
आचार्य प्रशांत: एक तो सरासर दुर्व्यवहार, तुमसे पूछे बिना तुम्हारा कहीं का टिकट कटा दें, तुम्हें कैसा लगेगा? तुम कहोगे, “अरे! नहीं ये कैसे कर दिया।” तुमसे पूछे बिना तुम्हें कपड़े पहना दिए जाएँ, तुम उसका भी विरोध कर दोगे। तुमसे पूछे बिना तुम्हारे मुँह में कुछ ठूँस दिया जाए खाने को, तुम उसका भी विरोध कर दोगे।
तुमने घर में अपनी छवि, अपने ब्रांड को ऐसा बना रखा है कि तुमसे पूछे बिना तुम्हारी शादी तय कर दी गई है। क्योंकि ये काम तो बहुत अद्भुत लोगों के साथ ही हो सकता है, किसी सामान्य आदमी के साथ तो यह दुर्घटना घटेगी ही नहीं कि उसे पूछे बिना उसका विवाह तय कर दिया गया। विवाह तय करने वाला भी एक बार को ख़ौफ़ खाएगा, कहेगा “ये मैं कर रहा हूँ, इसको पता चलेगा कि इसके पीछे से मैंने ऐसा गठबंधन निश्चित कर दिया है, तो बहुत मारेगा।”
ये छोटी-मोटी बात है? तुमसे पूछे बिना कोई तुम्हारा पजामा उठा ले जाए, तो बिगड़ जाओगे उस पर। तुमसे पूछे बिना कोई तुम्हारी चप्पल पहन ले, उससे भी बहस करोगे। यहाँ तुमसे पूछे बिना तुम्हारा पजामा उतारने का काम चल रहा है! तुम्हारा ब्रांड कैसा है? किस नाम से जाने जाते हो पूरे मोहल्ले में? ये बताओ। और ज़रूरी है कि मैं ये बातें तुम्हें अभी बोल दूँ, थोड़ा बहुत दुख होगा उससे तुम्हें अभ्यास हो जाएगा दुख झेलने का। क्योंकि आगे तो पूरी ज़िंदगी झेलना ही झेलना है, तो अभी से अभ्यास कर लो।
मेरे दो-चार कड़वे वचन चुभ रहे हों तो अच्छा है क्योंकि आगे तो पूरी ज़िंदगी चुभना है। आदमी के साथ दुनिया कैसा व्यवहार कर रही है, ये कुछ तो दुनिया पर निर्भर करता है, लेकिन बहुत कुछ आदमी पर निर्भर करता है। और बात सिर्फ़ शादी की नहीं है, निश्चित रूप से तुमने अपने घरवालों को, मोहल्ले वालों को, पूरी दुनिया को पर्याप्त कारण और प्रमाण दे रखे हैं अपने आप को बिल्कुल साबित कर रखा है कि “मैं झुनझुना हूँ, मुझे बजाओ।”
आज वो तुम्हारी शादी ज़बरदस्ती तय कर रहे हैं। कल वो पता नहीं क्या-क्या ज़बरदस्ती तय करेंगे तुम्हारा और करते ही होंगे, रोज़ करते होंगे। जिसको जान लिया जाए कि कमज़ोर है, उसका शोषण क्या सिर्फ़ एक तरीक़े से किया जाएगा या हर संभव तरीक़े से, रोज़-रोज़ किया जाएगा? जल्दी बोलो।
श्रोता: रोज़-रोज़ किया जाएगा।
आचार्य प्रशांत: तो बात इसकी भी नहीं है कि इस एक मसले में तुम्हारे साथ ज़्यादती क्यों हो रही है। तुम अगर घोंचू ही बने बैठे हो, तो तुम्हारे साथ तो हर मसले में ज़्यादती हो रही होगी, घड़ी-घड़ी हो रही होगी।
एक बार फिर से गौर करो, ये कितनी भयानक बात है कि तुम्हारा प्रणय-संबंध कोई और तय कर दे रहा है वो भी बिना तुम्हारी जानकारी के, अनुमति की तो बात ही छोड़ो। और दोनों तरफ़ से लड़की की तरफ़ से भी, तुम अगर उससे नहीं मिले हो तो वो भी तुमसे नहीं मिली होगी। पटेगी खूब दोनों में एक ही जैसे हो। ना तूने सिग्नल देखा, ना मैंने सिग्नल देखा। एक्सीडेंट हो गया, रब्बा रब्बा! परमानेंट हो गया, रब्बा रब्बा! दोनों में से कोई सिग्नल देखने को तैयार ही नहीं है।
प्रश्नकर्ता: पूछा तो था पर एक औपचारिक रूप से।
आचार्य प्रशांत: और तुमने औपचारिक रूप से (हाँ में सिर हिलाते हुए)।
प्रश्नकर्ता: नहीं मैंने काफ़ी विरोध किया पर उस समय…।
आचार्य प्रशांत: कैसे विरोध किया?
प्रश्नकर्ता: मतलब सर, सारी बातें बताईं मैंने, कि अभी नहीं करना चाहता शादी, ये, वो।
आचार्य प्रशांत: नहीं, अभी नहीं करना चाहता” या “अभी नहीं करूँगा।” ये “अभी नहीं करना चाहता” क्या होता है? सुबह प्रेशर बनता है तो बोलते हो, “मैं करना चाहता हूँ?” तो होता है न “करूँगा।”
जो चीज़ है वो अटल है, मृत्यु की तरह टाली नहीं जा सकती। तो यहाँ तुमने क्यों कहा, “मैं करना चाहता हूँ।” जान-बूझकर थोड़ी गुंजाइश छोड़ रहे थे न कि “देखो, मैंने तो मना किया था पर वो तो औरों ने करा दी।”
प्रश्नकर्ता: एक्ज़ैक्टली! हाँ यही हो रहा था उसमें।
आचार्य प्रशांत: हाँ यही था, तो सीधे बोलो न कि फिर अपना जुगाड़ है।
प्रश्नकर्ता: नहीं, लेकिन इतनी क्लैरिटी नहीं थी कुछ भी। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि “नहीं, बहुत ग़लत कर रहा हूँ मैं।”
आचार्य प्रशांत: ये तो तुम अपने ऊपर ग्लानि ले रहे हो, और ग्लानि लिए फेरे भी लोगे तुम।
प्रश्नकर्ता: हाँ, ऐसे ही। मतलब अभी यही होता है, दिन भर यही विचार आते रहते हैं।
आचार्य प्रशांत: रात में?
प्रश्नकर्ता: रात में मतलब सो जाता होगा कि सोने से पहले तक।
आचार्य प्रशांत: सोने के पहले तक?
प्रश्नकर्ता: कि ऐसा नहीं करना चाहिए मुझे।
आचार्य प्रशांत: “ऐसा नहीं करना चाहिए।"
प्रश्नकर्ता: वो घर पर बता भी दिया है मैंने, तो घरवालों को बार-बार रोज़ बोलता हूँ।
आचार्य प्रशांत: अरे, घरवाले अच्छे से जानते हैं कि तुम सच में क्या चाहते हो। घरवालों को एक बार पता चल जाए कि तुम नहीं चाहते कि ये काम हो, तो वो तत्काल पीछे हट जाएँगे। उन्हें भली-भाँति पता है कि तुम ऊपर-ऊपर से कर रहे हो, अंदर ही अंदर बाँछें खिली हुई हैं।
प्रश्नकर्ता: लेकिन सच बात तो ये है, अभी अंदर ही अंदर कुछ भी नहीं अच्छा लग रहा है।
आचार्य प्रशांत: वो तो अभी दूर होगी न शादी, इसलिए।
प्रश्नकर्ता: नहीं, शादी से दूर तो है लेकिन फोन पर तो बात कर ही सकते हैं, मेरा वो भी मन नहीं करता है।
आचार्य प्रशांत: फोन का क्या करना, अब तो…।
प्रश्नकर्ता: मैं घर भी नहीं जाता हूँ, मुझे पता है कि वहाँ जाना पड़ेगा, मिलना पड़ेगा।
आचार्य प्रशांत: भाई, तुम सारी वो बातें बता रहे हो जिनको करने से होनी टलने नहीं वाली। "मैं घर नहीं जाता हूँ। मैं फोन पर बात नहीं करता हूँ। मैं ये सब चीज़ें छोड़ने को तैयार हूँ। लेकिन एक चीज़ को मैं टालने को बिल्कुल भी तैयार नहीं, वो है विवाह।" उसके लिए तैयार बैठा हूँ। बाक़ी उसके आसपास की सब चीज़ों को मैं छेड़छाड़ दूँगा, इधर-उधर कर दूँगा। थोड़ी नाराज़गी दिखा दूँगा, थोड़ा रूठा-रूठा रहूँगा।”
रूठे-रूठे रहो तो और बढ़िया रहता है। ख़ास तौर पर लड़की वाले की ओर से कहते हैं, "दामाद जी थोड़ा रूठे-ऊठे रहते हैं, तन्नाए हुए हैं।" फिर दामाद जी की और ज़्यादा आवभगत होती है।
ये तुम क्या सोच रहे हो? तुम्हारा ही किस्सा है, इस देश में आधी शादियाँ ऐसे ही होती हैं। वो सब ऐसे ही कहते हैं, “वो तो मैं करना नहीं चाहता।” वो वीडियो देखा था ठसक लाइफ़ वाला “माँ, सिर्फ़ तेरे लिए कर रहा हूँ, वरना मैं तो बाल ब्रह्मचारी हूँ।”
करनी ही है दिलेरी से करो, कि हाँ भाई करनी है। और जहाँ अज्ञान होता है वहाँ विवाह करने का कारण भी एक ही होता है — काम, जिसका दूसरा नाम भय है। सबसे पहले जाओ उस लड़की से मिलकर आओ। समझ में आ रही है बात? फिर आगे देखना क्या करना है।
प्रश्नकर्ता: वैसे तो एक बार मतलब मिला हूँ, बात की है। पर फिर भी मतलब यही क्वेश्चन मेरा क्लियर ही नहीं है अभी भी।
आचार्य प्रशांत: तो मुझसे क्यों पूछ रहे हो? मियाँ-बीवी की बात है आपस में बैठ के क्यों नहीं क्लियर किया?
प्रश्नकर्ता: नहीं-नहीं, वो तो मतलब एकदम, मैं तो फिर भी ऐसा हूँ, उनको तो कुछ है भी नहीं इतना कि। वो तो ठीक है जो चल रहा है, उनको तो मंज़ूर।
आचार्य प्रशांत: देखो भाई, जिसको कुछ भी मंज़ूर होता है न फिर उसको कुछ भी मंज़ूर होता है। ऐसे आदमी से बचो जिसको कुछ भी मंज़ूर होता हो। हमारे लिए ज़रूरी होता है कि हमें बहुत कुछ नामंज़ूर हो। अगर किसी ऐसे के पल्ले पड़ रहे हो जिसे कुछ भी मंज़ूर है तो वो आदमी ठीक नहीं तुम्हारे लिए।
जानते हो न फिर उसने तुम्हें भी क्यों मंज़ूर किया है? तुम्हें कुछ भी मान के। अगर तुम कुछ भी हो तो कोई भी, कुछ भी हो सकता है, कुछ भी बराबर कुछ भी। एक चीज़ होती है कहनी, “मैंने प्रेम किया, मैंने तुझे मंज़ूर किया।” और तुम्हें कैसा लगेगा तुम उसके सामने बैठोगे, वो कहेगी “मैंने कुछ भी मंज़ूर किया।” कोई बात है ये?
और रही ये बात कि घरवाले उदास होते हैं, और दुख बताते हैं कि “अरे, समाज में नाक कट जाएगी, ये सब हो जाएगा।” उनकी उदासी, न तुम्हारी वजह से है और न तुम्हारी शादी कर देने के बाद हट जाने वाली है। उन्हें उदास रहना है इसलिए उदास थे, उन्हें उदास रहना है इसलिए उदास रहेंगे। तुम्हारी शादी का भी ऊपर-ऊपर बहाना मिला हुआ है तो कह देते हैं, “इसकी शादी को लेकर के उदास हैं।” तुम कर लो शादी, वो किसी और चीज़ को लेकर उदास हो जाएँगे।
तुम अपनी उदासी तो दूर कर नहीं पा रहे उनकी क्या दूर करोगे।
प्रश्नकर्ता: मैंने बोला उनको कि "मैं ख़ुद ही नहीं खुश रहूँगा तो आपको क्या खुश रखूँगा?" तो उल्टा-सीधा तर्क देते हैं।
आचार्य प्रशांत: जब जानते हो तर्क उल्टा-सीधा है तो दबाव में क्यों आ रहे हो?
प्रश्नकर्ता: वही कहीं न कहीं मोह ज़्यादा है मुझे, वो ज़्यादा ही दुखी हो जाते हैं। तो साहस की भी कमी है, ऐसा ही है।
आचार्य प्रशांत: अरे, मोह ज़्यादा है तो जिससे मोह है, उसका तो कम से कम भला चाह लो। मोह यही कहता है ना कि "वो है कोई और उससे बड़ी आसक्ति हो गई है। बड़ा मोह हो गया है।” जिससे मोह हो गया है, मोह के नाते ही सही, उसका भला चाह लो। तुम जो करने जा रहे हो, इसमें किसी का भी भला नहीं है, न तुम्हारा, न उस लड़की का, न तुम्हारे माँ-बाप का, न किसी और का।
या ये कहोगे कि "मुझे अपने घर वालों से मोह है, इसलिए मैं उनकी दुर्दशा करना चाहता हूँ।" ये तो बहुत पुरानी, बँधी-बँधाई, रटी-रटाई, सौ बार दोहराई गई पटकथा है। लड़के की ऐसे अंड-बंड शादी कर दो। पहले वो मना करता रहेगा, मना करता रहेगा फिर जब औरत घर में आ जाएगी, तो जिस औरत से शादी करने के लिए पहले मना कर रहा था, फिर वही उसकी हो जाएगी।
माँ-बाप एक-दूसरे को देखकर व्यंगात्मक मुस्कान छेड़ेंगे कहेंगे, "ये देखो! मना करा करते थे, शादी नहीं करनी है। अब सुबह के दस बजे तक कमरे से बाहर नहीं निकलते।" फिर सास-बहू की तनातनी होगी। बहू कहेगी, "शादी तो मैं करना ही नहीं चाहती थी वो तो कुछ भी कर लिया।"
कौन इस पूरी प्रक्रिया में आनंद पा रहा है? मुझे ये बताओ। इस पूरी प्रक्रिया में शांति, आनंद, चैन है किसको?
और बात अगर सिर्फ़ एक घटना की होती कि शादी, तो भी अलग चीज़ थी। थोड़ी देर पहले जैसा मैंने कहा, जिस व्यक्ति ने अपना मन ऐसा बना लिया है, वो व्यक्ति जीवन के हर निर्णय में दूसरों का दबाव अनुभव करेगा। जो व्यक्ति जीवन का इतना हार्दिक, इतना आत्मिक निर्णय भी जनता के दबाव में ले रहा है, भले ही वो जन अपने घर के हों। लेकिन आत्मा घरेलू नहीं होती भाई। आत्मा तो नितांत निजी होती है। वो ये भी नहीं देखती कि "घर के लोग हैं तो भाई इनसे तो आत्मा साझी ही कर लें" नहीं, ये नहीं होता।
जो व्यक्ति अपने इतने निजी निर्णय दूसरों के दबाव में ले रहा हो, दूसरों से प्रभावित होकर ले रहा हो, वो तो पग-पग पर दूसरों का दबाव ही झेलेगा। और इसको हम कहते भी हैं न, "दूसरों के दबाव में आ जाना।" वो वास्तव में दूसरों का दबाव नहीं होता, वो अपने भीतर की कमजोरी होती है। तुम्हारे भीतर कमजोरी न हो, तो कोई दूसरा तुम्हें कैसे दबा लेगा।
और अगर अपने भीतर कमजोरी है तो मुझे बताओ, उस कमजोरी को तुम कहाँ छोड़ दोगे? जहाँ जाओगे, वो कमजोरी तुम्हारे साथ चलेगी। नौकरी भी करोगे, तो ऐसे ही दबे-दबे करोगे। काम-धंधा करोगे, तो दबे-दबे करोगे। सड़क पर चलोगे, तो दबे-दबे चलोगे। ज़िंदगी में जो कुछ करोगे अपनी कमजोरी के नीचे दबे होकर करोगे।
कोई फ़ायदा ऐसे जीने से?
दुनिया जान जाती है, थोड़ी देर पहले पूछ रहा था न मैं, "ब्रांड कैसा है तुम्हारा?" दुनिया तो सूंघती रहती है कि कोई मिल जाए कमज़ोर आदमी और बिल्कुल शोषण कर ले इसका। तुम्हारी कमजोरी की ख़बर आग की तरह फैलती है।
प्रश्नकर्ता: वो ब्रांड वाली बात जो बोली न आपने, उसमें मेरा ये ब्रांड है कि मैंने इसके मज़े भी लिए खूब। जैसे वो आज्ञाकारी बेटा, सब समाज में जो छवि, तो वो दिखने लगा है अब कि वो कोई काम का नहीं है। पर पहले इसके काफ़ी मज़े लिए मैंने। सुख उठाया कि देखो, मैं तो आज्ञाकारी हूँ, सब मुझे आज्ञाकारी मानते हैं।
आचार्य प्रशांत: ठीक है, पहले सुख उठाए थे अब…।
प्रश्नकर्ता: वो भुगतना पड़ रहा है।
आचार्य प्रशांत: और सुख उठाओ।