एक बार पैदा होते, एक बार प्यार करते, एक बार मरते - यही है तुम्हारी फिलोसफी?

Acharya Prashant

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एक बार पैदा होते, एक बार प्यार करते, एक बार मरते - यही है तुम्हारी फिलोसफी?
शादी और रिश्तों के सामाजिक दबाव में अपने शरीर और गरिमा का सौदा करना बंद करना ज़रूरी है। जीवन का उद्देश्य केवल जोड़ी बनाना या यौन सुख पाना नहीं है। प्रेम वह है जो व्यक्ति को भीतर से ऊँचा और मुक्त करे, न कि उसे वस्तु बना दे। इसलिए पहले स्वयं को गढ़ें, ज्ञान और कौशल बढ़ाएँ, जीवन को सार्थक बनाएँ और अपने भीतर पूर्णता विकसित करें; सही व्यक्ति मिले तो स्वागत है, न मिले तो भी जीवन अधूरा नहीं है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: अभी हाल में ही मेरी फ़ैमिली के थ्रू क़रीब दो लड़कों से चार-पाँच महीने के गैप में शादी के पर्पज़ से मेरी मुलाक़ात कराई गई और सर, मैं थोड़ी-सी कम अट्रैक्टेड हूँ, तो शादी के दौर में चीज़ें यही ऑलमोस्ट देखी जाती हैं। तो उनकी तरफ़ से कई बिना किसी सॉलिड रीजन के या फिर वो रिजेक्शन हो गया। अब घर वालों का सिर्फ़ ये मानना है कि वो नहीं तो कोई और। और हमें, सर, ये लगता है कि हम कोई ऑब्जेक्ट तो हैं नहीं कि बार-बार हमारी दर्शनी लगाई जाए।

आचार्य प्रशांत: ये आकर्षण, ये सब, ये वो; शरीर को लेके मैं कुछ बोलता भी हूँ, तो यही आग्रह है कि भाई मज़बूत रखो, दौड़ो-भागो। क्योंकि शरीर कमज़ोर कर लो तो और कई तरह की बाहर की कमज़ोरियाँ स्वीकारनी पड़ती हैं। पर देखो, आप क्या कर रहे हो। आप उस व्यवस्था में फँसकर के वही करने लग गए, जो व्यवस्था आपसे कराना चाहती है। वो चाहते हैं कि आप अपने आप को शरीर की तरह देखो। आपने वो शुरू कर दिया। ये गुनाह है। गीता मना करती है और श्रीकृष्ण ख़ुश नहीं होंगे इस बात से। मुझे शरीर से कोई समस्या नहीं है। आप किसी पुरुष के सामने अपना शरीर प्रदर्शित करें या कोई पुरुष स्त्री के सामने, मुझे उसमें भी क्या समस्या है? ये सब तो कर्म है। मुझे मनुष्य को मनुष्य की गरिमा से गिराने में समस्या है।

तुम प्रेम के नाते जाकर किसी से गले मिल जाओ, वो भी बाहरी तौर पर शरीरों का ही आलिंगन है। ठीक है। वो नुमाइश नहीं कहलाएगी। छोटे बच्चे को भी आप प्रेम में उठा लेते हो और युवा पुरुष-स्त्री भी प्रेम में शारीरिक तौर पर मिल सकते हैं। पर ये सब जो आप अभी बता रहे हो, इसमें तो प्रेम कहीं नहीं है। जब प्रेम नहीं है तो शरीर कहाँ से आ गया? मैं पूछ रहा हूँ। प्रेम और शरीर का रिश्ता समझते हो क्या होता है? समझो बात को।

अहंकार बहुत सारी चीज़ें अपने पास रखता है। रखता है न? उन्हें हम क्या बोलते हैं? वो अहंकार के क्या हैं? विषय-ऑब्जेक्ट्स। और अहंकार के पास पहला ऑब्जेक्ट क्या होता है? शरीर। तो प्रेम और शरीर का रिश्ता ये होता है कि जैसे प्रेम में अहंकार अपने आप को ही छोड़ देता है। यही परिभाषा है न, मुझे मेरी हस्ती प्यारी नहीं है। अहंकार कह रहा है, मुझे मेरी हस्ती प्यारी नहीं है मैं ख़ुद को ही छोड़ने को तैयार हूँ। तो वैसे ही वह अपने सब ऑब्जेक्ट्स को जाकर सही जगह पर समर्पित करने लगता है। सही जगह कौन-सी? जो उसको मदद देगी घटने में।

ये मेरे पास क़लम है, ये क़लम मैं उसको दूँगा। ये ऑब्जेक्ट है मेरा। ये मेरा विषय है। मैं अहंकार हूँ, ये मेरा विषय है, ये क़लम मैं उसको दूँगा जो सचमुच मेरा भला कर पाए। और मेरी भलाई किसमें है? घटने में। ये क़लम मैं उसको दूँगा, जो घटने में मेरी मदद करे। ठीक इसी तरीके से मेरा पहला ऑब्जेक्ट क्या है? ये शरीर भी उसको दूँगी, जो घटने में मेरी मदद करे। और अगर वह घटने में मेरी मदद नहीं कर रहा है तो ये शरीर का व्यापार है, ये जिस्मफ़रोशी है, ये लेन-देन है न फिर। ये प्रेम तो नहीं है।

एक जानवर है बिल्कुल, हवसी जानवर। वो तुम्हारे शरीर का उपयोग कूड़ेदान की तरह कर रहा है, वह अपने शरीर का मल आकर तुम्हारे शरीर के ऊपर डाल जाता है। वो वैसे ही अपने सामान्य क्षणों में भले ही थोड़ा कम जानवर हो, पर हवस के क्षण में तो पूरा ही जानवर बन जाता है न। और हवस के क्षणों में वह जो पूरा जानवर बना हुआ है, वह तुम्हारे शरीर पर आकर और कचरा डाल जाता है।

चलो, डलवा लिया कचरा, शरीर को राख ही हो जाना एक दिन। डलवा भी लिया कचरा। तुम्हें क्या मिला? तुम्हारे भ्रम नहीं खोए, तुम्हारे बंधन भी नहीं खोए, तुम्हारी गरिमा खो गई। और अब अगली बार तुम और ज़्यादा अपने आप को शरीर जैसा ही अनुभव करोगे। और धीरे-धीरे ये तुम्हारी पहचान बन जाएगी। दुनिया भर की स्त्रियों की यही पहचान बन गई है, “मैं तो शरीर हूँ।” क्या है, इतनी काम-वासना होती है क्या कि किसी जानवर को भी बुला के शुरू हो जाओगे? दिख रहा है कि व्यक्ति अयोग्य है, कोई उसमें गहराई, ऊँचाई नहीं, कुछ नहीं। और तुम अपने आप को अर्पित कर देते हो, बिछ जाते हो।

मीरा को नहीं मिला होगा कोई तो बोलीं कि श्रीकृष्ण पर्याप्त है। भले ही शरीर रूप में उपस्थित नहीं है तब भी पर्याप्त है। कोई नहीं मिल रहा तो, “जाके सिर मोर-मुकुट मेरो पति सोई।”

समाज का दबाव और अपने ही शरीर का प्रभाव, हार्मोनल वासना, इन दोनों में आकर अपनी गरिमा का सौदा करना बंद करो।

ऐसे ही नहीं किसी को हक़ दे देते कि अंजू-पंजू आके तुम्हारे शरीर पर हाथ लगा जाएगा। ज्ञानियों ने इसको मंदिर बोला है। किसको? शरीर को ही। “घट-घट में राम बसत हैं।” कोई भी आता है ऐसे ही जानवर, थूक के चला जाता है। और ये बात दोनों लिंगों से कह रहा हूँ। क्योंकि सेक्सुअली एग्रेसिव तो महिलाएँ भी हो सकती हैं, पुरुषों का शिकार वो भी करती हैं। क्यों घुसना है तुम्हें इस खेल में?

अरे, सब कुछ तो करा प्रकृति ने ही है न, उसी ने करा है न? पैदा भी उसी ने कर दिया। ये बाल तुम्हारे लंबे तुमने ख़ुद किए खींच-खींच के? तुम्हारा जो भी क़द है, तुमने ख़ुद अपने आप को ऐसे खींचा कि इतनी लंबी हो जाऊँ? तुम्हारा खाना तुम कुछ कर रही हो भीतर, केमिकल-वेमिकल डाल के पचा रही हो? सब कुछ जब माँ कर ही रही हैं तो जीवन में अगर विपरीत लिंग कोई आना होगा तो वो भी आ ही जाएगा। 50% आबादी तो दूसरे ही लिंग की है भाई। काहे के लिए इतना व्याकुल, इतना डेस्परेट हो रहे हो? आएगा तो आएगा, नहीं आएगा तो नहीं आएगा। आइदर वे, आई एम ओके एंड कम्प्लीट। “पूर्णमद: पूर्णमिदं।” दिस और दैट, आई एम ओके। हम डेस्परेट नहीं हैं कि किसी राह चलते को पकड़ के अपने घर में घुसेड़ लाएँ और हमने दरवाज़ा बंद भी नहीं कर रखा है। कोई होगा सुयोग्य तो आ जाए, स्वागत है।

जीवन जोड़ी बनाने के लिए नहीं मिला है भाई। तुम पगलाए रहते हो कि अरे, जोड़ी नहीं बनी तो क्या होगा, और अब तो छठी क्लास से तुम पागल हो जाते हो। हाँ, मेंटल हेल्थ केसेस आ रहे हैं। छठी का लड़का है, वो उसका अभी था कि वो बोल रहा है, “सनी टूक अवे माय गर्ल।” वो बोल रही है, “शी इस्टोल माय बॉय।” तुम्हें ये सब किसने सिखा दिया कि तुम्हारी जोड़ी नहीं बनेगी तो तुम अधूरे रह जाओगे? एकदम ही पगला जाते हो। और 25-30 पार करने लगे और जोड़ा नहीं बना है तो बिल्कुल घोड़ा हो जाते हो। तुम्हारे साथ मरेगा? साथ पैदा हुआ था?

मैं साथी बनाने का विरोध नहीं कर रहा हूँ। मैं किसी व्यक्ति को जीवन के केंद्र पर रखने पर पुनर्विचार करने को कह रहा हूँ। कि मेरा एक जोड़ीदार होना चाहिए दूसरे सेक्स का और वो तू मेरी ज़िंदगी है। ये कॉन्सेप्ट कहाँ से आ गया तुम्हारे भीतर? फ़िल्में, गंदी फ़िल्में। ख़ूब देखा न, राजश्री, वाईआरएफ़, मीठे-मीठे गाने: “हम एक बार पैदा होते हैं और एक बार मरते हैं और एक बार प्यार करते हैं और ऊपर वाला हमें जोडों में भेजता है।” एकदम थू फ़िलॉसफ़ी। और उस फ़िलॉसफ़ी के तुम क़दरदान हो गए, ग्राहक हो गए, बंधक हो गए। लगे हुए हैं कि लड़की मिल जाए, लड़का मिल जाए।

अच्छा, तुमने क्या-क्या खेलना सीखा, ये बताओ। दुनिया में इतने स्पोर्ट्स हैं और जो खेलते हैं, उनसे पूछना कि जब वो खेल रहे हों और मैच के बीचों-बीच हों, उस वक़्त कोई आकर के उनके सामने नग्न खड़ा हो जाए और कहे, “आओ, मैं मौजूद हूँ, प्रस्तुत हूँ, अभी सेक्स करते हैं।” वो अपना गेम नहीं छोड़ेंगे। पर तुमने कभी कोई स्पोर्ट्स भी ठीक से नहीं खेला। क्रिकेट के मैदान, क्रिकेट तो देखते हो न? वहाँ घुस आती हैं कई बार इंग्लैंड या ऑस्ट्रेलिया वग़ैरह में, साउथ अफ़्रीका में, वो स्ट्रीकर्स बोलते हैं उनको। नंगी लड़कियाँ भी आ जाती हैं। बैट्समैन उसको ऐसे बल्ला दिखा-दिखा के भगाता है। “भाग यहाँ से, भाग यहाँ से, डिस्टर्ब मत कर।” क्योंकि अभी तुमने कुछ खेलना भी नहीं सीखा।

इसी तरीके से जिन्होंने पढ़ने में कभी जी लगाया हो, उनसे पूछो कि वहाँ भी जो आनंद होता है, वो कुछ कम होता है क्या? पर ज़िंदगी में आनंद तो छोड़ दो। किसी तरह का तुम्हें प्लेज़र ही नहीं पता। तो तुम्हें एक ही प्लेज़र होता है, वही जो घटिया, जो टीवी शॉप्स वग़ैरह में आ जाता है कि देवरानी-जेठानी, लोग-लुगाई, जो हायर प्लेज़र्स होते हैं लाइफ़ के, वो तुम्हें पता ही नहीं है। तो तुम इन लोअर प्लेज़र्स में ही जानवरों की तरह लूटने को डेस्परेट रहते हो।

सीखो स्विमिंग, खेलो वॉलीबॉल, और बुला रहा होगा उस वक़्त कि “आजा”, मना कर दोगे। ज़िंदगी को कोई ऊँचा मक़सद तो दो। मैंने तो अभी बस खेलने और पढ़ने की बात करी। खेलने-पढ़ने से ऊँचे और बहुत ज़्यादा मक़सद होते हैं, बहुत ऊँचे। वो मक़सद अपने आप को देकर देखो कि ये सेक्सुअल डेस्पिरेशन बचता है कि नहीं। सेक्सुअल, सोशल, जो भी बोलो, देकर देखो कि ये सब बचता है कि नहीं बचता है।

अच्छा, मैं ये नहीं कह रहा कि उससे तुम्हारी जो फ़िज़िकल अर्ज़र्ज़ हैं, वो मिट जाएँगी, ना। पर अब तुम किसी गटर के इंसान को स्वीकार नहीं कर पाओगे, क्योंकि तुम ख़ुद ऊँचाई पर पहुँच गए हो। अपने आप को ऊँचा बनाओ तो फिर ज़िंदगी में कोई आएगा भी तो उसकी एक ऊँचाई होगी। ऊँचाइयों पर ऊँचे ही लोग मिलेंगे। अपने आप को ऊँचाइयों पर ले जाने की जगह 16, 18, 20, 22 के होते नहीं हो; न तुमने ज़िंदगी देखी, न अपने आप को ढाला, न सँवारा, न अपने आप को कुछ शिल्प दिया, न आकार दिया, न गढ़ा, न सौंदर्य दिया और बस लग जाते हो कि किसी क़दर से जोड़ा बन जाए।

मैं बाहर निकलता हूँ, बहुत बार होता है जोड़े आ रहे होते हैं मुझे देख के घबरा-सा जाते हैं। मज़ाक की तरह नहीं बोल रहा हूँ। मैं ख़ुद बचना चाहता हूँ कि बेचारे को असुविधा नाल हो। कहीं कैफ़े में जाऊँगा तो सबसे कोने वाली हमेशा टेबल ले बैठूँगा, मुँह छुपा के। मैं किसी कैफ़े में या रेस्टोरेंट में अगर बीच में बैठ जाऊँ तो उसका धंधा बंद हो जाएगा। ये मैंने देखा है, लोग दरवाज़े से घुसते हैं, मुझे देख के बहुत ज़ोर से भागते हैं। मज़ाक से आगे की बात है, उनको पता है कि अब न मैं कुछ कर सकता, न वो कुछ कर सकते।

तुम अपने आप को न सुलझने वाली गाँठों में बाँध लेते हो, और मैं सांत्वना दे नहीं सकता कि रुक जाओ, रुक जाओ, अभी तुम्हारा उपचार हो जाएगा। तुम अपने आप को ऐसी जगहों पर डाल लेते हो जो पॉइंट ऑफ़ नो रिटर्न है। विशेषकर महिलाएँ। मैं क्या करूँ?

अभी किसी महिला की मेल आई, जो हमारी प्राइमरी आईडी है, जो हमने वेबसाइट पर भी डिस्प्ले कर रखी है। उसमें उसने बताया कि उसके साथ क्या-क्या हो रहा है। फिर उसने लिखा कि मुझे पता भी नहीं चला, मेरे पति ने मुझे इम्प्रेग्नेंट कब कर दिया। और मैं जानती थी कि ये नाक़ाबिल आदमी है और मैं कुछ ख़याल कर रही थी और अब मैं देख रही हूँ कि मैं दो मंथ्स प्रेग्नेंट हूँ। और अब मैं और बात कर रही हूँ इससे और इसके घर वालों से तो बहुत सारी बातें खुल रही हैं। और मैंने लव मैरिज करी थी, घर से भाग करी थी। मेरे घर वाले अब मुझसे बात नहीं करते हैं और यहाँ मैं आ गई हूँ तो मुझे दिखाई दे रहा है कि मैं किस आदमी के साथ और किस घर में फँस गई हूँ।

तो उसका मेल आया संस्था के पास। संस्था ने उसको रिप्लाई दिया। मालूम है हमें क्या रिप्लाई आता है? “दिस मेल बॉक्स डज़ नॉट एक्ज़िस्ट।” जानते हो इससे प्रोबेबिलिटी क्या पता चलती है? अब निश्चित रूप से हम नहीं जान सकते। पर संभावना जानते हो क्या है? इस महिला का मेल आईडी भी उस पुरुष के पास था और वो रेगुलरली इसका मेल…। जब उसने देखा कि यह मेल इधर आई है, मेल आईडी उड़ा दिया और वो महिला यही सोचती रहेगी कि संस्था की ओर से तो कभी जवाब ही नहीं आया।

अब उसका फ़ोटो एल्बम देखना। उसका लंबा, उसने लिखा था, लंबा प्रेम प्रसंग चला, पाँच साल में उसने क्या-क्या फ़ोटो खिंचाई होंगी, क्या-क्या वीडियो बनाए होंगे, क्या-क्या उसकी ख़ुशी, क्या जज़्बात छलके होंगे और फिर ब्याह किया होगा। उसका भी एल्बम होगा। क्या ख़ुशियाँ हैं! अच्छे बनो और अच्छा हाथ पकड़ो। और तुम्हारी नीयत अच्छे हाथ की नहीं, अच्छा बनने की होनी चाहिए।

अच्छे बनो, ऊँचे बनो, उसके बाद मालिक की मर्ज़ी होगी। किसी का हाथ आ गया, आ गया। नहीं आया तो हम ख़ुद ही अब क्या हो गए? हम ख़ुद ही अच्छे हो गए, हम ख़ुद ही ऊँचे हो गए। ख़ुश हैं। अपने में ख़ुश हैं भाई, तड़प नहीं रहे। और जब तक तुम्हें पता है कि तुम किसी लायक नहीं हो, किसी क़ाबिल नहीं हो। तुम में सौ तरह के दोष और कमज़ोरियाँ पाले सब बैठे हो, तब तक ये जोड़ेबाज़ी में भूलकर भी मत पड़ना।

पढ़ाई पर ध्यान दो। ख़ुद को बनाओ, ज़िंदगी को बनाओ, ताक़त बढ़ाओ, ज्ञान बढ़ाओ, कौशल सीखो, दुनिया देखो, अंडे देने मत लग जाओ जल्दी से कि घोंसला बना लिया।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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