प्रश्नकर्ता: मुझे ईश्वर में विश्वास करना कठिन लगता है। मैं क्यों मानूँ कि कोई महान या संचालक सत्ता कहीं है या सब कुछ चला रही है।
अगर मैं नास्तिक हूँ और ईश्वर में विश्वास नहीं करता, तो क्या मैं आध्यात्मिक नहीं हो सकता?
आचार्य प्रशांत: अच्छा मुद्दा है, सबके काम आएगा, इस पर मैं कुछ बोलता हूँ, फिर आप अपनी बात या जिज्ञासा सामने रखिएगा। देखिए, अध्यात्म किसी दैवीय सत्ता पर विश्वास करने के बारे में बिलकुल भी नहीं है। ठीक है? अध्यात्म बिलकुल नहीं कहता है कि आपको किसी भगवान या ईश्वर पर विश्वास होना चाहिए या करना होगा, बिलकुल भी नहीं। समझिएगा। शुरुआत कहाँ से होती है अध्यात्म की? अध्यात्म का अर्थ होता है; मार्मिक अर्थ भी और शाब्दिक अर्थ भी, स्वयं को जानना, स्वयं को साफ़ जानना, गहराई से जानना।
अधि: आत्म, अधि: आत्म, और ये जो अधि: है, ये वैसा ही है, जैसा अधिक में इस्तेमाल होता है। अधिक में जब आप अधि: का प्रयोग करते हैं तो वो किसका सूचक होता है? बाहुल्य का, आधिक्य का, तो आत्म माने क्या? ‘मैं।’
तो अधि: आत्म क्या हो गया? अधिक मैं, गहरा मैं, असली मैं। ‘मैं कौन हूँ?’ अब इसमें बताइए ईश्वर आ रहा है कहीं पर? इसमें कहीं पर ईश्वर की बात है क्या? ये तो कहा जा रहा है कि मैं-मैं तो पूरी दुनिया करती रहती है। यहाँ कोई ऐसा बैठा है जिसने दिन में आज ही पचास बार मैं न बोला हो? है कोई ऐसा?
मैं-मैं सब करते रहते हैं, पर दुनिया को जानना तो दूर की बात है। हमें यही नहीं पता होता है कि ये मैं कौन है, जिसकी बात करी जा रही है, कौन है जो उस मैं की बात कर रहा है। तो इसलिए है; अध्यात्म। ठीक है? ये अध्यात्म है। अब ये कौन है जो मैं की बात करता रहता है? मैं का विचार ही किसको उठता है?




