प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कभी दहेज जैसी कुप्रथा के ऊपर कुछ क्यों नहीं बोलते?
आचार्य प्रशांत: विचार नहीं आया कि इस पर भी अलग से कुछ बोला जाना चाहिए। संबंधों पर खूब बोला है, प्रेम पर बोला है, माया पर बोला है, लालच पर बोला है, झूठ पर बोला है। असल में एक तल से नीचे की चीज़ का ख़्याल आना मुश्किल हो जाता है। पर अब पूछा गया है तो ज़रूर बोलेंगेंl
मेरे लिए कल्पना करना ही मुश्किल है कि कोई किसी का साथ पैसे लेकर के करेगा। तो मैं कैसे बोलूँ इसपर? मैं मुश्किल पाता हूँ, इस बात को कल्पित करना, उस आदमी की शक्ल को चित्रित करना, जो कह रहा है कि मैं किसी के साथ हो सकता हूँ, लम्बे समय के लिए, उम्र भर के लिए भी अगर मुझे पैसे मिलेंगे। और पैसे नहीं मिलेंगे तो नहीं होऊँगा। ये थोड़ा-सा विचार से बाहर की बात है तो शायद इसलिए नहीं बोला आज तक।
और मेरे लिए मुश्किल है ऐसी महिला की भी कल्पना करना जो किसी ऐसे पुरुष के घर जाकर के बैठ जाती है, उसके बर्तन माँज रही है, उसके बच्चे पैदा कर रही है, जिसने उससे संगति करी थी पैसे लेकर केl तो इसपर मेरे लिए चुटकुला बनाना आसान है, उत्तर देना थोड़ा तक़लीफ का काम हैl मैं क्या बोलूँ? मतलब, क्या बोलूँ? इसपर किसी को झापड़ मारा जा सकता है, ज़वाब नहीं दिया जा सकताl
कोई आपके पास आकर के बोले कि मैं तुम्हारा हो सकता हूँ पर दस लाख देना पहले या बोले कि देखो अब मेरी फ़लानी नौकरी लग गई है तो मेरा रेट बढ़ गया है। ऐसे आदमी को विवाह मंडप में थोड़े ही ले जाओगे, उसको पागलखाने ले जाओगेl
तो ये चीज़ ऐसी है जिसको क्या समझाऊँ मैं? इसमें आत्मा-परमात्मा समझाऊँ मैं, इसमें मन, चेतना, समाधि समझाऊँ; मैं क्या बोलूँ? कैसे झेलते होंगे ऐसे लोग एक-दूसरे को? कैसे कुछ साल भी साथ रह लेते होंगें? वो जिस गाड़ी पर चल रहा है, वो दहेज में लाई है; चला कैसे लेता है? वो जिस बिस्तर पर सो रहे हैं, वो दहेज में लाई है; तुम्हें उत्तेजना भी कैसे हो पाती है? तुम्हें




