आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं विवाह के मूल में, ग़ौर से समझिएगा। जो पहली बात है वो दैहिक है, प्राकृतिक है। एक उम्र आते ही पुरुष को स्त्री के साथ और स्त्री को पुरुष के साथ रहने की इच्छा उठने लगती है। यह जो इच्छा है यह पूरे तरीक़े से शारीरिक होती है, इसीलिए किसी भी देश का, धर्म का, जाति का, वर्ण का पुरुष हो, उसे यह इच्छा उठती-ही-उठती है। यहाँ तक कि अगर वो अपंग भी हो, बुद्धिहीन भी हो तो भी उसे यह इच्छा उठेगी ही। यही बात स्त्री पर है, किसी देश की, किसी धर्म की, किसी वर्ण की, कैसी भी स्त्री हो, उसे भी यह इच्छा उठने ही लगती है।
तो जब फ़र्क ही नहीं पड़ता कि आपकी सामाजिक स्थिति कैसी है, आपकी आर्थिक स्थिति कैसी है, आपमें विद्वत्ता कितनी है, आप पढ़े-लिखे कितने हो, यह इच्छा उठनी-ही-उठनी है तो इसका सम्बन्ध फिर निश्चित रूप से किसी ऐसी चीज़ से नहीं हो सकता जो मानसिक है, क्योंकि मन की तो सबकी सामग्री अलग-अलग होती है न। कोई खूब पढ़-लिख गया है, न जाने कितनी किताबें पी ली हैं उसने, उसके मन की सामग्री और कोई अनपढ़ है बेचारा, इन दोनों के मन की सामग्री तो बिलकुल अलग-अलग होगी। लेकिन फिर भी हम पाते हैं कि कामवासना दोनों में ही निश्चित रूप से मौजूद होती है। इसका मतलब मन की सामग्री से कामवासना का बहुत कम लेना-देना है।
तो स्त्री और पुरुष को साथ रहना है, उसका पहला कारण प्राकृतिक है। और चूँकि प्राकृतिक है इसीलिए यह इच्छा आप पशुओं में भी पाते हैं, पेड़ों में भी पाते हैं, नन्हें पौधों में भी पाते हैं, छोटे-से-छोटे कीट-पतंगों में भी पाते हैं, नन्हें जीवों और जीवाश्मों में भी पाते हैं, पाते हैं न? तो इसका मतलब अगर शरीर है, तो शरीर की संरचना में ही यह निहित है कि पुरुष आकर्षित होगा स्त्री की ओर, स्त्री आकर्षित होगी पुरुष की ओर। और इस आकर्षण का अन्ततः जो परिणाम निकलता है वो होता है सन्तानोत्पत्ति।
ये बात हमारे बुज़ुर्गों ने देखी, पुरखों ने देखी और उन्होंने इस बात को समझा कि ये होता क्या है। उन्होंने कहा, ‘फ़र्क ही नहीं पड़ता कि हम किसी को कितना ज्ञान दे दें, कितनी यात्राएँ करा दें, कितना अनुभव दे दें और फ़र्क ही नहीं पड़ता कि कोई पुण्यात्मा है कि पापी है और फ़र्क ही नहीं पड़ता कि कोई अमीर है कि ग़रीब है और फ़र्क ही नहीं पड़ता कि कोई नाटा है कि लम्बा है कि कुरूप है कि सुरूप है, ये भावना तो सबमें ही विद्यमान है।’ तो उन्होंने कहा, ‘इससे लड़ा नहीं जा सकता, स्त्री-पुरुष के मध्य जो आकर्षण है इससे लड़ाई फ़िज़ूल है।’




