जो प्रेम का वास्तविक अर्थ नहीं समझते, वो विवाह चाहे घरवालों के कहने पर करे या फिर अपनी मर्ज़ी से करे, उसने ले-देकर चुनी तो माया ही है। हम प्रेम समझने को तैयार नहीं होते, प्रेम-विवाह करने को बड़े उतावले रहते हैं। ये जो पूरी विवाह की व्यवस्था को रच रहा है, वो कौन है? वो भीतर बैठा मन है। उस मन को हम समझते हैं क्या? उसको नहीं समझा तो उसके द्वारा रची गई व्यवस्था पर भरोसा कैसे कर लिया?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: दो लोग हैं, एक-दूसरे के लिए सहृदयता रखते हैं, ज़ाहिर है कि ये अच्छी बात है। लेकिन जब किसी का भला चाहते हो तो ये ज़िम्मेदारी आ जाती है न, कि पता भी हो कि भलाई, किस चिड़िया का नाम है, नहीं तो चाहने भर से थोड़े ही होगा।
बाहर गाड़ी खड़ी है मेरी, कुछ आवाज़ कर रही है, पता नहीं मैं वापस शहर तक ठीक-ठाक पहुँचूँगा या नहीं। आपमें से कितने लोग चाहते हैं कि मैं ठीक-ठाक पहुँच जाऊँ वापस?
सब चाहते हैं, चाहने से क्या होगा? उसके इंजन का, उसकी प्रक्रिया-प्रणालियों का कुछ पता भी तो होना चाहिए न? या जाओगे और उसको फूसफुसाओगे कि "देखो-देखो, ये हमारे बड़े प्यारे मित्र हैं, इनको सकुशल पहुँचा देना," तो वो पहुँचा देगी? चाहने से कुछ हो जाएगा क्या?
तो ये बात सब चाहने वालों को समझनी चाहिए न। चाहने भर से कुछ नहीं हो जाता। मन की जटिलताओं का, मन के खेलों का ज्ञान भी होना चाहिए। तभी दूसरे का भला कर पाओगे। नहीं तो बड़े अफ़सोस की बात हो जाती है कि लोग चाहते तो एक दूसरे का हित हैं लेकिन अनजाने में अहित कर डालते हैं। अपना ही हित नहीं कर पाते हैं लोग, दूसरे का हित कैसे करेंगे।




