विदाई माने क्या? पिता का घर पराया कैसे? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2023)

प्रश्नकर्ता: गुड आफ़्टरनून सर, बहुत ही गंभीर चर्चा थी। इस एन.आर.आई. ड्रीम के ही बारे में कुछ प्रश्न है, पर थोड़ा अलग है। जैसा कि अभी शादियों का मौसम चल ही रहा है, तो मैं किसी शादी में गई हुई थी, और अचानक मैं स्तब्ध रह गई कि जो विदाई के गाने होते हैं वो कितने अजीब हैं।
एक बहुत ही प्रसिद्ध गाना है जो बहुत पुराना है, पर वो अभी तक चलता आ रहा है विदाई के समय पर। एक ‘दाता’ मूवी थी कोई उन्नीस सौ नवासी में, और उसका गाना है, ‘बाबुल तेरी बिटिया..’, कुछ-कुछ ऐसा ही। और उसके जो मुख्यत: बोल हैं, वो हैं कि बेटी अपने बाबुल की किसी और की अमानत है।
आचार्य प्रशांत: ‘बेटी घर बाबुल के, किसी और की अमानत है;’ खूब सुना है मैंने।
(श्रोतागण हँसते हैं)
प्र: ‘दस्तूर ये दुनिया का, हम सबको निभाना है।‘ और फिर दो हज़ार अठारह में एक मूवी आई थी ‘राज़ी’, जो वास्तव में एक बोल्ड गर्ल की कहानी थी। पर विडंबना ये है कि उसमें उसकी विदाई में ये बोल हैं कि फसलें जो काटी जाएँ, उगती नहीं हैं, बेटियाँ जो ब्याही जाएँ, मुड़ती नहीं हैं।
और ये गाने खूब चलते हैं, और जो थिंग अबाउट एन.आर.आई. ड्रीम, ये दुल्हन ही डिसाइड (निर्णय) करती है कि ये गाना बजेगा मेरी विदाई पर। और जब वो जा रही है तो सब भावुक हो रहे होते हैं क्योंकि पूरा माहौल ही ऐसा बनाया जाता है। सो कॉल्ड



