न शरीर को मालिक बना लेना, न समाज को || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: अब मेरा रोज़ का देखना होता है कि मेरे पीछे कोई बल है, कोई फोर्स है जो मुझे संचालित करता है। जैसे मैं सुबह उठा और मैं ऑफ़िस की तरफ़ चल दिया। बैग लिया और चल दिया। तो एक डर है पीछे जो मुझे उधर जाने के लिए विवश करता है, क्योंकि मेरा वहाँ जाने का इच्छा नहीं रहता है, कहीं पर। और मैं देखता हूँ कि हर एक चीज़ में, छोटी-छोटी गतिविधि में मैं डरा हुआ रहता हूँ। अगर मैं डरा न हूँ तो मैं वो काम नहीं करूँगा।
आचार्य प्रशांत: देखो, जिन वजहों से तुम अपने ऑफ़िस को भाग रहे हो, जो ज़िम्मेदारियाँ और कर्तव्य तुम उठा रहे हो, थोड़ा ग़ौर करके देखना पड़ेगा कि वो सचमुच तुम्हारे कर्तव्य हैं भी कि नहीं। कर्तव्य माने ये निर्णय कि फ़लाना काम मेरे लिए करना ज़रूरी है। कर्तव्य माने ये फ़ैसला कि ये काम मुझे करना चाहिए, इसको कर्तव्य कहते हैं। फ़ैसला सही लिया है क्या?
तुम्हें कैसे पता कि जो काम तुम अपने लिए ज़रूरी समझ रहे हो, वो सचमुच ज़रूरी है? हम हर छोटी-छोटी चीज़ पर ज़िन्दगी में सम्भव है कि विश्लेषण कर जाऍं, लेकिन जो ज़िन्दगी के सबसे मूलभूत मुद्दे होते हैं उनका तो हम कभी परीक्षण, विश्लेषण करते ही नहीं। उनको तो हम मानते हैं, ‘ये तो है ही ऐसा!’ तुम्हें कैसे पता कि ये है ही ऐसा?
और अगर तुमने जो सबसे मूलभूत मुद्दे हैं, उनको ही बिना परखे बस मान लिया है तो अब बाक़ी छोटी-मोटी चीज़ों में बहुत परखने-खोजने से क्या मिलेगा तुम्हें? क्या मिलेगा? जिन बातों को तुम कह देते हो न, ‘पर ऐसा तो करना होता ही है’, वही बातें होती हैं जहाँ तुम्हारे बड़े-से-बड़े बन्धन होते हैं। उन्हीं बन्धनों से फिर डर आता है और पचास और चीज़ें हैं। क्यों स्वीकार कर रहे हो कि ऐसा तो करना होता ही है?
सबसे ज़्यादा ज़िन्दगी में मौज उनकी रहती है जो कुछ ऐसे काम नहीं करते जो करने होते ही हैं। सोचकर देखना! कुछ ऐसे काम जो करने होते ही हैं, उनको तुम न करो, फिर देखो ज़िन्दगी कैसी मस्त हो जाती है। पर हम कर्तव्य रूप में पकड़ लेते हैं। हम कहते हैं, ‘पर ये तो करना है ही, ये तो करना है ही!’ क्यों करना है, वो हमने कभी नहीं पूछा। बाक़ी सब दो कौड़ी की बातें हम दिन-रात पूछते हैं।



