती रहेगी। जो चीज़ कभी किसी समय हुई आपने मान लिया था कि सदैव होती रहेगी। ठीक है न।

उसने मुझसे तीन साल पहले बोला था ऑय लव यू, मैंने क्या कंक्लूज़न (निष्कर्ष) निकाला? वो आज भी मुझसे प्यार करता है। और इतना ही नहीं हमें बड़ा इंडिग्नेशन (रोष) होता है, बड़ी हम में ज्वाला उठती है जब हम पाएँ कि अब नहीं करता। ‘तूने बोला था न तीन साल पहले ऑय लव यू। यह, यह रिकॉर्डिंग देख। देख, देख यह तू है न।’ भाई, उसने बोला था, कब बोला था? तीन साल पहले बोला था। तुझसे किसने कहा था कि तू मान ले कि तीन साल बाद भी करेगा? ‘नहीं, पर उसने बोला था लव यू फॉरएवर।’ यह भी उसने कब बोला था? उसका फॉरएवर भी कब था? तीन साल पहले का था। वो बंदा खुद फॉरएवर नहीं है, न तू फॉरएवर है, लव फॉरएवर कहाँ से आ गया? यह ट्रस्ट है, सीमित प्रयोग का असीमित निष्कर्ष निकालना। ठीक है?

अब श्रद्धा क्या है? श्रद्धा कहती है हटो यार, न लेना न देना, मगन रहना, यह श्रद्धा है। अन्धविश्वास में भी किसी पर टिकते हो, कोई विषय होता है जिसका सहारा लेते हो। लेते हो न? ‘जिन्न मेरी मदद करेगा।’ यह अन्धविश्वास है सब। फलानी देवी, फलाना कुछ, फलानी शक्ति कुछ, कोई विषय है। बिलीफ़ में भी किसी का सहारा लेते हो ‘मुझे यक़ीन है कि’ अब किसी विषय की बात करोगे, कोई ऑब्जेक्ट होगा। ट्रस्ट में भी कोई होता ही है, ‘मेरे दो दोस्त हैं या कोई ईश्वर है जो विपत्ति के समय में आकर मेरी मदद कर देगा’, वहाँ भी कोई है जिसपर आश्रित हो रहे हो। श्रद्धा में किसी पर नहीं आश्रित होते। कोई बोले मुझे भगवन पर श्रद्धा है वो पागल है। भगवन पर अधिक से अधिक क्या हो सकता है? ट्रस्ट हो सकता है, श्रद्धा का कोई विषय नहीं होता। श्रद्धा का कोई विषय नहीं होता, फ़ेथ इस पर्पज़लेस. ऑब्जेक्टलेस, डिज़ायरलेस (श्रद्धा उद्देश्य विहीन, विषय विहीन, कामना विहीन है)।

फ़ेथ यह नहीं कहती कि मेरे साथ कुछ बुरा नहीं होगा, मुझे भरोसा है। मुझे अपने भगवन पर भरोसा है मेरे साथ कुछ बुरा नहीं होने देंगे या मुझे अपने यार पर भरोसा है या मुझे अपने बेटे पर भरोसा है कि वो मेरे साथ कुछ बुरा नहीं होने देगा, यह फ़ेथ नहीं है। फ़ेथ से पूछा जाता है कि अगर कुछ बुरा हो गया तेरे साथ तो? तो फ़ेथ क्या बोलती है, ‘होण दे।’ फिर से पूछोगे, ‘कुछ बुरा हो गया तेरे साथ?’ तो फ़ेथ क्या बोलती है, (ऊँघने का अभिनय)। फ़ेथ को रुचि ही नहीं है अच्छे में कि बुरे में, वो अपनेआप में पूरी तरह पूर्ण और संतुष्ट। और ज़्यादा उसे कुरेदोगे। अरे! बता तो तेरे साथ कुछ बुरा हो गया तो?

तो फ़ेथ क्या बोलती है? देख लेंगे। यह नहीं कि बुरा हो नहीं सकता, अच्छा भी हो सकता है बुरा भी हो सकता है, अच्छा-बुरा सब बाहर-बाहर की बात है, हम पर कोई फ़र्क पड़ता नहीं है, इसे श्रद्धा कहते हैं। जो होगा हम उससे बड़े ही हैं, जो होगा वो प्रकृति के क्षेत्र में होगा, हम प्रकृति के बाप हैं। जो होगा जीवन में होगा, हम जीवन से मुक्त हैं, यह श्रद्धा है। श्रद्धा बिलबिलाती नहीं है, ‘प्लीज, प्लीज बचा लो।’ श्रद्धा कहती है, ‘हमें ज़रुरत ही नहीं है कि कोई हमें बचाए।’, यह फ़ेथ है। अन्तर समझ में आ रहा है?

फ़ेथ इस भरोसे में नहीं जीती कि मेरे पास एक सपोर्ट सिस्टम है। फ़ेथ कहती है, ‘सपोर्ट सिस्टम हो अच्छी बात, न हो अच्छी बात, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता, नहीं पड़ता। हम सोच ही नहीं रहे कि अच्छा होगा कि बुरा होगा।’ यह वो चीज़ है जो आपसे निष्काम कर्म करवा पाती है। श्रद्धा बगैर निष्काम कर्म नहीं हो सकता। श्रद्धा नहीं है तो आप बार-बार पूछेंगे, ‘अभी दो घंटे निष्काम कर्म करा मिलेगा क्या?’ जब श्रद्धा होती है मात्र तब आप कह सकते हैं, ‘मिला तो ठीक। नहीं मिला तो? तो भी ठीक। पाने-न-पाने के लिए कर्म करा ही नहीं।’”

कुछ आ गया सुखदायी —और भाई जीव हैं तो सुख-दुख का अनुभव तो होता ही है। निष्काम कर्म भले ही कर रहे हों पर जहाँ तक शरीर की बात है, उसको तो यह सब— कुछ आ गया सुखदायी कहेंगे, ‘बहुत बढ़िया! लागाओ लड्डू’। लड्डू आएँ हैं तो हम अस्वीकार थोड़े ही कर देंगे। कुछ आ गया बस ऐसे ही आ गया, हवा चली पसीना सूख गया, अब यह थोड़े ही बोलेंगे कि तू सुख क्यों दे रही है हमको।

गर्मी का समय हो, पसीना बह रहा हो, शाम, और तभी ज़रा ठंडी हवा बहने लग जाए तो सुख मिलता है कि नहीं? वैसे ही अगर कर्मों से कुछ सुख मिल गया तो भोग लेंगे, हमें भोग से कोई आपत्ति नहीं है। चल रहे हैं, चल रहे हैं, चलते-चलते किसी ने लड्डू दिखा दिए, खा लेंगे। यह थोड़े ही बोलेंगे, ‘अरे, तू! हम कर्मयोगी हैं। हमें लड्डू दिखाता है?’ तू दिखा लड्डू। हाँ भाई, बढ़िया लड्डू हैं ला दिखा। और चल रहे हैं चलते-चलते नहीं मिले लड्डू, दो-चार दिन मामला फाँके का रहा तो भी कोई बात नहीं। लड्डू खा लिए क्योंकि लड्डुओं से कुछ मिल नहीं जाना है और भूखे रहे लिए तो भी कुछ बिगड़ नहीं जाना है, यह श्रद्धा है।

श्रद्धा बिना निष्काम कर्म सम्भव नहीं है और निष्काम कर्म आत्मज्ञान बिना सम्भव नहीं है माने श्रद्धा सीधे-सीधे आत्मज्ञान का ही एक रूप है। उसे आप परिणाम भी बोल सकते है, उसे आप आत्मज्ञान की अभिव्यक्ति बोल सकते हैं जैसे बोलिए पर आत्मज्ञान और श्रद्धा साथ-साथ चलेंगे। आपको कोई मिले महा अज्ञानी, ज्ञान से कोई लेना देना नहीं और बोले, ‘हम तो भक्ति मार्गी हैं, हम में श्रद्धा है।’ ऐसे ही है फिर मूरख, फूहड़। और ये ज़्यादातर बातें आपको भक्ति मार्गियों में खूब मिलेंगी। कहेंगे, ‘ज्ञान छि-छि-छि गन्दी चीज़। ज्ञान तो बुद्धि विलास है, ज्ञान अच्छी चीज़ नहीं है, श्रद्धा रखो श्रद्धा।’ भाई, ज्ञान बिना श्रद्धा तुझ में आ कहाँ से जाएगी? और ज्ञान माने हम दुनिया के बाहरी ज्ञान की बात नहीं कर रहे हैं, हम किस ज्ञान की? आत्मज्ञान।

आत्मज्ञान बिना श्रद्धा सम्भव नहीं है और आत्मज्ञान है तो श्रद्धा अपनेआप आएगी, आपको प्रयास नहीं करना पड़ेगा। जैसे-जैसे आप स्वयं को जानते जाएँगे वैसे-वैसे आप में सहारे की चाह कम होती जाएगी, वैसे-वैसे भविष्य को लेकर आपकी चिंता भी कम होती जाएगी, यही श्रद्धा है।

लिविंग विदआउट अ बेस (आधार के बिना जीना), फ्लाइंग विदआउट अ रडार (रडार के बिना उड़ना), सेलिंग विदआउट सेल्स (बिना पाल की नाव चलाना), वर्किंग विदआउट अ विज़न (उद्देश्य के बिना काम करना), गेटिंग क्लियरर?(कुछ स्पष्टता आई?)।

प्र: धन्यवाद सर)।

प्र: नमस्कार आचार्य जी, मेरा प्रश्न इस चीज़ से सम्बंधित है कि अभी अपने जैसे कहा कि निष्काम कर्म जो है वो आत्मज्ञान से आएगा और तभी हम मोक्ष तक पहुँच सकते हैं। तो मेरा प्रश्न यह है कि यह भी तो हो सकता है कि आत्मज्ञान हमें हो जाने के बाद भी —आपने एक चीज़ बोली कि वर्किंग विद आउट विज़न— तो एक जब कोई विज़न ही नहीं है तो यह भी तो हो सकता है कि आत्मज्ञान आने के बाद भी हम चारों तरफ़ की चीज़ों से आसक्त हो जाएँ या कभी उसमें इस तरह से भूल जाए तो हम मेन मुद्दे से ही भटक कर, हम उसी में फिर माया में ही फँसे रहे?

आचार्य: नहीं, नहीं हो सकता।

प्र: क्योंकि ऐसा काफ़ी जो तथाकथित गुरु हैं, जो इसी तरह के ढर्रे पर चले जाते हैं।

आचार्य: तुम्हें कैसे पता वो आत्मज्ञानी है?

प्र: वो शुरुआत वहीं से करते हैं।

आचार्य: तुम्हें कैसे पता?

प्र: वो बताते हैं इस तरह से।

आचार्य: उन्होंने बताया तुमने सुन लिया?

प्र: ऐसा देखा है ज़्यादातर।

आचार्य: हम देखने को कहते हैं कि परखने को? चलो, अगला प्रश्न। सारी समस्या स्थूलता की है, छवि की है। इम्प्रेशंस पर चलते हो और किसी को इम्प्रेस करना तो बहुत आसान होता है, है न। किसी ने इतनी बड़ी दाढ़ी रखी नहीं कि आत्मज्ञानी हो गया और अभी कोई कमी बची हो तो चार माला डाल लो, आईएसओ सर्टिफाइड आत्मज्ञानी। और अभी भी कुछ शक-शुबहा रह गया हो तो पिछले जन्म की चार-पाँच कहानियाँ बता दो, सिक्स-सिग्मा आत्मज्ञानी। और तुमने मान लिया है, तो होगा ही आत्मज्ञानी। नहीं, कैसे पता?गीताकार कुछ जानते हैं वास्तव में उसका प्रमाण है गीता। और जिन्हें तुम आत्मज्ञानी बोलते हो वो कुछ जानते हैं उसका प्रमाण है, दाढ़ी, यह कैसा प्रमाण है?

दर्शन शास्त्र शुरू ही होता है —कोई भी दर्शन हो— पहला सवाल कहता है प्रमाणिकता कहाँ है? हर दर्शन में पहला सवाल यही होता है प्रमाण किसको माने। और सब दर्शन प्रमाण के अलग-अलग स्रोतों को वैधता देते हैं, कुछ स्रोतों को सभी साझा मानते ही हैं और बाक़ीयों में थोड़ा-थोड़ा-थोड़ा भेद होता है। पर यह प्रश्न पहला होता है, हम किसी भी चीज़ को मान कैसे सकते हैं? कुछ भी मान कैसे लें? तुम मानते हो… वो बताते हैं, कभी बोलते हैं प्रत्यक्ष प्रमाण, कभी कहते है श्रुति प्रमाण, कभी कहते हैं अनुमान प्रमाण, तुम कहते हो दाढ़ी प्रमाण। कोई प्रमाण नहीं चाहिए, दाढ़ी प्रमाण है। यह दाढ़ी प्रमाण न वेदान्त मानता है, न सांख्य मानता है, न योग मानता है, न न्याय, न वैशेषिक, न कोई पाश्चात्य दर्शन मानता है।

पर भारत की नब्बे प्रतिशत आबादी यही प्रमाण मानती है, क्या? दाढ़ी प्रमाण, माला प्रमाण, गप्प प्रमाण, पगडा प्रमाण। जितनी गप्प फेंक सकते हो फेंको, ’मेरा ऐसा मेरा वैसा फिर मेरा ऐसा हुआ। फिर मैं कुएँ में गिर गया, कुएँ में अजगर था, अजगर बोला, मैं पुराने जन्म का एक ऋषि हूँ।” फिर अजगर मेरे भीतर घुस गया, अब मैं ऋषि हूँ।’ बच्चा लोग बजाओ ताली! और तुमने बजा दी ताली। और ‘मैं जब चाहूँ अपना अजगर एक्टिवेट कर सकता हूँ’, और डरे बैठे हो, अजगर है, यही है।

और फिर उसके बाद तुम्हें इस तरह की दुखद समस्या सामने आ जाती है कि मैंने तो इनकों आत्मज्ञानी माना था फिर इन्होने इस तरीक़े के काण्ड कैसे कर दिए? तुम्हें कैसे पता? अगर मान्यता और तथ्य आपस में टकरा रहे हों, तुम्हारी एक मान्यता थी और जब तुम तथ्य देखते हो तो तथ्य मान्यता के विरोध में हैं, तो इसका आशय क्या है? मान्यता ही ग़लत थी न, तथ्य तो तथ्य है, मान्यता ही ग़लत थी। मान्यता का आधार यही है। एक दूसरी चीज़ भी होती है, तुम्हारे पास सिर्फ़ इसकी मान्यता नहीं है कि आत्मज्ञान का प्रमाण होती है दाढ़ी और माला और गप्प और किससे कहानियाँ, तुम्हारे पास आत्मज्ञान का प्रमाण कुछ विशिष्ट कोटि के कर्म भी हैं। तुम कहते हो कि अगर आत्मज्ञानी होगा तो इस-इस तरीक़े के कर्म करेगा और इस-इस तरीक़े के कर्म नहीं करेगा।

तो तुम एक नहीं दो तरह से धोखा खाते हो भाई, एक तुम धोखा यह खाते हो कि जो आत्मज्ञानी नहीं है उसको आत्मज्ञानी समझ लेते हो क्योंकि आत्मज्ञान को लेकर तुम्हारे पास मान्यता है, छवि है। और दूसरा यह खाते हो कि जो आत्मज्ञानी है भी, उसको तुम उसके कर्म देख करके आत्मज्ञानी मानने से इंकार कर देते हो क्योंकि तुम्हारे पास छवि बस आत्मज्ञानी व्यक्तित्व की नहीं है, तुम्हारे पास छवि आत्मज्ञानी के कर्मों की भी है। तुम कहते हो इसके ये जो कर्म है यह हमारी लिस्ट में जो सेंक्शन्ड (स्वीकृत) आत्मज्ञान के जो कर्म है उनमें से तो है नहीं। और तुम्हारे पास एक लिस्ट है, उस सूची में लिखा हुआ है अगर आत्मज्ञानी होगा तो ऐसा-ऐसा करेगा, यह छः काम ज़रूर करेगा और यह छः काम बिलकुल नहीं करेगा।

अब होगा कोई आत्मज्ञानी तुमने उसे उन जो निषिद्ध, प्रतिबंधित छः काम हैं उसमें से कोई करते देख लिया, तुम कहोगे, ‘यह नहीं है आत्मज्ञानी’। दोनों ओर से मारे जाते हो क्योंकि दोनों ही ओर कुछ समझते नहीं हो बस दिमाग में छवि भर है।

प्र: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मैं आपको चार साल से सुन रहा हूँ, ऋषिकेश के बाद से मेरे ख्याल से छठा- सातवाँ कैंप है। मैं हर बार एक चीज़ में फँस जाता हूँ जाकर, जब आप बोलते हो कि आत्मा अज्ञेय, अजन्मा है, तो वो भी तो हमें कहीं-न-कहीं मानना पड़ता है। इस चीज़ को मैंने परखने की कोशिश की कि क्या मन बुद्धि के परे भी कुछ है भी कि अज्ञेय बार-बार आ रहा है? तो पहुँचते है कहीं पर जहाँ पर जाकर पूरा समाप्त हो जाता है मामला। तो फिर लगता है कि कहीं जाकर, हम इसलिए नहीं समझ पा रहे क्योंकि जिसको हम समझना चाह रहे हैं, वो हमसे नहीं है, हम उससे है। आप जिस तरह से स्टार्टिंग में बात कर रहे थे कि हम ही सूरज चला रहे, चाँद चला रहे ठीक है। हम चला रहे लेकिन इतने सारे फल पैदा हो रहे रोज़ लेकिन हमारे कंट्रोल में तो कुछ भी नहीं है, हम तो एक आम भी नहीं पका सकते, हम तो एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकते तो हमारे कंट्रोल में कैसे है?

आचार्य: इसीलिए आत्मा को अज्ञेय ही नहीं कहा, अप्रमेय भी कहा। अप्रमेय माने उसका कोई प्रमाण नहीं हो सकता। ठीक है? क्यों कहा उसका कोई प्रमाण नहीं हो सकता? फिर वापस जाओ कि वेदान्त का मूल प्रश्न क्या होता है, किसके लिए? आपके लिए उसका कोई प्रमाण नहीं हो सकता, आप वो हो जाओ तो आप स्वयं प्रमाण हैं। आप हो गये तो आपकी हस्ती प्रमाण है उसका, पर आप वो नहीं हुए तो आपको कोई प्रमाण दे नहीं सकता, आपके लिए वो अप्रमेय ही रहेगी। वो होकर ही उसको जाना जा सकता है अन्यथा उसका कोई प्रमाण नहीं है। प्रमाण मांगने वाला कौन है? अहंकार। प्रमाण वो माँग किसका रहा है? आत्मा का। अहंकार और आत्मा माने दो बिलकुल अलग चीज़ें, अहंकार वो जो आत्मा नहीं है, अहंकार वो जो अभी तक आत्मा होने से बचता रहा है।

रात को मैं सूरज का प्रमाण कैसे दूँ? बताओ। घनी, काली, आधी रात अमावस की मुझसे कहती है, ‘मुझे सूरज का प्रमाण दो। मुझे सूरज का आज तक कोई अनुभव नहीं हुआ।’ और रात की बात बिलकुल ठीक है, रात को आज तक सूरज से कोई अनुभव नहीं हुआ। हुआ है आज तक? क्या रात को सूरज का अनुभव हो सकता है? नहीं हुआ। आप रात को सूरज का अनुभव देने की कोशिश करेंगे तो क्या हो जाएगा? आप जिसको अनुभव देना चाह रहे है वो बचेगा ही नहीं अनुभव ताले के लिए न। रात को आपने सूरज का अनुभव दे दिया तो रात बची कहाँ? यह समस्या है, इस कारण अहंकार के लिए आत्मा को अप्रमेय कहा गया है। तुम्हें नहीं मिलेगा बच्चे प्रमाण, तुम जो हो तुम्हें वही बने-बने आत्मा का प्रमाण नहीं मिलेगा, तो तुम कोशिश भी मत करो। तुम कोशिश करो अपने भीतर जाने की, अपने भीतर जाने की मतलब अपनी ज़िन्दगी को देखने की, अपने कर्मों को देखने की, अपने संबंधो को, कामनाओं को देखने की। वो तुम कर लो, वो तुम्हारे बूते की बात है। जो तुम्हारे बूते की बात नहीं है उसका प्रयास मत करो। तुम्हें रात होते हुए सूरज का, प्रकाश का प्रमाण नहीं मिल सकता।

अच्छा, प्रमाण नहीं मिल सकता तो कैसे पता वो है भी? जो हो गए हैं उनकी हस्ती प्रमाण होती है। जो हो गए है उनकी हस्ती प्रमाण होती है, इसीलिए ग्रंथों से ज़्यादा गुरु को पूजा जाता है। इसीलिए गीता से ज़्यादा कृष्ण को पूजा जाता है। आत्मा का प्रमाण क्या है? आत्मा का प्रमाण तो आत्मस्थ व्यक्ति ही है। और वो भी वो प्रमाण किसी छटे हुए अहंकारी को दिखाई नहीं देगा, वहाँ भी प्रश्न बचता हैं न कि वो प्रमाण किसके लिए है? —कृष्ण प्रमाण हैं आत्मा का, कृष्ण की ऑंखें, कृष्ण की बात, कृष्ण की बोली, व्यव्हार, निर्णय यह सब आत्मा का ही प्रमाण हैं— पर वो प्रमाण भी किसके लिए है? वो प्रमाण भी किसके लिए है? दुर्योधन के लिए है? दुर्योधन को मिल गया प्रमाण कृष्ण को देखते ही कि यही आत्मा तो होती है? कृष्ण को देखते ही ‘तुमको देखा तो यह ख्याल आया’, दुर्योधन के साथ ऐसा कुछ हुआ था कि कृष्ण को देखा और एकदम समझ गए कि माया भ्रम है आत्मा सत्य है? ऐसा हुआ था? वो उल्टा कर रहा था, कृष्णा गए थे संधि प्रस्ताव लेकर बोला, ‘बान्धो- इनको। चलो, कैद में डालो’।

अर्जुन को भी आधा ही प्रमाण मिला था कृष्ण को देख कर, अर्जुन को भी लग रहा था पता नहीं, है नहीं है, क्या कर रहे हैं? भड़का रहे हैं बस। तो अहंकार को आत्मा का प्रमाण नहीं दिया जा सकता। ठीक? अहंकार अधिक-से-अधिक जिस दिन बन जाएगा आत्मा उस दिन प्रमाण पा जाएगा, बस मजे की बात यह है कि उस दिन उसे प्रमाण पाने की कोई उत्सुकता रहती नहीं है। जब तक नहीं बना है आत्मा तब तक उसको उत्सुकता रहती है, उत्सुकता माने डर, उत्सुकता माने संशय। उसको लगता है कहीं मैं मूरख ही तो नहीं बन रहा कि आत्मा कुछ होती ही न हो, फालतू ही मुझे ही कहा जा रहा है आत्मा, आत्मा। भाई, पता करे पहले कहीं, ‘हाँ भाई, आत्मा है?’ बोले ‘वो बगल के मोहल्ले में एक रहता है उसको पक्का सबूत मिला है कि होती है।’ कैसे मिला है? बोले ‘उसको रात को आती है।’ और फिर वो क्या करता है… (हँसते हुए)

तो यह जो आत्मा को जानने में आपकी उत्सुकता है यह वास्तव में आत्मा के प्रति आपके संशय का ही द्योतक है। आत्मा को लेकर आप में बड़ा संदेह है इसलिए आप में आत्मा को लेकर बड़ी उत्सुकता है। सुनने में अजीब बात लगेगी। सत्य के आग्रही की उत्सुकता आत्मा में नहीं होती वास्तव में। मैं कई बार बोलता हूँ उपनिषदों का प्रतिपाद्य विषय आत्मा नहीं है, माया है। सत्य के आग्रही की उत्सुकता सत्य में नहीं होती, माया में होती है। वो यह नहीं पूछता आत्मा है कि नहीं प्रमाण दो, है कि नहीं। वो कहता है, ‘आत्मा हटाओ, मैंने शुरुआत करी है अपने दुख से, यह सारी बातचीत इसलिए हो रही है क्योंकि मैं झंझट में हूँ।

तो मैं शुरुआत सच से नहीं शुरुआत झूठ से करूँगा। मैं जानना चाहता हूँ यहाँ (भीतर) झूठ क्या-क्या बैठे हैं जिनके कारण मैं दुख में हूँ’।” वो माया का अन्वेषण करता है, और माया को जो जान जाता है वो स्वयं को सत्य में पाता है। सत्य तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं है माया के अलावा। माया ने ही आपको घेर रखा है बाहर से भी, भीतर से भी। माया को ही जान जाइए यही सत्य की ओर आपका प्रयास होगा।

बैठे-बैठे अपनी कुर्सी पर कहेंगे, “आत्मा का प्रमाण लाओ।” कोई प्रमाण नहीं। ऋषि लोग पहले ही बोल गए अप्रमेय। बेटा कोशिश भी मत करना कुछ नहीं मिलेगा। और अगर मिल गया तो और खतरनाक बात है क्योंकि मिला तो वही वाला प्रमाण मिलेगा, करके दिखाईये(सिर घुमाना)। यह फलाने पर उतारी आत्मा और वो झूम रहा है। एक त्रासदी यह होती है कि चाह रहे थे कि आत्मा का प्रमाण मिले, मिली नहीं। और एक दुर्घटना होती है कि किसी को प्रमाण मिल गया। और ऐसे घूम रहे है वो बताएगें कि आई हैव प्रूफ ऑफ़ द सोल (मेरे पास आत्मा का प्रमाण है), वहाँ बड़ी कतारें लगती हैं, प्रूफ ऑफ़ द सोल! जिसको यह तक नहीं पता कि सोल माने आत्मा नहीं होता वो आत्मा का प्रमाण देने निकला है।

हमें उत्सुकता किसमें रखनी हैं? सच में नहीं झूठ में। सच नहीं पकड में आएगा, आप दौड़ लगाइए झूठ को पकड़ने के लिए। सच पकड़ में नहीं आएगा, आप तो झूठ को पकड़िए। मज़ा आता है, अपने ही झूठ को पकड़ने में बड़ा मज़ा आता है। आता है न? कैच योर ओन थीफ रेड हैंडेड दैट टू इन द मोमेंट ऑफ़ द थेफ़्ट ,विद हिस पैन्ट्स डाउन (अपने ही चोर को रंगे हाथों पकड़िये, वो भी उसी क्षण में जब वो चोरी कर रहा हो) ठीक तब जब वो चोरी करने जा रहा है उसी वक़्त पीछे से दबोच लीजिए, ‘बेटा! इधर देखो’ और उसकी शक्ल बिलकुल आपकी शक्ल जैसी होगी। बाद में भी पकड़ने में बहुत मज़ा नहीं कि उसने कर ली चोरी, वारदात हो गयी फिर जाकर पीछे साईरन बजा रहे हैं। क्या रखा है? जैसे भारतीय पुलिस फिल्मों में। ठीक जब हो रही है चोरी तब धर दबोचिए। ‘हाँ, क्या, क्या करने जा रहे थे? यह सब जो पूरी बातचीत चल रही थी उसमें छुपा हुआ इरादा क्या था बताना ज़रा?’ बहुत मज़ा आएगा आपको अपने ही छुपे हुए इरादे उद्घाटित करने में। हमारे ऊपरी इरादे दूसरे होते हैं, नीचे-नीचे खेल बिलकुल अलग। यही है सत्याग्रह, झूठ को पकड़ना ही सत्याग्रह है।

प्र: भगवान श्री प्राणम। अभी जो चर्चा चल रही थी ईश्वर वाले में, उसमें जो अहम् वृत्ति है, वो कर्तृत्व वृत्ति, एक ही चीज़ है, वो डिकोड हो रही है कर्म में, उसके लिए चाहिए समय। तो कृष्णमूर्ति साहब मैं पढ़ रहा था तो कह रहे थे, फिजिकल समय जो है उसकी तो आवश्यकता है, एक साइकोलॉजिकल समय है। यह समय क्या वही समय है? यह समझ नहीं आ रहा।।

आचार्य: साइकोलॉजिकल समय में वो अभिव्यक्त होती है विचार बनकर और क्रोनोलॉजिकल समय में वो अभिव्यक्त होती है कर्म बनकर। विचार भी कर्म ही हैं, सूक्ष्म कर्म को विचार कहते हैं और स्थूल विचार को कर्म कहते हैं, एक ही बात है।

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