प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि हमारे सामने जब कोई परिस्थिति आती है तो हम उसके तथ्य को देखने के बजाय, उसे उसके अतीत से जोड़कर देखते हैं। इसका कारण क्या है? जैसे कि कभी हम कोई लड़ाई हार जाते हैं तो आगे की लड़ाइयों में संशय और डर बन जाता है, और अपनी पुरानी हार से अपनी हस्ती का प्रश्न खड़ा होता है।
आचार्य प्रशांत: देखो, अतीत के प्रसंग में वर्तमान को देखने से, हमारा अहंकार वर्तमान में निहित ख़तरे से बच जाता है। अतीत में आपने परिस्थिति को ग़लत तरीक़े से देखा था, उसी ग़लती का परिणाम आप हैं, वो ग़लती आप में समायी हुई है। वर्तमान को अगर आपने सही देख लिया तो ग़लती ठीक हो जाएगी, भूल-सुधार हो जाएगा। ग़लती कौन था? आप स्वयं, तो भूल-सुधार का अर्थ क्या होगा? आपको मिटना पड़ेगा।
अतीत में सुरक्षा है, क्योंकि आप स्वयं अतीत का ही निर्माण हैं। अगर आप अतीत, माने ‘प्रकृति’ का निर्माण न होते तो आपको अतीत से इतना आसक्त न होना पड़ता, इसलिए वर्तमान की अवहेलना करना आवश्यक हो जाता है। वर्तमान वो अकेला बिन्दु है जहाँ आप सत्य में प्रवेश कर सकते हैं। वर्तमान में ख़तरा है। किसके लिए? अहंकार के लिए। अहंकार कहाँ से आता है?
अहंकार आता है अतीत से, क्योंकि अहंकार को विषय चाहिए। विषय सब आपके अतीत में समाहित हैं, तो अतीत को बचाए रखना अहंकार के लिए बहुत ज़रूरी होता है; अतीत से सम्बन्धित रहना, अहंकार के लिए अति आवश्यक है।
अतीत की स्मृतियों को अच्छा बोलना, बुरा बोलना, उनमें डोलते रहना, ये बहुत ज़रूरी है, नहीं तो हम बचेंगे ही नहीं।







