प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! सर मेरा सवाल था रिलेशनशिप (रिश्ते) को लेकर। आप कहते हैं कि जो साथी चुनने का मुद्दा है वो बहुत इम्पॉर्टन्ट (महत्वपूर्ण) है, तो जैसे उसको मैं रियल (असली) लाइफ़ (जीवन) में उतारने कि कोशिश कर रहा हूँ तो उसमें मेरे को जैसे तीन ऑप्शन्ज़ (विकल्प) समझ में आ रहे हैं।
पहला कि धीरे धीरे जो टेन्डन्सीज़ (प्रवृत्ति) होती हैं इसको अतिक्रमण करके इसके आगे बढ़ जाएँ इसके, दूसरा ये है कि पहले कुछ बन जाएँ अच्छा और फिर साथी का चुनाव करें और तीसरा ये कि साथ में ही कोई अभी ऐसा हो जो इसी रास्ते पर चलना चाहता हो तो उसके साथ चला जाए।
तो कौन सा बेहतर है और इसमें क्या प्रिकॉशन (एहतियात) लेने चाहिए जो भी अगर यूज़ (उपयोग) करें तो, या फिर आपके पास कोई और ऑप्शन (विकल्प) हो तो?
प्रतिभागी: हँसते हैं। ,
प्रश्नकर्ता: मतलब इसको में कन्सेप्चूअल (वैचारिक) लेवल (स्तर) पर तो समझ पा रहा हूँ लेकिन ऑपरेशनलाइज़ (परिचालन) कैसे करूँ लाइफ़ (ज़िंदगी) में?
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो मैं देखता हूँ कि हमारी भाषा कैसे-कैसे खेल खेलती है ये साथी माने क्या होता है? माने साथी क्या होता है? आप छोटे थे तो आपको ज़रूरी था कि कोई आपके साथ कोई रहे तो माँ रह लेती थीं, पिता रह लेते थे, ठीक है। उसके बाद आप वहाँ से उठकर पच्चीस से तीस साल के हो गए होंगे जानें पैंतीस साल के हो गए होंगे उतना समय आपने बिता लिया, बिना किसी फ़ुल




