सच्चा वैराग्य महत्वहीन या हानिकारक चीज़ों को छोड़ना है, और सच्ची महत्वाकांक्षा उस चीज़ के लिए पूरी तरह समर्पित होना है जो वास्तव में मूल्यवान है। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि गहरी समझ के दो पहलू हैं। जब विवेक से सत्य और असत्य स्पष्ट दिखने लगते हैं, तो त्याग प्रयास नहीं रहता, स्वाभाविक हो जाता है। आध्यात्मिक यात्रा में यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा सवाल लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर है। जैसे कि मेरा एक दोस्त है, वह अभी लिव-इन में है, तो हमारी जनरेशन में यह तो बहुत नॉर्मल सी चीज़ है कि अगर एक-दूसरे को दोनों पसंद कर रहे हैं तो साथ में हैं। अगर यह मैं समाज की दृष्टि में देखूँ, तो यह बहुत गंदी चीज़ है। समाज तो मतलब शादी को तो अप्रूवल देते हैं कि अच्छी चीज़ है। जब कोई शादी कर लेते हैं तो बहुत आते हैं तोहफ़ा, लेकिन जब बात लिव-इन का होता है, तो यह बहुत बड़ी बात हो जाती है।
तो मेरा सवाल यही है कि लिव-इन और मैरिज में मतलब फ़र्क़ क्या है?
आचार्य प्रशांत: लिव-इन वालों के लिए देखो, उनकी नज़र से देखो, उनके लिए लिव-इन और मैरिज में फ़र्क़ है, और मैरिज वालों की नज़र से देखोगे, तो उनके लिए मैरिज और लिव-इन में फ़र्क़ है; और मेरी नज़र से देखोगे, तो दोनों में कोई फ़र्क़ नहीं है। तो निर्भर करता है कि किसकी नज़र से देख रहे हो।




