प्रश्नकर्ता१: प्रणाम आचार्य जी। अर्जुन हम सब हैं पर कृष्ण नहीं है सबके पास। साथ ही साथ यह भी आभास हुआ कि यदि जीवन की तड़प कृष्ण के ही माध्यम से मिटेगी तो फिर कृष्ण के पास जाने का चुनाव क्यों करना पड़ता है कुछ लोगों को? यह मेंडेटरी क्यों नहीं हो सकता? यह च्वॉइस क्यों बनी रहती है? और जो लोग कृष्ण को नहीं चुनते है वह संतुष्ट जीवन कैसे बिता लेते हैं? उनको उनकी बेचैनी कैसे स्वीकार हो जाती है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, बेचैनी स्वीकार नहीं हो जाती। बेचैनी से मिटने के लिए नए-नए उपाय आज़माते रहते हैं। स्वीकार नहीं कर लेते कि हम बेचैन हैं और यह स्थिति ठीक है, हमने स्वीकार ली। वह फिर अपनी बेचैनी मिटाने के लिए और तरह-तरह की आज़माइशें करते हैं। किसी के पास कुछ है, किसी के पास कुछ है। और सब कुछ विफ़ल हो गया तो फिर कोई और तरीक़ा आज़मा लो; जीवन भर प्रयोग करते रहो; इधर से उधर अनुभव लेते रहो; यह सब चलता रहता है।
दूसरी बात बोली कि अनिवार्य क्यों नहीं किया जाता, मेंडेटरी कौन करेगा? तुम्हारे लिए अनिवार्य थोड़ी था यह प्रश्न पूछना?
देखो जिस दिन हम पैदा होते हैं न, हमें एक बहुत घातक चीज़ मिल जाती है। आज के सत्र में भी मैंने बोला। क्या? चुनाव का विकल्प।
कोई यहाँ किसी के लिए कुछ अनिवार्य नहीं कर सकता। अनिवार्यता का तो यह मतलब होता है कि विकल्प अब शेष नहीं है। अनिवार्य माने जिसका कोई निवारण नहीं, जिससे तुम बच नहीं सकते, वह अनिवार्य है। अनिवार्य इस अस्तित्व में कुछ है ही नहीं। साँस लेना तक अनिवार्य नहीं है। यहाँ तुम कुछ भी कर लो, कोई तुम्हें रोकने आने वाला नहीं। कर्मफल मिलता है वह अपनी जगह है। लेकिन अनिवार्य यहाँ कुछ भी नहीं है। हर पल में, हर कर्म में आपके पास चुनाव का अधिकार रहता ही है। यही आपका सौभाग्य है और यही बड़े से बड़ा दुर्भाग्य है।




