आचार्य प्रशांत: जाओ किसी भी आम लड़के से पूछ लो वह किसलिए विवाह करता है। सम्मानजनक काम करने के लिए तो वह विवाह करता नहीं। वह काम सारे ऐसे ही करता है जो अगर वह विवाह के बिना कर दे तो तुम कहोगे — जलील, लुच्चे, लफंगे गायब हो जा यहाँ से।
तो तुम अपना जो सबसे जलील रूप हो सकता है वह पत्नी के सामने नंगा करते हो। करते हो न? दुनिया में और किसी को भले ही तुम्हारे बारे में गलतफहमी हो कि तुम बड़े सम्माननीय आदमी हो, तुम्हारी पत्नी को तो गलतफहमी नहीं हो सकती। उसने तुम्हारा निरा पशु रूप देखा है, जो न माँ ने देखा है, न बाप ने देखा है, दोस्त-यारों ने भी नहीं देखा।
हमारी जो हैवानियत हमारे जीवन की स्त्रियाँ देखती हैं, हमारे सेक्सुअल पार्टनर देखते हैं वह और कोई देखता है क्या? और उसके बाद तुर्रा यह कि साहब को इज़्ज़त चाहिए। सब काम-धाम निपटा कर खड़े हो गए हैं, डकार मारी और कह रहे हैं — अब हमें सम्मान से प्रतिष्ठित करो न।
सम्मान चाहिए तुम्हें! कुछ करा है ऐसा कि सम्मान देगी तुम्हें? और अगर तुम वास्तव में सम्मान के अधिकारी होते तो तुम्हें भूख क्यों बची होती सम्मान पाने की? सम्मान का जो पात्र होता है, यह उसका अनिवार्य लक्षण है कि वह किसी से भी सम्मान माँगना बंद कर देता है। उसे फर्क ही नहीं पड़ता कौन उसे सम्मान दे रहा है, कौन नहीं दे रहा है।
वह कहता है, "हम खुद को जानते हैं, हम खुद अपना निर्णय कर सकते हैं। इतनी ईमानदारी है हममें कि हम अपने-आपको ही साफ-साफ अपनी आँख से ही देख लें। जितना हमें पता है अपने बारे में, उतना दूसरे को तो नहीं पता होगा हमारे बारे में। दूसरे के सामने तो हम कुछ क्षणों के लिए आ जाते हैं, अपने साथ तो हम चौबीस घण्टे रहते हैं। तो हम कितने पानी में हैं, दुनिया में और किसी से ज़्यादा बेहतर हमें ही पता है अपने बारे में। तो हम निर्णय करेंगे न कि हम सम्मान योग्य हैं कि नहीं हैं। और अगर हमने निर्णय कर लिया कि हम हैं सम्माननीय तो दूसरे से क्या सम्मान माँगना?"




