देह ही सत्य है, तो पॉर्न ही शास्त्र है || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: हैलो सर, मेरा प्रश्न इंटरनेट पॉर्नोग्राफ़ी (अश्लील विषयवस्तु) से सम्बन्धित है, अभी कुछ दिनों पहले डिपार्टमेंट ऑफ टेलिकॉम (सूचना विभाग) ने तिरसठ साइट्स की सूची बनाई थी और बैन कर दिया था उन्हें। कुछ और आँकड़ों के अनुसार भारत में नवासी प्रतिशत मोबाइल फ़ोन उपभोक्ता हैं जिन्होंने कभी-न-कभी इस तरह की साइट्स को एक्सेस (उपयोग) किया है। और कोविड के दौरान जो इंटरनेट ट्रैफिक था इस आईपी एड्रेस से वो बीस प्रतिशत बढ़ा था क्योंकि वो कंटेंट देखा जा रहा था।
तो अब इसमें दो पक्ष हैं, पहला पक्ष ये कि यह एक नेसेसरी एविल (आवश्यक बुराई) है कि बहुत सारे जवान लोग हैं देश में और उन्हें एक तरह से रिलीफ़ मिल जाता है ऐसा कंटेंट देख करके और जो विकसित देश हैं पश्चिम में वहाँ पर भी इसी आवश्यक बुराई का तर्क दिया जाता है इसीलिए ये आज तक वहाँ पर भी बैन नहीं हो पाया है।
दूसरा पक्ष ये कहता है कि जो यौन सम्बन्धी अपराध हैं वो इस तरह के कंटेंट की वजह से बढ़ रहे हैं, युवाओं को प्रोत्साहन मिल रहा है। तो भारत के संदर्भ में फिर इसको कैसे देखा जाए, जो पश्चिम की नक़ल करके, आया तो वहीं से है और ‘आवश्यक बुराई’ वाला जो तर्क दिया जाता है उसके बारे में और फिर पिछले कुछ सालों में इस कंटेंट को देखने की वजह से बढ़ने वाले यौन सम्बन्धी अपराध बढ़े हैं। तो यही आपसे समझना था कि इसको भारत के संदर्भ में इसको कैसे देखें?
आचार्य प्रशांत: आप ऊँचे जीवन की, मानव आदर्श की, आर्थिक प्रगति की एक भौतिक अवधारणा रखें और पॉर्नोग्राफ़ी न हो, ये सम्भव नहीं हो पाएगा। इंसान के, संस्थानों के, सरकारों के सारे आदर्श भौतिक हैं न? आपके जितने ऊँचे-से-ऊँचे आदर्श हैं और विचारधाराएँ हैं वो सब-के-सब भौतिक हैं न,



