
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा सवाल लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर है। जैसे कि मेरा एक दोस्त है, वह अभी लिव-इन में है, तो हमारी जनरेशन में यह तो बहुत नॉर्मल सी चीज़ है कि अगर एक-दूसरे को दोनों पसंद कर रहे हैं तो साथ में हैं। अगर यह मैं समाज की दृष्टि में देखूँ, तो यह बहुत गंदी चीज़ है। समाज तो मतलब शादी को तो अप्रूवल देते हैं कि अच्छी चीज़ है। जब कोई शादी कर लेते हैं तो बहुत आते हैं तोहफ़ा, लेकिन जब बात लिव-इन का होता है, तो यह बहुत बड़ी बात हो जाती है।
तो मेरा सवाल यही है कि लिव-इन और मैरिज में मतलब फ़र्क़ क्या है?
आचार्य प्रशांत: लिव-इन वालों के लिए देखो, उनकी नज़र से देखो, उनके लिए लिव-इन और मैरिज में फ़र्क़ है, और मैरिज वालों की नज़र से देखोगे, तो उनके लिए मैरिज और लिव-इन में फ़र्क़ है; और मेरी नज़र से देखोगे, तो दोनों में कोई फ़र्क़ नहीं है। तो निर्भर करता है कि किसकी नज़र से देख रहे हो।
लिव-इन वालों के लिए मैरिज एक पिंजरा है, जिसमें कोई और आकर के उनको बंद कर देता है। और मैरिज वालों के लिए लिव-इन उद्दंडता है, वासना है, अनैतिकता है, निर्लज्जता है। तो वो जहाँ से देख रहे हैं, उनको लिव-इन वाले बड़े अमान्य लगेंगे और लिव-इन वाले जहाँ से देख रहे हैं, उनको मैरिज वाले अस्वीकार्य लगेंगे। पर तुम कौन सा वहाँ पर कमाल कर दे रहे हो अगर तुम लिव-इन कर ले रहे हो? हाँ, ठीक है, आयोजित विवाह में प्रेम को कोई पूछता ही नहीं, वो बात बिल्कुल ठीक है। पर यह भी किसी ने कह दिया कि लिव-इन में प्रेम की शुद्धता होती है।
और लिव-इन का जो कल्ट है उसमें डर भले ही हो पर साथ ही साथ एक गुरूर भी रहता है कि “देखा, हम ज़माने को नहीं पूछते, हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं, तो हम दोनों एक साथ रहते हैं, दुनिया को ठेंगा दिखाकर के। हमें समाज की और धर्म की स्वीकृति नहीं चाहिए। हमने घर छोड़ा है, रस्मों को तोड़ा है, दूर कहीं जाएँगे नई दुनिया बसाएँगे।”
तुम कोई नई दुनिया नहीं बसा रहे हो, तुम्हारी हरकतें भी पुरानी दुनिया का ही विस्तार हैं। एक प्रकार की मूर्खता का जवाब दूसरे प्रकार की मूर्खता तो नहीं हो सकती न? बात इसकी नहीं होती कि आपने फेरे लिए कि नहीं, बात इसकी होती है कि प्रेम है कि नहीं। प्रेम है यदि, तो फेरे ले लेने से कोई अपराध थोड़ी हो गया। और प्रेम नहीं है और फेरे लिए बिना साथ-साथ रह रहे हो, तो उसमें कोई महानता नहीं आ गई। और प्रेम ऐसे ही नहीं आ जाता कि कॉलेज में आ गए हैं लड़का-लड़की, तो अब उनमें प्रेम पैदा हो गया। उम्र भी है, दस्तूर भी है, हो गया प्यार पैदा। ऐसे नहीं आ जाता।
तो यह सब अहंकार के खेल हैं। कभी वह समाज से डर करके अपने स्वार्थों की पूर्ति करता है और कभी वह समाज से विद्रोह करके अपने स्वार्थों की पूर्ति करता है। बात समाज की नहीं है कि समाज द्वारा स्वीकृत व्यवस्था के अंतर्गत तुम साथ रह रहे हो या समाज द्वारा अस्वीकृत तरीके से दोनों साथ रह रहे हो। बात इसकी है कि समाज को मानने वाला भी अहंकार ही था, और जब देखा कि मानने में स्वार्थ नहीं पूरे हो रहे, तो बोला, चलो विद्रोह कर देते हैं।
इन लिव-इन वालों को आज बता दिया जाए कि कोई तुम्हें बुरा नहीं बोलेगा और तोहफ़े शब्द इस्तेमाल किया, खूब तोहफ़े दिए जाएँगे, इज़्ज़त भी दे दी जाएगी। प्यार से रखा जाएगा, कोई मारे-पीटेगा नहीं। तो सौ में से नब्बे लिव-इन वाले आज शादी कर लें। हाँ या ना? लिव-इन वालों को बता दिया जाए कि जाति वग़ैरह पर कोई आपत्ति नहीं करेगा। दहेज वग़ैरह का नाटक नहीं किया जाएगा। कोई तुमसे सवाल नहीं पूछेगा, कोई नहीं पूछेगा कि इतने दिनों में सेक्स किया कि नहीं? वर्जिन हो कि नहीं? कोई कुछ नहीं पूछेगा। घर आओ, हम तुमको बहुत सारा रुपया-पैसा भी देंगे, इज़्ज़त भी देंगे, अब विधिवत विवाह कर लो। तो सौ में से नब्बे लिव-इन वाले कूद के पहुँच जाएँगे विवाह करने।
उन्हें विवाह से कोई आपत्ति थोड़ी थी, स्वार्थ नहीं पूरे हो रहे थे, इस बात से आपत्ति थी। स्वार्थ पूरे हो रहे हों, तो अहंकार समाज के साथ चल लेता है। स्वार्थ पूरे न हो रहे हों, तो अहंकार समाज से विद्रोह कर देता है।
एक ही तल पर दो व्यवस्थाएँ चल रही हैं। उन दोनों व्यवस्थाओं में मैं किसको श्रेष्ठ बताऊँ? एक डरा हुआ आदमी है और एक को नशा चढ़ा हुआ है। या ऐसे कह लो कि नशा दोनों को चढ़ा हुआ है, एक को डर का नशा चढ़ा है और एक को वासना का नशा चढ़ा है। जिसको डर का नशा चढ़ा है, उसको धक्का मारा गया, चल, शादी कर। उसने शादी कर ली। जिसको डर के नशे से ज़्यादा वासना का नशा चढ़ा हुआ है, उसको वासना ने धक्का मारा तो वो जाकर लिव-इन में रहने लगी।
“क्या, आचार्य जी, आप क्या सोचते हो? सब लिव-इन वाले वासना वाले ही हैं?” नहीं, तुम प्यार वाले हो, बिल्कुल निष्काम प्रेम है तुम्हारा। एकदम निष्काम प्रेम है। जितनी मार-पिटाई और वारदातें और हिंसा गृहस्थों में होती है, विवाहितों में उतनी ही या उससे ज़्यादा लिव-इन वालों में होती है। क्योंकि उधर भी अहंकार चल रहा है, इधर भी चल रहा है। हत्याएँ भी हो जाती हैं लिव-इन में कई बार, ठीक वैसे जैसे शादीशुदा लोग हत्या कर देते हैं अपने पति की कई बार, वैसे लिव-इन वाले भी कर देते हैं। क्योंकि बदला थोड़ी है कुछ, वही पुराना सड़ा हुआ अहंकार है।
बात यह नहीं है कि विवाह है या लिव-इन है, बात यह है कि समझ है कि नहीं है और प्रेम है कि नहीं है। सवाल यह होता है, लिव-इन करने से आप कोई क्रांतिकारी नहीं हो जाते। लिव-इन में कोई ऐसे सुर्ख़ाब के पंख नहीं लगे हैं कि आप बोलो कि हम तो विद्रोही हैं। कौन सा विद्रोह है? क्या कर लिया इसमें ऐसा?
ज़िंदगी में हर तरीके से तुम बिल्कुल गिरे हुए इंसान हो, लिव-इन करने से तुम महान हो जाओगे? लिव-इन में रह रहा जोड़ा, उसको बुलाओ, उसको बस इतना ही पूछ लो कि भारत के कितने पड़ोसी देश हैं, उसको यही न पता हो। उससे धर्म, चिकित्सा, विज्ञान, दर्शन, किसी क्षेत्र में कुछ पूछ लो, उसे कुछ नहीं पता। चलो, ये तो बाहरी बातें हो गईं, भीतर उसके डर भरा हुआ है, अंधविश्वास भरा हुआ है। भीतर उसके सौ तरह के वहम हैं, ईर्ष्या है। ले-देकर के कुल मिलाकर के एकदम ही साधारण और औसत इंसान है। अब यह लिव-इन करने लग जाए, तो क्या क्रांतिकारी हो जाएगा?
मूर्ख शादी कर ले, तो भी मूर्ख रहेगा और मूर्ख लिव-इन में रहे, तो वह भी मूर्खता होगी। इन सब से क्या बदल जाना है? और जो जगने लगा है उससे हम कभी पूछने जाते नहीं, उससे पूछना यह हमें शोभा ही नहीं देता कि क्या तू विवाह करेगा या तू किसी महिला या पुरुष की संगति में बिना विवाह के रहेगा? यह अशोभनीय प्रश्न है किसी बुद्ध से पूछने के लिए।
आपके द्वार बुद्ध आएँ और आप जाकर के उनसे पूछें, अपने वैवाहिक जीवन के बारे में कुछ बताइए, जब से पत्नी को पीछे छोड़ के गए थे, जंगल में कुछ हुआ क्या? तो ये प्रश्न सड़ा हुआ है। प्रश्न तो सिर्फ़ एक असली है। बुद्धत्व माने क्या? उनसे उनके बारे में पूछो तो बस इतना ही पूछो, आप सचमुच बुद्ध हैं न? बस इतना ही। और यदि वह सचमुच बुद्ध हैं, तो फिर विवाह करें कि ना करें, यह प्रकृति की बात है। उनकी मौज की बात है। और करें कि न करें, बात एक बराबर है, यह उनके ऊपर है। करना होगा तो करेंगे, नहीं करना होगा तो नहीं करेंगे। हो सकता है कभी करें कभी न करें, हो सकता है एक बुद्ध करें दूसरा न करे। कुछ भी हो सकता है, यह सवाल ही पूछने जैसा नहीं है। बुद्धों के लिए यह सब प्रश्न अप्रासंगिक हो जाते हैं।
शादी, लिव-इन, ये-वो, लोग घुसे रहते हैं। बड़ी-बड़ी बहस चलती रहती है आए दिन सोशल मीडिया पर: “श्रीकृष्ण ने राधा से विवाह क्यों नहीं किया? राधा का प्यार सच्चा था, तो फिर उन्होंने सोलह हज़ार रानियाँ क्यों? क्या यह राधा के साथ ग़लत नहीं हुआ?” यह तुम क्या सवाल कर रहे हो? यह तुम किस तल पर गिरा रहे हो श्रीकृष्ण को? क्या कर रहे हो तुम ये? तुम जहाँ भी जाते हो तुम्हें बस यही दिखाई देता है, शादी-ब्याह, शादी-ब्याह? किया कि नहीं किया? जो मिलेगा, उसी से बस यही पूछोगे, शादी? ले-दे के कुछ नहीं है, दिमाग़ में सेक्स भरा है।
बुद्ध भी दिख जाए, तो फूफी तुमसे यही पूछेगी, देख, लड़का अच्छा है ना? आप चली मत जाइएगा फूफी के साथ किसी बुद्ध से मिलने। वो बुद्ध को देखेंगी, ऐसे-से नज़रों से तोलेंगी, तराशेंगी और ऐसे कोहनी मारेंगी। कहें कि बात आगे बढ़ाऊँ? उनके लिए बुद्ध भी बस विवाह की वस्तु है।
ऐसे ही घूम रहे हैं, कुछ आता नही-जाता नहीं, दुनिया का कुछ पता नहीं। ज्ञान कुछ नहीं, अनुभव कुछ नहीं। कई बार तो सोलह, अठारह, बीस की उम्र होती है, लड़का-लड़की एक कमरे में हैं। कई बार तो दो-चार एक साथ रहने लग जाते हैं, तो यह कोई तुम्हारे अति आधुनिक होने का या जागरूक होने का सबूत थोड़ी ही होता है।
बोल रहे हैं, ये डेफिनेशन किसकी बनाई? मैरिज ने कि मैरिज में दो ही हो सकते हैं? हम चार शादीशुदा हैं आपस में। अरे, मज़ाक नहीं है सचमुच हो रहा है, हिंदुस्तान में कम हो रहा है, बाहर ज़्यादा हो रहा है। वहाँ कुत्ते-बिल्ली से भी शादी हो रही है। एक कुत्ता, एक बिल्ली और एक दीदी शादीशुदा हैं। अब इससे क्या पता चलता है कि मान्यता-भंजक हैं, यह नए युग की आहट हैं। धर्म-चक्र प्रवर्तन चल रहा है ये। क्या पता, कुछ नहीं पता चलता। क्या पता चलेगा? कुत्ते-बिल्लियों को ही रेस्क्यू करा लो बस। मैं सोचना ही नहीं चाहता उस दिशा में।
असली बात है कि इंसान बने कि नहीं बने भीतर से। इंसान बन जाओ, उसके बाद जो करोगे, सब ठीक होगा।
पर इंसान बने बिना घुस गए हो लिव-इन में, तो कल क्या कर रहे हो वहाँ पर। कहीं जाकर कुछ नहीं है, वही पुराना कुत्ते-बिल्ली का खेल खेल रहे हो और क्या कर रहे हो।
मैं विवाह का समर्थक बनकर नहीं बोल रहा। यह इल्ज़ाम मत लगा देना, छी! मैं नहीं कह रहा हूँ कि कूद-कूद के जाओ और ब्याह रचाना शुरू कर दो। तुम ब्याह करो कि नहीं करो, मुझे धेले का फ़र्क़ नहीं पड़ता, मेरा रिश्ता गीता से है। मैं ज्ञान की बात कर रहा हूँ, ज़िंदगी में उसको आने दो पहले।
हाँ, आपकी ज़िंदगी में कोई आता हो ज्ञान लेकर के, आप कहें, मुझे इसकी संगति चाहिए और वह संगति एक रिश्ता बन जाए; ठीक है, चलने दो। शायद रिश्ते को जीवन में प्रवेश भी इसी द्वार से करना चाहिए। पर फिर वहाँ पर केंद्रीय स्त्री या पुरुष नहीं होगा, वहाँ पर केंद्रीय ज्ञान होगा। वहाँ आपका पहला रिश्ता आदमी औरत से नहीं होगा, ऊँचाई और आज़ादी से होगा। तुम मेरी ज़िंदगी में इसीलिए हो, क्योंकि तुम मेरे लिए आज़ादी लेकर आए हो। ठीक है, अब हमारा साथ हो गया, संगत बन गई। अब ये अच्छी बात है, बढ़िया है। और तभी तक रहोगे भी ज़िंदगी में जब तक मेरे लिए मुक्ति के वाहक रहोगे, जिस दिन तुम मेरे लिए बंधन बनने लगे, चल फूट।
संगति हल्की चीज़ नहीं होती है, बहुत सोच-समझ करनी चाहिए। कोई सेक्सुअली अट्रैक्टिव है, इस आधार पर उसकी संगति कर लेना बहुत घाटे का सौदा होगा। मेरे बताने की बात नहीं है, आप जानते हो। जानते हो न? कौन-कौन जानता है? अध्यात्म संगति से क्यों तुम्हें रोकेगा, जीव हो तो संगति करोगे ही, प्रकृति में सब तत्त्व एक-दूसरे के साथ चलते हैं; कोई नहीं कहने जाता कि तुम त्याज्य हो, अस्पृश्य हो। यह कलम है, यह इस कागज़ की संगत कर रही है। यह द्रव्य है, यह इस मग की संगत कर रहा है। कर रहे हैं सब। संगति पर कोई वर्जना नहीं है, पर संगति का आधार ठीक रखो न।
एक आधार यह है कि समाज कह रहा है कि जाओ और फेरे ले लो, तो संगति बना ली। एक आधार यह है कि शरीर कह रहा है कि अब हॉर्मोन उबल रहे हैं, तो जाकर कोई लड़की-लड़का खोज लाओ, तो संगति बना ली। यह सब बहुत फ़िज़ूल आधार है। हाँ, बिल्कुल संभावना यही होती है, तुम लड़की हो तुम्हारे जीवन में कोई लड़का आएगा। पर किस आधार पर आ रहा है? वो आधार ही सब कुछ है। यूँ ही आ गया? टहलने निकला था तुम्हारे घर का दरवाज़ा खुला था तो घुस गया? ऐसे ही तो आते हैं हमारी ज़िंदगी में लोग। ऐसे ही आते हैं ना?
और आप किसकी संगति कर रहे हो इससे आपकी ज़िंदगी तय हो जानी है। अच्छे से समझ लो। ये रिवाज़, ये जात, ये पंडित, ये कुंडली, ये ताऊ और फूफी की बातें, इनके आधार पर रिश्ते नहीं बनाए जाते। और न ही कॉलेज में सबसे सेक्सी कौन है, यह देखकर लिव-इन किया जाता है।
अर्जुन को किसने बचा रखा है? श्रीकृष्ण की संगति ने। सोचो, कोई भी और वहाँ खड़ा होता, क्या होता? और अब सोचिए, आपके जीवन में आपको श्रीकृष्ण की संगति मिली होती, तो आपका क्या होता? और अर्जुन को भी संगति मिल गई होती किसी झुन्नू लाल की, तो गीता कभी नहीं आनी थी। क्या हो सकते थे आप और कहाँ हो सकते थे आप, यदि कृष्णों की संगति मिली होती आपको। श्रीकृष्ण जीवन की कीमत पर भी मिले, तो उनके पाँव पकड़ कर उनको जीवन में लाओ और खैनीबाज़ पैसे भी दे, तो भी उसको मार भगाओ। हमने ज़िंदगी में किसको भर रखा है? झुन्नूलाल खैनीबाज़ को।
कुछ आ रही है बात समझ में?
आज़ादी माने यह नहीं होता कि यही तो फ्रीडम है, आज इसके साथ लिव-इन करते हैं, दो महीने बाद उसके साथ लिव-इन करेंगे। यह कौन-सी आज़ादी है? और इसकी जो विपरीत चीज़ है, वो भी कौन-सी आज़ादी है कि अब हम जीवन भर बँध गए हैं एक के साथ, भले ही वो कोई भी हो। गांधारी बँध गई धृतराष्ट्र के साथ, तो ख़ुद भी अंधी हो जाएगी। न तो उसमें ना आज़ादी है और न आप लोग जो कर रहे हो लिव-इन के नाम पर कि बिन फेरे हम तेरे, चल भाई, बस रूम नंबर ही तो बदलना है, पहले 104 में चेक-इन करते थे, अब 110 में चेक-इन किया करते हैं। उसमें भी कोई आज़ादी नहीं है।
भीतर जब तक अज्ञान है, उच्छृंखलता हो सकती है, आज़ादी नहीं हो सकती।
जो लोग बहुत लालायित हो रहे हैं ज़िंदगी में किसी को लाने के लिए, मौसम जवान है, उनसे कह रहा हूँ, किसी को भी ज़िंदगी में लाने से पहले ज़िंदगी में सच्चाई को लेकर आओ। वह सच्चाई ही तुमसे सही चुनाव करवाएगी और सही संगत बनवाएगी। जिसकी ज़िंदगी में सच्चाई नहीं, वो हमेशा ग़लत साथी चुनेगा; फिर चाहे वह मैरिज हो, चाहे लिव-इन हो, चाहे कुछ भी हो।
यही बात उनसे कहूँगा जो ज़िंदगी में बच्चे लाने की अवस्था में हैं या योजना बना रहे हैं। दुनिया में बच्चे को लाने से पहले अपनी ज़िंदगी में सच्चाई लेकर आओ, वही बताएगी कि बच्चा क्या होता है और पाला कैसे जाता है।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।