अलग-अलग नहीं हैं दोनों! बाहर से अलग हैं, अंदर से एक हैं। जिसको हम आध्यात्मिक ज्ञान भी कहते हैं, वह बस मन की खोजबीन, जाँच-पड़ताल का नाम है। हमें दोनों चाहिए, विज्ञान भी, अध्यात्म भी। विज्ञान इसीलिए ताकि तुम्हें जगत की हक़ीक़त पता रहे, और अध्यात्म ताकि तुम्हें मन का ज्ञान रहे, तुम्हें पता हो कि ये मन चीज़ क्या है? इन दोनों का ही पता होना चाहिए, जैसे तुम्हारे मन के पखेरू को दो पंख मिल जाएँ, अब वो मुक्ति के आकाश में उड़ जाएगा।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम एक बोधपूर्ण जीवन जी सकें और मान्यताओं से प्रभावित ना हों इसके लिए सांसारिक ज्ञान ज़्यादा आवश्यक है या आध्यात्मिक ज्ञान?
आचार्य प्रशांत: अलग-अलग नहीं हैं दोनों भाई! बाहर से अलग हैं, अंदर से एक हैं। असल में जिसको आध्यात्मिक ज्ञान भी कहते हो, वो क्या है? वह बस मन की खोजबीन, जाँच-पड़ताल का नाम है। तो ऐसे समझ लो कि, जैसे मुक्ति की दो आवश्यकताएँ हों, दो आवश्यकताएँ क्यों? क्योंकि हम द्वैत में फँसे हैं। दो सिरे होते हैं द्वैत के। दोनों सिरों को देखना पड़ता है न।
एक सिरे पर हमको बाँधा हुआ है उसने जिसे संसार कहते हैं और दूसरे सिरे पर हम बँधे हुए हैं उससे जो संसार से बँधा रहना चाहता है, जो संसार की ओर आकर्षित होता है। जिसे मुक्ति चाहिए उसे इन दोनों को देखना पड़ेगा; संसार को भी देखना पड़ेगा, मन को भी देखना पड़ेगा।
संसार मन को रिझाता है और मन संसार सजाता है। दोनों में बड़ा गहरा नाता है। मुक्ति जिसे चाहिए उसे इन दोनों की ही खोजबीन करनी पड़ती है।




