भारत दुनिया के सबसे बीमार देशों में है, सबसे कुपोषित देशों में है। और कोई देश शादी, व्याह पर पर उतना नहीं खर्च करता, जितना भारत करता है, वेडिंग इंडस्ट्री कहीं उतनी बड़ी नहीं है, जितनी भारत में है। हमें सीधा-सीधा संबंध नहीं दिखाई दे रहा, हमारी दुर्दशा में और हमारे फ़िजूल खर्चों में? छोटा-मोटा फ़िजूल खर्चा नहीं है ये कि बस एक जाकर के कहीं से आप एक शर्ट खरीद लाए जिसकी आपको ज़रूरत नहीं थी। ये दुनिया में कोई नहीं करता। और ये हमें करने के लिए मजबूर किया जा रहा है ― पैसे के भौंडे प्रदर्शनों के द्वारा, ग्लैमर (ठाठ-बाट) दिखा-दिखाकर के और अरमान जगा-जगाकर के हमें मजबूर किया जाता है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, मेरा सवाल शादियों के ऊपर है। पिछले दो या तीन साल से देश में कुछ ऐसा माहौल बना है कि हर दूसरे महीने कोई-न-कोई बड़े सेलिब्रिटी (प्रतिष्ठित व्यक्ति) की शादी को खूब बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। और मैं देख रहा हूँ कि उसका एक प्रभाव मैंने अपने आसपास भी देखा है कि जिन लोगों की शादियाँ हो रही हैं उनके तरीके और रंग-ढंग सबकुछ बदल चुके हैं।
बात कुछ ऐसी होती है कि देखो उसने अपनी शादी में जो लहँगा पहना था, वैसा फ़लाने एक्टर (नायक) ने पहना था या फ़लानी एक्ट्रेस (नायिका) ने पहना था। और ये मतलब बड़ा अज़ीब सा देखने में लगता है कि जो बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज़ हैं उनकी शादियों के बारे में हमें मीडिया से खबर मिलती हैं ― ‘कौन मेहमान आए, क्या-क्या इवेंट्स (आयोजन) हुए, कैसे हुआ, कैसे नहीं हुआ।’ और उसी की एक छोटी फ़र्स्ट कॉपी देखने को मिलती है अपने आसपास के लोगों में।
तो कभी-कभार मैं समझ नहीं पाता हूँ कि एक आम भारतीय जो महँगी और बड़ी-बड़ी शादियाँ होती हैं इनके लिए इतना मरता क्यों है?




