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विवाह में तुम पति या पत्नी नहीं चुनते, अपने लिए संगति चुनते हो || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, ज़िम्मेदारी कैसे पूरी करूँ? मम्मी-पापा कुछ और कहते हैं और मैं कुछ और चाहती हूँ। ये भी पता है कि वो ठीक हैं अपनी जगह पर, फिर भी मेरा मन नहीं मान रहा। इसीलिए घरवालों से कुछ समय लिया है, पर अब ऐसा लग रहा है कि समय भाग रहा है और मैं वहीं हूँ, कुछ भी कर नहीं पा रही हूँ। ऐसी स्थिति में क्या करूँ कि कोई रास्ता नज़र आये और सब ठीक हो जाये? क्योंकि मेरे लिए घरवालों की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है। पर फिर दूसरी तरफ़ ऐसा लग रहा है कि ये रास्ता मेरा नहीं है। कृपया मार्गदर्शन करो, आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: मैं क्या मार्गदर्शन करूँ? मार्गदर्शन तो तुम करवा आयी हो। जितनी हिन्दी पिक्चरों के डायरेक्टर (निर्देशक) हैं, सब तुम्हारे मार्गदर्शक हैं। ये पढ़ रहा हूँ और ‘कभी खुशी कभी गम’ बज रहा है। (व्यंग करते हुए) ‘मेरे लिए मेरे घरवालों की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है’, ज़रूर!

मेरे चहेरे पर क्या लिखा है? नाम है मेरा आचार्य प्रशांत, समझी? इतनी आसानी से बुद्धू बना लोगी? ‘मम्मी-पापा कुछ और कहते हैं और मैं कुछ और चाहती हूँ।’ ये जो ‘कुछ’ है उसका नाम भी नहीं ले रही। इतनी मीठी चीज़ है? इतना बड़ा खजाना है कि सबसे छुपा रही हो? नाम तो उसी का नहीं लिया जाता जिसको या तो बहुत सम्मान देते हैं या जो नामातीत होता है। परमात्मा का कोई नाम नहीं होता। ये कौन है जिनका तुम नाम भी नहीं लेना चाहतीं? सारा खेल तो सवाल से ही खुल गया न!

प्र: शादी।

आचार्य: शादी! जैसे रसगुल्ला बट गया हो, बोला ही इतनी मिठास से। तुम्हें क्या लग रहा है, तुम बच जाओगी?

प्र: शादी की बात चल रही है।

आचार्य: क्या कह रहे हैं माताश्री-पिताश्री? कर लो या ये कह रहे हैं कि न करो?

प्र: कर लो।

आचार्य: कर लो। तुम क्या कह रही हो?

प्र: नहीं करनी।

आचार्य: ये तो हर लड़की कहती है शुरू-शुरू में। तुमने नया क्या बोला? ये तुम अपनी शर्माहट, अपनी ब्लशिंग (शर्माना) देखो। तुम तो अभी से विवाहिता हो। तैयारी, ट्रैनिंग (प्रशिक्षण) पूरी है बिलकुल। ऐसे ही तो शर्माना होता है। जब इतना कुछ सीख लिया है, तो आगे के कामों से कैसे बच जाओगी? छोटी बच्ची पैदा होती है, उसे पता होता है कैसे शर्माना है? जिन्होंने तुम्हें सिखा दिया यूँ शर्माना, उन्होंने जो बाक़ी बातें सिखायी हैं वो भी तुमने सीख ही ली होंगी, तुम्हें अनुपालन करना पड़ेगा।

ये लज्जा, ये शर्म, तुम्हें क्या लगता है इनमें कोई सौन्दर्य है? यही वो ज़ंजीरें हैं जिससे औरत जकड़ी जाती है। तुममें दुख थोड़े ही उठा? तुम तो भावविभोर हो गयी और तुम ही नहीं, पूरा कक्ष। मैं और कोई बात बोल रहा था तो इतनी मुस्कान बिखरी थी कहीं? अब देखो! कौन बच सकता है?

पहला ही वाक्य कहता है, ‘आचार्य जी, ज़िम्मेदारी कैसे पूरी करूँ?’ ये तो बात अजीब है। किसने कह दिया कि ये ज़िम्मेदारी है? बताओ किस शास्त्र में लिखा है? मैं पढ़ना चाहता हूँ। किसने कह दिया ज़िम्मेदारी है? किस चीज़ को विवाह कहती हो? मुझे समझाओ, मैं थोड़ा नासमझ आदमी हूँ। मैं नहीं जानता हूँ, मुझे बताओ, ‘किसको विवाह कहते हो?’

मैं सत्य जानता हूँ, परमात्मा जानता हूँ, मैं प्रेम जानता हूँ, आनन्द जानता हूँ, मैं मुक्ति जानता हूँ, सरलता जानता हूँ। मुझे विवाह समझाओ क्या होता है। मैंने किसी उपनिषद् में इस नाम का शब्द पढ़ा नहीं। मैं जानना चाहता हूँ कि ये ज़िम्मेदारी कैसे हो गया। मूढ़-मना हूँ, मुझे तो इतना पता है कि जो पैदा हुआ है, उसकी एक ज़िम्मेदारी होती है, मुक्ति। ये पचास ज़िम्मेदारियाँ कहाँ से आयीं? जवाब दो!

ये क्या है, विवाह क्या है? ये प्रश्न ही दिमाग में नहीं आता न? और मैं ख़िलाफ़ नहीं हूँ विवाह के। मैं बेवकूफ़ी के ख़िलाफ़ हूँ, मैं मूढ़ता ख़िलाफ़ हूँ। विवाह कुछ होता होगा, अच्छा-बुरा, मुझे नहीं पता। मुझे समझाओ, ‘विवाह क्या होता है?’ ज़िम्मेदारी कैसे हो गया? और ख़ासतौर पर ऐसा विवाह जो मम्मी-पापा के कहने से किया जाये, ये क्या है?

प्र: आचार्य जी, मन नहीं मान रहा है शादी के लिए।

आचार्य: तो ज़िम्मेदारी कैसे हो गयी, तुमने शुरू में ही कैसे लिख दिया कि ज़िम्मेदारी है?

प्र: घर में कईं चीज़ें कहते हैं कि यदि तुम ऐसा नहीं करोगी तो लोग क्या कहेंगे, हम किसी को क्या जवाब देंगे, ये तो तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।

आचार्य: तुम कुछ हो या जितनी हो बस लोगों के लिए हो? कुछ निजी है तुम्हारा? विवाह का मतलब जानती हो क्या होता है? किसी दूसरे व्यक्ति की निरन्तर संगति को स्वीकार कर लेना। दिन-रात सिखाता रहता हूँ कि एक चीज़ है अगर जो आदमी के पूरे जीवन का फ़ैसला कर देती है, वो है संगति। तुम जिसके साथ रह रहे हो, तुम वही हो जाओगे। तुम किसके साथ रहने जा रही हो ज़िन्दगी भर के लिए, या कम-से-कम कुछ सालों के लिए? और क्यों? कैसे चुना तुमने? जवाब तो दो!

पहली बात तो ये देखो कि संगति आवश्यक है। आदमी के भीतर अधूरेपन का भाव होता है। आदमी को कुछ तो चाहिए जिसके वो साथ हो सके। तो हम मानते हैं कि तुम्हें कोई चाहिए, संगति ज़रूरी है। हमारे भीतर अपूर्णता होती है और हमें हाथ पकड़ना है किसी का। किसका? और किन पैमानों पर तुम चुनते हो कि किससे विवाह करना है? बताओ मुझे।

पहली बात तो ये है कि स्त्री कहती है पुरुष की संगति चाहिए, पुरुष कहता है स्त्री की संगति चाहिए। वो भी स्त्री को जवान पुरुष की और पुरुष को जवान स्त्री की संगति चाहिए। तो सबसे पहले तो यहीं पर दिख गया कि तुमने किस आधार पर संगति चुनी है। तुमने किस आधार पर संगति चुनी है? तुम्हारा आधार है दैहिक सुख। तुम कहते हो, ‘जिसके साथ तुम सम्भोगरत हो सको, उसी की संगति करोगे।‘ है न? पहली बात तो ये है।

और उसमें भी तुम पचास बातों का और ख़याल कर देते हो। समाज ने कितना दबाव बनाया है? जिसके साथ जा रहे हो कमाता कितना है? उसकी जात क्या है? उसका धर्म क्या है? इस तरह से संगत चुनी जाती है? ऐसे तुम्हें तृप्ति मिल जाएगी? ऐसे मुक्त हो जाओगे? बोलो! जिसको तुम चुन ही देह देखकर रहे हो, वो दिन भर तुम्हारी देह नहीं नोचेगा? चलो ठीक है, सिर्फ़ देह देखकर नहीं चुन रहे हो वो तो मैं भी कह रहा हूँ, तुम पैसा भी देखते हो। तो ठीक है, देह नोचेगा पैसा दे देगा। ऐसे जीना है?

मुझे दो लोगों के साथ रहने में क्या आपत्ति हो सकती है, भली बात है। दो लोग साथ हैं और साथ रहने के लिए अगर तुमने कुछ रस्में भी निभा ली तो चलो ठीक है, चलेगा। तुम्हें एक रात का स्वाँग करना तो तुमने कर लिया। आग ली, उसके चक्कर काट लिये इर्द-गिर्द, ये सब भी तुम्हें करना था कर लिया, चलो कोई अपराध नहीं हो गया। कर डालो, ये सब भी कर डालो। तुम्हें सौ लोगों को दावत देनी थी, दो हज़ार लोगो को दावत देनी थी, तुमने दावत भी दे ली, चलो वो भी कोई बात नहीं। वो रात तो बीत जाएगी न और उसके बाद क्या बचेगी तुम्हारे पास? संगति।

तुम मुझे बताओ तुम किसकी संगति कर रहे हो और क्यों? ऐसा तो है नहीं कि शादी की रात के साथ शादी का खेल भी ख़त्म हो गया या ख़त्म हो गया? उसके बाद तो खेल शुरू होता है। घर तो ले आये हो, अब उसके साथ जीना भी पड़ेगा। कैसे जियोगे? समझाओ मुझे। समझाओ कैसे जियोगे? पर बड़े ताज्जुब की बात है कि सब जी लेते हैं। पर मुझे शक है कि वो जी ही नहीं रहे हैं।

किसी राधा को किसी कृष्ण की संगत मिलती हो, मैं होता कौन हूँ आपत्ति करने वाला? पर तुम हो राधा जैसे? तुममें है कृष्ण की तलब? बोलो! सीता राम के साथ हैं, भरत राम की तरफ़ भागते हैं, ये मीठी संगति है। मरदाना निरन्तर लगा ही रहा नानक देव के साथ, ये सुन्दर संगति है। इसमें कभी हो सकता है कि जो जोड़ा बने, उसमें एक स्त्री हो एक पुरुष हो, वो बात संयोगवश होगी, आवश्यक नहीं होगी। भाई, जब हम ये शर्त नहीं लगा सकते कि सुसंगति का अर्थ है कि एक आदमी हो और एक औरत हो, तो फिर हम ये भी शर्त नहीं लगा सकते कि ज़रूरी है कि स्त्री से दूर रहो या पुरुष से दूर रहो।

तुम्हें जहाँ सच्चा प्रेम मिल जाये, तुम्हें जहाँ परमात्मा मिल जाये, तुम वहाँ हो लो। पर क्या तुम शान्ति की ख़ातिर, परमात्मा की ख़ातिर साथी का चुनाव करते हो? तुम ऐसे तो नहीं करते न? यहाँ तो पुरुषों और पुरुषों के भी जोड़े घूम रहे हैं। स्त्रियों और स्त्रियों के भी जोड़े घूम रहे हैं, पर ऐसा तो नहीं है कि उन्होंने किसी और पैमाने पर चुनाव किया। चुनाव उन्होंने भी कामवासना के पैमाने पर ही किया है। इसीलिए कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई जोड़ा होमो-सेक्चुअल (समलैंगिक) है या हेटरो-सेक्चुअल (विषमलैंगिक)। तुमने किसी को भी चुना हो, चुनाव का आधार तो एक ही था न, क्या? शरीर, वासना। ये आधार तुम्हें कहाँ ले जाएगा? मुझे बताओ।

देह वैसे ही हर तरीक़े से अपना एहसास कराती रहती है और ख़ासकर स्त्री को। वो एहसास कराती ही रहती है, ‘मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ।’ और फिर तुम जीवन में कोई ले आओ जो दिन-रात तुम्हें ऐसे ही देखे जैसे कि तुम एक देह हो, तो जी लोगी? पर अजीब बात है औरतें जियें भी जाती है! कैसे जियें जाती हैं, वही जानें।

हाँ, बात ज़रा भद्दी न लगे, बिलकुल ही बेढंगी न लगे, तो इसके लिए ऊपर-ऊपर सभ्यता का, संस्कृति का ढोंग किया जाता है। दिखाया यूँ जाता है जैसे कि मात्र कामवासना का ही रिश्ता नहीं है, बौद्धिक रिश्ता भी है। हम बातचीत भी करते हैं, हम साथ घूमते-फिरते भी हैं।

पर मैं तो एक सवाल पूछ रहा हूँ, ‘तुम्हारे रिश्ते से अगर आज सम्भोग को निकाल दे तो रिश्ता बचेगा क्या?’ बूढ़े लोगों से नहीं पूछ रहा, उनके लिए तो ये सवाल अब व्यर्थ है। मैं जवान लोगों से पूछ रहा हूँ जो अभी पच्चीस के हैं, पैंतीस के हैं। वो एक चीज़ बताओ जो तुम्हारे रिश्ते से निकाल दी जाये तो रिश्ता तत्काल ढह जाएगा।

अदालतें भी कहती हैं कि अगर पति-पत्नी छः महीने तक शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना रहे तो तलाक़ दिया जा सकता है। अदालत भी जानती है कि पति और पत्नी के रिश्ते की बुनियाद में शरीर है। पूछो तो वो कहेंगे तुमसे कि विवाह को वैध माना ही तब जाता है, जब सन्सर्ग हो जाये शारीरिक, कंज़्यूमेशन ऑफ़ मैरिज कहते हैं उसको। उससे पहले मानते ही नहीं है कि शादी अभी हुई। शादी तो तब हुई जब सम्भोग हुआ, नहीं तो हुई ही नहीं। और ये बात अदालत कहती है, विधि कहती है तुम्हारी, तुम्हारा कानून कहता है और समाज भी जानता है।

कहीं पर हो रहा हो विवाह और दोनों पक्षों को तुम पकड़कर बोलो, ‘पूरा आशीर्वाद है हमारा तुम्हें और चलो फटाफट दोनों ब्रह्मचारी हो जाओ, शपथ ले लो यहीं पर कि ब्रह्मचारी ही रहेंगे’, फिर देखो क्या होता है। बाक़ी बातें बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। तुम जो चुनाव करते हो, उसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है शरीर। बाक़ी बातें भी है पर उनका महत्व कम है।

प्र२: आचार्य जी, जिसने कर लिया उसका क्या होगा?

आचार्य: क्या कर लिया है?

प्र: विवाह।

आचार्य: माने क्या? मैं तो पूछ ही रहा था मुझे समझाओ, क्या?

प्र: आचार्य जी, ये तो खेल ही यही है।

आचार्य: अरे, क्या किया है? ये तो बताओ।

प्र: सारे पैमाने ही यही है। आपने जो भी बताया, वही पैमाने चलते हैं समाज में।

आचार्य: बिलकुल बच्चे की तरह बताओ सीधे-सीधे सरल, मैं नासमझ आदमी हूँ।

प्र: शादी करी है।

आचार्य: हाँ, वो क्या है? क्या कर लिया है?

प्र: सम्बन्ध बना लिया है।

आचार्य: तो उसको सुधार लो। अगर सम्बन्ध को विवाह कहते हो तो सम्बन्ध सुधार लो, फिर तो मीठी बात है। एक आदमी एक औरत साथ-साथ है इसमें, फिर कह रहा हूँ, मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। मुझे आपत्ति है उस रिश्ते की दुर्गन्ध से, उस रिश्ते को ख़ुशबूदार बना लो फिर सब बढ़िया है।

और तुम ग़ौर से देखना, तुम किसको कहते हो विवाह? सात चक्कर लिए थे ऐसे (हाथ से गोल-गोल घुमाकर दिखाते हुए) गोल-गोल घूमकर उसको विवाह कहते हो? तो मैं कहूँगा उल्टे चक्कर ले लो। अगर यही विवाह है कि ऐसे-ऐसे (घड़ी की दिशा में) घूमे, तो ऐसे-ऐसे (घड़ी की विपरीत दिशा में) घूमने से विवाह ख़त्म।

‘विवाह माने क्या?’ ये सवाल ही नहीं पूछते न? बस विवाहित कहलाते हैं।

‘हाँ, हमारी भी हो गयी। एक काम और पूरा हुआ।’

‘हो गयी?’

‘हाँ, हमऊँ कर आये।’

‘क्या कर आये?’

वो नहीं पूछेंगे कभी। क्या है ये? वो नहीं पूछेंगे।

वैसे तो बहुत लजाती हो और मम्मी-पापा किसी को लाकर दे देंगे और चढ़ बैठेगा, तब लाज नहीं आएगी? और ये बात मुझे कभी भारतीय लड़कियों के बारे में ठीक-ठीक समझ आयी नहीं। इतनी लज्जाशीलता, इतनी लज्जाशीलता कि वो सिर्फ़ किसी अनजाने पुरुष के सामने ही खुलेंगी। जीवन भर जिन लड़कों को जाना उनके सामने शर्माती रहीं और कोई बिलकुल अनजाना लड़का आएगा, उसके सामने सब द्वार-दरवाज़े खुल जाने हैं। ये तो अजीब बात है! ये शर्मीली कुछ राज़ रखती है!

तुम कॉलेज में पढ़ती हो, तुम्हारे साथ के संगी-साथी आकर तुम्हें छू लें, तुम्हारा हाथ पकड़ लें; तुम थप्पड़ मार दोगी। कहोगी, ‘अभद्रता करता है।’ जबकि तुम उन्हें जानती हो, साथ के हैं, दोस्त भी कह सकती हो। उनसे सालों का परिचय है। वो हाथ पकड़ ले तो? थप्पड़ और मम्मी-पापा लाकर के कोई रख देंगे — जय राम जी की!

मैं अराजकतावादी नहीं हूँ। मुझे संस्थाएँ तोड़ने में कोई रस नहीं है। मैं नहीं कह रहा हूँ कि विवाह की संस्था टूट जाये, परिवार की संस्था टूट जाये। पर मैं समझना चाहता हूँ कि संस्थाएँ जैसी चल रही हैं, तुम उन्हें वैसा ही चलाए रखने में उत्सुक क्यों हो। ख़ासतौर पर अगर तुम्हें दिख रहा हो कि इन संस्थाओं से तुम्हें दुख बहुत मिलता है। तुम बदल क्यों नहीं सकते? तुम सुधर क्यों नहीं सकते? तुम बेहतर क्यों नहीं हो सकते? इंसान का इंसान से रिश्ता उन्नत क्यों नहीं हो सकता?

कर लेना विवाह, पर पहले इस प्रश्न का साफ़-साफ़ उत्तर ढूँढ लो, ‘विवाह क्या है?’ और तुम्हारे उत्तर में ‘समाज’ शब्द जितना कम आये, उतना अच्छा। ‘एक व्यक्ति के लिए विवाह क्या है?’ इस सवाल का जवाब ढूँढना। ‘एक इंसान के लिए विवाह माने क्या?’ अगर वो स्पष्टता है तुम्हारे पास, अगर वो समझदारी है तुम्हारे पास तो उसके बाद तुम जो भी करोगे, ठीक होगा। कर लेना शादी या नहीं करना, मर्ज़ी तुम्हारी। नासमझी में जो कुछ भी करोगे वो भारी पड़ेगा।

समझदार शादी भी कर ले जाये तो क्या फ़र्क पड़ता है। यहाँ जिन महाशयों की तस्वीरें लगी हैं, इनमें से कुछ शादीशुदा भी थे (पीछे दीवार पर लगीं सन्तों की तस्वीरों की ओर इशारा करते हुए)। शादीशुदा थे और मस्त थे, और बहुत सारे बुद्धू घूम रहे हैं कुँवारें भी। कुँवारें होने से वो बुद्ध थोड़े ही हो गये। कितने कुँवारें तो यहाँ बैठे हैं। तो? तुम (प्रश्नकर्ता) भी कुँवारी ही हो।

होश, जिज्ञासा। साफ़-साफ़ पूछना सीखो। किसी भी निर्णय में उतरने से पहले स्पष्टता माँगो, ‘ये क्या है और क्यों है?’ निर्णय का केन्द्र एक ही होता है। विवाह को लेकर के अगर हम अन्धेरे में रहते हैं, नासमझ रहते हैं तो इसलिए क्योंकि हम जीवन के प्रत्येक विषय में अन्धेरे में हैं। ‘किसकी संगत करनी है’ अगर हम ये चुनाव ठीक से नहीं कर पाते तो वो इसलिए क्योंकि हमने अपने बाक़ी चुनाव भी ठीक नहीं किये होते हैं।

किसी ने अपने लिए स्त्री या पुरुष ठीक चुना है या नहीं, ये जानना हो तो बस ये देख लो कि उसने अपने लिए शर्ट ठीक चुनी है या नहीं। चुनने वाला तो एक ही है न। जब तुम ठीक नौकरी चुनना नहीं जानते तो तुम ठीक स्त्री या पुरुष कैसे चुन लोगे? तो कोई ये न कहे कि मैंने बाक़ी सब चुनाव तो गड़बड़ किये, एक चुनाव ठीक किया।

और अगर कोई ये कहेगा कि एक चुनाव ठीक किया तो फिर वो साथ-ही-साथ ये भी दावा कर रहा है कि मेरे जीवन के सारे ही चुनाव ठीक हैं, सतर्क रहना। चुनने वाला एक है, कर्ता एक है। सजगता समग्र होती है। जो सही शब्द नहीं चुन सकता, जो सही समय नहीं चुन सकता, जो सही वाहन नहीं चुन सकता, मुश्किल ही है कि वो कुछ भी सही चुन पाये।

अध्यात्म इसीलिए होता है कि जो तुमने चुना हो, उसकी बात ही न की जाये, चुनने वाले को ही बदल दिया जाये। अधिक-से-अधिक तुम्हारी रुचि इसमें होती है कि ये चुनूँ, कि ये चुनूँ, कि ये चुनूँ, कि ये चुनूँ। अध्यात्म इस प्रश्न की उपेक्षा करता है। वो कहता है, ‘हटाओ कि ये चुनूँ, कि ये चुनूँ, कि ये चुनूँ; चुन लेना जो चुनना होगा, हमें दिखाओ चुन कौन रहा है। हमें दिखाओ चुनने वाला कौन है। क्योंकि अगर वो ठीक है तो ठीक ही चुनेगा और सबकुछ ठीक चुनेगा। और अगर वो ठीक नहीं है तो सबकुछ ही ग़लत चुनेगा। हमें बताओ कि चुनाव कौन कर रहा है।’

अध्यात्म कर्ता को ही विगलित कर देता है। अध्यात्म तुम्हारे सारे निर्णय बदल देता है, क्योंकि निर्णेता ही बदल जाता है। मुझे बताओ निर्णेता ठीक है क्या? और निर्णेता ठीक है या नहीं, इसका निर्धारण तुम्हारे जीवन पर एक समग्र दृष्टि डालकर हो जाएगा।

प्र: आचार्य जी, आपने एक सत्र में ये भी बताया था कि निन्यानवे प्रतिशत लोग तो जो चुनेंगे ग़लत ही चुनेंगे। एक प्रतिशत ही लोग ऐसे हैं जो सन्तों में आते हैं, वो जो भी चुनाव करें, वो सही ही है।

आचार्य: आपको कहाँ होना है? ये बात मुझे बड़ी अजीब लगती है! बच्चों को बोलते हैं, ‘आइआइटी जाओ’ और बच्चा बोल दे, ‘निन्यानवे प्रतिशत लोग तो जा ही नहीं सकते।’ तब तो उनसे कहते हैं, ‘नहीं बेटा, तुम्हें तो एक प्रतिशत में होना है। तुम्हें तो प्रतियोगिता में अव्वल आकर दिखाना है।’ और वो भी यही बोल दे, ‘अरे, प्रकृति की बात है, निन्यानवे प्रतिशत मूढ़ ही होते है।’ तब? बोलो!

जब अपनी बात आती है, तब कह देते हो कि क्या करे सब तो ग़लत ही चुनते हैं। तुम बताओ, तुम्हें सही चुनना है या ग़लत चुनना है? सबको छोड़ो, सब तो यहाँ (सत्र में) आयें भी नहीं न? तुम यहाँ आये हो। जैसे यहाँ आने का चुनाव कर सकते हो बिना ये देखे कि कितने लोग आएँगे, वैसे ही सही चुनाव करो, बिना ये देखे कि कितने लोग सही चुनाव करते हैं।

दो तरह के लोग होते हैं। कुछ यहाँ इसलिए आने का चुनाव करते हैं क्योंकि औरों ने भी यहाँ आने का चुनाव किया। तो उन्हें बड़ी खुशी होती है उस दिन, जिस दिन यहाँ बहुत भीड़ होती है। वो कहते हैं, ‘हमने ठीक ही चुनाव किया होगा, हम पहुँचे वहाँ अस्सी लोग और थे।’ क्योंकि उनके सही और ग़लत की परिभाषा ही यही होती है कि अगर औरों ने भी चुना, तो ठीक ही चुना होगा। और दूसरे होते हैं, ‘उन्हें सबसे ज़्यादा खुशी उस दिन होती है, जिस दिन यहाँ कोई नहीं होता।‘ वो कहते हैं, ‘आज आचार्य जी से पूरा ध्यान हमें ही मिलेगा।’ बताओ जीता कौन?

अपनेआप को देखो। अगर इस बात पर खुश हुए जा रहे हो कि यहाँ अस्सी लोग और हैं, तो ये कोई मज़ेदार बात नहीं हुई। तुम ये कि देखो तुम्हारे लिए क्या सही है। तुम्हारे लिए तो यही सही है कि यहाँ तुम्हारे अलावा कोई न हो। सोचो कैसा मज़ा आएगा? तुम हो और हम हैं! निन्यानवे लोग नहीं है, बस एक है। कौन? तुम। तो निन्यानवे की बात नहीं करनी।

अच्छा हो कि उस रास्ते पर न चलो जिस रास्ते पर निन्यानवे हैं, भीड़ कम मिलेगी। और निन्यानवे वैसे भी सही रास्तों पर होते नहीं, तुम्हीं ने कहा। तो इसका मतलब है कि सही रास्तों पर दो तरफ़ा फ़ायदा होता है। पहला तो ये कि वो रास्तें सही हैं और दूसरा ये कि भीड़ नहीं मिलती। ये तो मज़ेदार बात है! इसी को तो वरदान कहते हैं। सही रास्ते पर भीड़ नहीं मिलती और जिस रास्ते पर भीड़-ही-भीड़ मिले, जान लेना की ग़लत ही होगा।

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