प्रश्नकर्ता: मैं एक आध्यात्मिक संस्था से छः सालों से जुड़ा हुआ हूँ और आध्यात्मिक साधना का अभ्यास कर रहा हूँ। तीन साल तक ये साधना अच्छी चली लेकिन तीन साल पहले मेरी शादी होने के बाद मेरा ध्यान भटकने लगा।
मैंने शादी के जो सपने संजोए थे कि उच्चतम सुख की प्राप्ति होगी, चाहे वो शारीरिक हो या प्रेम हो, लेकिन ऐसा कोई सुख मुझे नहीं मिला। मुझे लगता है इसमें मेरी पत्नी का दोष हो सकता है जिससे मैं सन्तुष्ट नहीं हो पा रहा हूँ। शायद जिन्होंने विभिन्न शारीरिक सम्बन्धों का अनुभव किया है, वे उससे सन्तुष्ट हुए हो। ऐसे में मुझे ये भी खयाल आता है कि शायद मुझे भी इस तरह सन्तुष्टि मिल जाए, ताकि मैं अपनी साधना में फिर से ध्यान लगा सकूँ। लेकिन मैं अपनी पत्नी को धोखा नहीं देना चाहता हूँ।
तो मैं किस तरीके से सन्तुष्टि पा सकता हूँ जिससे मैं अपनी साधना और भक्ति में ध्यान केन्द्रित कर सकूँ?
आचार्य प्रशांत: पूरी बात समझनी होगी। सबसे पहले तो यह कि तुम साधना इत्यादि तो कर ही रहे थे तुमने कहा सब बढ़िया चल रहा था तीन साल तक। कह रहे हो छः साल से साधना कर रहा हूँ, कह रहे हो तीन साल तक सब बढ़िया चल रहा था फिर शादी हो गयी, अब इधर तीन साल से कुछ उलझन है, ऐसा ही?
और उलझन की वजह तुम बता रहे हो कि तीन वर्ष पहले तुमने शादी कर ली है उसके बाद से। छः वर्ष की साधना में पहले तीन साल अगर सब ठीक ही चल रहा होता तो तुम कोई ऐसा निर्णय क्यों करते जो तुम्हें उलझन देगा? ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि अभी तुम्हारा इरादा ये है कि तुम सेक्स इत्यादि से छुटकारा पा लो ताकि तुम पुनः अपनी पुरानी साधना के मार्ग पर जा सको। उस पुरानी साधना में अगर दम ही होता तो उस साधना के होते हुए भी, उस साधना के बावजूद तुम आज इस झंझट में, इस उलझन में क्यों फँसे होते?




