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ज़बरदस्त देसी शादी || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। अभी मेरी एक सहेली की शादी हुई, बिग इंडियन फैट वैडिंग। वो आगे पढ़ना चाह रही थी, हायर स्टडीज के लिए और आगे जाना चाह रही थी पर उसके माता-पिता ने यही कहा कि—संजोया हुआ था जो भी उन्होंने—ये शादी के लिए है। कुछ और भी मित्र हैं जो स्पोर्ट्स (खेलों) में जाना चाह रही थीं पर उनको भी कुछ प्रोत्साहन नहीं मिला।

तो ऐसा देखती हूँ मैं कि जो माँ-पिता हैं, भारत में खासतौर पर, वो आंतरिक विकास की जगह शादी पर खर्चा करना चाह रहे हैं, क्योंकि वो तो तय ही होता है कि बड़ा होना है तो शादी होनी है, चाहे लड़का हो चाहे लड़की, बहुत अच्छे से उनकी शादी करनी है। आंतरिक विकास की जगह जो पैसा है वो ज़्यादातर शादियों में ही जा रहा है।

आचार्य प्रशांत: बिग इंडियन फैट वैडिंग! देखो, कोई संयोग नहीं है; दो बातें हैं और दोनों साथ चल रही हैं और उनका साथ होना संयोग नहीं है। पहली बात, भारतीय दुनिया के कम आनंदित लोगों में हैं। दुनिया के किन्हीं भी और देशों की अपेक्षा भारतीय बहुत कम यात्राएँ करते हैं, अपने विकास पर बहुत कम समय और पैसा खर्च करते हैं, बहुत कम उनमें रोमांच की, एडवेंचर की लालसा होती है। कुछ नया करने के प्रति—जो भीतर से तार बजा दे, झिंझोड़ दे, एक सिहरन, एक हल्की उत्तेजना पैदा कर दे—भारतीयों में कोई बहुत उत्साह रहता नहीं।

तो कुल मिलाजुला करके जो एक औसत भारतीय ज़िंदगी है वो बेरौनक, बेरंगी, मुर्दा, बेजान ऐसी ही रहती है। रहती है न? भारतीय न तो आपको बहुत दुबले मिलेंगे—कुछ अपवादों को छोड़ दो जहाँ पर अभी भी कुपोषण-वगैरह की स्थिति है—और न ही भारतीय आपको बहुत मोटा मिलेगा। बहुत मोटे, ओबीज़ लोग भी आपको पश्चिम में ही मिलेंगे, जो औसत भारतीय है वो बस बेडौल होता है। हमने क्या-क्या कह दिया बेजान, बेरंगा, बेरौनक और अब बेडौल। हम सिर्फ़ बेडौल होते हैं। ठीक है?

हम एकदम सूखे हुए भी नहीं होते, हड्डी के ढाँचे, जैसे सोमालिया में कभी मिलते थे। ना हम उतने मोटे हो पाते हैं क्योंकि जो बहुत मोटे हो गए हैं वो भी कम-से-कम मज्जा चाहते हैं ज़िंदगी में, इसीलिए तो इतने मोटे हो गए, वो खा-खाकर “मज्जे” लूट रहे हैं।

भारतीय कुछ नहीं चाहता, वो बस निष्प्राण पड़ा रहता है। नई पीढ़ी फिर भी थोड़ी सी ऐसी है जिसको जीवन में थोड़ी गर्मी चाहिए, जो थोड़ा-सा अज्ञात के खतरे उठाने को तैयार हो जाती है। जो पुरानी पीढ़ियाँ रही हैं वो तो—कुछ अपवादों को छोड़ दो, कोई छोटा सा अनुपात होगा जनसंख्या का जो अपवाद स्वरूप होता है—पुरानी पीढ़ियाँ तो बिल्कुल ही ऐसी हैं कि सुबह दुकान पर या दफ़्तर में गए, दिनभर बैठे, वापस आए गेंहूँ की रोटी, लौकी की सब्जी, अरहर की दाल और चावल, साथ में आम का अचार, हफ़्ते के सात दिन। उसमें भी मैंने क्या बोल दिया, सात में से चार दिन तो आलू की सब्जी। किसी दिन बहुत लगा कि आज तो कहर ढा देना है, दावत कर देनी है तो तिकोने परांठे। ये एक आम भारतीय की ज़िंदगी होती है – एकदम मुर्दा। कुछ नही।

टीवी के सामने बैठ गए जहाँ हमें हमारे ही जैसे, बल्कि हमसे भी गिरे हुए चरित्र देखने को मिलते हैं और उन्हीं को देखे जा रहे हैं, देखे जा रहे हैं जो हमारी छाया जैसे ही है। वहाँ भी हम कुछ नया देखने को उत्सुक नहीं होते।

जानते हो दुनियाभर में हॉलीवुड ने झंडा गाड़ रखा है अपना। जहाँ तक फ़िल्म इंडस्ट्रीज की बात है, हॉलीवुड सब देशों से बहुत-बहुत आगे है, बस भारत में हॉलीवुड की बहुत पकड़ और पहचान नहीं है। यहाँ नहीं आ पाया क्योंकि यहाँ हमारा देसी माल चलता है। विदेश यात्रा तो छोड़ दो, हमें विदेशी फ़िल्में भी नहीं देखनी।

मैं नहीं कह रहा हूँ कि उनकी सब फ़िल्में बहुत अच्छी होती हैं, और न मैं ये चाहता हूँ कि हमारी सब भारतीय फ़िल्में बने नहीं या आगे बढ़े नहीं; मैं बस ये बता रहा हूँ कि नये के प्रति, जो हमसे थोड़ा अलग है, जो थोड़ा विजातीय है, उसके प्रति भारतीयों में कैसी उदासीनता होती है, इंडिफ्रेंस। हमें जानना भी नहीं है कि वहाँ हो क्या रहा है।

घरों में चले जाओ, वहाँ तुमको कितनी अद्वितीयता या अनूठापन, निरालापन, यूनिकनेस देखने को मिलती है? बताओ। एक घर और दूसरे घर के बीच कितना भेद देखने को मिलता है?

हम ज़िंदगियाँ भी एक जैसी जीते हैं और ज़िंदगी हमारी थोड़ी सी अगर अलग होने लग जाए, हमारे रिश्तेदारों से, हमारे अभिभावकों से, हमारे पड़ोसियों से, उनसे ही यदि हमारी ज़िंदगी का ढर्रा अगर थोड़ा सा अलग होने लग जाए तो हम डर जाते हैं। हमारे बच्चों की ज़िंदगी अगर अलग होने लग जाए तो हम बच्चों पर टूट पड़ते हैं। बच्चे पिट रहे हैं घरों में क्योंकि वो बाल अलग तरीके के कटाकर आ गए। लड़कियों ने थोड़े से छोटे कपड़े पहन लिए, माँ घर से निकालने को तैयार है। मैं छोटे कपड़ों का पक्ष नहीं ले रहा हूँ, मैं सिर्फ़ बता रहा हूँ कि नये के प्रति हममें कितना विद्वेष रहता है। छोटे-बड़े कपड़े की बात नहीं है।

अब फैट इंडियन वैडिंग समझ में आ रही है क्या है?

जब तुम्हारी ज़िंदगी में पच्चीस साल तक कुछ रहता ही नहीं है तो जितनी भड़ास है वो एक रात में निकाल देते हो, कहते हो अब तो मौका मिला है कुछ करने का। वो जो पैसा था जो खर्च हो जाना चाहिए था अपने आनंद में, अपने विकास में, वो पैसा कभी खर्च करा नहीं। खासतौर पर लड़की जिस दिन घर में पैदा हुई उस दिन बाप ने एफडी खोल दी कि अब पैसा खर्च नहीं होगा, अब पैसा जमा होगा, इसके दहेज में जाएगा।

आपको मालूम है दहेज को अब सामाजिक कुप्रथा के रूप में कम महत्व मिलता है महत्व मतलब अब उसको कम हाईलाइट किया जाता है। आज से बीस साल पहले फिर भी लोग आवाज़ उठाते थे, अभियान भी चलते थे, आपको लेख भी पढ़ने को मिल जाते थे, टीवी पर भी कार्यक्रम आ जाते थे जिसमें दहेज आदि की बुराई की जाती थी। बीस-पच्चीस साल पहले दूरदर्शन पर आता था 'दुल्हन ही दहेज है' तो दहेज मत लो।

दहेज पिछले बीस-तीस सालों में पाँच-दस गुना बढ़ गया है लेकिन अब उसको कुप्रथा भी नहीं मानते। इतना बढ़ा है तो मतलब उतना पैसा जमा भी किया जाता होगा, तभी तो दहेज दिया जाता है। वो कौनसा पैसा है जो जमा करा जाता है? और दहेज में मैं शादी पर होने वाला खर्चा शामिल कर रहा हूँ, वो भी दहेज का ही हिस्सा है। वो कौनसा पैसा है? वो वह पैसा है जो आपको किसी ढंग के काम में कब का व्यय कर देना चाहिए था; आपने नहीं खर्च करा।

हम ज़बरदस्त रूप से कन्नी काटने वाले लोग हैं। हमें जहाँ मौका मिलता है खट से बचाते हैं। और ये बात अब अनुवांशिक हो गई है, जैसे हमारी रगों में अब खून बनकर दौड़ने लगी है।

ये बात सौ साल पहले समझ में आती थी जब भारत बहुत गरीब था, ये बात पचास साल पहले भी समझ में आती थी। आज एक बहुत बड़ा वर्ग, एक पूरी क्लास पैदा हो गई है जिसके पास पैसा है। और वो छोटे नहीं हैं, कुछ लोग नहीं हैं, मैं दस-बीस लाख लोगों की बात नहीं कर रहा, मैं दस-बीस करोड़ लोगों की बात कर रहा हूँ जिनके पास पर्याप्त पैसा है, लेकिन उनके ऊपर भी अतीत की छाया अभी कुछ ऐसी है कि खर्च उनसे किया नहीं जाता, संस्कार वही पुराने हैं। मितव्ययी रहो, फ्रूगेलिटी। मत खर्च करो, मत खर्च करो।

अरे! खर्च नहीं करोगे तो क्या लेकर मरोगे? वो पैसा कमाया किसलिए है अगर खर्च नहीं करते?

लोग आते हैं, कहते हैं, “समझ में सब आ रहा है, आ रहा है, सब समझ में आ रहा है पर दिल अजीब-अजीब सा डूबने लग जाता है जैसे ही खर्च करने की बात आती है।”

पूछा, “क्यों?”

बोले, “अभी भी याद है पिता जी साइकिल पर चलते थे। एक-एक, दो-दो रुपया हम माँगा करते थे। बच्चे थे स्कूल जा रहे हैं जेब खर्च के लिए एक-एक दो-दो रुपया वो लेते थे आज से चालीस साल पहले। अब आज अचानक कुछ चीज़ सामने आ जाती है जिस पर बीस हजार, पचास हजार, एक लाख खर्च करना है, मैं खर्च कर सकता हूँ आराम से लेकिन दिल डूबने लग जाता है बिल्कुल।”

तो खर्च नहीं करता हिंदुस्तान। जहाँ वो मौका मिले—और उसको पता भी नहीं चलता कि वो जहाँ बचा रहा है, वो कर क्या रहा है। अपना नुक़सान।

एक उदाहरण देता हूँ। अभी यहाँ आने से पहले जो हमारा पुस्तकों का विभाग है उसको लेकर थोड़ी मीटिंग चल रही थी। तो मेरे सामने आँकड़े रखे गए कि हमारी कौनसी किताबें हैं अमेज़न पर जो लोग सबसे ज़्यादा ले जा रहे हैं। आप जानते हो उनमें क्या बात निकलकर आ रही है? और अभी आँकड़े और विस्तार से आएँगे तो और पता चल जाएगा मुझे। लोग नहीं देख रहे हैं कि किताब का शीर्षक क्या है, लोग देख रहे हैं कि किताब का मूल्य क्या है। जो सस्ती हैं वही निकलती जा रही हैं, कि ‘आचार्य जी का ही तो है। अरे! ये किताब हो या वो किताब हो, वो वाली तीन सौ की है, ये वाली डेढ़ सौ की है, इसको ले चलो।’ तुम कितने होशियार हो!

और ये सब बचाया जा रहा है। ये जीवन को जो आहार आपको देना चाहिए था, आप जीवन को नहीं दे रहे, आप उस आहार को बचाए ले रहे हैं। जैसे किसी बच्चे को जो खाना देना हो आप उस खाने में कटौती करके वो खाना सहेज के रख रहे हों बचत के नाम पर। ‘बचत कैसे करते हैं?’ बच्चों को खाना कम देकर के बचत करते हैं।

शरीर को खाना कम दिया जाए पता चल जाता है, शरीर कुपोषित हो गया। स्पष्ट हो जाता है, डॉक्टर बता देता है कुपोषण है। मन को जो कुपोषित कर रहे हो, वो कुपोषण कौन बताएगा? और मन को भी पोषण देने में पैसा लगता है, वो सब पैसा बचाया जा रहा है, वो बनता है फैट इंडियन वैडिंग।

उस लड़की को ठीक से पढ़ाया नहीं, और ठीक से पढ़ाने में यही भर शामिल नहीं होता कि आप कह दें, ‘नहीं जी, हमारी लड़की तो पोस्ट ग्रेजुएट है।’ कहाँ से कराई है पोस्ट ग्रेजुएशन ? भारत में पोस्ट ग्रेजुएशन सिर्फ़ पोस्ट ग्रेजुएशन नहीं होती है, ज़मीन और आसमान का अंतर होता है पीजी और पीजी में भारत में। तुमने कहाँ से कराया अपनी लड़की को? कहाँ भेजा, बताओ न?

इतने छोटे-छोटे कस्बे हैं, उनमें भी हो जाता है परास्नातक। वहाँ तुमने भेज दिया कि जाओ, एक ऐसे ही कोई लोकल बीए , बीएससी का कॉलेज है वहाँ तुमने उसको कह दिया जाओ एमएससी कर लो और फिर कह रहे हो लड़की तो हमारी पोस्ट ग्रेजुएट है।

और अच्छी शिक्षा अच्छे पैसे से आती है, वहाँ तुम पैसे नहीं खर्च कर पाए, वहाँ तुमने कन्नी काटी। और उस पैसे से अब तुम शादी में डीजे लगवा रहे हो, हीरे का उसके लिए सैट लेकर आए हो कि हीरा पहनेगी लड़की, जब अपने घर जाएगी। जब तक तुम्हारे घर में थी तो अपने घर में नहीं थी? अब वो अपने घर जाएगी तो हीरे लेकर जाएगी। जब तक तुम्हारे घर में थी तुम उसे ठीक से खाने को भी नहीं दे पाए।

आप ये बात भी जानते हैं न भारत में कुपोषण सिर्फ़ निम्न आयवर्ग में नहीं पाया जाता, भारत में मध्यवर्गीय लोग भी कुपोषित हैं; और लड़कियों में कुपोषण लड़कों की अपेक्षा ज़्यादा होता है, क्योंकि पोषण इतने से ही नहीं हो जाता, क्या? आलू की सब्जी, गेंहूँ की रोटी, अरहर की दाल और चावल, कह रहे इतने से खा तो लिया। इतने से पोषण नहीं हो जाता।

कभी पूरा ब्लड टेस्ट कराइए तो पता चलेगा कि—खासतौर पर लड़कियों में—आयरन की कमी और विटामिन डी सभी में कम होता है, कैल्शियम सब में कम होता है, इसके अलावा जिंक , मैग्नीशियम , सोडियम। और जो बाकी हैं मिनरल्स , विटामिन्स , प्रोटीन, आप करवाइए तो फिर देखिए कि कमी है कि नहीं। और ये कमी पैसे से ही भरी जाती है, पर यहाँ हम पैसा नहीं खर्च करतें। लड़कों पर भी नहीं करतें, लड़कियों पर तो और नहीं करतें।

वो पैसा कहाँ जाता है? बिग फैट इंडियन वैडिंग। वहाँ पर लाला जी की नाक ऊँची रहनी चाहिए, जे ढाई फुट की पगड़ी बाँधते हैं। और लड़की घूम रही है जिसका कोई न शारीरिक विकास हुआ है, न मानसिक विकास हुआ है, आधी अभी वो जानवर ही रह गई। शर्म नहीं आ रही इनको और इतनी इन्होंने बरात सजवा ली है।

मनुष्य सिर्फ़ जन्म लेने से मनुष्य हो जाता है क्या? उसको मनुष्य बनाना पड़ता है। तुम अपनी लड़की पर खर्च नहीं कर रहे, तुम अपने लड़के पर भी नहीं, तुम अपने ऊपर भी खर्च नहीं कर रहे तो तुम मनुष्य कैसे बन जाओगे, बोलो?

हम बार-बार कहते हैं, कर्म का उद्देश्य एक है – चेतना का उत्थान। तो उस कर्म से तुमने जो पैसे कमाए, वो तुमने अपनी चेतना के ऊपर क्यों नहीं लगाए? कर्म से पैसे आए, वो पैसे सबसे पहले किस उद्देध्य में खर्च होने चाहिए थे? चेतना के उत्थान में। लेकिन नहीं, क्योंकि वो अप्रकट है न, भौतिक नहीं है पता नहीं चलता।

एक शर्ट खरीद लो तो अच्छा लगता है। अच्छा ठीक है, भई! हज़ार रुपए में शर्ट आ गई। अब हज़ार रुपए में कोई ऐसी चीज़ आए जिससे मन साफ़ हो तो छूने को तो नहीं है, मन छू तो सकते नहीं। प्रमाण क्या है कि मन साफ़ हुआ? तो जैसा वो सज्जन मुझसे बोल रहे थे, “आचार्य जी, दिल टूट जाता है, खर्च कैसे कर दें? है तो, पर खर्च तब भी नहीं किया जाता।”

ये जो ओलंपिक में जाकर के कुल एक स्वर्णपदक लाकर के हम इतना शोर मचाते हैं, और ढोल बजा-बजा नाचते हैं कि एक सौ चालीस करोड़ मिलकर के एक गोल्ड मैडल ले आए हैं, उसमें भी बहुत बड़ा योगदान इसी बात का है कि खर्च नहीं करना है।

देखिए, मैं उनकी बात नहीं कर रहा जिनके पास इतना पैसा है ही नहीं कि वो खर्च नहीं कर सकते। ये तो जानते हैं न? मैं उनकी बात नहीं कर रहा। मैं उस वर्ग की बात कर रहा हूँ जिसके पास पैसा है लेकिन वो जानता ही नहीं कि इसे खर्च करना चाहिए और कैसे करना चाहिए।

अचानक से थोड़े ही तुम ऐशियन गेम्स या ओलंपिक या वर्ल्ड चैम्पियनशिप से पदक ले आओगे। उसके लिए पूरी एक सप्लाई लाइन होती है। किसी ग्रैंड स्लैम में किसी भारतीय को खेलते देखा है? डबल्स में महेश भूपति-लिएंडर पेस खेला करते थे एक दशक पहले। सिंगल्स में कोई दिखाई पड़ता है? फ्रेंच ओपन हो, विम्बलडन हो कोई दिखाई पड़ता है? कैसे दिखाई पड़ेगा?

टैनिस में कोई बच्चा आगे बढ़े, उसके लिए चार साल का हो न तब उसके हाथ में रैकेट थमाना पड़ता है, लाला जी को ये बात समझ में नहीं आती। और खासतौर पर लड़की, वो भी चार-पाँच साल की, लाला जी सोच ही नहीं पाएँगे कि इसके हाथ में टैनिस का रैकेट दो, इसको कोर्ट भेजो, इसको कोचिंग दिलाओ। ये आज की उम्र से टैनिस खेलना शुरू करेगी तब जाकर के एक दिन ओलिम्पिक में भी खेलेगी। मैं नहीं कह रहा हूँ सब लड़कियों को ओलंपिक्स में पहुँचना चाहिए, पर एक पूरा माहौल, एक पूरा इको सिस्टम तैयार करना पड़ता है, तब उसमें से कुछ लोग उस स्तर तक पहुँच पाते हैं।

नहीं, खर्च नहीं किया। न उसकी पढ़ाई में खर्च किया, न उसके शरीर को बनाने में खर्च किया, न उसको यात्रा कराने में खर्च किया, न उसको कोई कला सिखाई, न कोई खेल सिखाया। सारा पैसा बस बचाया और उस पैसे का फिर क्या किया? 'अरे खाए बिना मत जाइएगा! उधर स्पेशल पनीर पुलाव है आपके लिए।'

वो जो पनीर पुलाव है न वो तुमने अपनी लड़की का जीवन और पेट काटकर बचाया है। करोड़ों की शादियाँ होती हैं। एक साधारण मध्यमवर्गीय आदमी भी इतनी मोटी अब शादियाँ करता है।

जब यहाँ पर आयोजन होना था महोत्सव का तो उसके लिए लोग गए, रोहित जी वगैरह। तो पहले जो होटल्स में ऐसे हॉल होते हैं वहाँ पर पता करने लगे। अब आप जहाँ बैठे हैं ये काफ़ी अच्छे स्तर का, क्वालिटी का मिनी ऑडोटोरियम है। इससे कम स्तर के जो होटल्स हैं वो दस-दस गुना महंगे, कोई बोले पाँच लाख, कोई बोले दस लाख। किस बात के पैसे माँग रहे हैं ये? फिर समझ में आया यहाँ शादियाँ होती हैं।

तो वो जो हॉल थे वो ऐसे इस्तेमाल होते थे कि यहाँ पर बना रहता है सोफा, बेढंगा—तो अब एक और जुड़ गया, बेढंगा। एक यहाँ सोफा होता है, उसे गुलाबी रंग से अक्सर सजाया जाता है, उस पर फुग्गे लगाए जाते हैं दोनों तरफ़। उस पर लड़का-लड़की बैठ जाते हैं और ऐसे जैसे बहुत सारे लोग बैठे हैं सामने, ऐसे बैठ जाते हैं। वो करते क्या हैं वहाँ बैठकर मैं समझ नहीं पाया आज तक। दर्शन कर रहे हो, पिक्चर चल रही है, क्या करोगे वहाँ बैठकर? और दूल्हे के लफंगे यार होते हैं पाँच-सात जो बार-बार कूद-कूदकर जाते हैं और भाभी के साथ फोटो खिंचवाते हैं। उसका लगता है दिन का दस लाख, एक रात का दस लाख। और ये मैं जो छोटे वाले हैं उनका बोल रहा हूँ, बड़े वाले और ज़्यादा लेते होंगे।

लाला जी यहाँ पैसा खर्च करने को तैयार हैं, बोलो कितना खर्च करना है करेंगे और फिर अपने-आपको उत्तर भी तो देना है कि तुम्हारी ज़िंदगी में जब कभी कुछ अच्छा, ऊँचा, उत्सव जैसा हुआ ही नहीं तो अब कुछ करके दिखाओ।

तो लाला जी कहते हैं, “जो रोमांच, जो उत्सव आज तक हमने मिस करा है, जिससे चूके आए हैं उसकी कसर एक ही बार में निकाल देते हैं। बनाओ रे चार तरह का खाना! कॉन्टिनेंटल काउंटर उधर है, मुग़लई काउंटर उधर है, चाइनीज़ उधर है। एकदम लगना चाहिए कि कुछ हो रहा है, फ़िल्मी शादी बिल्कुल।

जहाँ नहीं खर्च करना चाहिए वहाँ लगे हुए हैं धकाधक खर्च करने में, बैंक्वेट हॉल्स और हॉटेल्स की चांदी करा रहे हैं। और जहाँ खर्च करना चाहिए, लाख दो लाख रुपए में बहुत अच्छी लाइब्रेरी बन जाती है, किसी के घर में नहीं होती। किताबों पर! किताबों पर दो लाख खर्च कर दें, कैसे खर्च कर दें? और दूल्हे को कोरोला देने में पच्चीस लाख खर्च कर सकते हैं और फॉर्च्यूनर देने में चालीस लाख, मर्सडीज देने में एक करोड़; तब नहीं होता। दो लाख रुपए लगा के घर में लड़की के लिए एक लाइब्रेरी नहीं बनवा सकते थे।

विदेश यात्रा छोड़ दीजिए, भारत ही कितनों ने घूमा होता है? इतना बड़ा नक्शा है, कौन जाता है घूमने? दक्षिण के नाम पर हम बहुत हुआ तो गोवा चले जाएँगे, नहीं तो कन्याकुमारी या मुन्नार घूम आएँगे। दक्षिण तो फिर भी कुछ लोग चले जाते हैं, उत्तर-पूर्व किसने घूमा है? घूमना छोड़ दीजिए, अभी मैं कहूँ वो सब राज्यों के नाम बता दीजिए तो कहेंगे चेरापूंजी, गुवाहाटी। आपने ही नहीं घूमा, अपनी बच्ची को क्या घुमाएँगे? ‘और फिर बच्ची तो पराया धन है, इसे उत्तर-पूर्व घुमाकर क्या करेंगे? इसके ऊपर एक ही बार खर्चा करना होता है, कब? साजन जी घर आए दुल्हन क्यों शरमाए'। ले दनादन, दे दनादन!

और यही फिर जो अविकसित और अशिक्षित लड़कियाँ होती हैं, ये अपने जीवन को भी बोझ की तरह जीती हैं। अपने परिवार की ज़िंदगी भी खराब करती हैं, अपने बच्चों की ज़िंदगी भी खराब करती हैं।

जब इनका अपना न कोई विकास हुआ है, न ज्ञान मिला है, तो ये अपने बच्चों की भी क्या परवरिश करेंगी! ये अपने बच्चों को भी फिर अपने ही जैसा बना देती हैं। और जीवन भर कुढ़ती रहती हैं और बहुत दर्द में जीती हैं। फिर कुछ नहीं आता इनको, एक टीवी देखना आता है, टीवी दिखा दो। शॉपिंग करना आता है, शॉपिंग कर लेंगी।

जीवन के उच्चतर मूल्य और आदर्श क्या होते हैं, ये इनके पिताओं ने, माताओं ने इनमें कभी स्थापित ही नहीं किए क्योंकि देखिए पैसा हर चीज़ में लगता है। पैसा बहुत बचाओगे तो जीवन फिर कैसे बढ़ाओगे? कैसे सजाओगे? यहाँ भी आप बैठे हो तो पैसा खर्च करके आए हो न; अध्यात्म में भी लगता है। आप अगर इतने ही तुल गए हो कि पैसा बचाकर ही रखना है, तो जीवन के किसी क्षेत्र में आप आगे नहीं बढ़ सकते।

उनसे मैं माफी चाहता हूँ, मैं फिर कह रहा हूँ जो यहाँ पर कुछ हमारे मित्र ऐसे भी हैं जो आर्थिक रूप से वाकई कमजोर हैं, स्कोलरशिप वगैरह पर आए हुए हैं। जिनके पास है ही नहीं खर्च करने को उनसे नहीं अभी बात कर रहा हूँ। मैं उनसे बात कर रहा हूँ जिनके पास है, पर खर्च नहीं करते। छोटे-से-छोटा कस्बा हो, वहाँ बैंक्वेट हॉल आपको लाईन से मिल जाएँगे। ‘*डायमंड बैंक्वेट हॉल*’, ऐसे ही नाम होते हैं उनके और उनका धंधा बारहमासी है, शादियाँ लगातार हो रही हैं।

कुल मिलाकर के जो बात है कहे देता हूँ, ये जितना पैसा शादियों में खर्च करते हो, इसका आधा भी अगर लड़की की ज़िंदगी, मन, व्यक्तित्व बनाने में लगा दो, तो लड़की भी तर जाएगी, आप भी तर जाओगे। यही बात लड़कों पर भी लागू होती है।

अपने-आप कुछ नहीं हो जाता। आप कहो अपने-आप हो जाएगा, अपने-आप अगर वो कुछ खेलना भी सीखेगा तो गली क्रिकेट। अपने-आप तो इतना ही होगा कि जाकर के कहीं पर लकड़ी का फट्टा उठाकर के गेंद पीटना शुरू कर देगा, कुल इतनी ही वो अपनी प्रतिभा विकसित कर पाएगा। जैसे भारत में सब क्रिकेटर होते हैं, वो भी बन जाएगा। अगर ये भी चाहते हो कि वो क्रिकेट ढंग से सीखे तो इसके लिए भी पैसा खर्च करना पड़ेगा, उसे किसी अकैडमी भेजना पड़ेगा, भाई। क्रिकेट तक अपने-आप नहीं आ जाता।

आपने अगर अब बच्चे पैदा कर दिए हैं तो ये मत सोचिएगा अपने-आप बड़े हो जाएँगे। बड़े-बूढ़ों का ये ढंग होता है कहने का, “अरे! हमारे तो बारह थे, सब अपने-आप पल-बढ़ गए। ये आजकल के चोंचले हैं कि ठीक से परवरिश करो, बात-बात में उनका देखभाल-ख़्याल रखो। ये चोंचले हैं।” ये चोंचले नहीं हैं, ये आवश्यकताएँ हैं।

अपने-आप गिटार बजाना सीख लोगे? आपकी बच्चियों को कौनसा वाद्ययंत्र बजाना आता है? बताइये। यहाँ बहुत सारे अभिभावक बैठे हुए हैं, कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी कुछ? बांसुरी, संतूर, गिटार, हारमोनियम, वीणा कुछ? और आप अगर इस उम्र में उन्हें नहीं सिखा रहे तो वो कब सीखेंगी? ज़िंदगी में कभी नहीं सीख पाएँगी।

एक बार उंगलियाँ इतनी मोटी हो गई उसके बाद गिटार सीखना ऐसे ही मुश्किल हो जाता है। स्ट्रिंग इंस्ट्रूमेंट सबसे आसानी से—मैं बहुत नहीं जानता, जितना लेकिन मुझे पता है—जब उंगलियाँ नाजुक होती हैं और उम्र कच्ची होती है तब ज़्यादा आसानी से सीख पाते हो।

'नहीं जी, अपने-आप बड़ी हो जाएँगी ये तो, हमारी बिटिया तो चंद्रकला की तरह है, पंद्रह दिन में पूर्णिमा हो जाती है।' वो पंद्रह दिन में बस शरीर से जवान हो जाएगी, और कुछ नहीं होगा। भीतर से पशु ही रह जाएगी।

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