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मेरे बेटे को आचार्य जी को सुनने की बीमारी लग गयी || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: हमारी एक कल्चर्ड (संस्कारी) और एजुकेटेड फैमिली है विथ अ स्पिरिचुअल बेंट (आध्यात्मिक झुकाव के साथ)। मेरे बेटे को आपको सुनने का रोग पिछले दो साल से लगा हुआ है। पहले मुझे लगा कोई स्पिरिचुअल टीचिंग होंगी। पर कुल इतना सीखा है उसने आपसे कि शादी नहीं करूँगा, जॉब नहीं करूँगा। मैं बहुत परेशान हो गया। ये आप क्या सिखा रहे हो यंग लोगों को?

आचार्य प्रशांत: चलिए किसी बहाने आप सामने तो आए। बहुत क़ाबिल बेटा पाया है आपने। आमतौर पर ये पिता का दायित्व होता है कि वो बेटे को सही रास्ता दिखाए, गुरु के पास ले जाए। ये पिता का दायित्व होता है न? छोटा सा होता है बच्चा तो बाप बच्चे की उँगली पकड़कर ले जाता है स्कूल में एडमिशन कराने, तो पिता ले जा रहा है पुत्र को शिक्षक के पास।

पर बधाई हो आपका बेटा लाखों में एक निकला, वो लेकर के आया है अपने पिता को शिक्षक के पास। और यही तरीक़ा था आपको शिक्षक के पास लाने का जो आज सामने है। जो विडियोज़ आपका बेटा सुनता रहा है उसमें अगर कुछ आपने भी अगर सुने होते तो बात आपको कुछ स्पष्ट हुई होती।

वो बेटा है न आपका, शर्माजी! तो इतना तो आप दावा करते ही होंगे कि उसकी भलाई चाहते हैं। आप छप्पन साल के हैं तो बेटा बाईस, चौबीस या अट्ठाईस साल का होगा। पूरी ज़िन्दगी पड़ी है उसके सामने।

कहाँ गुजारने वाला है वो अपनी पूरी ज़िन्दगी? काम करते हुए और अपने घर में। समझ रहे हो? अपने दफ़्तर में और अपने घर में, इन दो जगह वो अपनी ज़िन्दगी गुजारने वाला है।

पिता हो न आप शर्माजी! प्रेम करते हो न अपने बेटे से, तो ये नहीं चाहते कि आपका बेटा सही दफ़्तर में रहे और सही घर में रहे। दफ़्तर से आशय होता है कि क्या उसने चुनी है नौकरी और घर से आशय होता है कि कैसा है उसका परिवार। और परिवार की शुरुआत तो वो करेगा पत्नी के साथ ही बच्चे वग़ैरह तो बाद में आएँगे।

तो यही दो चुनाव होते हैं जो किसी भी युवा व्यक्ति को करने होते हैं। और इन दो चुनावों से उसका पूरा जीवन निर्धारित हो जाता है क्योंकि इन दो के अलावा ज़िन्दगी में और है क्या? काम और परिवार। समय ही देख लो न कहाँ बीतता है। आठ-नौ बजे से निकल पड़ते हो दफ़्तर के लिए और छः-सात बजे, आठ बजे घर आ जाते हो तो फिर बाकी समय परिवार के साथ।

हफ़्ते के पाँच दिन या छः दिन दफ़्तर को समर्पित, तो सप्ताहांत हो या छुट्टियाँ हों तो वो परिवार को समर्पित। और थोड़ी और उम्र बढ़ती है, प्रौढ़ हो जाते हो तो या तो ये सोच रहे होते हो कि अपना काम कैसे आगे बढ़ाऊँ, व्यापार कैसे आगे बढ़ाऊँ या ये सोच रहे होते हो कि अपने बच्चों की शिक्षा कैसे आगे बढ़ाऊँ।

यही जब जवान थे तो सोच रहे थे कि नौकरी बदलकर अगली नौकरी कैसे करूँ या ये सोच रहे थे कि पति को या पत्नी को साथ लेकर घूमने कहाँ जाऊँ, कहाँ घूमने जाऊँगा तो ज़्यादा मज़ा रहेगा? कुल मिला-जुलाकर के दिमाग में जो भी विचार थे या योजनाएँ थी उनका सम्बन्ध था तो बस इन्हीं दोनों से न, काम से और परिवार से।

तो शर्माजी आपके बेटे को यही सिखा रहा हूँ कि इन दोनों का चयन पूरी ज़िम्मेदारी और सावधानी से करो ये हल्के में लेने वाली चीज़ें नहीं हैं। रही बात इसकी कि आप कह रहे हैं कि उसे मुझे सुनने का रोग लग गया है और अब कहता है शादी नहीं करूँगा, जॉब नहीं करूँगा तो ये तो सम्भव ही नहीं है। मेरी बहुत मौलिक शिक्षा है कि किसी दूसरे के आगे हाथ नहीं फैलाना है, किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना है। तो ये तो हो ही नहीं सकता है कि कोई जवान आदमी मुझे सुन रहा हो और कहे कि मैं ज़िन्दगी में कोई काम नहीं करूँगा। काम नहीं करेगा तो खाएगा कैसे? हाथ फैलाने को तो मैंने मना कर रखा है।

तो काम तो वो करेगा-ही-करेगा आपकी तकलीफ़ शायद ये है कि वो आपकी मर्जी का काम नहीं करना चाहता। आपको ये समस्या नहीं है कि आपका बेटा जॉब ही नहीं करेगा या काम ही नहीं करेगा। अगर वो मुझे सुन रहा है तो काम तो वो जी तोड़ करेगा। मेरे साथ के जवान लोग काम तो करते ही हैं, आम जवान बन्दा जितना काम करता है उससे चार गुना काम करते हैं। तो काम तो वो भी करेगा आपका बेटा भी।

तो झूठ मत बोलिए कि वो जॉब नहीं करना चाहता। सीधे बताइए कि वो उस तरह की जॉब नहीं करना चाहता कि जैसी आपकी मंशा है। वो क्यों करे आपकी आज्ञाओं का पालन? आप कितने समझदार हैं ये तो आपके सवाल से ही दिख रहा है। तो आपने कितनी समझदारी से उसके लिए कोई जॉब सोच रखी होगी ये भी फिर पता ही है। वो क्यों चले आपके नक्शे-कदम पर?

इसी तरीक़े से अगर जीवन का अर्थ होता है सम्बन्धित होना। तो ऐसा तो हो नहीं सकता कि कोई भी व्यक्ति पूरा जीवन बिना सम्बन्धित हुए बिता दे। जीवन का एक वर्ष भी बिना सम्बन्धित हुए बिता दे या जीवन का एक दिन भी बिना सम्बन्धित हुए बिता दे। जो जी रहा वो सम्बन्धों में ही जी रहा है। कुछ-न-कुछ रिश्ता आपका किसी-न-किसी से रहेगा ही। मैं सिखा ये रहा हूँ कि सही सम्बन्ध बनाओ, मैं ये नही सिखा रहा कि सम्बन्ध बनाओ ही नहीं। क्योंकि ग़लत सम्बन्ध जिसने बना लिए उसने ज़िन्दगी भर के लिए नर्क पाल लिया। आप ये चाहते हो कि आपका बेटा नर्क में जिये और बड़े-से-बड़ा नर्क होता है ग़लत शादी। आप जानते नहीं क्या शर्माजी!

ग़लत शादी क्या होती है? जैसे हर वो काम ग़लत होता है जो बिना जाने-समझे किया जाए, जो बेहोशी में किया जाए, जो भावनाओं के उद्वेग में किया जाए। उसी तरीक़े से जो शादी बेहोशी में, बिना जाने-समझे, सामाजिक या पारिवारिक या शारीरिक दबाव में कर ली जाती है वो ग़लत होती है, वही नर्क बनती है।

बेटे के शुभचिंतक हो न, नहीं चाहते क्या कि वो सही सम्बन्ध बनाए? कोई शादी करे या न करे इस पर तो मैं कभी कुछ कहता ही नहीं। मैं तो बस ये कहता हूँ कि कभी कुछ ऐसा मत करो जो तुम्हारे पाँव की बेड़ी बन जाए, जो तुम्हारे जीवन को समूचा लील ले ऐसा कुछ मत कर लेना। होश में विवाह करो बहुत सुन्दर होगा तुम्हारा विवाह। बहुत सारे ऊँचे लोग हुए हैं, आदर्श लोग हुए हैं जिन्होंने शादियाँ करी थीं। उनकी शादियाँ शुभ हैं क्योंकि उनकी चेतना शुद्ध है। शुद्ध चेतना के साथ जो करोगे वो शुभ ही होगा। और बेहोशी में निर्णय लोगे शादी वग़ैरह सम्बन्ध बनाने का तो पछताओगे।

क्या चाहते हो, आपका लड़का पछताए जीवन भर? सबसे पहले तो ये समझिए कि विवाह क्या होता है मूलत:? एक सम्बन्ध होता है स्त्री और पुरुष के बीच में। अगर हमें पता ही नहीं है कि सम्बन्ध बना कौन रहा है, सम्बन्ध बना किससे रहा है, सम्बन्ध बनाने कि वजह क्या है तो हम कैसे चुनेंगे सही सम्बन्ध?

और चुन लो ग़लत सम्बन्ध और उस पर सामाजिक और कानूनी ठप्पा भी लगवा दो और सामाजिक और कानूनी बेड़ियाँ भी पहन लो और फिर जीवन भर रोते रहो, घूमो गले में पत्थर लटकाकर के कि अब तो बँध गया अब क्या करूँ।

पर आप बड़े उतावले हो बिना ये जाने-समझे कि बेटा चाह क्या रहा है, कह क्या रहा है? आप कूद पड़े हो बेटे के खिलाफ़ और इल्ज़ाम लगा रहे हो कि अरे उसको रोग लग गया है, बता रहे हो कि हमारी कल्चर्ड और एजुकेटेड फैमिली है विथ अ स्पिरिचुअल बेंट। ये कौन सा स्पिरिचुअल बेंट है? और कितना बेंट है; पाँच डिग्री, दस डिग्री कितना झुके हुए हो?

आम मध्यमवर्गीय परिवार है आम मध्यमवर्गीय आडम्बर के साथ और आम मध्यमवर्गीय मान्यताएँ और मूर्खताएँ। धन्यवाद नहीं उठ रहा है भीतर कि ऐसे साधारण और मीडियोकर परिवार में एक लड़का निकल रहा है क़ाबिल, होशियार, समझदार। नाज़ नही कर रहे उस पर, फ़क्र नहीं उठ रहा उस पर, उल्टे बता रहे हो कि उसको रोग लग गया है।

यही होता है। दो बातें, पहली बात तो ये कि हीरे की परख जौहरी ही जाने और दूसरी बात वो जो जीसस ने बोली थी, कि “मुक्त पुरुष की कद्र दुनिया में कहीं भी हो सकती है लेकिन उसके अपने कुनबे और गाँव में नहीं हो सकती”। आपको भी शायद अपने बेटे की क़ीमत का पता उस दिन चलेगा जब दुनिया उसके गुण गाएगी। जब दूसरे आकर के आपको बताएँगे कि आपका बेटा तो सूरज जैसा चमक रहा है तब आपको लगेगा अच्छा मेरे बेटे ने कुछ हासिल किया है। वरना आपको तो अभी यही लग रहा है कि आप तो बड़े कल्चर्ड और एजुकेटेड हैं और स्पिरिचुअल बेंट है और आपका बेटा ही बड़ा ख़राब निकल गया।

आपका कल्चर भी किसी काम का नहीं है, एजुकेशन भी किसी काम की नहीं है और स्पिरिचुअल बेंट के तो कहने ही क्या! हो सके तो अगली बार जब अपने बेटे को पाएँ कि आपके ख़ौफ़ से छुप-छुपकर कहीं वीडियो वग़ैरह देख रहा है तो उससे कहिएगा कि “बेटा शेयर कर दे, मैं भी देख लूँ, मेरा भी कल्याण हो जाए”।

अगर उसे रोग लगा हुआ है तो प्रार्थना करिए कि वो रोग आपको भी लगे और ऐसा लगे, ऐसा लगे कि जो आपका पुराने किस्म का जीवन है वो समाप्त ही हो जाए।

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