प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, माता-पिता की मृत्यु का भय सताता है, कि कैसा जीवन रहेगा। मतलब जीवन में कुछ करने की हिम्मत होगी या नहीं? मतलब, मेरे अंदर ऐसा लगता है कि...
आचार्य: अभी वो हैं। अभी वो हैं, अभी उनके साथ कैसा जीवन बिता रहे हो, इस पर ध्यान दो न। जब वो चले गये तो चले ही गये, इसमें कोई लाग-लपेट की बात नहीं। उन्हें भी जाना है, तुम्हें भी जाना है। यहाँ जितनी मूर्तियाँ बैठी हैं सबको जाना है। ये तो नहीं है कि वो जाएँगे नहीं, ये तो निश्चित है कि वो जाएँगे। अभी तो हैं। अभी उनके साथ कैसी ज़िन्दगी बिता रहे हो?
प्र: अभी तो उनका स्वास्थ्य सब ठीक है।
आचार्य: तो बस ठीक है। इसी के बारे में केंद्रित रहो। जो उन्हें ऊँचे-से-ऊँचा दे सकते हो, दो। और पता होना चाहिए देने योग्य वस्तु क्या होती है। बार-बार सोचना क्या कि चले गये तो क्या होगा। निश्चित है कि जाएँगे। और कोई बड़ी बात नहीं कि उनसे पहले तुम निकल जाओ। कोई बड़ी बात नहीं कि तुमसे और उनसे पहले मैं निकल जाऊँ। यहाँ कौनसी देह अमर होकर आयी है। तो इस बात की चिंता क्या कर रहे हो कि किसी की विदाई हो जाएगी। इसमे चिंतन जैसा कुछ है ही नहीं।
जो चीज़ निश्चित है, उसको लेकर क्या ऊहापोह मे रहना। कुछ अनिश्चित हो, संभावित मात्र हो, तो उसको लेकर सोचो।
कल का दिन है, देखो कल के दिन क्या कर सकते हो उनके साथ। इससे आगे तुम्हारा ज़ोर नहीं है। सांसारिक दृष्टि से भी पढ़े-लिखे हो। अध्यात्म की ओर भी तुम्हारी रुचि है। बुद्धिमान हो, जानते हो, समझते हो। दोनों ही आयामों का तुम्हें कुछ ज्ञान है। तो देखो न कि सुन्दर से सुन्दर भेंट क्या है जो माँ-बाप को दी जा सकती है। वो दो उनको।




