
प्रश्नकर्ता: क्या संवेदनशीलता भी किसी प्रकार की वृत्ति है?
आचार्य प्रशांत: संवेदना–सम्+वेदना। मूल शब्द है ‘विद्’; ‘विद्’ का अर्थ है ‘जानना’। वो वही शब्द है जिससे वेद निकले हैं। ‘विद्’ से ‘विद्या’, वेदना उठती ही इसलिए है क्योंकि तुम्हारे भीतर कुछ है जो जानता है कि तुम्हारे तरीके झूठे हैं। अगर तुम पूर्णत: यंत्र होते तो कभी वेदना का अनुभव ही नहीं होता।
चाकू से हत्या की जाती है, पर चाकू को वेदना नहीं उठती। लेकिन हत्यारे को वेदना उठ सकती है। हत्यारे को वेदना इसलिए उठती है क्योंकि उसके भीतर ‘विद्’ विराजमान है। जानने वाला विराजमान है। उसी जानने वाले के कारण वेदना उठती है।
तुम्हें अगर जीवन में बड़े कष्ट हैं, तो ये अच्छी ख़बर है, इससे यही पता चलता है कि अभी मर नहीं गए हो।
अगर तुम्हारा हृदय अभी भी काँपता है, अगर तुम रोते हो, परेशान होते हो, तो एक तरीके से ये शुभ लक्षण हैं। इससे यही पता चलता है कि अभी भीतर कोई है, जो तुमको पुकार-पुकार कर कह रहा है, "बदलो, बदलो, ये ठीक नहीं है", इसी कारण कष्ट हैं तुम्हें। कष्ट का अर्थ ही है कि भीतर चेतना का स्रोत बैठा ही हुआ है।
लेकिन साधारण मन, सोया हुआ मन, वेदना को मात्र कष्ट समझता है। वो कहता है, "वेदना का अर्थ है पीड़ा", वो वेदना का अर्थ ज्ञान से ले नहीं पाता। संवेदना का अर्थ ये हुआ, "मेरे भीतर वो बैठा हुआ है, वो जानने वाला, और उसकी दृष्टि से मैं पूरी दुनिया को देख रहा हूँ। जितने कष्ट हैं, मुझे सब साफ़ दिखाई दे रहे हैं, और मैं उनका सही अर्थ भी कर पा रहा हूँ।"
संवेदना ही करुणा है।
याद रखना ‘विद्’ से वेदना आया है, पर यदि अज्ञान है तो वेदना मात्र कष्ट बनेगी; यदि ज्ञान है वेदना कष्ट नहीं, करुणा बनेगी। जब वेदना करुणा बन जाए तो उसे संवेदना कहते हैं। करुणा का अर्थ दया नहीं है। करुणा का अर्थ है, "मैं ठीक-ठीक जान रहा हूँ कि तुम्हारा कष्ट नकली है, मैं कष्ट की वास्तविकता जान गया हूँ", संवेदना के मूल में भावुकता नहीं है, विद्या है। यह भूलना नहीं।
संवेदना में भाव का कोई स्थान नहीं है; ‘बोध’ का स्थान है, ‘विद्’ का स्थान है, ‘जानने’ का स्थान है।
संवेदना का अर्थ ये नहीं है कि तुमने किसी को रोते देखा और तुम रोने लग गए। संवेदना का अर्थ है कि तुमने किसी को रोते देखा और तुम जान गए कि उसका जो कष्ट है, वो कितना नकली है। और जब तुम जान जाते हो कि कष्ट नकली है, मात्र तभी तुम उसके कष्ट का उपचार भी कर सकते हो।
हमने शब्दों के बड़े विपरीत, बड़े ख़तरनाक और बड़े निरर्थक अर्थ कर लिए हैं। हमने संवेदना का अर्थ भावुकता से लगा लिया है। हमने संवेदना का अर्थ एक प्रकार की मूर्खता से लगा लिया है। बच्चा नाहक चिल्ला रहा है, माँ बार-बार उसके पास दौड़ कर जा रही है, हम कहते हैं, "संवेदना है।" किसी का लाख रूपये का नुकसान हो गया है, वो छाती पीट रहा है, आप जाकर के उसे गले लगा लेते हैं, और आप कहते हैं "ये संवेदना है"; ये मूर्खता है, ये संवेदना नहीं है। संवेदना में तो सबसे पहले विद्या है, जानना है, वास्तविक रूप से जानना है।
करुणा का ये अर्थ नहीं होता कि, "मुझे बहुत बुरा लग रहा है कि तुम्हें कष्ट है।"
करुणा का अर्थ होता है कि "मैं जानता हूँ कि सारा कष्ट नकली है, और इसी कारण उसे दूर किया जा सकता है।" करुणा का या संवेदना का अर्थ दया नहीं है, भावुकता नहीं है। ये भूल मत कर देना। हम कई बार बात कर चुके हैं कि संवेदनशीलता, भावुकता नहीं है। पर इतनी बार बात करने के बाद भी मैं देखता हूँ कि हम संवेदनशीलता के नाम पर भावुकता को ही प्रश्रय दिए जाते हैं। हमें बिलकुल नहीं पता होता कि हम करें क्या।
मैं तुमसे कल भी कह रहा था, अभी फिर दोहरा रहा हूँ, जो आदमी अभी अधजगा है, उसके लिए ‘युद्ध’ है, और वो स्वयं एक सैनिक है। और सैनिक के कदम डगमगाने नहीं चाहिए। सैनिक में तो एक गहरा आंतरिक अनुशासन होना चाहिए कि, "अभी मैं युद्ध पर हूँ, मैं फ़ोन पर बात करने नहीं चला जाऊँगा।" पर नहीं, आपको लगता है कि इसी में संवेदना है। इसमें संवेदना नहीं है, यह तुम्हारा आत्मघात है, तुम अपने ही दुश्मन हो।
तुम कैसे किसी की मदद करोगे जब तुम खुद कुछ समझते नहीं? डूबते हुए की मदद उसके साथ डूब कर नहीं की जा सकती, क्या ये छोटी-सी बात स्पष्ट नहीं है तुम्हें? मूर्ख की मदद उसके जितना मूर्ख बन कर नहीं की जा सकती। पर तुम्हारे मन में एक तर्क बैठा दिया गया है कि रोते हुए की मदद उसके साथ रो कर की जा सकती है, और तुमने कभी जाँचा नहीं कि इस तर्क में कुछ दम है भी या नहीं।