आचार्य प्रशांत: लड़का भले ही कितना बेअदब, बदतमीज़ रहा हो, जीवन भर उसने माँ-बाप की सुनी न हो, माँ को मुँह पर गरियाया हो, बाप को जूता मारा हो। लेकिन जब विवाह का समय आता है, तो कहता है 'माँ का दिल कैसे तोड़ सकता हूँ? अरे! माँ की आज्ञा है, शिरोधार्य है।’ (श्रोतागण हँसते हैं) तो तूने ज़िन्दगी में और कब माँ की आज्ञा मानी थी? पर इस चीज़ के लिए वो बताएगा कि माँ को बहू की तलाश है न। और दादी, वो दम तोड़ने को राज़ी नहीं बुढ़िया। वो कहती है, 'जब तक छौना हाथ में लेकर अपने ऊपर मुतवा नहीं लूँगी, तब तक मुँह में गंगाजल नहीं लूँगी'। (श्रोतागण हँसते हैं)
दादी के बड़े तुम भक्त हो गये अचानक और यही दादी जब बिस्तर में पड़ी-पड़ी कहती है कि मेरे लिए दवाई ले आ दे, तो तुम क्रिकेट का बल्ला उठाकर बोलते थे कि (श्रोतागण हँसते हैं) नहीं, मार नहीं देऊँगा, 'खेलने जा रहा हूँ'। तब तुम्हारे पास इतनी क़द्र नहीं थी दादी की कि दादी को समय पर दवा लेकर देदो। पर अब तुम बड़ी बात बताते हो कि मैं तो दादी भक्त हूँ। दादी का दिल रखने के लिए शादी कर रहा हूँ, कसम से। नहीं तो मैं तो पैदा ही हुआ था ब्रह्मचारी।
हाँ, इस तरह के तुम्हारे इरादे हैं कि घरवालों को खुश करना है, इसकी इच्छा बतानी है, ये करना है, बहाना देना है, तो ठीक है। और भी होती हैं बातें। बड़ी अजीब बातें हैं, समझना — विवाह के पीछे मकसद किस तरीक़े के होते हैं? वो होते हैं न वो, प्री-वैडिंग (शादी से पहले), ऊपर वो खिलौना कैमरा लेकर घूमता है, फिर नीचे कहा जाता है कि चलो अब तुम शाहरुख खान हो, तुम काजोल हो। जितनी हसरतें हैं निकाल लो अभी सब। वो सब हो जाएगा। एक दिन के लिए ही सही, हीरो-हिरोइन तो बन गये न? हमारा भी एल्बम बना, हमारी भी पिक्चर बनी।
तुम्हारे भीतर जितनी हीन भावना होगी उतना तुम चाहोगे कि एक दिन के लिए ही सही हम भी राजा-रानी बन जाएँ। विवाह के दिन हर लड़का चाहे वो कितना भी बड़ा..., घोड़ी पर तो चढ़ लेता है न। नहीं तो ऐसे तो टट्टू भी उसको अनुमति न दे। टट्टू भी बोलेगा मैं तुझपर चढ़ूँ वो ज़्यादा शोभा देगा। (श्रोतागण हँसते हैं) औक़ात देख किसकी ऊपर है? पर! विवाह के दिन एक-से-एक मूर्खानन्द घोड़ी चढ़ने को पा जाते हैं। तो अगर घोड़ी चढ़ने के ही तुम्हारे अरमान हैं, तो करलो विवाह लेकिन ये मत कहना कि उससे अकेलापन दूर हो जाएगा।




