आचार्य प्रशांत: प्रणाम आचार्य जी, पिछले कुछ दिनों में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का फिर से अनादर हुआ। और बुद्धिजीवी और कलाकार क़िस्म के लोगों का जैसे ये पसंदीदा काम हो। वो देवियों की मूर्तियाँ लेते हैं, प्रतिमाएँ लेते हैं और फिर उनका अपने अनुसार दुरुपयोग करते हैं।
इसी तरीक़े से कई लेखक भी हैं जो पुरानी पौराणिक कथाओं इत्यादियों को लेते हैं और फिर उनका मनचाहा अर्थ करके और कई बार तो उनमें ज़बरदस्त विकृतियाँ डालकर के प्रकाशित करते हैं। पूछने पर वो कहते हैं कि ये हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और पुराने धार्मिक और ऐतिहासिक पात्र तो सार्वजनिक हैं, पब्लिक फ़िगर्स हैं। तो उनका किसी भी तरीक़े से अर्थ करना या प्रदर्शन करना सबकी अपनी निजी स्वतंत्रता की बात है।
आचार्य प्रशांत: नहीं, बात इसकी नहीं है कि अगर देवी-देवताओं की मूर्तियों का किसी ने अपने मन के हिसाब से कुछ निरूपण कर दिया, चित्रण कर दिया या वर्णन कर दिया, तो एक संप्रदाय की भावना को ठेस लगती है, इसीलिए ये काम ग़लत है। नहीं, ये बात भावना की नहीं है। ये बात बहुत व्यावहारिक है, समझनी पड़ेगी।
देखो, ये जितने भी धार्मिक पात्र हैं या पौराणिक चरित्र हैं, ये बड़ी सूक्ष्मता से, बड़े ध्यान से, एक बहुत बड़े ऊँचे उद्देश्य के लिए रचे गये। ये पात्र यूँही नहीं हैं। ये पात्र ऐसा नहीं है कि कोई ऐतिहासिक व्यक्ति ही था निश्चित रूप से, तो उसको लेकर के फिर कोई कालांतर में धार्मिक पात्र रच दिया गया। नहीं, ऐसा नहीं है।
आदमी का मन एक जटिलता है। आदमी का मन अपने में ही गुत्थम-गुत्था है। बहुत उलझा हुआ रहता है। उसको सुलझाने की विधियाँ हैं ये सब पात्र और देवियाँ और देवता और जितनी भी कहानियाँ और कथानक तुम जानते हो।




