अपने बारे में ये बातें ज़रूर पता हों || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, मेरा क्वेश्चन (प्रश्न) डर को लेकर है। अभी तीन दिन मैंने यहाँ वालंटियरिंग (स्वयं सेवा) की; दिन अच्छे गुजरे; मज़े में निकल गये। लेकिन अभी ‘मीट द मास्टर’ के लिए यहाँ पर मैसेज (संदेश) रिकॉर्ड करना था।मेरा काफ़ी मन था आगे आकर बोलने का लेकिन कदम बढा रहा था तो ऐसे लग रहा था कि कलेजा ही बाहर आ जाएगा। और ऐसा मैंने देखा है कि मेरे जीवन में ये डर बना ही रहता है हर चीज़ में।ईवन (यहाँ तक कि) जैसे मैसेज भी शेयर (साझा) करना चाहता हूँ मैं संस्था के, सोशल मीडिया प्लेटफार्म परतो मैं नहीं कर पाता हूँ। मुझे पता नहीं क्या डर है, जो मुझे आगे बढने से रोकता है।
कोई मेरे सामने गलत काम हो रहा है या कुछ हो रहा है तो मैं उसे इग्नोर (अनदेखा) कर देता हूँ। मैं उसके ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठा पाता। तो मैं इस डर में घिरा रहता हूँ हर समय। तो मैं इससे बाहर नहीं निकल पा रहा हूँ।
आचार्य प्रशांत: नहीं, तुम डर से क्या घिरे हो, तुम अपनी कल्पना से घिरे हो। जो आपके साथ हो रहा है, बहुत लोग यहाँ बैठे होंगें, उनके साथ भी होता होगा। कल्पना हमारी ये रहती है कि फ़लाना काम करेंगे तो भयानक अंजाम आ जाएगा।जैसे यहाँ आ कर नहीं बोल पाये तो उसके पीछे एक कल्पना है। कल्पना ये है कि बोलूँगा तो ऐसा दुष्परिणाम आ जाएगा या सोशल मीडिया पर शेयर करूँगा तो कोई फ़लाने तरह का ताना मार देगा या कमेंट (टिप्पणी) लिख देगा, कुछ ऐसा हो जाएगा।
जो काम हम नहीं कर रहे होते हैं उस काम में कुछ ऐसा खतरनाक नहीं होता। उस काम के परिणाम की हमारी कल्पना में कुछ खतरनाक होता है।हम भूल ही जाते हैं कि जो कुछ भी खतरा दिख रहा है वो कल्पना के भीतर का है, वो यथार्थ नहीं है। जाँच तो लें कि वो खतरा है भी या नहीं है।थोड़ा जाँच लो, क्या पता वो खतरा बस यूँ ही हो, छद्म। सोच लिया है, वास्तव में नहीं है। एक झटके में बहुत बड़ा खतरा न उठाना चाहते हो तो थोड़ा-थोड़ा प्रयोग कर लो।जहाँ लगे कि यहाँ सबसे कम खतरा है वहाँ से प्रयोग शुरू कर लो। पर शुरू कर के जाँचो तो सही कि जो तुमने विचार बैठा लिया है, जिस खतरे की तुम आशंका कर रहे हो, उस आशंका में कोई दम भी है या तुम यूँ ही फ़ालतू ही डरे बैठे हो।



