इंसान खिलौना नहीं, रिश्तों से ऐसे नहीं खेलते! || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2023)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। घरों में और समाज में डराया जाता है कि अगर आप अभी नहीं करोगे, अभी आपको लग रहा है कि क्योंकि जवानी में तो हर कोई आक्रोश दिखाता है, मना ही करता है। मगर ये बोलकर डराया जाता है कि अभी नहीं कर रहे हो, बाद में पछताओगे। बाद में मिलेगी नहीं, ढूँढोगे, पागलपन करोगे।
आचार्य प्रशांत: आप तो हो सकता है पछताओ, हो सकता है न पछताओ। और जो नहीं करते वो पछताते हैं, इसके प्रमाण बहुत कम हैं क्योंकि जिन्होंने नहीं करी, वैसे लोग ही बहुत कम हैं। वो तो आपको भविष्य के बारे में एक सम्भावना बताते हैं कि भाई, तुमने विवाह नहीं करा तो तुम पछताओगे। वो एक सम्भावना है जो हो भी सकती है सच और न भी हो लेकिन जिन्होंने करा है, उनसे पूछो कि तुम्हारी क्या हालत है, तुम कितना पछता रहे हो, अपनी तो बताओ। मेरी बात तो अभी सम्भावित है, प्रॉबेबलिस्टिक है, हो भी सकती है, नहीं भी हो सकती है लेकिन तुम बताओ न और तुम्हारे ही जैसे सब हैं, जो सब करके बैठे हैं। तुम अपने पछतावे की बात नहीं बताओगे क्या? तुम अपने पछतावे की बात नहीं बताओगे?
प्र२: इसमें आचार्य जी, अगर एक आम भारतीय की ज़िन्दगी देखी जाए तो उसमें कोई बहुत ज़्यादा रीडिंग या फिर स्पोर्ट्स या म्यूज़िक या जितनी भी और दूसरे अन्य सोर्स (स्रोत) होते हैं एक तरीक़े से प्लेज़र (आनन्द) के या हैप्पीनेस (खुशी) के, वो कहीं-न-कहीं मिसिंग (अनुपस्थित) रहते हैं। जिसकी वजह से आपके साथ जो भी; पहली बात तो आप एक व्यक्ति को तलाशते हो उस चीज़ की पूर्ति करने के लिए और अगर आपको कोई मिल भी जाता है, तो आप उसके ऊपर वो सारा बोझ डाल देते हो आपको वो चीज़ प्रोवाइड (पूर्ति) करने के लिए। तो मैं ये जानना चाहती हूँ कि भारतीय, हम लोग इतने इनवेस्टेड (निवेशित) क्यों हैं रिलेशनशिप्स (सम्बन्धों) में?






