भारतीयों में आनंद की कमी अक्सर देखी जाती है। जो पैसा आनंद और विकास में खर्च होना चाहिए, वो कभी खर्च नहीं होता। बचत की आदत से भड़ास बिग इंडियन फैट वेडिंग में निकलती है। पच्चीस साल तक ज़िंदगी में कुछ नहीं रहता, तो सारी भड़ास एक रात में निकल जाती है। शादियों में जो पैसा खर्च करते हो, उसका आधा भी लड़की की ज़िंदगी, मन, व्यक्तित्व बनाने में लगा दो, तो लड़की भी तर जाएगी, आप भी तर जाओगे।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। अभी मेरी एक सहेली की शादी हुई, बिग इंडियन फैट वैडिंग। वो आगे पढ़ना चाह रही थी, हायर स्टडीज के लिए और आगे जाना चाह रही थी पर उसके माता-पिता ने यही कहा कि—संजोया हुआ था जो भी उन्होंने—ये शादी के लिए है। कुछ और भी मित्र हैं जो स्पोर्ट्स (खेलों) में जाना चाह रही थीं पर उनको भी कुछ प्रोत्साहन नहीं मिला।
तो ऐसा देखती हूँ मैं कि जो माँ-पिता हैं, भारत में खासतौर पर, वो आंतरिक विकास की जगह शादी पर खर्चा करना चाह रहे हैं, क्योंकि वो तो तय ही होता है कि बड़ा होना है तो शादी होनी है, चाहे लड़का हो चाहे लड़की, बहुत अच्छे से उनकी शादी करनी है। आंतरिक विकास की जगह जो पैसा है वो ज़्यादातर शादियों में ही जा रहा है।
आचार्य प्रशांत: बिग इंडियन फैट वैडिंग! देखो, कोई संयोग नहीं है; दो बातें हैं और दोनों साथ चल रही हैं और उनका साथ होना संयोग नहीं है। पहली बात, भारतीय दुनिया के कम आनंदित लोगों में हैं। दुनिया के किन्हीं भी और देशों की अपेक्षा भारतीय बहुत कम यात्राएँ करते हैं, अपने विकास पर बहुत कम समय और पैसा खर्च करते हैं, बहुत कम उनमें रोमांच की, एडवेंचर की लालसा होती है। कुछ नया करने के प्रति—जो भीतर से तार बजा दे, झिंझोड़ दे, एक सिहरन, एक हल्की उत्तेजना पैदा कर दे—भारतीयों में कोई बहुत उत्साह रहता नहीं।




