जो व्यक्ति अपने इतने निजी निर्णय दूसरों के दबाव में ले रहा हो, दूसरों से प्रभावित होकर ले रहा हो, वो तो पग-पग पर दूसरों का दबाव ही झेलेगा। और इसको हम कहते भी हैं न, "दूसरों के दबाव में आ जाना।" वो वास्तव में दूसरों का दबाव नहीं होता, वो अपने भीतर की कमजोरी होती है। तुम्हारे भीतर कमजोरी न हो, तो कोई दूसरा तुम्हें कैसे दबा लेगा।
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आचार्य प्रशांत: एक तो सरासर दुर्व्यवहार, तुमसे पूछे बिना तुम्हारा कहीं का टिकट कटा दें, तुम्हें कैसा लगेगा? तुम कहोगे, “अरे! नहीं ये कैसे कर दिया।” तुमसे पूछे बिना तुम्हें कपड़े पहना दिए जाएँ, तुम उसका भी विरोध कर दोगे। तुमसे पूछे बिना तुम्हारे मुँह में कुछ ठूँस दिया जाए खाने को, तुम उसका भी विरोध कर दोगे।
तुमने घर में अपनी छवि, अपने ब्रांड को ऐसा बना रखा है कि तुमसे पूछे बिना तुम्हारी शादी तय कर दी गई है। क्योंकि ये काम तो बहुत अद्भुत लोगों के साथ ही हो सकता है, किसी सामान्य आदमी के साथ तो यह दुर्घटना घटेगी ही नहीं कि उसे पूछे बिना उसका विवाह तय कर दिया गया। विवाह तय करने वाला भी एक बार को ख़ौफ़ खाएगा, कहेगा “ये मैं कर रहा हूँ, इसको पता चलेगा कि इसके पीछे से मैंने ऐसा गठबंधन निश्चित कर दिया है, तो बहुत मारेगा।”
ये छोटी-मोटी बात है? तुमसे पूछे बिना कोई तुम्हारा पजामा उठा ले जाए, तो बिगड़ जाओगे उस पर। तुमसे पूछे बिना कोई तुम्हारी चप्पल पहन ले, उससे भी बहस करोगे। यहाँ तुमसे पूछे बिना तुम्हारा पजामा उतारने का काम चल रहा है! तुम्हारा ब्रांड कैसा है? किस नाम से जाने जाते हो पूरे मोहल्ले में? ये बताओ। और ज़रूरी है कि मैं ये बातें तुम्हें अभी बोल दूँ, थोड़ा बहुत दुख होगा उससे तुम्हें अभ्यास हो जाएगा दुख झेलने का। क्योंकि आगे तो पूरी ज़िंदगी झेलना ही झेलना है, तो अभी से अभ्यास कर लो।




