
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

















दार्शनिक बना नहीं जाता। ये कोई कैरियर थोड़ी होता है। ये तो ज़िंदगी बना देती है। पहले ज़िंदगी ऐसे जियो कि उसकी परतें उघड़ें कुछ, उसका नंगापन सामने आए। और उसके लिए ज़िंदगी के बहुत क़रीब आना पड़ता है। ज़िंदगी के क़रीब जाना माने झूठ अब टूटेगा। और झूठ साँस है, झूठ रीढ़ है, झूठ प्राण बन गया है हमारा। सब टूटेगा। ज़िंदगी को देखो। ज़िंदगी से लात खाओ फिर तुमसे जो कुछ भी अभिव्यक्त होगा, वह दर्शन होगा।



आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।

धर्म होता है ख़ुद को समझने के लिए, ताकि आपकी चेतना उड़ान ले सके। समझ में आ रही है बात? और यही दो कोटियों के लोग होते हैं दुनिया में; एक, वो जो अपने पुराने ढर्रों पर चल रहे हैं इन्हें आप बोल सकते हैं अधार्मिक लोग। वह पुराने ढर्रे दो तरीक़ों के हो सकते हैं — ये बात बहुत रोचक लगेगी बहुत लोगों को। जो पुराने शारीरिक ढर्रे पर चल रहा है, वो तो अधार्मिक है ही। लेकिन जो पुराने सामाजिक ढर्रे पर भी चल रहा है, वो भी अधार्मिक है। धर्म किसी ढर्रे का नाम नहीं होता, धर्म जानने का नाम होता है।

आपको क्या लगता है, यह जो अलग-अलग तरह के स्पोर्ट्स हैं, यह क्यों इतने प्रचलित हो गए? क्योंकि स्पोर्ट्स होगा तभी तो ऐड होगा। वह विज्ञापन बेचने का ज़रिया है और विज्ञापनदाता ऐसे नए-नए ज़रिए खोजते रहेंगे। चाहे वह विज्ञापन हो, चाहे बाबा जी की PR हो, चाहे आपको धार्मिक आधार पर भड़काने वाला कोई WhatsApp फ़ॉरवर्ड हो, वह सब बहुत केयरफुली क्राफ्टेड होते हैं। बहुत सतर्क रहा करिए, बहुत सतर्क; सब कुछ सिर्फ़ इसलिए है ताकि कोई आपसे अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके।

जो एक का नहीं होता, उसे सौ का होना पड़ता है। अपने आप को सौ जगह टुकड़ा-टुकड़ा करके उसको बाँटना भी पड़ता है। असली आदमी होता है, वो काम ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ, और साथी भी ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ। तो जब दोनों को ही 24 घंटे कम पड़ रहे हैं, तो वो 48 से ज़्यादा घंटे कहाँ से लाएगा? क्या करेगा फिर वो? वो काम को ही साथी बना लेता है, या साथी को ही काम बना लेता है, या साथी ऐसा बनाता है जो काम में भी साथ हो।

हिमालय से ऋषि चलते थे और सीधे दक्षिण भारत तक पहुँच जाते थे। या वो कहते थे कि मैं हिमालय का हूँ, वही रहूँगा? कबीर साहब जीवन भर चलते रहे। नानक साहब अरब तक पहुँच गए, चीन से यात्री चलते थे और ज़्यादातर ज्ञान की खोज में होते थे, वह तिब्बत पार करके हिमालय लाँघ करके भारत आ जाते थे। आपको यात्रा करने से किसने रोका है? यात्रा ही बहुत कुछ सिखा देती है। विदेश न जाओ, भारत तो घूम लो। पृथ्वी पूरी तुम्हारी है, जहाँ जा सकते हो, जाओ।

























सत्य के मार्ग पर चलने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बाहरी समर्थन नहीं, बल्कि भीतर की निष्ठा और साहस की होती है। जब व्यक्ति स्वार्थ, भय और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय का साथ देता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य के प्रति अडिग रहना। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।
समझ केवल जानकारी इकट्ठा करने या बातों को याद रखने से नहीं आती, बल्कि पूरी सजगता से वर्तमान में जीने और हर अनुभव को स्वयं देखने से आती है। जीवन हर दिन नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटी हुई बातें पर्याप्त नहीं होतीं। वास्तविक सीख तब होती है जब जिज्ञासा, प्रश्न और प्रत्यक्ष समझ विकसित होती है। स्मृति नहीं, बल्कि जागरूकता और समझ ही सही निर्णय, सीखने और जीवन को सार्थक दिशा देने का आधार बनती है।
आध्यात्मिक प्रगति अधिक गुरु, ग्रंथ या संस्थाएँ बदलने से नहीं, बल्कि एक सत्य को गहराई से जीने से होती है। सतही अध्ययन अहंकार को बढ़ाता है, जबकि वास्तविक अध्ययन स्वयं को बदल देता है। जो वास्तव में समझता है, उसे निरंतर नए उपाय नहीं चाहिए। विनम्रता से अपनी अधूरी समझ स्वीकार कर, एक प्रामाणिक स्रोत के साथ गहराई से जुड़े रहना ही आत्मज्ञान और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है।
ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है।
बार-बार लक्ष्य छोड़ देने का कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि गलत और उधार लिए हुए लक्ष्य हैं। जिन उद्देश्यों का जन्म प्रेम, समझ और आत्मबोध से नहीं होता, वे बोझ बन जाते हैं। सही लक्ष्य भीतर की स्पष्टता से निकलता है और वही व्यक्ति को स्वाभाविक समर्पण देता है। इसलिए प्रेरणा खोजने से पहले स्वयं को जानना, आत्म-अवलोकन करना और यह समझना ज़रूरी है कि वास्तव में हमारे लिए क्या मूल्यवान है।
पढ़ना केवल पन्ने पूरे करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। जब किसी विषय को सचमुच समझा जाता है, तो जिज्ञासा स्वयं आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अधूरी किताबें अक्सर रुचि की कमी नहीं, बल्कि बिना समझे आगे बढ़ने का परिणाम होती हैं। इसलिए गति से अधिक महत्त्वपूर्ण है हर विचार को समझना, क्योंकि वास्तविक सीख वहीं से शुरू होती है।
व्यक्ति और उसके माता-पिता दोनों अक्सर प्रेम के नाम पर एक-दूसरे पर अधिकार जताते हैं, जबकि संबंधों में निर्णय सम्मान, समझ और स्वतंत्रता पर आधारित होने चाहिए। वयस्क होने के बाद जीवन के महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। सच्ची परवरिश निर्भरता नहीं, आत्मनिर्भरता पैदा करती है। पारिवारिक दबाव का बड़ा हिस्सा प्रेम से नहीं, बल्कि भय, सुविधा, अपेक्षाओं और स्वार्थ से संचालित होता है। स्वस्थ संबंध वहीं संभव हैं जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की चेतना, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करें।
सच्चा जीवन समाज के दबाव या तथाकथित “पैशन” के पीछे चलने से नहीं, बल्कि भीतर और बाहर दोनों प्रकार की गुलामी से मुक्त होने से शुरू होता है। अक्सर जिसे अपनी पसंद या पैशन समझा जाता है, वह भी सामाजिक संस्कारों का परिणाम होता है। जब व्यक्ति स्वयं को गहराई से समझकर स्वतंत्र निर्णय लेता है, तब उसका कर्म स्वाभाविक, सार्थक और समाजोपयोगी बनता है। भय और सुरक्षा की मानसिकता से ऊपर उठकर भी गरिमापूर्ण, संतुलित और आर्थिक रूप से पर्याप्त जीवन जिया जा सकता है।
लोग ऋषिकेश शांति या आत्मबोध के लिए नहीं, बल्कि अपनी वही तनावपूर्ण और भ्रमित जीवनशैली को बनाए रखने के लिए आते हैं। महादेव का अर्थ अंत और अहंकार की समाप्ति है, पर तीर्थ भी मनोरंजन और पलायन का साधन बन गया है। दुख से मुक्त होने के बजाय लोग उसी दुख को बचाए रखने के उपाय खोजते रहते हैं।
आप सपनों से परेशान होकर जागते हैं, फिर भी उन्हें पूरे दिन ढोते रहते हैं। अगर गड़बड़ी सपने में थी, तो उसे जागृत जीवन में क्यों लाना? वर्तमान जीवन अपने आप में पूर्ण है, पर आप उससे बचने के लिए बीते भ्रमों को पकड़े रहते हैं। सपने कामनाओं से जन्म लेते हैं; जितना उन्हें पकड़ोगे, उतना वे आपको पकड़ेंगे। छोड़ दो, तभी स्पष्टता आएगी।
ये ऐसी सी बात है, कि “मैं क्या करूँ? मैं दस कदम आगे चलता हूँ। पीछे से वो कॉल करके पकड़ लेती है।” वो तुम्हें कॉल करके पकड़ रही है या पहले तुमने मोबाइल फोन पकड़ रखा है? वो तुम्हें पकड़ ले, इसका इंतजाम पहले से करके कौन बैठा है? तुम अगर चाहते ही होते कि वो तुम्हें न पकड़े, तो फोन पीछे नहीं छोड़ के आए होते।
जब ये सब उठे, तो कहो, “तू उठ, तेरा काम है उठना पर तू मैं नहीं है।” और प्रमाण इसका ये है कि मैं तुझे देख सकता हूँ, मैं तेरी हर गतिविधि पर नज़र रख सकता हूँ। यही प्रमाणित करता है कि तुझमें और मुझमें भेद है। तू दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। हम दोनों एक नहीं हैं। मैं साक्षी हूँ तेरा, तू अपना काम कर, मैं बैठा-बैठा देखूँगा। मैं बैठा-बैठा देखूँगा तो मेरे पाँव मेरे पाँव हैं, और मेरा हाथ मेरा हाथ है, और मेरी ऊर्जा मेरी ऊर्जा है; वो तुझे नहीं मिलेगी। मैं तुझसे कोई रिश्ता बनाऊँगा ही नहीं।
प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रहकर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है; ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता, लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम…
हम आमतौर पर बस ऐसे ही छवि बना लेते हैं कि संघर्ष या दबाव सिर्फ़ व्यवसाय में या सांसारिक मसलों में ही है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। दबाव और संघर्ष अध्यात्म में भी उतने ही करने पड़ते हैं, जितने कि संसार में, बस उसकी श्रेणी, उसकी गुणवत्ता अलग है। बाहर तुम दबाव झेलते हो कुछ और अतिरिक्त हासिल कर लेने के लिए, और अध्यात्म में, जिसको तुमने नाहक पा लिया है, वह दबाव बनाता है कि मुझे मत छोड़ो। भीतर वाली लड़ाई जीत लो, बाहर की सब लड़ाइयाँ तुम पाओगे कि तुम्हारे लिए बहुत आसान हो गई हैं।
तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा।
तुम कहीं गए, तुमने किसी की चरण स्पर्श कर लिए। यह कोई सम्मान है? यह आदर है। सम्मान दूसरी बात है। सम्मान का अर्थ होता है, ध्यान से समझना। जो अपने मन की समझ नहीं रख सकता, वह किसी और को कैसे समझ जाएगा? पर दावा हमारा यह है कि हम दूसरे का सम्मान करते हैं। दूसरे का सम्मान तो तब हो जब आत्म-सम्मान हो। आत्म-सम्मान मतलब खुद को समझना। पहले अपना सम्मान कर लो। अपना सम्मान मतलब, आत्म-ज्ञान! आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान है।
दो तरह का शोषण चलता आया है धर्म के नाम पर, एक, महिलाओं का; और एक, तथाकथित निचली जातियों और वर्णों का। और लोकधर्म की लगभग बुनियाद है ये शोषण। अब लोकधर्म अगर जात-पात, छुआ-छूत और स्त्री-शोषण, इनके बिना चल ही नहीं सकता; तो जहाँ कहीं भी स्त्रियों को उठाने की बात आएगी और जाति को हटाने की बात आएगी, लोकधर्म उससे बहुत ख़ौफ़ खाएगा। ख़ौफ़ खाएगा और उस बात को कह देगा? ये लेफ्टिस्ट बात है।
आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।
जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है न, जब तक उसके प्रति, उसके विरुद्ध सक्रिय ऊर्जा नहीं उठेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं आता। बहुत सोच-समझ के कहा है — नफ़रत, घृणा होनी चाहिए। जो घृणा की ऊर्जा होगी न वही ऊर्जा काम आएगी। जो संतुष्ट हैं, उनकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता।
काम करना माने ये नहीं होता कि कोई महल बनाना है, कोई साम्राज्य खड़ा करना है, ये करना है, वो करना है। वास्तविक काम हमेशा नकारात्मक होगा। तो इसलिए उसको ढूँढना बहुत आसान है। आसपास अपने देखो, कहाँ कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए। सूँघो, कहाँ-कहाँ गंदगी फैली हुई है। हाथ में झाड़ू उठाओ, साफ़ कर दो; यही है काम। काम करके कुछ हासिल नहीं करना है। काम करके जो हासिल कर लिया है, उसको हटाना है।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। अभी हमारी जो टीम है, वो ओलंपिक से वापस आई है, जो खिलाड़ी हैं। और उनको लेकर कुछ नेशनल न्यूज़, मीडिया में और सोशल मीडिया में कुछ बातें चल रही हैं। उनके कुछ हेडलाइंस (शीर्षक) मैं आपको पढ़कर के सुनाना चाहता हूँ — ‘मनु के…
उल्टी-पुल्टी मान्यताएँ पकड़े बैठे हो, अपने आप को कुछ मान रहे हो, ‘मैं लंकेश हूँ।’ ज्ञान होता तो अपने आप को कोई लंकेश थोड़ी बोलेगा, स्त्री का अपहरण थोड़ी करेगा। ज्ञान होता रावण को, तो वह अपने आप को और कुछ क्यों मान रहा होता? रावण ने तो ज्ञान को सिर्फ़ सूचना की तरह रखा है। अगर ज्ञानी होता, तो फिर श्रीराम के ख़िलाफ़ युद्ध में थोड़ी खड़ा हो जाता वो।
अगर जीवन में अनुशासन नहीं है, तो मतलब साफ़ है कि तुम जिस विषय के पास हो, उसमें इतनी जान ही नहीं है कि वह तुम्हें अनुशासित कर पाए। अधिकांशतः हमारे जीवन में एकाग्रचित्तता नहीं रहती, उसका कारण यह है कि हमने अपने लिए लक्ष्य ही मूल्यहीन चुन लिए होते हैं। स्वयं को अनुशासित करने की चेष्टा मत करो, उपयुक्त विषय ढूँढो। जब तुम सच के पास होते हो, तो अनुशासन अपने आप हो जाता है। तुम उसके निकट रहो, वो तुम में अनुशासन ला देगा।
बहुत-बहुत पुरानी गंदगी है, समय लगेगा। बहुत पुरानी गंदगी है, सोचो कितना पुराना हमारा देश है। कम से कम पिछले हज़ार सालों में तो बहुत गड़बड़ करी गई है। वो सब साफ़ करने में समय लगेगा, ये जो गाली गलौज कर रहे हैं, ये बेचारे तो शिकार हैं गंदगी के। इन्हें पता भी नहीं है कि इनके मुँह से कौन बोल रहा है, इनके मुँह से अतीत की सड़न बोल रही है। अभी इनमें इतनी आत्म-जागरूकता नहीं है कि ये जान पाएँ कि ये तो अभी हैं ही नहीं।
होश में आओ और फिर होश को जाने मत दो, पानी जैसे हो जाओ। किसी पथरीले पहाड़ पर पानी की एक धार छोड़ो, देखो, वो कैसे अपना रास्ता तय करती है। पहाड़ है पथरीला, ऊबड़-खाबड़ चट्टानों से भरा हुआ, कहीं गड्ढा, कहीं कुछ और तुमने धार छोड़ी है। धार कहीं रुककर के विचार नहीं करती कि कौन सा मार्ग मेरे लिए ठीक है, कौन सा नहीं। उसे पता है किधर को जाना है। वो समर्पित है उस जगह पहुँच जाने को, जिसके बाद गति की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। नीचे कोई तालाब होगा, एक बार धार वहाँ तक पहुँच गयी, क्या उसके बाद भी बहती है?
मैं होऊँगा वैसा, बात बताओ सही है या नहीं है? बोलो, बात सही है कि नहीं है? अगर सही है, तो बात ले लो। मैं तुमसे थोड़ी कह रहा हूँ, मुझे उठा के अपने घर बैठा लो। मुझे आना भी नहीं है तुम्हारे घर, बुलाओगे तो भी नहीं आऊँगा। मैंने एक बात कही है, बस उस बात का ही रिश्ता है हमारा और तुम्हारा। वो बात अगर तुम्हें ठीक लगती है, तो समझ लो। और इधर-उधर की फालतू तो मत बताओ, ये बाबा ऐसा है, कि बाबा वैसा है।
जो रोना-चिल्लाना हो रहा है, देख लो कि सब देह के कारण हैं। शरीर के हॉरमोन करवा रहे हैं। जान लो कि तुम उनके कर्ता नहीं हो — यह कर्मसंन्यास हो गया। दूसरा तरीका यह है कि यह सब किसी ऊँचे उद्देश्य को समर्पित कर दो; हँसेंगे तो उस ध्येय के लिए, रोएँगे तो उस ध्येय के लिए — यह कर्मयोग है। श्रीकृष्ण कहते हैं — इन दोनों में कर्मयोग श्रेष्ठ है। तुम्हारी चित्त की तमाम वृत्तियों के साथ रिश्ता बड़ा गहरा है। तुम्हारे लिए उनसे संबंध तोड़ना मुश्किल हो जाएगा, इसीलिए कर्मयोग ज़्यादा आसान तरीका है।
तुम्हें लग रहा है बहुत क़ाबिल नौजवान घूम रहे हैं हिंदुस्तान में और इनको ब्रेन वॉश कर- कर के आचार्य जी बुला रहे हैं और फिर इनसे अपने लिए काम कराएँगे। अरे, ये निहायती घटिया नस्ल है। नस्ल भी घटिया, फ़सल भी घटिया। इनको यहाँ बुलाता हूँ तो इन पर बड़ी मेहनत करनी पड़ती है किसी लायक बने, और आधे तो उतनी मेहनत झेल भी नहीं पाते। वे बाहर निकल जाते हैं और फिर बाहर जाकर वीडियो बनाते हैं, “हमसे काम कराया, हम मर गए हैं। अरे, हमसे हुआ नहीं।”
मैं पहली बात बोल रहा हूँ पूरा प्रयास करो, और अपने माही टटोल, झाँक करके देखो कि कहीं स्वार्थवश तो नहीं किसी से कह रहे कि आओ गीता में, आओ गीता में। पहले अपना साफ़ करो मामला। स्वार्थ को लेकर के किसी को गीता में भी लाओगे तो ये पराजय ही है। ठीक है?
ज़िंदगी में जब ऊँचाई के लिए आकर्षण आ जाता है, लगाव-झुकाव आ जाता है, जिसको हम इश्क़ बोल रहे हैं, वास्तविक प्रेम बोल रहे हैं, तो फिर मेहनत अपने आप हो जाती है। तो मेहनत बहुत ज़रूरी है, पर अंधी मेहनत हमें सिर्फ़ गधा बनाती है। अंधी मेहनत से बचो, पर मेहनत से मत बचो। मेहनत तो करनी पड़ेगी। पर मेहनत ऐसे ही मत करने लग जाना कि कहीं भी लग गए, मेहनत किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं। नहीं-नहीं, ये मत करने लग जाना।
भाषा बड़ी अनोखी चीज़ है। जो शब्द तुम बोलते हो, वो तुम बोलते ही भर नहीं हो, सुनते भी हो। जो पाठ, जाप, मंत्र, शब्द, भजन-कीर्तन इत्यादि करते हो, उससे बाहर की कोई सत्ता नहीं, जो तुमसे संतुष्ट या प्रसन्न हो जानी है। जो भी कुछ कह रहे हो, स्वयं को सुना रहे हो। जिसकी भाषा बदलने लग जाती है, उसका मन बदलने लग जाता है।
यह नेपाल की नहीं, हर देश की कहानी है। दुनिया भर में अनगिनत क्रांतियाँ होती रहती हैं और उनसे कुछ बदलाव भी आते हैं, पर उतने से आपका पेट नहीं भरेगा। बाहरी बदलाव सदा आकर्षक लगता है, लेकिन उसके परिणाम या तो शून्य होंगे या आंशिक। क्रांति सदा भीतर से शुरू होनी चाहिए। एक जगा हुआ आदमी सबसे बड़ी क्रांति होता है। जब भीतरी आज़ादी नहीं होती तो बाहर भी आज़ादी का दुरुपयोग ही होता है। ज़बरदस्त क्रांतियाँ हों, लेकिन ठोस आधार पर और ऊँचे लक्ष्यों के लिए हों।
प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…
हमें दो तरह की शिक्षाएँ चाहिए — एक शिक्षा हमें इसलिए चाहिए ताकि कपड़े पहन सकें और रोटी खा सकें, और दूसरी शिक्षा चाहिए जो हमें इंसान बनाए। रोटी और कपड़े नहीं मिल रहे हों, तो बाकी बातें नहीं हो पाती हैं। लेकिन हम इसलिए नहीं पैदा हुए हैं कि बस काम चलता रहे। इंसान होना एक बहुत बड़ी संभावना है। तो फिर एक शिक्षा इसलिए ली जाती है ताकि वह आपको सशक्त कर सके; जीवन को उद्देश्य और ऊँचाई दे सके।
श्रीकृष्ण अर्जुन को उच्चतम ज्ञान बता रहे हैं — आत्मज्ञान। उसके बाद व्यवहार की चीज़ें बहुत सरल हो जाती हैं। जो आख़िरी बात जान गया, उसको बाक़ी बातें समझाना बहुत आसान हो जाता है। जिसने ब्रह्मविद्या साध ली, उसको अब और कुछ भी साधना मुश्किल नहीं पड़ेगा। ब्रह्मविद्या माने स्वयं को हरा देना। जो गीता का हो गया, वह जान जाता है भली-भाँति कि सांसारिक परीक्षाएँ भी कैसे पार करनी हैं। उसको हराना असंभव हो जाएगा।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से जो लोगों ने सिखा दिया है, उसकी वजह से मैं भुगत रहा हूँ। अब क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: देखो, व्यवहारिक होकर देखा करो। किसी की भी गलती हो, भुगत कौन रहा है? जल्दी बताओ। तुम बिलकुल सही जा रहे हो अपनी सड़क पर। और सड़क…
आप अपने सामने अगर एक ऐसे मनुष्य को देखें जो पशुवत हो चुका है, तो ये मत सोचिएगा कि सिर्फ़ एक इंसान का खेल ख़राब हुआ है। ये समझिएगा कि आपको भी उसके जैसा बनाने की पूरी तैयारी चल रही है। एक दिन ये आग तुम्हारे घर में भी लगेगी। तो कोई तो चाहिए ना — जो सामने आए, इलाज करे, मुक़ाबला करे। कोई सामने नहीं आएगा, कोई मुक़ाबला नहीं करेगा तो सब वैसे ही हो जाएँगे।
जो आत्मस्थ नहीं है जब वो प्रकृति का संसर्ग करेगा तो क्या होगा? उखड़ जाएगा। वो उखड़ जाएगा जैसे कोई नन्हा पौधा। नन्हे पौधे को बचा के रखते हो ना तमाम तरीक़े की ताक़तों से, आवेग से। तो जो लोग आत्मा में स्थापित नहीं होते, पर जगत के अनुभवों का रस लेने निकल पड़ते हैं, जगत उनको उखाड़ मारता है।
मुक्ति एक सतत प्रक्रिया है, जो आखिरी साँस तक चलती है। कभी ऐसा नहीं होगा कि अब जो मेरे पास है, वही सर्वश्रेष्ठ है और अंतिम है। जो होगा, उससे लगातार आगे बढ़ते रहना होगा। 11 महीने नहीं, 11 साल नहीं, आप अगर 110 साल जी गए तो 110 साल।
हो तुम मौत की गोद में, मौत माने यही नहीं कि जो आप मर के गिर जाते हो ज़मीन पर, मौत माने उम्मीदों का टूटना। जो आप आशाएँ लेकर के बैठे थे उनका मरना, यही सब मौत है। तमाम तरीक़े की हार, तमाम तरह की घुटन और टूटन यही सब मौत है। तो दिन-रात तुम मौत की गोद में हो, मौत तुम्हें चबा रही है, “जगत चबैना काल का।” और तुम में से कुछ-कुछ लोग हो जो काल के मुँह में हो, कुछ पॉपकॉर्न की तरह गोद में पड़े हुए हो। जब पॉपकॉर्न खाते हो ना, कुछ मुँह में जाता है कुछ गोद में गिर जाता है, तो ये तुम्हारी हालत है।
दर्शन में 'विवशता' जैसा कोई शब्द नहीं होता, 'चुनाव' होता है। आप अगर मजबूर हो, तो यह भी आपका चुनाव है कि आप अपने आप को मजबूर रखना चाहते हो। जिस दिन भीतर से आग उठे कि ऐसी ज़िंदगी नहीं जीनी, सारी मजबूरियाँ जल जाएँगी। कई बार वाक़ई ऐसा लगता है कि हम कमज़ोर हैं तो तब क्या करना है? जो चीज़ आप जान जाएँ कि सही है, उसमें जूझ जाइए। जूझने से ताक़त केवल आती ही नहीं, बल्कि प्रकट हो जाती है।
अगर तुम्हारा हृदय अभी भी काँपता है, अगर तुम रोते हो, परेशान होते हो, तो एक तरीके से ये शुभ लक्षण हैं। इससे यही पता चलता है कि अभी भीतर कोई है, जो तुमको पुकार-पुकार कर कह रहा है, "बदलो, बदलो, ये ठीक नहीं है", इसी कारण कष्ट हैं तुम्हें। कष्ट का अर्थ ही है कि भीतर चेतना का स्रोत बैठा ही हुआ है।
लोग भी न बंदा देख कर और शक्ल देख कर बोलते हैं। तुम शेर की तरह रहो, शेर की तरह जियो, किसी की हिम्मत नहीं होनी चाहिए तुम पर आक्षेप या आपत्ति करने की।