शादी का निर्णय लेने में उलझन || आचार्य प्रशांत, केदारनाथ यात्रा पर (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो ‘इच्छा’ होती है वो मुझे आज तक पता ही नहीं चला कि मेरी आखिर इच्छा है क्या। जैसे कि मैट्रिक पास किया और सब दोस्त आईएससी किए, हम भी कर लिए। फिर सब इंजीनियरिंग का तैयारी करना शुरू किए हम भी किए साथ में। इच्छा नहीं थी कि हम इंजीनियर बने, फिर भी। फिर हुआ कि दोस्त जो था बी सी ए की इंजीनियरिंग किया, नहीं हुआ इंट्रांस , कहा बी सी ए कर लीजिए, बी सी ए कर लिए। मतलब कभी अपनी अन्दर की इच्छा पता ही नहीं चलती है कि आखिर मेरी इच्छा है क्या। मतलब बाहर का सराऊन्डिंग जो कराता है वो करते चले जाते हैं, और ऐसे करते हुए करीब सन् दो हज़ार तीन में हम मैट्रिक पास किए आज सन् दो हज़ार उन्नीस चल रहा है। आज तक कुछ नहीं कर पाए। मतलब अन्दर की इच्छा नहीं; कभी-कभी कोई चीज़ सोचते हैं तो फ़ायदा-घाटा के हिसाब से सोचते हैं कि इसमें फ़ायदा, इसमें घाटा है। लेकिन इच्छा नहीं पता चलती है कि आखिर इच्छा क्या है। और अब आचार्य जी, चलते-चलते ऐसी आ गयी है कि अब शादी की बारी आ गयी है। यहाँ भी पता नहीं चल रही है कि मेरी इच्छा क्या है; और कभी-कभी लगता है कि विरोध किया जाए शादी का लेकिन हमको लगता है कि ज़रूरी नहीं है लेकिन अन्दर से ज़्यादा इच्छा का कंफ्यूजन होता है और मतलब न ही हम ‘हाँ’ बोल पाते हैं किसी चीज़ में, न ही ‘ना’ बोल पाते हैं।
आचार्य प्रशांत: शुरुआत हमेशा वहाँ से करो जिसके बारे में पूरी आश्वस्ति हो; जो बात पक्की ही पता हो, शुरुआत वहाँ से करो, फिर गलती नहीं होगी। तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारा मन किधर का है, तुम नहीं जानते, क्या सही क्या गलत, तुम नहीं जानते कि तुम्हारी अपनी निजी इच्छा क्या है। ये सब वो चीज़ें हैं जो तुम नहीं जानते। हज़ार बातें होंगी जो तुम नहीं जानते, कुछ ‘एक’ है जो जानते हो? वहाँ से शुरू करो न।
कुछ है जिसके बारे में तुम्हें पक्का पता है? सवाल ये सबके लिए है।कुछ है जिसको लेकर आप शत प्रतिशत आश्वस्त हैं कि ये तो है ही। वहाँ से आगे बढ़ेंगे, उसके आधार पर आगे के एक-एक करके निर्णय करेंगे, निर्णय गलत नहीं होंगे। बहुत ज़्यादा नहीं जानना है, बस जो जानना है उसे गहरी आश्वस्ति के साथ जानना है, पूर्णता के साथ जानना है। क्या है जो तुम इतनी श्रद्धा के साथ जानते हो कि कोई भी उसका विरोध कर ले तुम डिगोगे नहीं। कुछ है ऐसा जिसको लेकर के तुम्हें इतना विश्वास है कि तुम्हें पुनर्विचार नहीं करना पड़ेगा। कुछ है ऐसा?



