विवाह में तुम पति या पत्नी नहीं चुनते, अपने लिए संगति चुनते हो || आचार्य प्रशांत (2018)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, ज़िम्मेदारी कैसे पूरी करूँ? मम्मी-पापा कुछ और कहते हैं और मैं कुछ और चाहती हूँ। ये भी पता है कि वो ठीक हैं अपनी जगह पर, फिर भी मेरा मन नहीं मान रहा। इसीलिए घरवालों से कुछ समय लिया है, पर अब ऐसा लग रहा है कि समय भाग रहा है और मैं वहीं हूँ, कुछ भी कर नहीं पा रही हूँ। ऐसी स्थिति में क्या करूँ कि कोई रास्ता नज़र आये और सब ठीक हो जाये? क्योंकि मेरे लिए घरवालों की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है। पर फिर दूसरी तरफ़ ऐसा लग रहा है कि ये रास्ता मेरा नहीं है। कृपया मार्गदर्शन करो, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: मैं क्या मार्गदर्शन करूँ? मार्गदर्शन तो तुम करवा आयी हो। जितनी हिन्दी पिक्चरों के डायरेक्टर (निर्देशक) हैं, सब तुम्हारे मार्गदर्शक हैं। ये पढ़ रहा हूँ और ‘कभी खुशी कभी गम’ बज रहा है। (व्यंग करते हुए) ‘मेरे लिए मेरे घरवालों की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है’, ज़रूर!
मेरे चहेरे पर क्या लिखा है? नाम है मेरा आचार्य प्रशांत, समझी? इतनी आसानी से बुद्धू बना लोगी? ‘मम्मी-पापा कुछ और कहते हैं और मैं कुछ और चाहती हूँ।’ ये जो ‘कुछ’ है उसका नाम भी नहीं ले रही। इतनी मीठी चीज़ है? इतना बड़ा खजाना है कि सबसे छुपा रही हो? नाम तो उसी का नहीं लिया जाता जिसको या तो बहुत सम्मान देते हैं या जो नामातीत होता है। परमात्मा का कोई नाम नहीं होता। ये कौन है जिनका तुम नाम भी नहीं लेना चाहतीं? सारा खेल तो सवाल से ही खुल गया न!
प्र: शादी।
आचार्य: शादी! जैसे रसगुल्ला बट गया हो, बोला ही इतनी मिठास से। तुम्हें क्या लग रहा है, तुम बच जाओगी?



