एक बार पैदा होते, एक बार प्यार करते, एक बार मरते - यही है तुम्हारी फिलोसफी?

शादी और रिश्तों के सामाजिक दबाव में अपने शरीर और गरिमा का सौदा करना बंद करना ज़रूरी है। जीवन का उद्देश्य केवल जोड़ी बनाना या यौन सुख पाना नहीं है। प्रेम वह है जो व्यक्ति को भीतर से ऊँचा और मुक्त करे, न कि उसे वस्तु बना दे। इसलिए पहले स्वयं को गढ़ें, ज्ञान और कौशल बढ़ाएँ, जीवन को सार्थक बनाएँ और अपने भीतर पूर्णता विकसित करें; सही व्यक्ति मिले तो स्वागत है, न मिले तो भी जीवन अधूरा नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: अभी हाल में ही मेरी फ़ैमिली के थ्रू क़रीब दो लड़कों से चार-पाँच महीने के गैप में शादी के पर्पज़ से मेरी मुलाक़ात कराई गई और सर, मैं थोड़ी-सी कम अट्रैक्टेड हूँ, तो शादी के दौर में चीज़ें यही ऑलमोस्ट देखी जाती हैं। तो उनकी तरफ़ से कई बिना किसी सॉलिड रीजन के या फिर वो रिजेक्शन हो गया। अब घर वालों का सिर्फ़ ये मानना है कि वो नहीं तो कोई और। और हमें, सर, ये लगता है कि हम कोई ऑब्जेक्ट तो हैं नहीं कि बार-बार हमारी दर्शनी लगाई जाए।
आचार्य प्रशांत: ये आकर्षण, ये सब, ये वो; शरीर को लेके मैं कुछ बोलता भी हूँ, तो यही आग्रह है कि भाई मज़बूत रखो, दौड़ो-भागो। क्योंकि शरीर कमज़ोर कर लो तो और कई तरह की बाहर की कमज़ोरियाँ स्वीकारनी पड़ती हैं। पर देखो, आप क्या कर रहे हो। आप उस व्यवस्था में फँसकर के वही करने लग गए, जो व्यवस्था आपसे कराना चाहती है। वो चाहते हैं कि आप अपने आप को शरीर की तरह देखो। आपने वो शुरू कर दिया। ये गुनाह है। गीता मना करती है और श्रीकृष्ण ख़ुश नहीं होंगे इस बात से। मुझे शरीर से कोई समस्या नहीं है। आप किसी पुरुष के सामने अपना शरीर प्रदर्शित करें या कोई पुरुष स्त्री के सामने, मुझे उसमें भी क्या समस्या है? ये सब तो कर्म है। मुझे मनुष्य को मनुष्य की गरिमा से गिराने में समस्या है।



